#ghar ka chirag

  सुमन ने मजदूरो के साथ काम करना शुरू कर दिया उन दोनों को काम की जानकारी थी। सुमन ने इससे पहले कभी कारखाने में आकर काम को देखा भी नही था। उसे काम की कोई जानकारी नही थी। उसने उन दोनों की सहायता से काम सीखा। धीरे -धीरे उसे काम की जानकारी होने लगी। उसने सुकन्या से मदद लेनी शुरू कर दी। काम पूरा होने के बाद उस काम को दुकानो तक पहुचाने  की जिम्मेदारी के बारे में सोचना पड़  रहा था।                उसने मजदुर विजय से पूछा- तुम्हे काम देने कहाँ  जाना होता है। इसकी जानकारी है।
        विजय बोला -मै इससे पहले कभी गया नही  हूँ। आप बाबूजी से पूछ लो। वे पता बता देंगे तो मै  चला जाऊँगा।
   सुमन ने पूछकर जगह बता दी। उस पते पर विजय सामान दे आया।  विजय आते  हुए कितना सामान और चाहिए उसके बारे में पूछता हुआ आया।
        ये उस समय की बात है। जब औरते बाहर निकल कर काम नही करती थी। उन्हें समय से हारना होता था या किसी के सामने चिरौरी करके गृहस्थी चलानी  पड़ती थी।  सुमन ने दोनों हालातो से समझोता करने की अपेक्षा मेहनत करके अपने बलबूते पर जिंदगी चलानी शुरू कर दी।
     विजय काम का आर्डर ज्यादा लाया था जो तीन लोगो द्वारा पूरा करना मुश्किल था। सुमन ने सुकन्या से मदद के लिए कहा। सुकन्या को बेटी के होंसले ने नई  हिम्मत दे दी थी। अब चार लोग मिल कर काम करने लगे।
        अभी हालत ज्यादा नही सुधरे थे। घर में गरीबी का साम्राज्य था। सबको अपनी छोटी जरुरतो के लिए हालात  से समझोता करना पड़ता था। सुमन समझदार थी। उसने अपने मन पर नियंत्रण रख लिया था। बाकि छोटे भाई -बहनो को समझाना मुश्किल हो जाता था। वो माँ और सुमन से बहस  करने लगते थे। सुकन्या ऐसे  हालत देखकर रोने लगती थी। ऐसे में सुमन ही उन्हें समझा कर शांत करने की कोशिश करती थी।
    सुमन इस समय बच्चे की अपेक्षा एक समझदार और बड़ी औरत  की भूमिका ज्यादा निभा रही थी उसकी उम्र की लड़की से उस तरह की उम्मीद कोई नही कर सकता था। उसका बचपना कही खो गया था। घर में  बड़े  से लेकर  छोटे सभी उसका कहना मानते थे। वेद और सुकन्या उस पर आश्रित हो गए थे।
    विजय जब सामान देने के लिए दुकान पर गया। उसे पहले से ज्यादा काम मिला। अब सुमन को निश्चित समय पर  काम पूरा करना  मुश्किल लग रहा था।
         उसने माँ से सलाह की -आप ही बताये में इसे  कैसे पूरा कर सकूँगी।
     सुकन्या ने कहा -विद्यालय से आकर तेरी दोनों बहने हमारे साथ काम करेंगी। जब तू काम कर सकती है। तो वे  काम करने से कैसे  मना  कर सकती है।
  सुमन को माँ का सुझाव सही लगा। उसने अपनी दोनों बहनो के साथ इस बार काम को समय पर पूरा करके भिजवा दिया।  दुकानदार उनके काम को देखकर खुश हो गए। धीरे -धीरे काम बढ़ता जा रहा था। सुमन ने काम के बढ़ने के साथ मजदूरो का इजाफा नही किया बल्कि घर के सारे  लोगो की मदद से  उसने काम पूरा करने की कोशिश  करनी शुरू कर दी।
      सुमन के द्वारा काम को संभाल  लेने से वेद और सुकन्या का टुटे  हुए  होंसले ने उनके अंदर उम्मीद की किरण जगा  दी।  वेद के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार  होने लगा। अब वेद ने बाहर की जिम्मेदारी संभाल  ली। उनके परिवार की मेहनत ने उस परिवार को एकता और मेहनत का महत्व समझा दिया था। उस घर का प्रत्येक इंसान सुमन के हौंसले की तारीफ करता। यदि सुमन जैसी बेटी किसी के घर हो उसे बेटे की कमी महसूस नही  हो सकती। 

#dhokha

   वेद अस्पताल से घर वापस आये।  अभी उनकी तबियत सही नही थी। उनके सारे  मददगार उन्हें छोड़कर जा चुके थे। सभी के मन में उनके मरने का विश्वास  था ।  उन्हें उम्मीद थी कि अस्पताल से कोई जीवित नही आता। जो जैसे पैसा खीच सकता था उसने सारा रुपया वहाँ  से ले लिया। उनको वेद के परिवार पर कोई दया नही आई। वेद उन सब के धोखे से टूट गए। कुछ लोग दुनियाँ  में सिर्फ धोखा खाने के लिए आते है। वेद भी उनमे से एक थे। वेद शारीरिक  और मानसिक  दोनों  रूपों से टूट गए थे। अब उन्हें पैसे के बारे में सोचना था। उनकी सारी  जमापूंजी खत्म हो चुकी थी। वे घर कैसे चलाये इस बारे में नए सिरे से सोचना पड़  रहा था।
    वेद को सही खुराक तो क्या नसीब होती अब खाने के लाले पड़  गए थे। एक दिन वेद ने सुकन्या से कहा -मुझे तुम मेरे लेनदारो  के पास ले चलो। ऐसे  तो पैसे देने कोई घर नही आयेगा मुझे देखकर वो मेरा पैसा वापिस करने के बारे में सोचेंगे।वे कुछ पैसा लौटा देंगे जिससे घर चलाने में तुम्हे सहूलियत हो जाएगी। बच्चो की तरफ देखकर बहुत दुःख होता है।
    सुकन्या उनकी तबियत के बारे में सोच कर बोली -इतनी ख़राब हालत में तुम इतना सफर कैसे कर सकोगे। अभी तक तुम्हारे लिए घर में चलना भी बहुत मुश्किल हो रहा है।
   वेद बोला -घर चलाने के लिए पैसे की जरूरत है। तुमने अभी तक दुनियाँ का सामना नही किया है। बच्चे बहुत छोटे है। मेरे आलावा कौन तुम्हारी मदद के लिए आएगा। मुझे कोई दूर तक दिखाई नही दे रहा है
      उनका सुझाव सुकन्या को ठीक लगा। उन्होंने गाड़ी मंगवाई एक तरफ सुकन्या ने सहारा दिया दूसरी तरफ से सुमन ने सहारा दिया। उन दोनों की मदद से वेद लेनदारों के पास गया। वहाँ जाकर उन्हें सबकी बेईमानी के बारे में पता चला। अधिकतर जगह से सभी पैसा उनके नाम से दूसरे लोग ले जा चुके थे। सुकन्या और सुमन का बाहरी दुनिया का अनुभव नया था। दुनियाँ की चालबाजी देखकर वे हैरान हो गयी। थोड़ा पैसा वेद को देखकर लेनदारों ने चूका दिया पर वह ज्यादा दिन तक चलने वाला नही था।
     घर वापस आकर सभी सोच में डूब गए अब क्या किया जाये जिससे घर खर्च निकल सके। सुकन्या और वेद दोनों बुरी तरह टूट चुके थे। उनके अंदर जीने की इच्छा ही नही बची थी।
          ऐसे में सुमन ने अपने माँ और पिता को सुझाव दिया- हमारे पास अभी भी मशीने है। कुछ कच्चा सामान बचा है। हम ज्यादा मजदूरो को नही रखेंगे बल्कि दो मजदूरो के साथ मिलकर काम करेंगे। अभी के लिए ये कच्चा मॉल पूरा करके देखते है। तब तक आपकी तबियत ठीक हो जाएगी। आप मुझे एकबार कारखाना चलाने की इजाजत दे दीजिये शायद हमारी हालत सुधर जाये। हाथ पे हाथ रख कर बैठने से तो काम करना ज्यादा अच्छा रहेगा।
     वेद कर्मठ इंसान थे। उन्होंने कभी नही सोचा था। उन्हें अपनी बेटी की मदद लेनी पड़ेगी। उनकी मजबूरी ने उन्हें सुमन को कारखाना चलाने  की आज्ञा देनी पड़ी। अभी वेद काम करने की हालत में नही थे।
       

