सुमन ने मजदूरो के साथ काम करना शुरू कर दिया उन दोनों को काम की जानकारी थी। सुमन ने इससे पहले कभी कारखाने में आकर काम को देखा भी नही था। उसे काम की कोई जानकारी नही थी। उसने उन दोनों की सहायता से काम सीखा। धीरे -धीरे उसे काम की जानकारी होने लगी। उसने सुकन्या से मदद लेनी शुरू कर दी। काम पूरा होने के बाद उस काम को दुकानो तक पहुचाने की जिम्मेदारी के बारे में सोचना पड़ रहा था। उसने मजदुर विजय से पूछा- तुम्हे काम देने कहाँ जाना होता है। इसकी जानकारी है।
विजय बोला -मै इससे पहले कभी गया नही हूँ। आप बाबूजी से पूछ लो। वे पता बता देंगे तो मै चला जाऊँगा।
सुमन ने पूछकर जगह बता दी। उस पते पर विजय सामान दे आया। विजय आते हुए कितना सामान और चाहिए उसके बारे में पूछता हुआ आया।
ये उस समय की बात है। जब औरते बाहर निकल कर काम नही करती थी। उन्हें समय से हारना होता था या किसी के सामने चिरौरी करके गृहस्थी चलानी पड़ती थी। सुमन ने दोनों हालातो से समझोता करने की अपेक्षा मेहनत करके अपने बलबूते पर जिंदगी चलानी शुरू कर दी।
विजय काम का आर्डर ज्यादा लाया था जो तीन लोगो द्वारा पूरा करना मुश्किल था। सुमन ने सुकन्या से मदद के लिए कहा। सुकन्या को बेटी के होंसले ने नई हिम्मत दे दी थी। अब चार लोग मिल कर काम करने लगे।
अभी हालत ज्यादा नही सुधरे थे। घर में गरीबी का साम्राज्य था। सबको अपनी छोटी जरुरतो के लिए हालात से समझोता करना पड़ता था। सुमन समझदार थी। उसने अपने मन पर नियंत्रण रख लिया था। बाकि छोटे भाई -बहनो को समझाना मुश्किल हो जाता था। वो माँ और सुमन से बहस करने लगते थे। सुकन्या ऐसे हालत देखकर रोने लगती थी। ऐसे में सुमन ही उन्हें समझा कर शांत करने की कोशिश करती थी।
सुमन इस समय बच्चे की अपेक्षा एक समझदार और बड़ी औरत की भूमिका ज्यादा निभा रही थी उसकी उम्र की लड़की से उस तरह की उम्मीद कोई नही कर सकता था। उसका बचपना कही खो गया था। घर में बड़े से लेकर छोटे सभी उसका कहना मानते थे। वेद और सुकन्या उस पर आश्रित हो गए थे।
विजय जब सामान देने के लिए दुकान पर गया। उसे पहले से ज्यादा काम मिला। अब सुमन को निश्चित समय पर काम पूरा करना मुश्किल लग रहा था।
उसने माँ से सलाह की -आप ही बताये में इसे कैसे पूरा कर सकूँगी।
सुकन्या ने कहा -विद्यालय से आकर तेरी दोनों बहने हमारे साथ काम करेंगी। जब तू काम कर सकती है। तो वे काम करने से कैसे मना कर सकती है।
सुमन को माँ का सुझाव सही लगा। उसने अपनी दोनों बहनो के साथ इस बार काम को समय पर पूरा करके भिजवा दिया। दुकानदार उनके काम को देखकर खुश हो गए। धीरे -धीरे काम बढ़ता जा रहा था। सुमन ने काम के बढ़ने के साथ मजदूरो का इजाफा नही किया बल्कि घर के सारे लोगो की मदद से उसने काम पूरा करने की कोशिश करनी शुरू कर दी।
