वेद और सुकन्या की गृहस्थी अच्छी तरह से चलने लगी। इस बीच उनके घर दो बेटियो ने और जन्म ले लिया। उनके परिवार में बैटे का इंतजार था। वेद को व्यापार करने का बहुत शौक़ था। वह जितना कमा कर लाते थे। सुकन्या को उसमे से कम पैसे खर्चने का निर्देश दे रखा था।वेद को दिल्ली में ओरो से काफी ज्यादा वेतन मिलता था। उनकी लगन और मेहनत ने उन्हें इतनी तरक्की दिलवा दी थी। जिसकी उनकी उम्र के और लोग उम्मीद भी नही कर पाते थे। वे उसमे से आधे रूपये अलीगढ़ भेज देते थे। उसके बाद घर खर्च के बाद जो पैसे बचते थे। उससे अपने कारखाने में लगाने की कोशिश करते। उन्हें कारखाना खोलने के लिए किसी और से किसी तरह की मदद मिलने की उम्मीद नही थी। वे केवल अपने खर्च में कटौती कर के कारखाने के सपने को साकार कर सकते थे। धीरे -धीरे उनके सपने ने दिल्ली में आकार लेना शुरू कर दिया।
उधर अलीगढ़ में जिन्होंने गत्ते का कारखाना उनसे ये सोच कर लिया था कि उनका जीवन ऐशोआराम से गुजरेगा। मेहनत के आभाव में कारखाना बंद हो गया। वे सब फिर से वेद से पैसे की मांग करने लगे।वेद का मन पिता के शव्दो से दुखी हो गया। उन्होंने अपने पिता के परिवार की यथासम्भव मदद करनी शुरू कर दी। उनका छोटा भाई बड़ा हो गया था। उसके लिए काम ढूंढने का जिम्मा उनके पिता ने वेद को सौंप दिया। दिल्ली में वेद ने छोटा सा कारखाना लगा लिया था। उस कारखाने की मालकिन उन्होंने सुकन्या को बना दिया था। क्योंकि वेद अभी भी पुरे दिन नौकरी करते थे। शाम के समय अपने कारखाने में आकर काम करते थे। उनकी मेहनत से उनका काम अच्छा चलने लगा। जब उनके पिताजी ने भाई के लिए काम ढूंढने के लिए कहा तो उन्होंने सोचा हम दोनों भाई इस कारखाने को चलाएंगे। उन्होंने नौकरी छोड़ कर पूरा ध्यान कारखाने की तरफ देना शुरू कर दिया। उनके कारखाने में दिन दूनी रात चौगनी तरक्की होने लगी। उन्होंने अपने भाई मोहन को दिल्ली बुला लिया। ये सोचकर पिता के आदेश का पालन हो जायेगा और उन्हें एक सहायक भी मिल जायेगा।
उनका परिवारिक वातावरण हमेशा पूजा पाठ और कला से सम्बंधित रहा था। पर वेद का मन हमेशा नए अविष्कार करने में लगा रहता वे हमेशा विज्ञानं के मुरीद रहे। वेद के सामने जैसी चीज रख दी जाती थी। वे एकदम मशीनो के द्वारा उसका प्रतिरूप बना देते थे। उनके काम को देखकर सभी हैरान हो जाते थे।
इसी बीच वेद के घर में बेटे का जन्म हुआ सभी फुले न समां रहे थे। तीसरी बेटी के बाद बेटे के जन्म पर उसकी पीठ पर भेली फोड़ने की रस्म की गयी। उसके पैदा होने का जश्न धूम -धाम से मनाया गया। उसकी पहली राखी पर वेद ने राखी की जगह घडी पहना कर अपना शोक पूरा किया। जो भी वहाँ मौजूद था उसको वेद का ऐसा व्यवहार अमीरी का दिखावा लगा। सब उसकी पीठ पीछे बुराई करने लगे। लेकिन वे उसमे पिता के प्यार को नही देख पाये।
वेद का काम भली भांति चल रहा था। उसके परिवार में कोई परेशानी नही थी। लेकिन अलीगढ़ में पिता के परिवार में दिक्क़ते शुरू हो गयी थी। वे हर तरह से फिर वेद पर निर्भर होते जा रहे थे।