#rishte

     वेद और सुकन्या पर बेटे का जोड़ा बनाने का दबाब पड़  रहा था।
    सब आकर कहते - एक बेटे से क्या होता है। इसका जोड़ा होना चाहिए।
   इन बातो का असर उनपर पड़ा। उन्होंने एक और बार बच्चे के बारे में सोचा। इस बार उनके घर बेटे ने जन्म लिया। उसका भविष्य पंडितो ने बहुत अच्छा बताया साथ ही उसे अभिभावकों के लिए भारी बताया।  लेकिन बेटे को पा  कर वे निहाल हो गए थे।  उनका व्यवसाय इतना अच्छा चल रहा था उन्हें लगा ही नही बेटा उनका किसी  रूप में भारी  हो सकता है.
    शिखर के होते ही व्यापार में घाटा  होना शुरू हो गया। दिनों दिन हालत बिगड़ने लगी। अब वेद मेहनत के साथ भाग्य को भी मानने  लगे। वे दिनरात मेहनत करते लेकिन हालत सुधरने का नाम ही नही ले रही थी।
    अब वेद के पेट में असहनीय दर्द रहने लगा था। ये दर्द उनकी बर्दास्त के बाहर था। वे अपने उपर  नियंत्रण नही रख पाते  थे। इस बीच उनका भाई उनके काम में गिरावट देखकर उन्हें छोड़कर कही  और काम करने लगा।
     उनके पास सहायक के रूप में उनका कोई हमदर्द नही रहा था। ऐसे में जब वेद की हालत बहुत ख़राब हो जाती तब सुमन ही उनके इलाज के लिए डॉकटर  के पास जाती।  सुकन्या अनपढ़ और घरेलू औरत  थी वह पति के बिना अकेली कभी घर से बाहर नही निकली थी उसके अंदर आत्मविश्वास की कमी थी इसलिए जब कभी वेद की हालत रात    के समय खराव  हो जाती तब भी सुमन उनके इलाज के लिए डॉ के पास जाने से गुरेज नही करती थी।   उनकी बेटी सुमन अब 16  साल की हो रही थी। वह अद्वितीय सुंदर थी। हालत ने उसे नाजुक और कमजोर समझने का मौका ही नही दिया। वह दिनरात वेद के स्वास्थ्य के लिए पार्थना करती रहती।
       एक तरफ वेद की माली हालत खराव होती जा रही थी। दूसरी और उनका स्वास्थ्य उनका साथ नही दे रहा था। वे अपनी तरफ से काम को सँभालने की पूरी कोशिश कर रहे थे। पर कुछ भी ठीक नही हो पा  रहा था।  दिनों दिन वेद की हालत बिगड़ती जा रही थी।  उनको देखकर सभी डरे हुए थे।  उन्हें देखकर डॉ ने ऑपरेशन के लिए कहा। उस समय लोग ऑपरेशन से बहुत डरते थे। सभी के मन में डर  था  कि ऑपरेशन कराने वाले जिन्दा नही बचते।
      वेद के सामने उसके निरीह बच्चे उसे ऑपरेशन  करवाने  से रोक रहे थे।  वेद का सबसे छोटा बेटा  सिर्फ चार साल का था। कोई बच्चा समझदार नही था।
    वेद हमेशा सोचते -  मुझे कुछ हो गया तो मेरे परिवार को कौन देखेगा।
   वे अपने दर्द को बर्दास्त करने की कोशिश करते रहते। अब दर्द बहुत जल्द होने लगा था। वेद के बर्दास्त के बाहर हो गया था। अब सबने वेद का ऑपरेशन करवाने के लिए डॉ से बात की सबको उनके ऑपरेशन की खबर भिजवा दी गयी।
     वेद को हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया गया। उनके पिताजी आ  गए थे। सुकन्या और सुमन वेद की देखभाल में लगी रहती थी। इस समय उनका कोई मददगार नही था। एक दिन अस्पताल से जब सुकन्या घर आई तो उसने मुंशीराम को अलमारी को खोल कर खड़े देखा।
       उसने मुंशीराम से पूछा -आप यहाँ क्या कर रहे है. आपको कुछ चाहिए तो मुझे बता दीजिये में आपको दे देती हूँ।
   मुंशीराम ने कहा -में अलीगढ़ के मकान  के कागज ढूंढ  रहा हूँ।
    सुकन्या बोली -आप इनके आने पर इनसे ले लेना। ऐसे आपको परेशानी होगी। वे आपको आकर दे देंगे।
  मुंशीराम बोले -अस्पताल में जाकर कोई वापस आता  है जो वेद वापस आएगा। इसलिए में मकान के कागज अलीगढ़ ले जाऊंगा।
  सुकन्या मुंशीराम के शब्द सुनकर सन्न रह गयी। एक पिता अपने बेटे के लिए ऐसे शब्द बोल सकता है। उसने मुंशीराम से कुछ नही कहा.लेकिन शर्म लिहाज में मुंशीराम ने अलमारी बंद करके चाबी सुकन्या को दे दी। उस समय बहु ससुर का  सामना नही किया करती थी।
     वेद अलीगढ़ नियमित रूप से पैसे भेजा करते थे। जिस महीने वेद अलीगढ़ पैसे नही भेज [पाते  थे। मुंशीराम कोई काम नही करते थे।  इसलिए उनके लिए घर चलाना  बहुत मुश्किल था वे सिर्फ वर्तमान जरुरतो के बारे में सोचते थे उनके लिए भविष्य कोई मायने नही रखता था अलीगढ़ के घर चलाने  की जिम्मेदारी भी वेद की थी। पैसे की कमी होने पर मुंशीराम मकान को गिरवी रख देते थे।
      वेद हमेशा सोचते  इनके पास एक छत तो रहनी चाहिए।  इसलिए वेद पैसे का जुगाड़ करके उनका मकान  छुड़वा के उनके  मकान की रजिस्ट्री उन्हें वापस दे आते थे। ऐसा कई बार हुआ। तो परेशान होकर वेद ने रजिस्ट्री छुड़वाने के वाद पिताजी को नही दी और उसे दिल्ली ले आये  थे। मुंशीराम को बेटे की तबियत की चिंता नही थी बल्कि सिर्फ मकान के बारे में सोच रहे थे.  

