#HARMFUL OF PLASTIC

                        प्लास्टिक  के नुकसान 

   
    कुछ सालो पहले तक  हमारे जीवन में प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं होता था। लोगो को इसके बारे में पता ही नहीं था। पचास साल पहले लोगो का जीवन बहुत सादा था। जरूरत सीमित  थी लेकिन अब सभी घरो में अनेक रूपों में प्लास्टिक दिखाई देने लगा है।
        प्लास्टिक की पॉलीथिन जब आयी तब लोगो ने इसे बहुत पसंद किया। क्योंकि इसमें सामान डालने पर यह फटती नहीं थी जबकि कागज के लिफाफे में अधिक भार सहने का माद्दा नहीं होता था।ये कभी ख़राब भी नहीं होती थी। 
        जबसे पन्नियाँ आयी तब से लोग अपने' साथ थैला रखना भूल गए। धीरे -धीरे घर से खाली  हाथ निकलने में लोग शान समझने लगे। पन्नियों का इतना महत्व बढ़ गया कि लोग अच्छी पन्नी लगने पर दुकान वाले से फालतू पन्नी मांगने में भी गुरेज नहीं करते थे।
   अच्छी पन्नियों का इस्तेमाल एक से ज्यादा बार हो जाता था लेकिन साधारण पन्निया घर में आते ही सामान निकाल कर, कूड़ेदान के हवाले कर दी  जाती  है । एक तरह से हम दुकान से कूड़ा उठा कर, घर के कूड़ेदान में डालने के लिए लाते है । 
        आजकल रसोई से लेकर सोने का कमरा,कारखानों आदि  हर जगह प्लास्टिक ही प्लास्टिक दिखाई देती है। यदि मै  आपसे सोचने के लिए कहुँ । -'ऐसी जगह बताओ जहां प्लास्टिक का कोई सामान इस्तेमाल नहीं होता। 'आप अवश्य परेशान हो जाओगे हमारे चारो  तरफ प्लास्टिक की बहुतायत मिलेगी। 
       कुछ बर्षो पहले तक इसके नुकसान के बारे में किसी को पता नहीं था। अब हर तरफ कूड़े का अम्बार बढ़ता जा रहा है। कूड़े का ढेर रूपांतरित होकर मिटटी में बदल जाता है। लेकिन उसमे से झाँकती हुई पन्नियाँ मन में घृणा पैदा करती है। 
     खाने का सामान जिन प्लास्टिक के उत्पादों में रखते है उनमे भी रासायनिक खराबी पैदा हो जाती है। कहा जाता है। बहुत सारी आधुनिक बीमारियों का कारण प्लास्टिक है। जैसे त्वचा की ,पेट की आदि। इसलिए फिर से लोग धातु के बर्तनो का इस्तेमाल करने लगे है। 
     यह धरती अरबो सालो से है लेकिन धरती का रूप इतना नहीं बिगड़ा था जितना कुछ सालो में  बदल गया। अब तो धरती से आसमान तक प्रदूषित हो गया  है।
  •  यदि इन्हे धरती में दबाना चाहे तो मिटटी प्रदूषित होती है। 
  • जलाना चाहे तो इससे निकलने वाली गैसे वातावरण को प्रदूषित करती है।
  •   नाली में गिर जाये तो नालियों का पानी रोक देती है। बंद नालियों के कारण हर तरफ गन्दा पानी फैल जाता है। बरसात में पानी की निकासी न होने के कारण जल -भराव की समस्या का सामना करना पड़ता है।बरसात में  जल -भराव के कारण जिंदगी रुक सी जाती है। 
  • कूड़े को पन्नी में भरकर फेंक देने से, जानवर खाना समझकर  पन्नी भी खा जाते है।खाने के सामान पचने के आभाव में. ये  जानवरो की मौत का कारण भी बन गयी है। 
    इसकी अति अब विकराल रूप धारण कर चुकी है। इससे मुक्ति के उपाय करने पड़ेंगे वरना धरती जीने लायक नहीं रहेगी। धरती जैसा सूंदर गृह  अभी ब्रह्माण्ड में कही नहीं खोजा गया है। यदि हमे अच्छी जिंदगी चाहिए तो इसके लिए प्रयास करने पड़ेंगे।
     इसके लिए हमें प्लास्टिक की चीजों से दूरी बनानी पड़ेगी।
    घर से थैला लेकर चलने में परेशानी नहीं होनी चाहिए बल्कि अन्य को भी इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। 
    यदि प्लास्टिक का सामान घर में आ गया है। तो इसका बहुउपयोगी प्रयोग करने के उपाय सोचने चाहिए।
      हमें केवल अपना ही भला नहीं सोचना बल्कि सृष्टि के भले के बारे में भी सोचना चाहिए। हमारे बाद भी धरती रहने लायक बनी  रहे। धरती पर सबसे बुद्धिमान प्राणी इंसान है।  धरती को बदलने की सामर्थ्य यदि किसी में है  तो वह केवल इंसान में है। हमे अपने दायित्व का सामना खुले मन से करना चाहिए। जिसमे जितनी सामर्थ्य होती है वही काम कर सकता है। अपनी जिम्मेदारी से मुकरने के बाद कही ऐसा न हो जिंदगी जीना  दुश्वार हो जाये।
                                                                              मधुरिमा पाठक
                                                                              पीजीटी हिंदी 