सुमन के द्वारा काम को संभाल लेने से वेद और सुकन्या का टुटे हुए होंसले ने उनके अंदर उम्मीद की किरण जगा दी। वेद के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार होने लगा। अब वेद ने बाहर की जिम्मेदारी संभाल ली। उनके परिवार की मेहनत ने उस परिवार को एकता और मेहनत का महत्व समझा दिया था। उस घर का प्रत्येक इंसान सुमन के हौंसले की तारीफ करता। यदि सुमन जैसी बेटी किसी के घर हो उसे बेटे की कमी महसूस नही हो सकती।
विजय बोला -मै इससे पहले कभी गया नही हूँ। आप बाबूजी से पूछ लो। वे पता बता देंगे तो मै चला जाऊँगा।
सुमन ने पूछकर जगह बता दी। उस पते पर विजय सामान दे आया। विजय आते हुए कितना सामान और चाहिए उसके बारे में पूछता हुआ आया।
ये उस समय की बात है। जब औरते बाहर निकल कर काम नही करती थी। उन्हें समय से हारना होता था या किसी के सामने चिरौरी करके गृहस्थी चलानी पड़ती थी। सुमन ने दोनों हालातो से समझोता करने की अपेक्षा मेहनत करके अपने बलबूते पर जिंदगी चलानी शुरू कर दी।
विजय काम का आर्डर ज्यादा लाया था जो तीन लोगो द्वारा पूरा करना मुश्किल था। सुमन ने सुकन्या से मदद के लिए कहा। सुकन्या को बेटी के होंसले ने नई हिम्मत दे दी थी। अब चार लोग मिल कर काम करने लगे।
अभी हालत ज्यादा नही सुधरे थे। घर में गरीबी का साम्राज्य था। सबको अपनी छोटी जरुरतो के लिए हालात से समझोता करना पड़ता था। सुमन समझदार थी। उसने अपने मन पर नियंत्रण रख लिया था। बाकि छोटे भाई -बहनो को समझाना मुश्किल हो जाता था। वो माँ और सुमन से बहस करने लगते थे। सुकन्या ऐसे हालत देखकर रोने लगती थी। ऐसे में सुमन ही उन्हें समझा कर शांत करने की कोशिश करती थी।
सुमन इस समय बच्चे की अपेक्षा एक समझदार और बड़ी औरत की भूमिका ज्यादा निभा रही थी उसकी उम्र की लड़की से उस तरह की उम्मीद कोई नही कर सकता था। उसका बचपना कही खो गया था। घर में बड़े से लेकर छोटे सभी उसका कहना मानते थे। वेद और सुकन्या उस पर आश्रित हो गए थे।
विजय जब सामान देने के लिए दुकान पर गया। उसे पहले से ज्यादा काम मिला। अब सुमन को निश्चित समय पर काम पूरा करना मुश्किल लग रहा था।
उसने माँ से सलाह की -आप ही बताये में इसे कैसे पूरा कर सकूँगी।
सुकन्या ने कहा -विद्यालय से आकर तेरी दोनों बहने हमारे साथ काम करेंगी। जब तू काम कर सकती है। तो वे काम करने से कैसे मना कर सकती है।
सुमन को माँ का सुझाव सही लगा। उसने अपनी दोनों बहनो के साथ इस बार काम को समय पर पूरा करके भिजवा दिया। दुकानदार उनके काम को देखकर खुश हो गए। धीरे -धीरे काम बढ़ता जा रहा था। सुमन ने काम के बढ़ने के साथ मजदूरो का इजाफा नही किया बल्कि घर के सारे लोगो की मदद से उसने काम पूरा करने की कोशिश करनी शुरू कर दी।
सुमन के द्वारा काम को संभाल लेने से वेद और सुकन्या का टुटे हुए होंसले ने उनके अंदर उम्मीद की किरण जगा दी। वेद के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार होने लगा। अब वेद ने बाहर की जिम्मेदारी संभाल ली। उनके परिवार की मेहनत ने उस परिवार को एकता और मेहनत का महत्व समझा दिया था। उस घर का प्रत्येक इंसान सुमन के हौंसले की तारीफ करता। यदि सुमन जैसी बेटी किसी के घर हो उसे बेटे की कमी महसूस नही हो सकती।