#lakshmi

    ६० का दशक आ  गया था  वेद का बेटा राजेश चार साल का हो गया था। बड़ी बूढ़ी  औरतो  ने सुकन्या को कहना शुरू किया- राजेश का एक भाई होना चाहिए।  एक बेटे का होना भी कोई होना है। दो का जोड़ा अच्छा लगता है।
   सुकन्या कहती-चार बच्चे हो गए है। इन्हे पाल ले यही बहुत है।
   सुकन्या के शब्द सुनकर बे बिफर उठती -बहु ऐसे मत कह भगवान गुस्सा हो जायेंगे। इसे खेलने के लिए भी एक साथी चाहिए।  दो का जोड़ा देखने में भी अच्छा लगता है। अकेला कहाँ घूमता फिरेगा। भाई के साथ होंसला बढ़ेगा। अपना कहने के लिए एक भाई जरूर होना चाहिए।
 उनके शब्दों का सुकन्या पर असर हुआ। वेद भी राजी हो गए। लेकिन बेटे की उम्मीद में नया मेहमान बुलाया था। वह बेटे के स्थान पर चौथी बेटी हो गयी। उन दिनों हॉस्पिटल में बच्चे कम और घर में ज्यादा हुआ करते थे। उनके घर के पास एक हॉस्पिटल खुला। उन्होंने इसमें बच्चे की पैदाइस करवाने की सोची। इसके जन्म में कुछ दिक्क़ते आ  रही थी सुकन्या ने नर्सो की बातचीत सुन ली।
       नर्स कह  रही थी -सुकन्या कमजोर है इसके लिए बच्चे का जन्म काफी परेशानी भरा होगा। बच्चा या सुकन्या दोनों में से किसी एक को बचा पाएंगे। दोनों को बचा पाना बहुत कठिन है।
   ये शब्द सुनकर सुकन्या घबरा गयी। वह चुपचाप घर नर्सो को बिना बताये आ  गयी। उसने सोचा- जब मरना है  तो परिवार के बीच में मरूँगी। अनजाने लोगो के सामने क्यों दम  तोडू। घर आकर उसने दाई  को बुलबा लिया।
    बच्चे का जन्म मुश्किल से हुआ। उन्होंने बेटी को एक तरफ लिटा दिया। सुकन्या की देखभाल में सभी लोग लग गए। सुकन्या बहुत मुश्किल से बची। चौथी बेटी जो माँ को इतनी परेशानी में डाल  दे उसकी तरफ किसी का ध्यान नही गया। वह लड़की रोइ भी नही। जो उसकी तरफ कोई देखता।
          उन दिनों वेद का काम बहुत अच्छा चल रहा था। वेद घर पर नही थे उनके पास काम बहुत था। वेद दिन रात  काम में लगे रहते थे। वेद के काम को लेकर एक आदमी उन्हें ढूंढ़ते हुए उनके घर आ  गया। उसे जब पता चला। वेद नही है।
     उन्होंने सुकन्या के पास कई हजार रूपये भिजवा कर कहा -वेद से कहना में पहले ही आपको पैसा दे रहा हूँ। आप मेरा काम सही समय पर कर देना।ये पैसा पेशगी है।
     सुकन्या की हालत अच्छी नही थी। उसने उससे ज्यादा बात नही की। उसमे उठने की ताकत भी नही थी। उसने ये पैसा अपने सिरहाने रख लिया।उसके बाद वह सो गयी।
    शाम को वेद 8  बजे घर आये। उन्होंने बेटी के बारे में सुना। उसके बाद वे सुकन्या के पास आये। तब तक सुकन्या की हालत सुधर गयी थी। सुकन्या ने पुरे दिन के हाल वेद को बताये। वेद ने जब पेसो के बारे में सुना वह हैरान रह गए। उन दिनों लोगो को पुरे महीने का वेतन मुश्किल से ५० रूपये मिलता था। ऐसे में कोई इंसान पेशगी में कई हजार रूपये दे गया।
     वेद के मुँह  से निकला - ये लड़की तो अपना दहेज़ अपने साथ लायी है। उसकी शक्ल तो दिखाओ केसी  है। तब सबको ध्यान आया की आज एक लड़की पैदा हुई है। उस ज़माने में लड़की की पैदाइस गौरव नही दिलाती थी। बल्कि माँ को अपमानित करने का सबब बनती थी। इसलिए सबके दिमाग में था। ये चौथी लड़की मर भी जाये तो अच्छा है। सबने उस लड़की को उठा कर वेद को दिया। वह लड़की सुबह 8  बजे की पैदा हुई  थी अब शाम के आठ बज  रहे थे। सर्दियों के दिन थे। वह लड़की लगभग मरणासन्न थी। यदि उसे कुछ और समय नही देखा जाता तो वह अवश्य दुनिया छोड़ चुकी होती।
    उसकी दयनीय हालत देखकर वेद बाजार से ब्रांडी लाए उसके सारे  शरीर पर मला। कुछ समय बाद गर्मी आई और  उसने अपनी छोटी सी आँखे खोलकर देखा। बड़े होने पर जब उस लड़की को अपने जीवन के बारे में पता चला। तो वह अपनी जिंदगी को पेसो की सौगात ही समझती थी।
    पंडितो ने उसका नाम लक्ष्मी रखा। उनके अनुसार -ये लड़की जब तक तुम्हारे घर में रहेगी पेसो की कभी कमी नही होगी। यह साक्षात लक्ष्मी का अवतार है। उन्होंने उस लड़की का नाम लक्ष्मी रख दिया।   

#farj

      वेद और सुकन्या की गृहस्थी अच्छी तरह से चलने लगी। इस बीच उनके घर दो बेटियो ने और जन्म ले लिया। उनके परिवार में बैटे  का इंतजार था। वेद को व्यापार करने का बहुत शौक़  था। वह जितना कमा  कर लाते  थे। सुकन्या को उसमे से कम  पैसे खर्चने का निर्देश दे रखा था।वेद को दिल्ली में ओरो से काफी ज्यादा वेतन मिलता था। उनकी लगन  और मेहनत  ने उन्हें इतनी तरक्की दिलवा दी थी। जिसकी उनकी उम्र के और लोग उम्मीद भी नही कर पाते थे।  वे उसमे से आधे रूपये अलीगढ़ भेज देते थे। उसके बाद घर खर्च के बाद जो पैसे बचते थे। उससे अपने कारखाने में लगाने की कोशिश करते। उन्हें कारखाना खोलने के लिए किसी और से किसी तरह की मदद मिलने की उम्मीद नही थी। वे केवल अपने खर्च में  कटौती कर के कारखाने के सपने को साकार कर सकते थे। धीरे -धीरे उनके सपने ने दिल्ली में आकार  लेना शुरू कर दिया।
          उधर अलीगढ़ में जिन्होंने गत्ते  का कारखाना उनसे ये सोच कर लिया था कि  उनका जीवन ऐशोआराम से गुजरेगा। मेहनत के आभाव में कारखाना बंद हो गया। वे सब फिर से वेद से पैसे की मांग करने लगे।वेद का मन पिता के शव्दो से दुखी हो गया। उन्होंने अपने पिता के परिवार की यथासम्भव मदद करनी शुरू कर दी।              उनका छोटा भाई बड़ा हो गया था। उसके लिए काम ढूंढने का जिम्मा उनके पिता ने वेद को सौंप दिया। दिल्ली में वेद ने छोटा सा कारखाना लगा लिया था। उस कारखाने की मालकिन उन्होंने सुकन्या को बना दिया था। क्योंकि वेद अभी भी पुरे दिन नौकरी करते थे। शाम के समय अपने कारखाने में आकर काम करते थे। उनकी मेहनत से उनका काम अच्छा चलने लगा। जब उनके पिताजी ने भाई के लिए काम ढूंढने के लिए कहा तो उन्होंने सोचा हम दोनों भाई इस कारखाने को चलाएंगे। उन्होंने नौकरी छोड़ कर पूरा ध्यान कारखाने की तरफ देना शुरू कर दिया। उनके कारखाने में दिन दूनी रात  चौगनी तरक्की होने लगी। उन्होंने अपने भाई मोहन को दिल्ली बुला लिया। ये सोचकर पिता के आदेश का पालन हो जायेगा और  उन्हें एक सहायक भी मिल जायेगा।
                   उनका परिवारिक वातावरण हमेशा पूजा पाठ और कला से सम्बंधित रहा था। पर वेद का मन हमेशा नए अविष्कार करने में लगा रहता वे हमेशा विज्ञानं के मुरीद रहे। वेद के सामने जैसी चीज रख दी जाती थी। वे एकदम मशीनो के द्वारा उसका प्रतिरूप बना देते थे। उनके काम को देखकर सभी हैरान हो जाते थे।
         इसी  बीच वेद के घर में बेटे का जन्म हुआ सभी फुले न समां रहे थे। तीसरी बेटी के बाद बेटे के जन्म पर उसकी पीठ पर भेली  फोड़ने की रस्म की गयी। उसके पैदा होने का जश्न धूम -धाम से मनाया गया। उसकी पहली राखी पर वेद ने राखी की जगह घडी पहना कर अपना शोक पूरा किया। जो भी वहाँ मौजूद था उसको वेद का ऐसा व्यवहार अमीरी का  दिखावा लगा। सब उसकी पीठ पीछे बुराई करने लगे। लेकिन वे उसमे पिता के प्यार को नही देख पाये।
     वेद का काम भली भांति चल रहा था। उसके परिवार में कोई परेशानी नही थी। लेकिन अलीगढ़ में पिता के परिवार में दिक्क़ते शुरू हो गयी थी। वे हर तरह से फिर वेद पर निर्भर होते जा रहे थे।
       अब सुकन्या भी मुखर होने लगी थी। उसे उनकी समस्यो को लेकर वेद को अपने सुख छोड़ते देखकर बहुत झल्लाहट होने लगी थी। सुकन्या अब चंद्रमुखी नही रही थी वह सभी पर गुस्सा उतारने  लगी थी। जिनके लिए वेद इतना कर रहे थे। वे भी पैसे लेकर उन्हें पूछते नही थे। ये सुकन्या को सहन नही होता था। वे वेद को समझा कर हार  जाती लेकिन वेद पिता के प्रति अपने फर्ज को निभाहने में लगे रहते।  