#DIFFERENT MEANING OF MARRIAGE PART -3

                   शादी के मायने -भाग ३ 

     
   मूर्ति के जीवन में अरुणा की तरफ से खुशियों का आगाज हो चूका था। अब वह  उसकी तरफ से चिंतामुक्त हो चुकी थी.अब उसका ध्यान   उसके छोटे भाई वरुण की तरफ गया।  इतने समय में वह भी शादी के लायक हो चूका था। वरुण ज्यादा नहीं पढ़  सका था लेकिन एक दिन  उसके लिए MA पास लड़की का रिश्ता आ गया। वह लड़की देखने में सुंदर थी। उसके आलावा उसकी पढ़ाई  भी अच्छी थी। मूर्ति ने इस लड़की रीना से वरुण की शादी करने का फैसला कर लिया।
        एक दिन उसके घर में  रीना वधू  के रूप में आ गयी। उसके घर में मानो  उजाला फैल  गया। अब मूर्ति को लगने लगा उसके सारे दुःख दूर हो गए। भगवान ने उसकी सुन ली हर समय उसके मुँह पर भगवान् का नाम रहता।
       अरुणा के बच्चो को लेकर मूर्ति को परेशानी का सामना करना पड़ा था। लेकिन रीना की  एक साल के अंदर ही गोद  भर गयी। भगवान ने पोते  के रूप में उसके घर को रोशन कर दिया। उसके पैर जैसे धरती पर नहीं पड़ते थे। उसे भगवान् ने मनमांगी मुराद दे दी थी। उसके बच्चो के घर में भी तीन बेटे हो गए थे। उसे भगवान् से और क्या चाहिए था। 
        उसके जन्म के दो महीने बाद एक दम  ऐसी खबर मिली की रूह कांप  उठी। सुनते ही मेँ सदमे में आ गयी।  वरुण की दुर्घटना में मौत हो गयी। इसका यकीन करना मुश्किल हो रहा था। वरुण को पल -पल  छोटे से बड़ा होते देखा था। जिस उम्र में लड़को की शादी भी नहीं होती। उस उम्र में वरुण एक बेटे का पिता बन कर दुनिया को छोड़ कर चला भी गया था। 
       जब मै  मूर्ति से मिली तब उसने बताया -वरुण अपने दोस्त की शादी में गया था। जहाँ उसके दोस्तों के साथ लड़ाई हो गयी थी। जिसमे उन लड़को ने उसे जान से मार  डाला। .
       उन्होंने इसे दुर्घटना का रूप दे दिया। जिससे वे सब बच सके। मेने हर स्थान पर इस बारे में जिक्र किया लेकिन मेरी फरियाद कोई नहीं सुन रहा। वह  सब लड़के रसूखदार लोगो के बेटे है। उन्होंने पुलिसवालो को  पैसे खिला दिए है.इतना कहते ही उसके आंसू बहने लगे। वह सीधी सादी औरत  साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पोंछने लगी। मेने भरसक उसे तसल्ली देने की कोशिश की लेकिन उसका दुःख इतना बड़ा था। कि मुझे अपने शब्द झूठे लगने लगे। 
