वेद और श्यामा की मेहनत बाहर वालो को दिखाई दे रही थी।जब भी कोई वेद की तारीफ करता तो श्यामा उसके शव्दो को सुनकर तड़प जाती श्यामा के मन में जलन पैदा हो रही थी। अब वह दिन रात घर में क्लेश करने के बहाने ढूंढ़ती रहती। उसकी छोटी सी बेटी को भी दूध देने पर शोर मचा देती। दिनरात की मेहनत के बाद भी सुकन्या और सुमन कमजोर होती जा रही थी। सुकन्या उस माहौल के हिसाब से ढल नही पा रही थी। सुमन को दूध नही मिल पा रहा था। उसको दस्त लग गए थे। उसकी हालत बहुत ख़राब हो गयी थी। उसे देख कर लग रहा था। सुमन कुछ दिन की मेहमान है जब हर चीज की अति हो गयी तब सुकन्या के शव्दो का वेद पर असर हुआ।
उन्होंने अपने पिताजी से बात की-घर में सामान की कोई कमी हो तो आप मुझसे कहो। क्या किसी चीज की कमी है।
मुंशीराम ने कहा -तू क्या कहना चाहता है। सही से कह। तेरी ये बाते हमें समझ नही आ रही है।
वेद ने कहा -घर में दूध की कमी है। यदि ऐसा है तो ज्यादा दूध मंगवाना शुरू कर दो। मेने खर्चा देने से मना नही किया है।
मुंशीराम बोले -तुझे दूध को लेकर किसने कहा है। हमने तुझसे कोई शिकायत की है। जो ऐसे बोल रहा है।
वेद ने अपने पिताजी से सुमन की तबियत से सम्बंधित बात की। तो मुंशीराम आपे से बाहर हो गए। उन्होंने कहा -तू बड़ा बच्चे वाला बनता है। क्या हमने बच्चे नही पाले। तेरी बेटी अनोखी है। ये भी और बच्चो के साथ पल जायेंगी ।
वेद का इससे पहले एक बेटा हो कर सही देखभाल के आभाव में दुनिया से चला गया था। उसका दुःख वेद के मन में अभी तक था। सुमन की हालत भी बहुत ख़राब हो रही थी उसकी हालत से सुकन्या और वेद परेशान रहते थे। वे दुबारा से बच्चे का दुःख नही सहना चाहते थे।
सुमन वेद की आँखों का तारा थी। पिता के मन में बेटी के लिए एक कोमल जगह होती है। उसके लिए वेद बहुत संवेदनशील थे। जो इंसान अपने पिता के सामने कभी नही बोला। उसको अपने सामने बोलते देख कर मुंशीराम आपे से बाहर हो गए। उन्होंने वेद की चिंता को समझने के स्थान पर इसे अपनी इज्जत का प्रश्न बना दिया। जो चिंगारी धीरे -धीरे सुलग रही थी। वह वेद के बोलते ही ज्वाला बन गयी। उसने सब कुछ भस्म कर दिया।
वेद की तरक्की की खबरे जब श्यामा के सामने आती थी। उससे उसे जलन होती थी। वह खुश होने के स्थान पर मुंशीराम को भड़काने में अपनी सारी ताकत लगा देती थी। श्यामा के शव्दो का असर अब मुंशीराम पर होने लगा था। मुंशीराम अपना बुढ़ापा समझ नही पा रहे थे। बल्कि वेद की तरक्की को अपनी मेहनत का फल समझ रहे थे। उन्हें हमेशा लगता था। उनकी बदौलत ही उसका बेटा इतनी तरक्की कर पाया है। उसके मन में बेटा घमण्ड़ो हो गया था। वह बाप के सामने जबान लड़ाने लगा था।
दिनों दिन घर में कड़वाहट फैलती जा रही थी। कोई भी वेद और सुकन्या के सवालो का सही जबाब नही देता था। उस घर में धीरे से चुप्पी घर करती जा रही थी। अब वह शांति सबको असहज बना रही थी.