#jhuth

      सुकन्या और वेद दिल्ली में आकर जीवन की गुजर बसर में लग गए। कुछ समय के बाद उनकी जिंदगी सही रास्ते  पर चलने लगी। वे परस्पर एक दूसरे का पूरी तरह ध्यान रखने लगे।  सुमन की चुहल बाजी सबको लुभाने लगी। दिन पंख लगाकर उड़ने लगे।
     एक दिन बुआजी के घर में बैठे हुए सब अपनी मन की बात कर रहे थे। इतने में सुकन्या ने वेद से पूछा- जब आप दिल्ली में थे। आपने अलीगढ़ में हमारे लिए पैसे क्यों नही भेजे। दिन रात मुझे ताने  सुनने पड़ते थे। मै उनसे नजरे भी मिला नही पाती थी।  उन्होंने अपने हिस्से के खाने में से हमें दिया। मुझे खाते हुए बहुत दुःख होता था। खाना निगला  भी नही जाता था। मगर पेट की भूख खाना खाने के लिए मजबूर कर देती थी। 
    वेद सुकन्या की बात सुनकर हैरान रह  गया। उसने तो हर महीने अपने पिताजी के पास पैसे भिजवाये थे। उसे इस का जबाब देते नही बना।  कई घरो में बेटे शरीफ होते है। कई जगह बाप पर्दा ढकने में लगे रहते है। यहाँ पिता ही बेटे की इज्जत उघाड़ने  में लगा था। बेटा  अपने बाप की शिकायत किससे जाकर करता। उस  ज़माने में  बेटे की तरफ से बोलने वाले नही होते थे।बल्कि बेटे को अच्छा व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती थी। बेटे  के शव्दो पर कोई यकीन नही करता था  सबको बाप के शव्दो पर यकीन होता था। इसलिए वेद भौचक सा देखता रह गया। बाप के शव्दो को क्या कह कर काटे।
    इतने में बुआजी बोल पड़ी- बहु तू क्या कह रही है। वेद हर महीने अलीगढ़ पैसे भिजवाता था। मेने खुद अपने सामने इसे पैसे   भिजवाते  देखा है। इसने  अपने ऊपर  ना के बराबर पैसे खर्च किये है। अधिकाधिक पैसे अलीगढ़ भिजवाये है।
     अब सुकन्या के हैरान होने की बारी  थी। वह सोच भी नही सकती थी अपना बाप अपने बेटे को नीचा  दिखाने  के लिए झूठ  का सहारा लेगा। माँ तो सौतेली थी उसका गलत बोलना स्वीकार्य था। सगा बाप भी झूट बोलेगा किसी ने इसकी कल्पना नही की थी।
      सुकन्या का आक्रोश अब बुआजी की बात सुनकर शांत हुआ। लेकिन ससुर  जी को लेकर मन में गांठ पड़  गयी। उसे समझ नही आ  रहा था। ससुरजी ने क्या सोच कर झूठ बोला। उनका झूठ सदा चलेगा। मुझे पता  भी नही चलेगा। मेरा पति कभी सच नही बोलेगा। शायद वेद अपने पिता के शव्दो को कभी नही काटता। वह अपने पिता की इज्जत हर हाल में बचाने के लिए सारे  इल्जाम अपने ऊपर ले लेता। इस भरोसे ही वेद के पिताजी इतना बढ़ा  झूठ बोल गए। 

#privar se milan

    वेद की आमदनी पहले से दुगनी हो गयी उसके काम से खुश होकर उसके मालिक ने उसकी तनख्वाह बढ़ा  दी थी। अब वेद ने सुकन्या और सुमन को दिल्ली  लाने के बारे में विचार किया। उसने बुआजी से सलाह की उन्होंने हामी भर दी। अगली छूट्टी  वाले दिन उसने अपने परिवार के पास जाने का निर्णय किया।  वेद ने बुआजी के घर के पास एक किराये का छोटा सा घर ले लिया। उसने उस घर में थोड़ा सा जरूरत का सामान भी ला  कर रख दिया जिससे सुकन्या को घर सँभालने में कोई परेशानी ना  हो
    छुट्टी बाले दिन वेद के चेहरे पर विशेष रौनक थी। उसकी बुआजी  की लड़कियाँ उसकी हालत देखकर उससे हँसी -मजाक कर रही थी। वेद उनके प्रशनो का जबाब देने के स्थान पर केवल मुस्कुरा कर रह जाता था। उसे समझ नही आ  रहा था।  उनकी हंसी को किस रूप में ले। वह बहनो का मजाक समझ रहा था। वेद तैयार होकर अलीगढ़ के लिए चल पड़ा। उसने अपने परिवार को खुश करने के लिए बहुत सारा सामान खरीदा था। जिसकी उसके परिवार को जरूरत थी।
      वेद को अलीगढ़ छोड़े हुए चार महीने बीत  गए थे. उसका इतने दिनों में गुस्सा भी शांत हो गया था। उसने अपने माँ -पिताजी के लिए काफी सारा सामान खरीदा था। उसके मन में उनके लिए अब कोई कलुष नही रहा था। उसने घर में पहुँचते ही बड़ो के पाँव छुए छोटो को ढेर सारा प्यार किया उसके बाद सबको तोहफे दिए। छोटे भाई -बहन तोहफे पाकर खुश हो गए। उनमे काफी अंतर था। उन्हें अपने भाई से कोई खास लगाव या नफरत नही थी। वे बहुत छोटे थे। उनका सम्बन्ध केवल तोहफों से था। उनको तोहफे पाकर सब कुछ मिल गया था। वे अपने तोहफे अपने दोस्तों को दिखाने चले गए।  लेकिन उनकी माँ के चेहरे की त्यौरियां  कम नही हुई। पिताजी ने उनसे सीधे मुँह बात नही की। लेकिन वेद ने उनका सम्मान करने में गुरेज नही किया।
    वेद सबसे मिलकर सुकन्या के पास गया। सुकन्या भी चार महीने से वेद का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसने हरेक पल उसको याद करके बिताया था। आज उसका वियोग ख़त्म हो गया था। वेद को देखते ही सुकन्या की आँखों से आंसू बहने लगे। ये ख़ुशी के आंसू थे जो दोनों की आँखों से बह  रहे थे.उनकी पीड़ा शब्दों में बयान करनी मुश्किल है। जिन्होंने चार महीने विपरीत माहौल में गुजारे है वे उनका दर्द समझ सकते है।
      इतने में वेद की बेटी उसके पास आ  गयी। सुमन ने चार महीने में चलना सीख लिया था वह कुछ शब्द बोलने लगी थी। वह वेद के पैरो  से आकर लिपट  गयी। गोद में उठाने की जिद करने लगी। वेद को सुमन की बालसुलभ हरकते मन को भा  रही थी। उसने सुमन को गोद में उठा कर प्यार करना शुरू कर दिया। सुमन पिता के प्यार का मतलब समझ नही पायी। वह घबरा गयी जोर से रोने लगी। वेद भी समझ गया। सुमन बहुत छोटी है। उसको इतना अधिक कसकर प्यार करने लगा था जिससे उसे बेचैनी होने लगी थी। उसने सुमन को सुकन्या की गोद में दे दिया। सुमन माँ की गोद में बैठकर पिता को निहारने लगी। उसे इतनी समझ नही थी की ये उसके पिता हे बल्कि वो सुकन्या के पास कौन  आ गया पहचानने की कोशिश कर रही थी क्योंकि माँ के पास अबतक उसका ही अधिकार था। उसकी माँ किससे बात कर रही है। उसकी जिज्ञासा उसे वेद के पास खींच लायी थी।
     अगले दिन वेद ने बड़ो के सामने सुकन्या को दिल्ली ले जाने के बारे में पूछा।  उसके पिताजी ने उन्हें ले जाने की आज्ञा देते हुए कहा -तेरी अमानत  है हम कैसे रोक सकते है। जब चाहे ले जा। 
  अगले दिन से सुकन्या ने दिल्ली के लिए सामान बाँधना शुरू कर दिया।     वे   दिल्ली के लिए चल पड़े नई मंजिल की तरफ। अपनों से दूर। सुकन्या का मायका और ससुराल दोनों अलीगढ़ में थे। वह सबसे दूर जा रही थी उसके  मन में दुःख था। उम्मीदों का  नया आसमान उसको अपनी और बुला रहा था।  