      मूर्ति से मिलकर मुझे लगने लगा भगवान् इतना निर्दयी कैसे हो गया। इस जन्म में मुझे उसके बुरे काम याद  नहीं आते। जरूर उसने पिछले जन्म में बहुत सारे बुरे काम किये होंगे जिसका फल उसे इस जन्म में भुगतना पड़  रहा है। 
        मै  तो उसके किसी बुरे काम की दुहाई भी नहीं दे सकती क्योंकि मेने कभी उसे किसी को परेशान करते भी नहीं देखा था। उसके लिए भगवन ने इतना बुरा कैसे लिख दिया। उसकी कलम भी इतना दुःख लिखते हुए बिलकुल नहीं काम्पी।  . 
       भगवान  ने मुँह फेरा तो इंसानो ने भी उससे मुँह फेर लिया। मूर्ति ने जिससे दूसरी शादी की थी। उसने भी ऐसे समय में उसे छोड़ दिया। अब वह अपने एक बेटे के साथ रहने लगा। मूर्ति ने अपने दूसरे पति रमेश के बहुत हाथ -पैर जोड़े उसकी खुशामद करने  में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन रमेश का दिल नहीं पिघला। 
       रमेश अब बहुत बूढ़ा  हो चुका था।उसके लिए पत्नी की जरूरत ना के बराबर रह गयी थी उसकी सारी इन्द्रियाँ स्थिल हो चुकी थी।  उसके पहली पत्नी के पांचो बच्चो की शादी हो चुकी थी।रमेश की पहली पत्नी पांचो बच्चो को जन्म देने के बाद मर गयी थी। उस समय छोटा बेटा केवल दो साल का था। वह पांचो बच्चो को  अकेले नहीं पाल सकता था इसलिए उसने मूर्ति को अपने साथ रखा। 
      उसके लिए पत्नी अब जरूरत नहीं बल्कि मजबूरी बन चुकी थी। उसे अब केवल मूर्ति ही नहीं बल्कि उसे वरुण के बेटे और उसकी पत्नी की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती।
        इससे बचने का आसान तरीका उसे मूर्ति का साथ छोड़ने में लगा। मूर्ति को समझ नहीं आ रहा था। उससे क्या खता हुई। ऐसे वक्त में रमेश ने उसका साथ क्यों छोड़ दिया। उसके रोने -गिड़गिड़ाने से भी रमेश का दिल नहीं पसीजा। अब रमेश और मूर्ति अलग रह रहे  है। 
    मूर्ति के पास केवल दो ही तरिके हे जिससे उसकी जीवन की नैया पार  हो सकती है। एक उसकी बहू को नौकरी मिल जाये। बहु ने MA  के आलावा कोई व्यवसायिक पढ़ाई नहीं की है। जिसके कारण उसकी नौकरी मिलने में परिशानी हो रही है।  
      दूसरा बहु रीना की किसी अन्य जगह शादी कर दे। उसने विवाहित जीवन का सुख केवल दो साल ही देखा था। उसका पूरा जीवन पड़ा है। रिश्तो का मकड़जाल तो उसने इतने समय में देख लिया है। 
     उसका किसी अच्छी जगह विवाह हो जाये। जिससे उसके जीवन में बदलाव आ सके। 


