वेद को नौकरी मिल गयी पर ये नौकरी उनके मन मुताबिक नही थी। वे दिन रात मेहनत करते पर उसमे उन्हें ख़ुशी प्राप्त नही हो रही थी। वे अपनी जरूरत के ही पैसे खर्च करते साथ ही उसमे से कुछ रूपये बचाते भी थे। उन्होंने अपने काम का सपना देखा था। उस सपने को साकार करने में लगे रहते।
कहते है -जहाँ चाह होती है वहाँ राह भी निकल आती है। ऐसा ही वेद के साथ भी हुआ। उसके काम से उनका मालिक खुश हो गया। उसके पास एक गत्ते के काम का आर्डर आया जिसके लिए उसे कोई ढंग का काम करने वाला इंसान नही मिल रहा था.उन्होंने वेद के अंदर काम की लगन और जूनून देखा था। वेद की आँखों की चमक ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके अंदर के जोश और लगन ने उन्हें वेद से बात करने के लिए तैयार किया। वेद से उन्होंने गत्ते के काम करने के बारे में बात चलायी। तो वह एकदम जबाब नही दे पाया। वेद ने घर में पूछ कर जबाब देने के लिए कहा।
वेद ने मुंशीराम से घर में आकर बात चलायी। तो मुंशीराम के पास भी उचित जबाब नही था। उन्होंने अभी तक रेलवे की नौकरी की थी उनमे जोखिम लेने का होंसला नही था। उनके पास परिवार की जिम्मेदारी भी थी। पैसे की तंगी के कारण वे भी सोच में पड़ गए। उन्होंने कहा -मेँ कल सोच के जबाब दूँगा।
अगले दिन मुंशीराम ने वेद को कहा -यदि तुम गत्ते का काम करना चाहते हो तो अवश्य करो। पर मै तुम्हारी पैसे से कोई मदद नही कर पाउँगा।
वेद को घर के हालात पता थे। उन्हें अपने परिवार से मदद की उम्मीद पहले से नही थी। उसे जो कुछ करना था। अपनी हिम्मत के भरोसे ही करना था। उन्होंने अपने मालिक से अपनी रजामंदी दे दी। कुछ मालिक का नाम, पैसा और साख के कारण उनका काम बनता चला गया। वेद ने अपनी जमा पूंजी उसमे लगा कर २५ प्रतिशत की पार्टनर शिप ले ली। वेद ने गत्ते की फैक्टरी चलाने के लिए दिन रात एक कर दिए। उनकी मेहनत रंग लाने लगी। अब वे अपनी नौकरी की अपेक्षा कही ज्यादा कमाने लगे। वेद अभी केवल 24 साल के हुए थे। उनके मन को लाहौर के कारण जो विपदा सहन करने के लिए मिली थी अब उसका दंश हल्का होने लगा था। उनके घर के हालत सुधरने लगे।
वेद के पैसे की रौनक़ हर तरफ दिखाई देने लगी उनके घर में बदलाव आने शुरू हो गए। उन्होंने अलीगढ़ के मकान को पक्का करवा दिया।
इस बीच वेद के घर एक कन्या का जन्म हो गया था। उन्होंने कन्या का नाम सुमन रखा। वह कन्या बहुत सुन्दर थी। जो उसे देखता वह उसे देखता रह जाता। सुमन सबकी आँखों का तारा बन गयी थी। वेद दिनरात फैक्टरी में काम करते और सुकन्या घर के काम में लगी रहती। वे परिवार में अपनापन खोजने में दिनरात एक कर रहे थे।
कहते है -अपनी माँ थोड़ा करने पर ही खुश हो जाती है। पर सौतेली माँ को खुश करना बहुत मुश्किल होता है। स्यामा को भी सुकन्या और वेद के व्यवहार और मेहनत कोई ख़ुशी नही दे पाती थी। वे हर समय सुकन्या और वेद के कामो में कमी ही ढूंढ़ती रहती। वह कोई समय नही देखती थी जब उनके कामो में कमी न निकाल सके। वे उन्हें अपने बहु बेटो के रूप में नही ले पाती थी। बल्कि वह सुकन्या को बहु की अपेक्षा अपनी प्रतिस्पर्धी समझती थी। सुकन्या सुंदरता में बेजोड़ थी। जो सुकन्या को देखता ठगा सा रह जाता। उसके आलावा सुकन्या काम में भी सुघड़ ग्रहणी थी। ये दोनों बाते उसे श्यामा की आँखों में चढ़ने नही देती थी। वे हमेशा सुकन्या और वेद को अपना न सकी।
