#privar se milan

    वेद की आमदनी पहले से दुगनी हो गयी उसके काम से खुश होकर उसके मालिक ने उसकी तनख्वाह बढ़ा  दी थी। अब वेद ने सुकन्या और सुमन को दिल्ली  लाने के बारे में विचार किया। उसने बुआजी से सलाह की उन्होंने हामी भर दी। अगली छूट्टी  वाले दिन उसने अपने परिवार के पास जाने का निर्णय किया।  वेद ने बुआजी के घर के पास एक किराये का छोटा सा घर ले लिया। उसने उस घर में थोड़ा सा जरूरत का सामान भी ला  कर रख दिया जिससे सुकन्या को घर सँभालने में कोई परेशानी ना  हो
    छुट्टी बाले दिन वेद के चेहरे पर विशेष रौनक थी। उसकी बुआजी  की लड़कियाँ उसकी हालत देखकर उससे हँसी -मजाक कर रही थी। वेद उनके प्रशनो का जबाब देने के स्थान पर केवल मुस्कुरा कर रह जाता था। उसे समझ नही आ  रहा था।  उनकी हंसी को किस रूप में ले। वह बहनो का मजाक समझ रहा था। वेद तैयार होकर अलीगढ़ के लिए चल पड़ा। उसने अपने परिवार को खुश करने के लिए बहुत सारा सामान खरीदा था। जिसकी उसके परिवार को जरूरत थी।
      वेद को अलीगढ़ छोड़े हुए चार महीने बीत  गए थे. उसका इतने दिनों में गुस्सा भी शांत हो गया था। उसने अपने माँ -पिताजी के लिए काफी सारा सामान खरीदा था। उसके मन में उनके लिए अब कोई कलुष नही रहा था। उसने घर में पहुँचते ही बड़ो के पाँव छुए छोटो को ढेर सारा प्यार किया उसके बाद सबको तोहफे दिए। छोटे भाई -बहन तोहफे पाकर खुश हो गए। उनमे काफी अंतर था। उन्हें अपने भाई से कोई खास लगाव या नफरत नही थी। वे बहुत छोटे थे। उनका सम्बन्ध केवल तोहफों से था। उनको तोहफे पाकर सब कुछ मिल गया था। वे अपने तोहफे अपने दोस्तों को दिखाने चले गए।  लेकिन उनकी माँ के चेहरे की त्यौरियां  कम नही हुई। पिताजी ने उनसे सीधे मुँह बात नही की। लेकिन वेद ने उनका सम्मान करने में गुरेज नही किया।
    वेद सबसे मिलकर सुकन्या के पास गया। सुकन्या भी चार महीने से वेद का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसने हरेक पल उसको याद करके बिताया था। आज उसका वियोग ख़त्म हो गया था। वेद को देखते ही सुकन्या की आँखों से आंसू बहने लगे। ये ख़ुशी के आंसू थे जो दोनों की आँखों से बह  रहे थे.उनकी पीड़ा शब्दों में बयान करनी मुश्किल है। जिन्होंने चार महीने विपरीत माहौल में गुजारे है वे उनका दर्द समझ सकते है।
      इतने में वेद की बेटी उसके पास आ  गयी। सुमन ने चार महीने में चलना सीख लिया था वह कुछ शब्द बोलने लगी थी। वह वेद के पैरो  से आकर लिपट  गयी। गोद में उठाने की जिद करने लगी। वेद को सुमन की बालसुलभ हरकते मन को भा  रही थी। उसने सुमन को गोद में उठा कर प्यार करना शुरू कर दिया। सुमन पिता के प्यार का मतलब समझ नही पायी। वह घबरा गयी जोर से रोने लगी। वेद भी समझ गया। सुमन बहुत छोटी है। उसको इतना अधिक कसकर प्यार करने लगा था जिससे उसे बेचैनी होने लगी थी। उसने सुमन को सुकन्या की गोद में दे दिया। सुमन माँ की गोद में बैठकर पिता को निहारने लगी। उसे इतनी समझ नही थी की ये उसके पिता हे बल्कि वो सुकन्या के पास कौन  आ गया पहचानने की कोशिश कर रही थी क्योंकि माँ के पास अबतक उसका ही अधिकार था। उसकी माँ किससे बात कर रही है। उसकी जिज्ञासा उसे वेद के पास खींच लायी थी।
     अगले दिन वेद ने बड़ो के सामने सुकन्या को दिल्ली ले जाने के बारे में पूछा।  उसके पिताजी ने उन्हें ले जाने की आज्ञा देते हुए कहा -तेरी अमानत  है हम कैसे रोक सकते है। जब चाहे ले जा। 
  अगले दिन से सुकन्या ने दिल्ली के लिए सामान बाँधना शुरू कर दिया।     वे   दिल्ली के लिए चल पड़े नई मंजिल की तरफ। अपनों से दूर। सुकन्या का मायका और ससुराल दोनों अलीगढ़ में थे। वह सबसे दूर जा रही थी उसके  मन में दुःख था। उम्मीदों का  नया आसमान उसको अपनी और बुला रहा था।  

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