#shadi ke mayne part-2

                     शादी के मायने भाग -2 

   
    मूर्ति ने पति के सभी बच्चो की शादी में जी  -जान से काम किया। उसे देखकर बाहर वालो को एहसास तक नहीं होता था कि  वह उनकी सौतेली माँ है। इस बीच  उसकी बेटी अरुणा भी शादी लायक हो गयी। उसकी उसने 12वी   पास करने के बाद रिश्ता ढूँढना शुरू कर दिया। अरुणा की बीसबें  साल में उसने शादी कर दी। 
      उसकी शादी के समय मूर्ति बहुत खुश नजर आ रही थी। उसके चेहरे पर पुरानी  रौनक विराजमान थी। उसके साथ दरवाजे पर स्वागत करने के लिए उसका पति साथ नहीं खड़ा दिखाई दिया। उसके बच्चे भी आवभगत करते दिखाई नहीं दे रहे थे। चारो तरफ देखने पर भी उसका पति और बच्चे कही दिखाई नहीं दे रहे थे। 
       ऐसे समय में मूर्ति मुझे बहुत अकेली लग रही थी। वह उतने ही जोश में काम कर रही थी जितने जोश में वह हमेशा होती थी। उसे देखकर एहसास हो रहा था।वह  कही न कही  अंदर से टूट रही थी। उसने पति के बच्चो के लिए बहुत किया लेकिन उसका पति ऐसे समय में नकली मुखौटा लगाने के लिए भी तैयार नहीं था। उस आदमी को देखकर लग रहा था उसे इन बच्चो की परवाह नहीं थी बल्कि अपनी पहली पत्नी के बच्चो की जिम्मेदारी पूरी करने के लिए ही मूर्ति के साथ रहा। 
      अधिकतर औरते दूसरे के बच्चो को अपना लेती है। लेकिन दूसरे पति के लिए किसी और के बच्चो को अपना सकना कितना मुश्किल होता हे इसका अहसास यहाँ हुआ।
      कोई साथ न दे तब भी काम पूरा हो जाता है। मूर्ति को ऐसे समय में अरुणा के पिता की बहुत याद  आ रही थी। क्योंकि उसे ऐसे समय में वह अपने साथ खड़े दिखाई देते। जबकि इस समय सिर्फ शादी की खाना-पूर्ति होती दिखाई दे रही थी।  अपने पन के आभाव में अरुणा ससुराल चली गई। 
      अरुणा अपने ससुराल में मन लगाने लगी। उसका घर में सभी उसका ध्यान रखते थे।माँ की क्षत्रछाया से दूर  वहां के माहौल में रमने की भरसक कोशिश कर रही थी। क्योंकि मायका भी इतना भारी  नहीं था जहाँ परेशानी होने पर उसकी जिम्मेदारी उठाने के लिए कोई तैयार हो।   माँ का ख्याल उसे हमेशा सताता रहता। उसे इसकी खलिश हमेशा से थी। उसके अपने  पिता उसे इतनी छोटी उम्र में छोड़ कर क्यों चले गए। कई बार उसे भगवान  पर भी गुस्सा आता था क्यों उससे उनका पिता उन्होंने छीन लिया। 
      अरुणा अपने ससुर में पिता का रूप तलाशने लगी। .उसके ससुर अच्छे थे। उन्होंने उसकी भावनाओ को समझा। उनके अंदर भी पिता का रूप हिलोरे लेने लगा।लेकिन पिता और ससुर के प्यार में अंतर् होता है। पिता का प्यार सीमाहीन हो सकता है। लेकिन ससुर और बहू को मर्यादाओ का पालन करना पड़ता है। कही उस सम्बन्ध का मतलब कोई गलत न समझने लगे। 
     इस तरह उसकी शादी के चार साल बीत  गए लेकिन उसकी अब तक गोद नहीं भरी थी। इसे लेकर मूर्ति और अरुणा दोनों चिंतित रहने लगी। क्योंकि अब सभी उनसे बच्चो के बारे में बात पूछने लगे थे। उन्हें अरुणा में कमी दिखाई दे रही  थी।  सभी को लड़की में दोष ढूंढने में समय नहीं लगता। लेकिन लड़के हमेशा इस चिंता से परे  होते है। 
       अरुणा की डॉ से  जाँच -पड़ताल होने लगी। उसे अनेक डॉ को दिखाया गया। एक साल के अंदर ही सुखद परिणाम दिखाई देने लगे  पांचवे साल में अरुणा के घर में दो जुड़वाँ  बच्चो ने जन्म लिया।  उसके घर में बच्चो की कमी एक साथ पूरी हो गई। अब अरुणा का परिवार पूरा हो गया था। उसके घर में लड़का और लड़की दोनों ही एक साथ आ गए थे। 
    बाकी -अगली बार 