एक दिन मुंशीराम ने वेद से गत्ते की फैक्टरी छोड़ देने के लिए कहा। वेद उनका मतलब समझ नही पाया। जब उन्हें समझ आया तब वह एकदम स्तब्ध रह गए। उससे कुछ कहते नही बना। उनकी सारी मेहनत मुंशीराम अपनी मेहनत का फल बता रहे थे। मुंशीराम कभी भी उस फैक्टरी में गए नही थे। श्यामा के शव्दो ने उनकी सोचने समझने की शक्ति ख़त्म कर दी।
उन्होंने वेद के सामने कहा -जैसी तू फैक्टरी चला रहा है। उससे ज्यादा अच्छी में चला कर दिखा दूंगा।
ये वेद के लिए एक तमाचा था। जिसने उसे हिला के रख दिया। वेद बहुत स्वाभिमानी था। उसने अपने भविष्य के बारे में बिलकुल नही सोचा। अपने पिताजी को गट्टे की फैक्टरी की जिम्मेदारी उसी समय सौंप दी। उससे अलग होने का निर्णय किया। उसके इस निर्णय के बारे में किसी ने कल्पना नही की थी। सभी को लग रहा था। वेद अपने पिता के सामने दुखी होकर क्षमा मांगेगा और वे अपना बड़प्पन दिखाते हुए कुछ अपशव्द बोलकर उसे क्षमा कर देंगे।
मुंशीराम के मुह से निकले हुए शव्द वे वापस लौटा नही सकते थे। उन्होंने जिंदगी भर नौकरी की थी। उन्हें खुद पता था। उनके अंदर व्यापर करने की शक्ति और समझ नही है। जबान से निकला तीर अब वापस नही ले पा रहे थे। उनका बड़प्पन उन्हें झुकने से रोक रहा था।
श्यामा की मुँहमाँगी मुराद पूरी हो गयी थी। वह मन ही मन बहुत खुश हो रही थी। उसे लग रहा था चलता हुआ कारखाना उसके बच्चो को मिल जायेगा। सौतेला बेटा उसकी आँखों से दूर हो जायेगा। उसका जीवनं खुशियो से भरा रहेगा।
उन्होंने अपने पिताजी से बात की-घर में सामान की कोई कमी हो तो आप मुझसे कहो। क्या किसी चीज की कमी है।
मुंशीराम ने कहा -तू क्या कहना चाहता है। सही से कह। तेरी ये बाते हमें समझ नही आ रही है।
वेद ने कहा -घर में दूध की कमी है। यदि ऐसा है तो ज्यादा दूध मंगवाना शुरू कर दो। मेने खर्चा देने से मना नही किया है।
मुंशीराम बोले -तुझे दूध को लेकर किसने कहा है। हमने तुझसे कोई शिकायत की है। जो ऐसे बोल रहा है।
वेद ने अपने पिताजी से सुमन की तबियत से सम्बंधित बात की। तो मुंशीराम आपे से बाहर हो गए। उन्होंने कहा -तू बड़ा बच्चे वाला बनता है। क्या हमने बच्चे नही पाले। तेरी बेटी अनोखी है। ये भी और बच्चो के साथ पल जायेंगी ।
वेद का इससे पहले एक बेटा हो कर सही देखभाल के आभाव में दुनिया से चला गया था। उसका दुःख वेद के मन में अभी तक था। सुमन की हालत भी बहुत ख़राब हो रही थी उसकी हालत से सुकन्या और वेद परेशान रहते थे। वे दुबारा से बच्चे का दुःख नही सहना चाहते थे।
सुमन वेद की आँखों का तारा थी। पिता के मन में बेटी के लिए एक कोमल जगह होती है। उसके लिए वेद बहुत संवेदनशील थे। जो इंसान अपने पिता के सामने कभी नही बोला। उसको अपने सामने बोलते देख कर मुंशीराम आपे से बाहर हो गए। उन्होंने वेद की चिंता को समझने के स्थान पर इसे अपनी इज्जत का प्रश्न बना दिया। जो चिंगारी धीरे -धीरे सुलग रही थी। वह वेद के बोलते ही ज्वाला बन गयी। उसने सब कुछ भस्म कर दिया।
वेद की तरक्की की खबरे जब श्यामा के सामने आती थी। उससे उसे जलन होती थी। वह खुश होने के स्थान पर मुंशीराम को भड़काने में अपनी सारी ताकत लगा देती थी। श्यामा के शव्दो का असर अब मुंशीराम पर होने लगा था। मुंशीराम अपना बुढ़ापा समझ नही पा रहे थे। बल्कि वेद की तरक्की को अपनी मेहनत का फल समझ रहे थे। उन्हें हमेशा लगता था। उनकी बदौलत ही उसका बेटा इतनी तरक्की कर पाया है। उसके मन में बेटा घमण्ड़ो हो गया था। वह बाप के सामने जबान लड़ाने लगा था।
दिनों दिन घर में कड़वाहट फैलती जा रही थी। कोई भी वेद और सुकन्या के सवालो का सही जबाब नही देता था। उस घर में धीरे से चुप्पी घर करती जा रही थी। अब वह शांति सबको असहज बना रही थी.
एक दिन मुंशीराम ने वेद से गत्ते की फैक्टरी छोड़ देने के लिए कहा। वेद उनका मतलब समझ नही पाया। जब उन्हें समझ आया तब वह एकदम स्तब्ध रह गए। उससे कुछ कहते नही बना। उनकी सारी मेहनत मुंशीराम अपनी मेहनत का फल बता रहे थे। मुंशीराम कभी भी उस फैक्टरी में गए नही थे। श्यामा के शव्दो ने उनकी सोचने समझने की शक्ति ख़त्म कर दी।
उन्होंने वेद के सामने कहा -जैसी तू फैक्टरी चला रहा है। उससे ज्यादा अच्छी में चला कर दिखा दूंगा।
ये वेद के लिए एक तमाचा था। जिसने उसे हिला के रख दिया। वेद बहुत स्वाभिमानी था। उसने अपने भविष्य के बारे में बिलकुल नही सोचा। अपने पिताजी को गट्टे की फैक्टरी की जिम्मेदारी उसी समय सौंप दी। उससे अलग होने का निर्णय किया। उसके इस निर्णय के बारे में किसी ने कल्पना नही की थी। सभी को लग रहा था। वेद अपने पिता के सामने दुखी होकर क्षमा मांगेगा और वे अपना बड़प्पन दिखाते हुए कुछ अपशव्द बोलकर उसे क्षमा कर देंगे।
मुंशीराम के मुह से निकले हुए शव्द वे वापस लौटा नही सकते थे। उन्होंने जिंदगी भर नौकरी की थी। उन्हें खुद पता था। उनके अंदर व्यापर करने की शक्ति और समझ नही है। जबान से निकला तीर अब वापस नही ले पा रहे थे। उनका बड़प्पन उन्हें झुकने से रोक रहा था।
श्यामा की मुँहमाँगी मुराद पूरी हो गयी थी। वह मन ही मन बहुत खुश हो रही थी। उसे लग रहा था चलता हुआ कारखाना उसके बच्चो को मिल जायेगा। सौतेला बेटा उसकी आँखों से दूर हो जायेगा। उसका जीवनं खुशियो से भरा रहेगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें