#lahor ka chhutna

  प्रेमवती की मौत के कारण सुकन्या की ख़ुशियों  पर ग्रहण लग गया। अब उसकी शादी को किसी तरह से पूरा कर देना ही उद्देश्य रह गया था। प्रेमवती की मौत  ने ख़ुशियों को मातम में बदल दिया था।  वेद के घर में खुशियो का मतलव भी कुछ खास नही था।
      सुकन्या ब्याह कर ससुराल में आ  गयी जैसे परिवार की उसने कल्पना की थी वैसा उस घर में कुछ भी नही था। उस समय के हिसाब से लड़कियों की मर्जी कोई मायने नही रखती थी। उसे अब उस परिवार में ही अपनी पूरी जिंदगी बितानी थी। उसका मन अभी बहन की मौत  के कारण दुखी था। उसपर ससुराल का कोई लाढ  चाव उसे देखने को नही मिला। उसका मन भविष्य के बारे में सोच कर रुआँसा  होने लगा। उसको किसी का प्यार नसीब  भी होगा या ऐसे ही जिंदगी कट जाएगी।
      अब वेद पर नौकरी का दबाब पड़ने लगा। उसका मन आगे पढ़ाई  करने का था।  पर उसे कहा गया -अब तू घर बार बाला  हो गया है। तुझे पढ़ाई  की जगह नौकरी करनी चाहिए। अभी वेद की इच्छा नौकरी करने की नही थी। घर के दबाब के कारण उसे नौकरी ढूंढनी पड़ी। उसकी विज्ञानं की पढ़ाई के कारण उसे अच्छी जगह नौकरी मिल गयी। उस घर का माहौल संस्कृत का होने के कारण उसे कला विषय की पढ़ाई  करने पर विवश किया जाता था उसका मन कला विषय में नही लगता था। इस कारण उसने विज्ञानं विषय में पढ़ाई  की थी। अब उसे एक प्रयोगशाला में नौकरी करने का मौका मिल गया था।  वेद को वहाँ  काम भाने  लगा।
      नौकरी करते हुए वेद का समय बीतने लगा। सुकन्या का मायका अलीगढ़ में था जबकि वेद लाहौर में रहते थे। वही  मुंशीराम की रेलवे में नौकरी के कारण उन्हें लाहौर  में रहना पड़ता था। उनका नदी के किनारे घर था।  वेद की जब भी नहाने की इच्छा होती थी वे नदी पर चले जाते थे। उन्हें गाय  को भी नदी पर नहलाने में बड़ा मजा आता  था। उनका खेलने और तैरने  का शौक  भी साथ ही पूरा हो जाता था। उस समय जिंदगी बहुत सरल हुआ करती थी। लोग सादगी पसंद हुआ करते थे। घर में थोड़ा सा जीवन यापन का सामान ही खुशियो का माप -दंड हुआ करता था।
   उनकी जिंदगी की खुशियो में फिर से ग्रहण लग गया। वेद की नौकरी रसायनो के बीच थी प्रयोग करते हुए एक  खतरनाक रसायन उनकी आँख में चला गया। उस समय इलाज के आधुनिक साधन का आभाव भी था। उनका आस -पास के वैद्य और हकीमो से इलाज करवाया गया। उसका असर नही हो रहा था। वेद हमेशा आँखे बंद किये जलन के कारण तड़पते रहते।  सुकन्या उनकी सेवा में रत रहती पर उनकी पीड़ा को कम  नही कर पाती।
        उन दिनों भारत विभाजन का शोर सुनाई देने लगा था। ऐसे में मुंशीराम ने सोचा बीमार बेटे के साथ लाहौर  में रहना सही नही है  . आस -पास की मारकाट  और आगजनी की घटनाये उन्हें दहला देती थी। उन्होंने वेद के इलाज के लिए  कुछ सामान लेकर अलीगढ़ आने में अपनी भलाई समझी।   मुंशीराम सफर के हिसाब से थोडा सा सामान लेकर  अलीगढ़ आ  गए।  वेद की आँखों का इलाज होने लगा। अभी वेद केबल बीस साल के थे उनकी पूरी जिंदगी सामने थी। उनकी एक आँख के कारण परिवार से खुशियो ने मुँह  मोड़ लिया था। पूरा परिवार उनकी आँखे ठीक  होने के बारे में सोचता रहता था। असार अच्छे नही दिखाई दे रहे थे। उनकी आँखों की पीड़ा तो कम  होने लगी थी पर रौशनी वापिस नही आई थी।