#DIFFERENT MEANING OF MARRIAGE

                                    शादी के मायने 

   एक दिन मेरे  पड़ोस में एक परिवार  रहने आया। जिसमे उस परिवार में चार सदस्य थे। उनके दो बच्चे  थे  उसकी  बड़ी लड़की 10  साल की थी और बेटा  चार साल का था। मूर्ति साक्षात् मूर्ति के समान  थी।   मूर्ति बहुत सूंदर और गाने- बजाने में निपुण थी। वह पुरे जोश से कीर्तन करती थी। ढोलक बजाते हुए लगता था जैसे जोश में ढोलक ही फाड् देगी। गाते -बजाते हुए पसीने से सराबोर हो जाती थी। लगातार एक के बाद दूसरा गाना गाती  चली जाती थी। वह गाने -बजाने  में कभी नानुकुर नहीं करती थी।  उसका गाने -बजाने में सानी  नहीं था। हम उसके साथ केवल सहायक की भूमिका निभाते थे। उसे किसी और साथी की जरूरत नहीं थी। वह अकेली एक मण्डली के समान  थी।
      पूरे  दिन घर के काम में लगी रहती थी। उसके आलावा अपने पति के कारखाने में काम भी करती थी। उसके चेहरे पर काम को लेकर परेशानी नहीं दिखाई देती थी। हर समय हँसती- मुस्कराती  जोश से भरी रहती थी। 
           एक दिन मुझे पता चला मूर्ति की यह दूसरी शादी थी। उसकी पहली शादी 18  साल की उम्र में हो गई थी। जिसके कारण उसके  22  साल की उम्र तक दोनों बच्चे हो गए। जब वह 24  साल की हुई। तब तक उसका जीवनसाथी उसे दुनियाँ  में अकेला छोड़ कर स्वर्ग चला गया। 
     शहरो में जिस उम्र में लड़कियाँ  शादी के ख्यालो में खोने लगती है। तब तक मूर्ति की दुनियाँ  उजड़ चुकी थी। मासूम सी मूर्ति की गोद  में दो नन्हे बच्चे कुलमुला रहे थे। मूर्ति उन नन्ही सी जानो  को चुप कराये या अपने उमड़ते आंसुओं को रोके उसे कुछ समझ नहीं आता था।
       मूर्ति ने पढ़ाई  भी केवल नौवीं  तक की थी। उसके परिवार वालो ने उसे ज्यादा पढ़ाना  उचित नहीं  समझा था। उन्होंने बेटी को जिम्मेदारी समझ कर जल्दी से मुक्ति पाने में अपनी भलाई समझी थी। उसके जीवन में पूरी तरह अंधकार छा  गया था। 
        उसे समझ नहीं आ रहा था ऐसी हालत से पार  कैसे पाया जा सकता है। उसने खुद को भाग्य के भरोसे छोड़ दिया। इतनी छोटी उम्र में दो बच्चो के साथ जिंदगी की दौड़ में किस तरह पार  पहुंचेगी उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। 
       कुछ समय तक मूर्ति रोती -विलखती  घर और बच्चो के काम में खुद को भुलाये रहती। लेकिन रात  का अँधेरा उसे पति की यादो में ले जाता। 
     ससुराल में रहते हुए उसे दिन -रात  पति की मौत  का उलाहना दिया जाता। जैसे उसके कारण ही उसके पति की मौत हुई  है। यदि उससे उसकी शादी नहीं हुई होती तो वह सौ साल तक जीवित रहता। ऐसे दमघोटू माहौल में उसके लिए साँस लेना  भी मुश्किल होता था। 
          कुछ समय बाद मायके आने पर उसके घरवालो  ने मूर्ति को वापस भेजने से मना  कर दिया। मायके वाले ज्यादा अमीर नहीं थे। लेकिन उसकी दयनीय  हालत देखकर उनका दिल पसीज गया। मूर्ति के मायके वालो के  लिए तीन जनो  का खर्चा वहन करना मुश्किल था। 
   इसलिए   उसके मायके वालो ने उसके लिए  रिश्ता देखना शुरू कर दिया। लेकिन दो बच्चो की विधवा के साथ शादी करने की बात सुनकर लोग वापस नहीं आते। जबकि उसकी उम्र केवल 26  साल ही थी। धीरे -धीरे दिन बीतते जा रहे थे। उसकी उम्र बढ़ती जा रही थी। 
       एक दिन उनके पास पांच बच्चो के विधुर बाप का रिश्ता आया। उसके परिवार वालो को वह रिश्ता पसंद नहीं था। लेकिन मज़बूरी में उन्होंने मूर्ति की शादी उससे करने में भलाई समझी। 
      जिंदगी के इस रूप को मूर्ति ने खुद को ढालना शुरू कर दिया। उसके पति के पांच बच्चे शादी की उम्र के होने लगे तब हँसते -मुस्कुराते हुए उसने उनकी शादी कर दी। उसे देखकर नहीं लगता था। ये उसकी सौतन के बच्चे है। शादी करने के बाद वह बेटे अलग रहने लगते। क्योंकि वह खुद भी किराये के मकान में रहती थी। उसने जिंदगी को लेकर कभी कोई गिला -शिकवा नहीं किया। 
    बाकी  अगली बार -------