कहते है -जहाँ चाह होती है वहाँ राह भी निकल आती है। ऐसा ही वेद के साथ भी हुआ। उसके काम से उनका मालिक खुश हो गया। उसके पास एक गत्ते के काम का आर्डर आया जिसके लिए उसे कोई ढंग का काम करने वाला इंसान नही मिल रहा था.उन्होंने वेद के अंदर काम की लगन और जूनून देखा था। वेद की आँखों की चमक ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके अंदर के जोश और लगन ने उन्हें वेद से बात करने के लिए तैयार किया। वेद से उन्होंने गत्ते के काम करने के बारे में बात चलायी। तो वह एकदम जबाब नही दे पाया। वेद ने घर में पूछ कर जबाब देने के लिए कहा।
वेद ने मुंशीराम से घर में आकर बात चलायी। तो मुंशीराम के पास भी उचित जबाब नही था। उन्होंने अभी तक रेलवे की नौकरी की थी उनमे जोखिम लेने का होंसला नही था। उनके पास परिवार की जिम्मेदारी भी थी। पैसे की तंगी के कारण वे भी सोच में पड़ गए। उन्होंने कहा -मेँ कल सोच के जबाब दूँगा।
अगले दिन मुंशीराम ने वेद को कहा -यदि तुम गत्ते का काम करना चाहते हो तो अवश्य करो। पर मै तुम्हारी पैसे से कोई मदद नही कर पाउँगा।
वेद को घर के हालात पता थे। उन्हें अपने परिवार से मदद की उम्मीद पहले से नही थी। उसे जो कुछ करना था। अपनी हिम्मत के भरोसे ही करना था। उन्होंने अपने मालिक से अपनी रजामंदी दे दी। कुछ मालिक का नाम, पैसा और साख के कारण उनका काम बनता चला गया। वेद ने अपनी जमा पूंजी उसमे लगा कर २५ प्रतिशत की पार्टनर शिप ले ली। वेद ने गत्ते की फैक्टरी चलाने के लिए दिन रात एक कर दिए। उनकी मेहनत रंग लाने लगी। अब वे अपनी नौकरी की अपेक्षा कही ज्यादा कमाने लगे। वेद अभी केवल 24 साल के हुए थे। उनके मन को लाहौर के कारण जो विपदा सहन करने के लिए मिली थी अब उसका दंश हल्का होने लगा था। उनके घर के हालत सुधरने लगे।
वेद के पैसे की रौनक़ हर तरफ दिखाई देने लगी उनके घर में बदलाव आने शुरू हो गए। उन्होंने अलीगढ़ के मकान को पक्का करवा दिया।
इस बीच वेद के घर एक कन्या का जन्म हो गया था। उन्होंने कन्या का नाम सुमन रखा। वह कन्या बहुत सुन्दर थी। जो उसे देखता वह उसे देखता रह जाता। सुमन सबकी आँखों का तारा बन गयी थी। वेद दिनरात फैक्टरी में काम करते और सुकन्या घर के काम में लगी रहती। वे परिवार में अपनापन खोजने में दिनरात एक कर रहे थे।
कहते है -अपनी माँ थोड़ा करने पर ही खुश हो जाती है। पर सौतेली माँ को खुश करना बहुत मुश्किल होता है। स्यामा को भी सुकन्या और वेद के व्यवहार और मेहनत कोई ख़ुशी नही दे पाती थी। वे हर समय सुकन्या और वेद के कामो में कमी ही ढूंढ़ती रहती। वह कोई समय नही देखती थी जब उनके कामो में कमी न निकाल सके। वे उन्हें अपने बहु बेटो के रूप में नही ले पाती थी। बल्कि वह सुकन्या को बहु की अपेक्षा अपनी प्रतिस्पर्धी समझती थी। सुकन्या सुंदरता में बेजोड़ थी। जो सुकन्या को देखता ठगा सा रह जाता। उसके आलावा सुकन्या काम में भी सुघड़ ग्रहणी थी। ये दोनों बाते उसे श्यामा की आँखों में चढ़ने नही देती थी। वे हमेशा सुकन्या और वेद को अपना न सकी।
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