#taras

    सुकन्या को अलीगढ छोड़कर वेद दिल्ली आ  गया। दिल्ली में बुआजी किराये के छोटे से  मकान में  रहती थी। वहाँ  जगह की कमी थी पर उनके दिल बड़े थे उन्होंने तहेदिल से वेद का स्वागत किया। उसे घर में अपने पन  का अहसास हुआ। अब वेद को दिल्ली में रोजगार की तलाश थी। उसने इधर -उधर जहाँ  भी नौकरी की उम्मीद होती। वह वहाँ  जाकर अपनी किस्मत आजमाते। लेकिन उन्हें लगता उनकी किस्मत कही जाकर सो गयी है। हर जगह से नाउम्मीदी की खबरे आ  रही थी।
     एक महीने तक वेद लगातार नौकरी की उम्मीद में जाते रहे। अंतत उनकी कोशिश रंग लायी। उन्हें एक कारखाने  में नौकरी मिल गयी। नौकरी बहुत अच्छी तो नही थी लेकिन गुजारा  चल सकता था। वे यहाँ भी दिनरात एक करके काम कर रहे थे। उनकी कड़ी मेहनत देखकर सभी खुश थे।
        जब उन्हें पहले महीने की तनख्वाह मिली उसमे से उन्होंने बहुत कम  खर्च किये बाकी  सारे रूपये अलीगढ़ अपने पिताजी के पास भिजवा दिए। उन्हें लग रहा था उनकी बेटी और पत्नी जब उनके पिताजी के साथ रह रही है। तो दोनों की जिम्मेदारी सिर्फ उनकी है।  उनके पिताजी उसकी बेटी और पत्नी को अपने घर में रख रहे है  यही बहुत बड़ी बात है। वे सुबह से रात  तक काम करते। जो घर से खाना ले जाते वही  खाते  । भूख कितनी भी ज्यादा लगती थी बे कुछ भी बाहर का नही खाते  कही घर के लिए पैसे कम न पड  जाये। शाम को थकन और भूख से उतरा चेहरा देखकर  उनकी बुआजी को बहुत तरस  आता।
       बुआजी कई बार उससे कहती- कुछ अपने ऊपर  भी खर्च कर लिया कर।
     वेद हमेशा अपनी मज़बूरी की दुहाई देकर रह जाता। उसका दर्द उनकी बुआजी को समझ में आ  जाता। बुआ उनके लिए माँ के सामान थी। उनका दिल उसकी बेबसी पर तड़प कर रह जाता। वह उनके लिए ज्यादा कुछ भी नही कर सकती थी।
         बुआजी की पांच बेटियाँ  और दो बेटे थे। उनके पति की आमदनी भी ज्यादा नही थी सातो बच्चे बड़े थे। उनकी पांच बेटियाँ  शादी लायक थी। वे उनकी शादी के कारण ज्यादा पैसे बचाने  की फ़िराक में रहती थी। किसी तरह उनकी बेटियो की शादी अच्छे घर में हो जाये।आजादी के बाद का समय था। उस ज़माने में लड़कियों से कमाने के बारे में कोई सोचता भी नही था। इसलिए उन्हें अपनी जमापूंजी में से लड़कियों की शादी का खर्चा  वहन करना था।  पैसे के हिसाब से सभी का हाथ तंग था। उनके दिल में एक दूसरे के लिए बहुत प्यार था। इसी कारण सब परस्पर सम्ब्द्ध  थे।
    अलीगढ़ में सुकन्या को हर समय ताने  सुनाये जाते -तेरा निठल्ला पति तुम दोनों को हमारे उपर छोड़ कर चला गया है। हमसे अपना खर्चा  तो उठता नही उस पर तुम दोनों के लिए पैसे कहाँ  से लाये।
     ये सुनकर सुकन्या आंसू  पीकर रह जाती उसके पास पति के पास तक खबर पहुँचाने  का कोई साधन नही था। वह चिठ्ठी भी नही लिख सकती थी। क्योंकि उसको पढ़ाया ही नही गया  था। उस ज़माने में लड़कियों को पढ़ाने  का रिवाज ही नही था। वह घर से बाहर निकल कर किसी से चिट्टी भी नही लिखवा सकती थी। उस के दुःख के बारे में कोई उसका साथी नही था। वह अपनी नन्ही सी सुमन के सामने अपना दुखड़ा सुना कर अपने दिल की भड़ास निकाल कर रह जाती थी। वह नासमझ कुछ समझ नही पाती  थी। ये बात सुकन्या को भी पता था। लेकिन जब दुःख बहुत बड  जाता है  तो किसी ना किसी के सामने निकाल कर मन को तसल्ली मिल जाती है। ऐसी ही हालत सुकन्या की थी। उसे पता था सुमन उसके दुःख को कम  नही कर सकती। पर उसको किसी और का सहारा नही था। उसे नासमझ सुमन ही अपनी लगती। जिसके सामने वह अपना दुःख उड़ेल सकती थी। 

sukanya ki jid

    वेद ने सुकन्या से रसोई अलग करने के लिए कहा। सुकन्या एक ही शहर में  सास -ससुर के रहते हुए अलग रसोई करने के लिए तैयार नही हुई। वेद को समझ नही आ  रहा था। ऐसे में वो क्या करे।
       उसने सुकन्या को समझाते  हुए कहा -जब पिताजी ने हम सबको अलग होने के लिए कहा है। तो एक रसोई की जिद करने से क्या फायदा।
      सुकन्या बोली-सब कहेंगे अपनी सास से तो सभी निभा लेते है। सौतेली सास के साथ निभाया नही गया। मेरा मायका भी यही है। सारे रिश्तेदार मुझे ताने  देंगे की सास के साथ निभा नही सकी। यदि आप चाहते हो मेरी रसोई अलग रहे तो आपको दूसरे शहर चलना पड़ेगा। में अलीगढ़ में रहते हुए अलग रसोई नही करूंगी।
    वेद सुकन्या के बारे में  इस तरह से नही सोच सका था। उसकी कोई जिद हो सकती है। वह आज तक किसी के सामने नही बोली थी। उसके इस तरह से अड़ जाने से वेद हैरान रह गया। उसे अब जिंदगी के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ेगा।  कई दिन तक वेद विचारो में डूबा रहा। उसे मनाने भी कोई नही आया।
         अंतत उसने अलीगढ़ छोड़ने का मन बना लिया।  अलीगढ़ में रहते हुए कई  साल बीत  गए थे उसे अलीगढ़ अपना सा लगने लगा था। उसे  छोड़ते हुए दुःख हो रहा था।  जिंदगी उसका किसी और शहर में इंतजार कर रही थी।
       वेद की दूर के रिश्ते की बुआ दिल्ली में रहती थी। उन्होंने दिल्ली में आकर किस्मत आजमाने के बारे में विचार किया। उन्हें दिल्ली में अपना कहने वाले एक रिश्तेदार का साथ भी मिल जायेगा। अलीगढ़ में जिसे अपना समझता था वे ही वेगाने की तरह व्यवहार कर रहे थे। उन्होंने इस झगडे के बाद उन दोनों से किसी भी तरह का सम्बन्ध नही रखा था। उन दोनों को देखकर वे मुँह मोड़ लेते थे जैसे किसी दुश्मन से सामना हो गया है। ये व्यवहार उन दोनों को और भी दुःख देता  था ।
     वेद ने  सुकन्या से दिल्ली चलने के बारे में कहा -में अकेले जाकर दिल्ली के हाल  मालूम करता हूँ। यदि सही काम मिल गया तो कुछ समय बाद रहने का इंतजाम करके तुम्हे भी अपने साथ दिल्ली ले जाऊंगा। तुम तब तक कहाँ  रहना चाहोगी।
     सुकन्या बोली -जब तक आप दिल्ली में काम की तलाश में जा रहे हो। में इसी घर में रहकर आपके आने का इंतजार करूंगी।
      वेद ने कहा -इस तरह के माहौल  में रहते हुए तुम्हे परेशानी होगी। यदि तुम्हारी मर्जी हो तो मै तुम्हे मायके छोड़ सकता हूँ।
    सुकन्या मायके जाने के लिए तैयार नही हुई। उसने कहा -मेरे मायके में  भाभियाँ है। वे मेरी परेशानी नही समझ पायेगी। बल्कि हमारे पीछे हमारा मजाक ही उड़ाएगी। यहाँ संबंध ख़राब हो गए है। वहाँ में इसकी भनक भी नही लगने देना चाहती। बुरे वक्त में अपना साया भी साथ छोड़ देता है। आप दिल्ली जाकर काम की तलाश करो। में अपना बुरा वक्त गुजार  लूँगी। मेरी तरफ से आप परेशान मत होना। मेरा और सुमन का गुजारा  इस घर में हो जायेगा। मै  यहाँ रहते हुए आपका इंतजार करूंगी। आपको भी तसल्ली रहेगी कि  मै  अपने घर में हूँ।
   वेद को उसकी बाते  उचित लगी क्योंकि वेद को अभी दिल्ली की जानकारी नही थी। उसने दिल्ली के बारे में थोड़ा सा सुना था। अनजान शहर में जीवन गुजारना   बहुत मुश्किल होता है।  वेद जीवन की तलाश में दिल्ली के  लिए चल पड़ा। 

