#jahar

    सुकन्या और वेद की शादी की तैयारियाँ शुरू हो गयी थी अब किसी के मन में नाउम्मीदी नही थी। प्रेमवती की तरफ से पैसे की दिक्क़त  ख़त्म हो गयी थी। उसकी सौतेली माँ की तरफ से भी अब किसी को कोई परेशानी नही थी।  पर भाग्य कब किसका विपरीत हो जाये इसके बारे में सोचना किसी के बस का नही होता।
         प्रेमवती की नन्द   सुरेखा  को जब प्रेमवती के निर्णय के बारे में पता चला। तब उसकी छाती पर सांप लौटने लगे। उसे अपनी भाभी का बर्ताव ही पसंद नही था। उसपर वह अपना सब कुछ किसी पराये इंसान को दे दे ये उसकी सोच से उलट  था। ये वह समय था जब सारी  संपत्ति पर केबल बेटे या उसके परिवार का अधिकार होता था बेटियो को मायके की किसी चीज पर अधिकार नही होता था।  सुरेखा को अब अपनी भाभी से कोई उम्मीद नही थी। उधर उसका पति हरिओम भी हरदम उसके कान भरता रहता था। सुरेखा और हरिओम के घर भी कोई संतान नही थी। सुरेखा की माँ और सुरेखा दोनों को जब से प्रेमवती के निर्णय के बारे में पता चला था। उन्हें एक पल भी चैन नही पड  रहा था। वे अनेक उपाय ढूंढने में लगी थी किसी तरह सारी  जायदाद दूसरे के हाथो में जाने से बच जाये।  कानून के हिसाब से प्रेमवती का किसी तरह से विरोध नही किया जा सकता था। सबसे उन्होंने सलाह लेके देख लिया। पर उसका कोई तोड़ नही निकल सका। ऐसे में उन्होंने प्रेमवती को ही रास्ते  से हटाने का सोच लिया।
    सुकन्या की शादी से 15  दिन पहले उन्होंने प्रेमवती को खाने में कुछ गलत चीज खिला दी। जिसके कारण प्रेमवती ने एकाएक  दम तोड़ दिया। आनन -फानन में उसका अंतिम संस्कार करने की कोशिश की गयी। पर उनके मायके वालो को उनकी मौत की खबर लग गयी। जब उनके पिताजी ने उनकी लाश को देखा तो वे समझ गए उनकी बेटी को मारा गया है। उनके होश उड़ गए उनकी बेटी उनके लिए मरे के सामान ही थी पर अपनी पहली औलाद की लाश देखकर वे सकते में आ गए।
          वे प्रेमवती के ससुर से बोले -ये सब कैसे हुआ। प्रेमवती का सारा शरीर नीला पड़ा है। उसको मारा गया है। इसे मै जलाने नहीं दुँगा। पहले पुलिस बुलाई जाएगी तब इसका अंतिम संस्कार होगा।
   प्रेमवती के ससुर ने अपनी पगड़ी सुकन्या के पिता के चरणो में रख दी और बोले -मेरे परिवार की इज्जत अब आपके चरणो में है। जो कुछ हुआ मेरी जानकारी में नही हुआ है। और मेरा भी कोई दोष नही है। पर मै  इन सबकी जिम्मेदारी लेता हूँ। आपके तो और भी बच्चे है। मेरी तो केवल एक बेटी और दामाद ही बचे है। उनके कसूर की सजा आप मुझे दे दो। इस बुढ़ापे में मै अपनी आखिरी संतान को जेल के सीखचों के पीछे नही देख पाऊँगा।
     उनके शव्द सुनकर उनका दिल पसीज गया। वे बोले- पति के जाने के बाद प्रेमवती तो जिन्दा लाश बन चुकी थी। उसका दुःख हमसे भी नही देखा जाता था। पर बेटी तो बेटी थी उसका गम भूलना भी आसान नही होता। आपका कोई कसूर नही है। पर जिसने भी ये कर्म किया है। उसे मै कभी माफ़ नही कर सकूंगा।
      प्रेमवती का जब अंतिम संस्कार हुआ तब उसके पिता ने हाथ में जल लेकर उसकी नन्द सुरेखा को श्राप दिया। तूने मेरी पली -पलायी बेटी को जहर देकर  मारा है। तेरे भी बच्चे हो और सभी बच्चे जवानी में तेरी आँखों के सामने से जाये  भगवान  तुझे भी एक दिन ऐसा ही दुःख दे। उस दिन मेरा दुःख कम होगा।
    इस समय तक सुरेखा की कोई संतान नही हुई थी। डॉकटरो के हिसाब से भी संतान के आसार  नही थे। पर प्रेम वती की मौत  के बाद उसके घर बच्चो का जन्म हुआ।
          सब के मुँह  पर उसके बच्चो को देखकर ये ही शव्द होते -आज के समय में बुरा करने वालो का ही भला होता है।
     उनके कहे हुए शव्दो पर प्रेमवती के पिता मुस्कुरा देते। उन्होंने तो बददुआ  देते हुए भगवान  से उसकी औलाद  ही मांगी थी।
          वे हमेशा कहते थे- बच्चे ना हो  दुःख होता है। बच्चे होकर मर जाये  बहुत दुःख होता है। बच्चे बड़े होकर बिगड़ जाये महादुःख होता है।  यदि भगवान बच्चे अच्छे दे और वे  बड़े होकर मर जाये तो दुख का कोई ठिकाना ही नही होता। इंसान के सारे  किये कराये पर पानी फिर जाता है। उसके पास आंसुओ के आलावा कुछ नही रहता हे।
    ऐसे ही सुरेखा के सारे बच्चे बड़े होकर होनहार निकले पर मौत ने एक एक कर उन्हें अपने पास बुला लिया। तब सुरेखा  की हालत देखकर प्रेमवती के पिता ने कहा- आज  तुम मेरी हालत समझ सकोगी कि जवान बच्चे की मौत का दुःख क्या होता है।  उनके श्राप के फलीभूत होने में 25  साल लग गए थे। इतने सालो तक उन्होंने अपने भावो को संभाल के रखा था। अब उनके मन को शांति मिली थी।
        प्रेमवती के बच्चे शादी के 15  साल बाद हुए थे। उसके 25  साल बाद उनकी मौत  ने सुरेखा को पूरी तरह से तोड़ के रख दिया। वह अपने बच्चो की मौत  का सदमा झेल नही सकी। कुछ सालो के बाद सुरेखा और उसके पति की भी मौत हो गयी। वह आलीशान हवेली अब वीरान पड़ी है। उसमे रहने वाले भी नही रहे जिसके लिए एक जिन्दा औरत  को लाश में बदल दिया गया था।
    जिस सम्पत्ति के कारण प्रेमवती को जहर दिया गया था। आज उस सम्पत्ति को भोगने बाला कोई नही था। कहा गया है -अंत बुरे का बुरा होता है ,

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