अब सुकन्या भी मुखर होने लगी थी। उसे उनकी समस्यो को लेकर वेद को अपने सुख छोड़ते देखकर बहुत झल्लाहट होने लगी थी। सुकन्या अब चंद्रमुखी नही रही थी वह सभी पर गुस्सा उतारने लगी थी। जिनके लिए वेद इतना कर रहे थे। वे भी पैसे लेकर उन्हें पूछते नही थे। ये सुकन्या को सहन नही होता था। वे वेद को समझा कर हार जाती लेकिन वेद पिता के प्रति अपने फर्ज को निभाहने में लगे रहते।
उधर अलीगढ़ में जिन्होंने गत्ते का कारखाना उनसे ये सोच कर लिया था कि उनका जीवन ऐशोआराम से गुजरेगा। मेहनत के आभाव में कारखाना बंद हो गया। वे सब फिर से वेद से पैसे की मांग करने लगे।वेद का मन पिता के शव्दो से दुखी हो गया। उन्होंने अपने पिता के परिवार की यथासम्भव मदद करनी शुरू कर दी। उनका छोटा भाई बड़ा हो गया था। उसके लिए काम ढूंढने का जिम्मा उनके पिता ने वेद को सौंप दिया। दिल्ली में वेद ने छोटा सा कारखाना लगा लिया था। उस कारखाने की मालकिन उन्होंने सुकन्या को बना दिया था। क्योंकि वेद अभी भी पुरे दिन नौकरी करते थे। शाम के समय अपने कारखाने में आकर काम करते थे। उनकी मेहनत से उनका काम अच्छा चलने लगा। जब उनके पिताजी ने भाई के लिए काम ढूंढने के लिए कहा तो उन्होंने सोचा हम दोनों भाई इस कारखाने को चलाएंगे। उन्होंने नौकरी छोड़ कर पूरा ध्यान कारखाने की तरफ देना शुरू कर दिया। उनके कारखाने में दिन दूनी रात चौगनी तरक्की होने लगी। उन्होंने अपने भाई मोहन को दिल्ली बुला लिया। ये सोचकर पिता के आदेश का पालन हो जायेगा और उन्हें एक सहायक भी मिल जायेगा।
उनका परिवारिक वातावरण हमेशा पूजा पाठ और कला से सम्बंधित रहा था। पर वेद का मन हमेशा नए अविष्कार करने में लगा रहता वे हमेशा विज्ञानं के मुरीद रहे। वेद के सामने जैसी चीज रख दी जाती थी। वे एकदम मशीनो के द्वारा उसका प्रतिरूप बना देते थे। उनके काम को देखकर सभी हैरान हो जाते थे।
इसी बीच वेद के घर में बेटे का जन्म हुआ सभी फुले न समां रहे थे। तीसरी बेटी के बाद बेटे के जन्म पर उसकी पीठ पर भेली फोड़ने की रस्म की गयी। उसके पैदा होने का जश्न धूम -धाम से मनाया गया। उसकी पहली राखी पर वेद ने राखी की जगह घडी पहना कर अपना शोक पूरा किया। जो भी वहाँ मौजूद था उसको वेद का ऐसा व्यवहार अमीरी का दिखावा लगा। सब उसकी पीठ पीछे बुराई करने लगे। लेकिन वे उसमे पिता के प्यार को नही देख पाये।
वेद का काम भली भांति चल रहा था। उसके परिवार में कोई परेशानी नही थी। लेकिन अलीगढ़ में पिता के परिवार में दिक्क़ते शुरू हो गयी थी। वे हर तरह से फिर वेद पर निर्भर होते जा रहे थे।
अब सुकन्या भी मुखर होने लगी थी। उसे उनकी समस्यो को लेकर वेद को अपने सुख छोड़ते देखकर बहुत झल्लाहट होने लगी थी। सुकन्या अब चंद्रमुखी नही रही थी वह सभी पर गुस्सा उतारने लगी थी। जिनके लिए वेद इतना कर रहे थे। वे भी पैसे लेकर उन्हें पूछते नही थे। ये सुकन्या को सहन नही होता था। वे वेद को समझा कर हार जाती लेकिन वेद पिता के प्रति अपने फर्ज को निभाहने में लगे रहते।
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