#murad

      वेद और श्यामा की मेहनत  बाहर वालो को दिखाई दे रही थी।जब भी कोई वेद की तारीफ करता तो श्यामा उसके शव्दो को सुनकर तड़प जाती   श्यामा के मन में जलन पैदा हो  रही थी। अब वह दिन रात  घर में क्लेश करने के बहाने ढूंढ़ती रहती। उसकी छोटी सी  बेटी को भी दूध देने पर शोर मचा देती। दिनरात की मेहनत के बाद भी सुकन्या और सुमन कमजोर होती जा रही थी। सुकन्या उस माहौल  के हिसाब से ढल नही पा  रही थी। सुमन को दूध नही मिल पा  रहा था। उसको दस्त लग गए थे। उसकी हालत बहुत ख़राब हो गयी थी। उसे देख कर लग रहा था।  सुमन कुछ दिन की मेहमान है जब हर चीज की अति हो गयी तब सुकन्या के शव्दो का वेद पर असर हुआ।
         उन्होंने अपने पिताजी से बात की-घर में सामान की कोई कमी हो तो आप मुझसे कहो। क्या किसी चीज की कमी है।
    मुंशीराम ने कहा -तू क्या कहना चाहता है। सही से कह। तेरी ये बाते हमें समझ नही आ  रही है।
    वेद ने कहा -घर में दूध की कमी है। यदि ऐसा है  तो ज्यादा दूध मंगवाना शुरू कर दो। मेने खर्चा देने से मना  नही किया है।
  मुंशीराम बोले -तुझे दूध को लेकर किसने कहा है। हमने तुझसे कोई शिकायत की है। जो ऐसे बोल रहा है।
     वेद ने   अपने पिताजी से सुमन की तबियत से सम्बंधित बात की। तो मुंशीराम आपे  से बाहर हो गए। उन्होंने कहा -तू बड़ा बच्चे वाला बनता है। क्या हमने बच्चे नही पाले। तेरी  बेटी  अनोखी  है। ये भी और बच्चो के साथ पल जायेंगी ।
    वेद का इससे पहले एक बेटा  हो कर सही देखभाल के आभाव में दुनिया से चला गया था। उसका दुःख वेद के मन में अभी तक था। सुमन की  हालत भी बहुत ख़राब हो रही थी उसकी हालत से सुकन्या और वेद परेशान रहते थे। वे दुबारा से बच्चे का दुःख नही सहना चाहते थे।
    सुमन वेद की आँखों का तारा  थी। पिता के मन में बेटी के लिए एक कोमल जगह होती है। उसके लिए वेद बहुत संवेदनशील थे। जो इंसान अपने पिता के सामने कभी नही बोला। उसको अपने सामने बोलते देख कर मुंशीराम आपे  से बाहर हो गए। उन्होंने वेद की चिंता को समझने के स्थान पर इसे अपनी इज्जत का प्रश्न बना दिया। जो चिंगारी धीरे -धीरे सुलग रही थी। वह वेद के बोलते ही ज्वाला बन गयी। उसने सब कुछ भस्म कर दिया।
   वेद की तरक्की की खबरे जब श्यामा के सामने आती  थी। उससे उसे जलन होती थी। वह खुश होने के स्थान पर मुंशीराम को भड़काने में अपनी  सारी  ताकत लगा देती थी। श्यामा के शव्दो का असर अब मुंशीराम पर होने लगा था। मुंशीराम अपना बुढ़ापा समझ नही पा  रहे थे। बल्कि वेद की तरक्की  को अपनी मेहनत का फल समझ रहे थे। उन्हें हमेशा लगता था। उनकी बदौलत ही उसका बेटा इतनी तरक्की कर पाया है। उसके मन में बेटा घमण्ड़ो हो गया था। वह बाप के सामने जबान लड़ाने  लगा था।
    दिनों दिन घर में कड़वाहट फैलती जा रही थी। कोई भी वेद और सुकन्या के सवालो का सही जबाब नही देता था। उस घर में धीरे से चुप्पी घर करती जा रही थी। अब वह शांति सबको असहज बना रही थी.
     एक दिन मुंशीराम ने वेद से गत्ते  की फैक्टरी छोड़ देने के लिए कहा। वेद उनका मतलब समझ नही पाया। जब उन्हें समझ आया  तब वह एकदम स्तब्ध रह गए। उससे  कुछ कहते नही बना। उनकी सारी  मेहनत मुंशीराम अपनी मेहनत का फल बता रहे थे। मुंशीराम कभी भी उस फैक्टरी में गए नही थे। श्यामा के शव्दो ने उनकी सोचने समझने की शक्ति ख़त्म कर दी।
         उन्होंने वेद के सामने कहा -जैसी तू फैक्टरी चला रहा है। उससे ज्यादा अच्छी में चला कर दिखा दूंगा।
      ये वेद के लिए एक तमाचा था। जिसने उसे हिला के रख दिया। वेद बहुत स्वाभिमानी था। उसने अपने  भविष्य के बारे में बिलकुल नही सोचा। अपने पिताजी को गट्टे की फैक्टरी की जिम्मेदारी उसी समय सौंप दी। उससे अलग होने का निर्णय किया। उसके इस निर्णय के बारे में किसी ने कल्पना नही की थी। सभी को लग रहा था। वेद अपने पिता के सामने दुखी होकर क्षमा मांगेगा और वे अपना बड़प्पन दिखाते हुए कुछ अपशव्द बोलकर उसे क्षमा कर देंगे। 
    मुंशीराम के मुह से निकले हुए शव्द वे वापस लौटा  नही सकते थे। उन्होंने जिंदगी भर नौकरी की थी। उन्हें खुद पता था। उनके अंदर व्यापर करने की शक्ति और समझ नही है। जबान से निकला तीर अब वापस नही ले पा  रहे थे। उनका बड़प्पन उन्हें झुकने से रोक रहा था।
     श्यामा की मुँहमाँगी  मुराद पूरी हो गयी थी। वह मन ही मन बहुत खुश हो रही थी। उसे लग रहा था चलता हुआ कारखाना उसके बच्चो को मिल जायेगा। सौतेला बेटा  उसकी आँखों से दूर हो जायेगा। उसका जीवनं खुशियो से भरा रहेगा।  