         उधर लाहौर  की तरफ से भी अच्छे समाचार सुनाई नही दे रहे थे  . मुंशीराम लाहौर  वापिस जाने के ख़्याल में रहते थे। उन्होंने इस बात की कल्पना भी नही की थी कि बेटे के इलाज के कारण उनसे अपना देश वेगाना  हो जायेगा। वे केवल इलाज के लिए थोड़ा सा सामान लेकर अलीगढ़ आये  थे। वे लाहौर  से बेहद कम और जरूरी सामान लेकर अलीगढ़ आये थे। उनके पास नौकरी के कागजात और पढ़ाई  से सम्बंधित कोई सामान नही था।
      भारत -विभाजन के कारण लाहौर  का माहौल  हिन्दुओ के रहने लायक नही रहा। जब मुंशीराम ने जरूरी सामान लाहौर  से लाने  का विचार रखा। तब सारे  परिवार के लोगो ने उन्हें जिंदगी का हवाला देते हुए समझाया। -अभी लाहोर जाने का सही समय नही आया है। तुम आराम से यही रहो। जैसी खबरे आ  रही है। उस हिसाब से सामान तो लाना असम्भव है जीवन के भी लाले पड़  जायेंगे।  कुछ समय में हालात  सामान्य हो जायेंगे। तभी लाहौर  जाकर सामान ले आना।
     मुंशीराम ने लाहौर  में तबाही का माहौल  तो पहले ही देखा हुआ था। उनकी भी ऐसे समय में लाहौर  जाने की इच्छा नही हो रही थी। घर और सामान का मोह उन्हें लाहौर जाने पर विवश कर रहा था। उन्होंने हालात  के संभलने  की उम्मीद में कुछ समय और रुकने के बारे में विचार कर लेने में भलाई समझी।
    मुंशीराम ने लाहौर  में रहते समय ही  रिश्तेदारो के कहने पर अलीगढ़ में एक छोटा सा मकान  खरीद रखा था। उन्होंने कभी उस मकान  के बारे में नही सोचा था। अब वही  मकान  उनके रहने का ठिकाना बन गया  था। अब उन्हें अलीगढ़ में रहते हुए 8  महीने हो गए थे। इतने समय तक किसी के घर में रहना कितना मुश्किल हो जाता। उनका वही  मकान  उनका बसेरा बन गया था। रहने का ठिकाना तो हो गया था। अब उन्हें अपने जीवन -यापन की दौड़ में लगना  था।
      भारत -विभाजन के कारण जब उन्हें लगने लगा।  वे वापिस कभी नही लाहौर  लॉट  पाएंगे। तब मुंशीराम और वेद  नौकरी ढूंढने निकल पड़े। मुंशीराम के बुढ़ापे और वेद की एक आँख की खराबी  के कारण और कागजो के आभाव के कारण उन्हें  सही नौकरी नही मिल सकी। उनके पास लाहौर  जाकर कागज लाने  का कोई उपाय नही बचा था क्योंकि अब उनका घर पाकिस्तान बन चूका था। वहाँ तक जाने के लिए बीसा और पासपोर्ट जैसे कागजात और धर्म की  दीवारे खड़ी हो गयी थी। उन दीवारो के कारण अपना घर कैसे वेगाना  हो जाता है। उसका दर्द  वेद कभी नही भुला पाया। सारी  जिंदगी उनके मन में लाहौर  की कसक समायी रही। अपने अंतिम समय तक  वे अपने घर की यादो में खो जाते थे। 

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