सुकन्या और वेद दिल्ली में आकर जीवन की गुजर बसर में लग गए। कुछ समय के बाद उनकी जिंदगी सही रास्ते पर चलने लगी। वे परस्पर एक दूसरे का पूरी तरह ध्यान रखने लगे। सुमन की चुहल बाजी सबको लुभाने लगी। दिन पंख लगाकर उड़ने लगे।
एक दिन बुआजी के घर में बैठे हुए सब अपनी मन की बात कर रहे थे। इतने में सुकन्या ने वेद से पूछा- जब आप दिल्ली में थे। आपने अलीगढ़ में हमारे लिए पैसे क्यों नही भेजे। दिन रात मुझे ताने सुनने पड़ते थे। मै उनसे नजरे भी मिला नही पाती थी। उन्होंने अपने हिस्से के खाने में से हमें दिया। मुझे खाते हुए बहुत दुःख होता था। खाना निगला भी नही जाता था। मगर पेट की भूख खाना खाने के लिए मजबूर कर देती थी।
वेद सुकन्या की बात सुनकर हैरान रह गया। उसने तो हर महीने अपने पिताजी के पास पैसे भिजवाये थे। उसे इस का जबाब देते नही बना। कई घरो में बेटे शरीफ होते है। कई जगह बाप पर्दा ढकने में लगे रहते है। यहाँ पिता ही बेटे की इज्जत उघाड़ने में लगा था। बेटा अपने बाप की शिकायत किससे जाकर करता। उस ज़माने में बेटे की तरफ से बोलने वाले नही होते थे।बल्कि बेटे को अच्छा व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती थी। बेटे के शव्दो पर कोई यकीन नही करता था सबको बाप के शव्दो पर यकीन होता था। इसलिए वेद भौचक सा देखता रह गया। बाप के शव्दो को क्या कह कर काटे।
इतने में बुआजी बोल पड़ी- बहु तू क्या कह रही है। वेद हर महीने अलीगढ़ पैसे भिजवाता था। मेने खुद अपने सामने इसे पैसे भिजवाते देखा है। इसने अपने ऊपर ना के बराबर पैसे खर्च किये है। अधिकाधिक पैसे अलीगढ़ भिजवाये है।
अब सुकन्या के हैरान होने की बारी थी। वह सोच भी नही सकती थी अपना बाप अपने बेटे को नीचा दिखाने के लिए झूठ का सहारा लेगा। माँ तो सौतेली थी उसका गलत बोलना स्वीकार्य था। सगा बाप भी झूट बोलेगा किसी ने इसकी कल्पना नही की थी।
सुकन्या का आक्रोश अब बुआजी की बात सुनकर शांत हुआ। लेकिन ससुर जी को लेकर मन में गांठ पड़ गयी। उसे समझ नही आ रहा था। ससुरजी ने क्या सोच कर झूठ बोला। उनका झूठ सदा चलेगा। मुझे पता भी नही चलेगा। मेरा पति कभी सच नही बोलेगा। शायद वेद अपने पिता के शव्दो को कभी नही काटता। वह अपने पिता की इज्जत हर हाल में बचाने के लिए सारे इल्जाम अपने ऊपर ले लेता। इस भरोसे ही वेद के पिताजी इतना बढ़ा झूठ बोल गए।
एक दिन बुआजी के घर में बैठे हुए सब अपनी मन की बात कर रहे थे। इतने में सुकन्या ने वेद से पूछा- जब आप दिल्ली में थे। आपने अलीगढ़ में हमारे लिए पैसे क्यों नही भेजे। दिन रात मुझे ताने सुनने पड़ते थे। मै उनसे नजरे भी मिला नही पाती थी। उन्होंने अपने हिस्से के खाने में से हमें दिया। मुझे खाते हुए बहुत दुःख होता था। खाना निगला भी नही जाता था। मगर पेट की भूख खाना खाने के लिए मजबूर कर देती थी।
वेद सुकन्या की बात सुनकर हैरान रह गया। उसने तो हर महीने अपने पिताजी के पास पैसे भिजवाये थे। उसे इस का जबाब देते नही बना। कई घरो में बेटे शरीफ होते है। कई जगह बाप पर्दा ढकने में लगे रहते है। यहाँ पिता ही बेटे की इज्जत उघाड़ने में लगा था। बेटा अपने बाप की शिकायत किससे जाकर करता। उस ज़माने में बेटे की तरफ से बोलने वाले नही होते थे।बल्कि बेटे को अच्छा व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती थी। बेटे के शव्दो पर कोई यकीन नही करता था सबको बाप के शव्दो पर यकीन होता था। इसलिए वेद भौचक सा देखता रह गया। बाप के शव्दो को क्या कह कर काटे।
इतने में बुआजी बोल पड़ी- बहु तू क्या कह रही है। वेद हर महीने अलीगढ़ पैसे भिजवाता था। मेने खुद अपने सामने इसे पैसे भिजवाते देखा है। इसने अपने ऊपर ना के बराबर पैसे खर्च किये है। अधिकाधिक पैसे अलीगढ़ भिजवाये है।
अब सुकन्या के हैरान होने की बारी थी। वह सोच भी नही सकती थी अपना बाप अपने बेटे को नीचा दिखाने के लिए झूठ का सहारा लेगा। माँ तो सौतेली थी उसका गलत बोलना स्वीकार्य था। सगा बाप भी झूट बोलेगा किसी ने इसकी कल्पना नही की थी।
सुकन्या का आक्रोश अब बुआजी की बात सुनकर शांत हुआ। लेकिन ससुर जी को लेकर मन में गांठ पड़ गयी। उसे समझ नही आ रहा था। ससुरजी ने क्या सोच कर झूठ बोला। उनका झूठ सदा चलेगा। मुझे पता भी नही चलेगा। मेरा पति कभी सच नही बोलेगा। शायद वेद अपने पिता के शव्दो को कभी नही काटता। वह अपने पिता की इज्जत हर हाल में बचाने के लिए सारे इल्जाम अपने ऊपर ले लेता। इस भरोसे ही वेद के पिताजी इतना बढ़ा झूठ बोल गए।
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