#gatte lo fectory

   वेद को नौकरी मिल गयी पर ये नौकरी उनके मन मुताबिक नही थी। वे दिन रात  मेहनत करते पर उसमे उन्हें ख़ुशी प्राप्त नही हो रही थी।  वे अपनी जरूरत के ही पैसे खर्च करते साथ ही उसमे से कुछ रूपये बचाते  भी थे। उन्होंने अपने काम का सपना देखा था। उस सपने को साकार करने में लगे रहते।
           कहते है -जहाँ  चाह  होती है वहाँ  राह  भी निकल आती  है।  ऐसा ही वेद के साथ भी हुआ। उसके काम से उनका मालिक खुश हो गया। उसके पास एक गत्ते के काम का  आर्डर आया  जिसके लिए उसे कोई ढंग का काम करने वाला इंसान  नही मिल रहा था.उन्होंने वेद के अंदर काम की लगन  और जूनून देखा था। वेद की आँखों की चमक ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके अंदर के जोश और लगन ने उन्हें वेद से बात करने के लिए तैयार किया। वेद से उन्होंने गत्ते  के काम करने के बारे में बात चलायी। तो वह एकदम जबाब नही दे पाया। वेद ने घर में पूछ कर जबाब देने  के लिए कहा।
      वेद ने मुंशीराम से घर में आकर बात चलायी। तो मुंशीराम के पास भी उचित जबाब नही था। उन्होंने अभी तक रेलवे की नौकरी की थी उनमे जोखिम लेने का होंसला नही था। उनके पास परिवार की जिम्मेदारी भी थी। पैसे की तंगी के कारण वे भी सोच में पड़  गए। उन्होंने कहा -मेँ  कल सोच के जबाब दूँगा।
    अगले दिन मुंशीराम ने वेद को कहा -यदि तुम गत्ते  का काम करना चाहते हो तो अवश्य करो। पर मै  तुम्हारी पैसे से कोई मदद नही कर पाउँगा।
     वेद को घर के हालात  पता थे। उन्हें अपने परिवार से मदद की उम्मीद पहले से नही थी। उसे जो कुछ करना था। अपनी हिम्मत के भरोसे ही करना था। उन्होंने अपने मालिक से अपनी रजामंदी दे दी। कुछ मालिक का नाम, पैसा  और साख के कारण उनका काम बनता चला गया।   वेद ने अपनी जमा पूंजी उसमे लगा कर २५ प्रतिशत की पार्टनर शिप ले ली। वेद ने गत्ते  की फैक्टरी चलाने  के लिए दिन रात एक कर दिए।  उनकी मेहनत रंग लाने  लगी। अब वे अपनी नौकरी की अपेक्षा कही ज्यादा कमाने लगे। वेद अभी केवल 24  साल के हुए थे। उनके मन को  लाहौर के कारण जो विपदा सहन करने के लिए मिली थी अब उसका दंश हल्का होने लगा  था। उनके घर के हालत सुधरने लगे। 
        वेद के पैसे की रौनक़  हर तरफ दिखाई देने लगी उनके घर में बदलाव आने शुरू हो गए। उन्होंने अलीगढ़ के मकान  को पक्का करवा दिया।
        इस बीच वेद के घर एक कन्या का जन्म हो गया था। उन्होंने कन्या का नाम सुमन रखा। वह कन्या बहुत सुन्दर थी। जो उसे देखता वह उसे देखता रह जाता। सुमन सबकी आँखों का तारा   बन गयी थी। वेद दिनरात फैक्टरी में काम करते और सुकन्या घर के काम में लगी रहती। वे परिवार में अपनापन खोजने में दिनरात एक कर रहे थे।
           कहते है -अपनी माँ थोड़ा करने पर ही खुश हो जाती है। पर सौतेली माँ को खुश करना बहुत मुश्किल होता है। स्यामा को भी सुकन्या और वेद के व्यवहार और मेहनत कोई ख़ुशी नही दे पाती  थी। वे हर समय सुकन्या और वेद के कामो में कमी ही ढूंढ़ती रहती। वह कोई समय नही  देखती थी जब उनके कामो में कमी न निकाल  सके। वे उन्हें अपने बहु बेटो के रूप में नही ले पाती  थी। बल्कि वह  सुकन्या को बहु की अपेक्षा अपनी प्रतिस्पर्धी  समझती थी। सुकन्या सुंदरता में बेजोड़ थी। जो सुकन्या को देखता ठगा सा रह जाता। उसके आलावा सुकन्या काम में भी सुघड़ ग्रहणी थी। ये दोनों बाते उसे श्यामा की  आँखों में चढ़ने नही देती थी। वे हमेशा सुकन्या और वेद को अपना न सकी। 

#lahor ka chhutna

  प्रेमवती की मौत के कारण सुकन्या की ख़ुशियों  पर ग्रहण लग गया। अब उसकी शादी को किसी तरह से पूरा कर देना ही उद्देश्य रह गया था। प्रेमवती की मौत  ने ख़ुशियों को मातम में बदल दिया था।  वेद के घर में खुशियो का मतलव भी कुछ खास नही था।
      सुकन्या ब्याह कर ससुराल में आ  गयी जैसे परिवार की उसने कल्पना की थी वैसा उस घर में कुछ भी नही था। उस समय के हिसाब से लड़कियों की मर्जी कोई मायने नही रखती थी। उसे अब उस परिवार में ही अपनी पूरी जिंदगी बितानी थी। उसका मन अभी बहन की मौत  के कारण दुखी था। उसपर ससुराल का कोई लाढ  चाव उसे देखने को नही मिला। उसका मन भविष्य के बारे में सोच कर रुआँसा  होने लगा। उसको किसी का प्यार नसीब  भी होगा या ऐसे ही जिंदगी कट जाएगी।
      अब वेद पर नौकरी का दबाब पड़ने लगा। उसका मन आगे पढ़ाई  करने का था।  पर उसे कहा गया -अब तू घर बार बाला  हो गया है। तुझे पढ़ाई  की जगह नौकरी करनी चाहिए। अभी वेद की इच्छा नौकरी करने की नही थी। घर के दबाब के कारण उसे नौकरी ढूंढनी पड़ी। उसकी विज्ञानं की पढ़ाई के कारण उसे अच्छी जगह नौकरी मिल गयी। उस घर का माहौल संस्कृत का होने के कारण उसे कला विषय की पढ़ाई  करने पर विवश किया जाता था उसका मन कला विषय में नही लगता था। इस कारण उसने विज्ञानं विषय में पढ़ाई  की थी। अब उसे एक प्रयोगशाला में नौकरी करने का मौका मिल गया था।  वेद को वहाँ  काम भाने  लगा।
      नौकरी करते हुए वेद का समय बीतने लगा। सुकन्या का मायका अलीगढ़ में था जबकि वेद लाहौर में रहते थे। वही  मुंशीराम की रेलवे में नौकरी के कारण उन्हें लाहौर  में रहना पड़ता था। उनका नदी के किनारे घर था।  वेद की जब भी नहाने की इच्छा होती थी वे नदी पर चले जाते थे। उन्हें गाय  को भी नदी पर नहलाने में बड़ा मजा आता  था। उनका खेलने और तैरने  का शौक  भी साथ ही पूरा हो जाता था। उस समय जिंदगी बहुत सरल हुआ करती थी। लोग सादगी पसंद हुआ करते थे। घर में थोड़ा सा जीवन यापन का सामान ही खुशियो का माप -दंड हुआ करता था।
   उनकी जिंदगी की खुशियो में फिर से ग्रहण लग गया। वेद की नौकरी रसायनो के बीच थी प्रयोग करते हुए एक  खतरनाक रसायन उनकी आँख में चला गया। उस समय इलाज के आधुनिक साधन का आभाव भी था। उनका आस -पास के वैद्य और हकीमो से इलाज करवाया गया। उसका असर नही हो रहा था। वेद हमेशा आँखे बंद किये जलन के कारण तड़पते रहते।  सुकन्या उनकी सेवा में रत रहती पर उनकी पीड़ा को कम  नही कर पाती।
        उन दिनों भारत विभाजन का शोर सुनाई देने लगा था। ऐसे में मुंशीराम ने सोचा बीमार बेटे के साथ लाहौर  में रहना सही नही है  . आस -पास की मारकाट  और आगजनी की घटनाये उन्हें दहला देती थी। उन्होंने वेद के इलाज के लिए  कुछ सामान लेकर अलीगढ़ आने में अपनी भलाई समझी।   मुंशीराम सफर के हिसाब से थोडा सा सामान लेकर  अलीगढ़ आ  गए।  वेद की आँखों का इलाज होने लगा। अभी वेद केबल बीस साल के थे उनकी पूरी जिंदगी सामने थी। उनकी एक आँख के कारण परिवार से खुशियो ने मुँह  मोड़ लिया था। पूरा परिवार उनकी आँखे ठीक  होने के बारे में सोचता रहता था। असार अच्छे नही दिखाई दे रहे थे। उनकी आँखों की पीड़ा तो कम  होने लगी थी पर रौशनी वापिस नही आई थी।
         उधर लाहौर  की तरफ से भी अच्छे समाचार सुनाई नही दे रहे थे  . मुंशीराम लाहौर  वापिस जाने के ख़्याल में रहते थे। उन्होंने इस बात की कल्पना भी नही की थी कि बेटे के इलाज के कारण उनसे अपना देश वेगाना  हो जायेगा। वे केवल इलाज के लिए थोड़ा सा सामान लेकर अलीगढ़ आये  थे। वे लाहौर  से बेहद कम और जरूरी सामान लेकर अलीगढ़ आये थे। उनके पास नौकरी के कागजात और पढ़ाई  से सम्बंधित कोई सामान नही था।
      भारत -विभाजन के कारण लाहौर  का माहौल  हिन्दुओ के रहने लायक नही रहा। जब मुंशीराम ने जरूरी सामान लाहौर  से लाने  का विचार रखा। तब सारे  परिवार के लोगो ने उन्हें जिंदगी का हवाला देते हुए समझाया। -अभी लाहोर जाने का सही समय नही आया है। तुम आराम से यही रहो। जैसी खबरे आ  रही है। उस हिसाब से सामान तो लाना असम्भव है जीवन के भी लाले पड़  जायेंगे।  कुछ समय में हालात  सामान्य हो जायेंगे। तभी लाहौर  जाकर सामान ले आना।
     मुंशीराम ने लाहौर  में तबाही का माहौल  तो पहले ही देखा हुआ था। उनकी भी ऐसे समय में लाहौर  जाने की इच्छा नही हो रही थी। घर और सामान का मोह उन्हें लाहौर जाने पर विवश कर रहा था। उन्होंने हालात  के संभलने  की उम्मीद में कुछ समय और रुकने के बारे में विचार कर लेने में भलाई समझी।
    मुंशीराम ने लाहौर  में रहते समय ही  रिश्तेदारो के कहने पर अलीगढ़ में एक छोटा सा मकान  खरीद रखा था। उन्होंने कभी उस मकान  के बारे में नही सोचा था। अब वही  मकान  उनके रहने का ठिकाना बन गया  था। अब उन्हें अलीगढ़ में रहते हुए 8  महीने हो गए थे। इतने समय तक किसी के घर में रहना कितना मुश्किल हो जाता। उनका वही  मकान  उनका बसेरा बन गया था। रहने का ठिकाना तो हो गया था। अब उन्हें अपने जीवन -यापन की दौड़ में लगना  था।
      भारत -विभाजन के कारण जब उन्हें लगने लगा।  वे वापिस कभी नही लाहौर  लॉट  पाएंगे। तब मुंशीराम और वेद  नौकरी ढूंढने निकल पड़े। मुंशीराम के बुढ़ापे और वेद की एक आँख की खराबी  के कारण और कागजो के आभाव के कारण उन्हें  सही नौकरी नही मिल सकी। उनके पास लाहौर  जाकर कागज लाने  का कोई उपाय नही बचा था क्योंकि अब उनका घर पाकिस्तान बन चूका था। वहाँ तक जाने के लिए बीसा और पासपोर्ट जैसे कागजात और धर्म की  दीवारे खड़ी हो गयी थी। उन दीवारो के कारण अपना घर कैसे वेगाना  हो जाता है। उसका दर्द  वेद कभी नही भुला पाया। सारी  जिंदगी उनके मन में लाहौर  की कसक समायी रही। अपने अंतिम समय तक  वे अपने घर की यादो में खो जाते थे। 

#jahar

    सुकन्या और वेद की शादी की तैयारियाँ शुरू हो गयी थी अब किसी के मन में नाउम्मीदी नही थी। प्रेमवती की तरफ से पैसे की दिक्क़त  ख़त्म हो गयी थी। उसकी सौतेली माँ की तरफ से भी अब किसी को कोई परेशानी नही थी।  पर भाग्य कब किसका विपरीत हो जाये इसके बारे में सोचना किसी के बस का नही होता।
         प्रेमवती की नन्द   सुरेखा  को जब प्रेमवती के निर्णय के बारे में पता चला। तब उसकी छाती पर सांप लौटने लगे। उसे अपनी भाभी का बर्ताव ही पसंद नही था। उसपर वह अपना सब कुछ किसी पराये इंसान को दे दे ये उसकी सोच से उलट  था। ये वह समय था जब सारी  संपत्ति पर केबल बेटे या उसके परिवार का अधिकार होता था बेटियो को मायके की किसी चीज पर अधिकार नही होता था।  सुरेखा को अब अपनी भाभी से कोई उम्मीद नही थी। उधर उसका पति हरिओम भी हरदम उसके कान भरता रहता था। सुरेखा और हरिओम के घर भी कोई संतान नही थी। सुरेखा की माँ और सुरेखा दोनों को जब से प्रेमवती के निर्णय के बारे में पता चला था। उन्हें एक पल भी चैन नही पड  रहा था। वे अनेक उपाय ढूंढने में लगी थी किसी तरह सारी  जायदाद दूसरे के हाथो में जाने से बच जाये।  कानून के हिसाब से प्रेमवती का किसी तरह से विरोध नही किया जा सकता था। सबसे उन्होंने सलाह लेके देख लिया। पर उसका कोई तोड़ नही निकल सका। ऐसे में उन्होंने प्रेमवती को ही रास्ते  से हटाने का सोच लिया।
    सुकन्या की शादी से 15  दिन पहले उन्होंने प्रेमवती को खाने में कुछ गलत चीज खिला दी। जिसके कारण प्रेमवती ने एकाएक  दम तोड़ दिया। आनन -फानन में उसका अंतिम संस्कार करने की कोशिश की गयी। पर उनके मायके वालो को उनकी मौत की खबर लग गयी। जब उनके पिताजी ने उनकी लाश को देखा तो वे समझ गए उनकी बेटी को मारा गया है। उनके होश उड़ गए उनकी बेटी उनके लिए मरे के सामान ही थी पर अपनी पहली औलाद की लाश देखकर वे सकते में आ गए।
          वे प्रेमवती के ससुर से बोले -ये सब कैसे हुआ। प्रेमवती का सारा शरीर नीला पड़ा है। उसको मारा गया है। इसे मै जलाने नहीं दुँगा। पहले पुलिस बुलाई जाएगी तब इसका अंतिम संस्कार होगा।
   प्रेमवती के ससुर ने अपनी पगड़ी सुकन्या के पिता के चरणो में रख दी और बोले -मेरे परिवार की इज्जत अब आपके चरणो में है। जो कुछ हुआ मेरी जानकारी में नही हुआ है। और मेरा भी कोई दोष नही है। पर मै  इन सबकी जिम्मेदारी लेता हूँ। आपके तो और भी बच्चे है। मेरी तो केवल एक बेटी और दामाद ही बचे है। उनके कसूर की सजा आप मुझे दे दो। इस बुढ़ापे में मै अपनी आखिरी संतान को जेल के सीखचों के पीछे नही देख पाऊँगा।
     उनके शव्द सुनकर उनका दिल पसीज गया। वे बोले- पति के जाने के बाद प्रेमवती तो जिन्दा लाश बन चुकी थी। उसका दुःख हमसे भी नही देखा जाता था। पर बेटी तो बेटी थी उसका गम भूलना भी आसान नही होता। आपका कोई कसूर नही है। पर जिसने भी ये कर्म किया है। उसे मै कभी माफ़ नही कर सकूंगा।
      प्रेमवती का जब अंतिम संस्कार हुआ तब उसके पिता ने हाथ में जल लेकर उसकी नन्द सुरेखा को श्राप दिया। तूने मेरी पली -पलायी बेटी को जहर देकर  मारा है। तेरे भी बच्चे हो और सभी बच्चे जवानी में तेरी आँखों के सामने से जाये  भगवान  तुझे भी एक दिन ऐसा ही दुःख दे। उस दिन मेरा दुःख कम होगा।
    इस समय तक सुरेखा की कोई संतान नही हुई थी। डॉकटरो के हिसाब से भी संतान के आसार  नही थे। पर प्रेम वती की मौत  के बाद उसके घर बच्चो का जन्म हुआ।
          सब के मुँह  पर उसके बच्चो को देखकर ये ही शव्द होते -आज के समय में बुरा करने वालो का ही भला होता है।
     उनके कहे हुए शव्दो पर प्रेमवती के पिता मुस्कुरा देते। उन्होंने तो बददुआ  देते हुए भगवान  से उसकी औलाद  ही मांगी थी।
          वे हमेशा कहते थे- बच्चे ना हो  दुःख होता है। बच्चे होकर मर जाये  बहुत दुःख होता है। बच्चे बड़े होकर बिगड़ जाये महादुःख होता है।  यदि भगवान बच्चे अच्छे दे और वे  बड़े होकर मर जाये तो दुख का कोई ठिकाना ही नही होता। इंसान के सारे  किये कराये पर पानी फिर जाता है। उसके पास आंसुओ के आलावा कुछ नही रहता हे।
    ऐसे ही सुरेखा के सारे बच्चे बड़े होकर होनहार निकले पर मौत ने एक एक कर उन्हें अपने पास बुला लिया। तब सुरेखा  की हालत देखकर प्रेमवती के पिता ने कहा- आज  तुम मेरी हालत समझ सकोगी कि जवान बच्चे की मौत का दुःख क्या होता है।  उनके श्राप के फलीभूत होने में 25  साल लग गए थे। इतने सालो तक उन्होंने अपने भावो को संभाल के रखा था। अब उनके मन को शांति मिली थी।
        प्रेमवती के बच्चे शादी के 15  साल बाद हुए थे। उसके 25  साल बाद उनकी मौत  ने सुरेखा को पूरी तरह से तोड़ के रख दिया। वह अपने बच्चो की मौत  का सदमा झेल नही सकी। कुछ सालो के बाद सुरेखा और उसके पति की भी मौत हो गयी। वह आलीशान हवेली अब वीरान पड़ी है। उसमे रहने वाले भी नही रहे जिसके लिए एक जिन्दा औरत  को लाश में बदल दिया गया था।
    जिस सम्पत्ति के कारण प्रेमवती को जहर दिया गया था। आज उस सम्पत्ति को भोगने बाला कोई नही था। कहा गया है -अंत बुरे का बुरा होता है ,

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...