COURAGE AND LIFE

                   जुझारूपन से किस्मत  को मात

   जिंदगी के खेल निराले होते है। ऐसी ही एक दास्ताँ मेरे सामने आयी । एक दिन मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई। वह 1984  के दंगो में अपने माता -पिता को खो चुकी थी।
        उस समय उसकी उम्र केवल तीन साल की थी। उसे अभी दुनियाँ  की समझ भी नहीं थी। वह हर समय माँ के पल्लू से चिपकी रहती थी। अचानक उसकी दुनिया में झंझावात आ गया। उसे इन हालातो की सही तरह से समझ भी नहीं थी।
       जो हो रहा है। क्यों हो रहा है। वह चीख -चीख कर रो कर ही इन को रोकने का प्रयास कर रही थी। अपने छोटे -छोटे हाथो से उन आताताइयों को रोकने की कोशिश कर रही थी. उन नृशंस लोगो को किसी पर तरस नहीं आया। उसके सामने उसके माँ -बाप और बड़े भाई -बहनो को जिन्दा आग के हवाले कर दिया गया। उस पर किसी की नजर नहीं पड़ी। या उसको किसी ने महत्व नहीं दिया।
         अगले दिन लाशो के ढेर में  मनमीत  मिली। जो घायल थी मगर जिन्दा  सांसे ले रही थी। एक रहमदिल पडोसी का ध्यान उसकी तरफ गया। उसने इस बात को अन्य लोगो पर जाहिर नहीं होने दिया।उसे  चुपचाप अपने घर ले आया। घर में उसकी देखभाल से वह स्वस्थ  हो गयी। इस बीच  दंगे  खत्म हो गए। जिस भले पडोसी ने इतने दिन देखभाल की थी। अब वह मनमीत के रिश्ते दारो को केम्प में ढूंढने लगे।
       एक दिन उन्हें उसके चाचा  मिल गए। वे भी दंगे से प्रभावित थे। लेकिन उन्होंने माल  का नुकसान उठाया था। लेकिन उनके परिवार की जान बच गई थी। उनकी तीन बेटियाँ  और दो बेटे थे। सब सही सलामत थे। उन्हें सही समय पर केम्प में पहुँचा दिया गया था।
      उनके मकान  को जला दिया गया था। और दुकान को लूट लिया गया था। लेकिन जान बच गयी थी उसका उन्होंने तहे  दिल से शुक्रिया अदा  किया।
      उनके  लिए  इतने बड़े परिवार की देखभाल करना बहुत मुश्किल था। उन्हें विभाजन के बाद दूसरा उजड़ने का  दंश  साल रहा था। दादाजी बिलकुल चुप हो गए थे। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। जवानी में विभाजन का झटका झेल गए थे लेकिन बुढ़ापा बहुत दुखदाई प्रतीत हो रहा था।
       सरदारों की हिम्मत कभी खत्म नहीं होती। उन्होंने जोशीले अंदाज से मनमीत को अपने गले लगा लिया। साथ ही आंसुओ की धारा बह  निकली उन्हें अपने बड़े बेटे के परिवार के खत्म होने का  दुःख सता रहा था  ।                उन्होंने घर आकर अपने उजड़े आशियाने को संभालना शुरू किया। लुटी हुई दुकान में फिर से सामान डाला। जिंदगी की जद्दोजहद शुरू हो गयी।
       सबसे पहले बच्चो की पढ़ाई  का इंतजाम किया। बच्चे पढ़ने  में मन लगाने लगे। इस तरह समय बीतता गया। समय आने पर सब काम -काज में लग गए तब उन्होंने  सबकी शादी कर दी। । जिंदगी पटरी पर आ गयी थी। अब मनमीत के चाचाजी ने सुख की साँस ली।
        मनमीत बैंक में बड़ी अफसर बन गयी थी। उसकी शादी को तीन साल हो गए थे। अचानक उसे बच्चेदानी के कैंसर का पता चला। इसकी खबर सुनते ही सन्न रह गयी। अभी तक उसने मेहनत की थी। उस मेहनत का फल अब मिलने लगा था। तभी किस्मत ने फिर से झटका दे दिया। कई दिन आंसुओ में डूब  गए। फिर हिम्मत जुटा  कर डॉक्टर  की देखरेख में इलाज चलने लगा। डॉ ने उन्हें बच्चेदानी निकालने  का सुझाव दिया। लेकिन अभी तक वे बेऔलाद थे। इसलिए इसके उपचार के उपाय किये गए। कुछ खराब हिस्सा काट कर निकाल दिया गया। जिसके बाद बच्चेदानी में बीस टांके आये।
      अब मनमीत घर में रह कर आराम कर रही थी।हर  समय उसका मन  किस्मत के रंग बिरंगे खेल को समझने  में लगा रहता लेकिन  वह निराश नहीं हुई थी बल्कि इस हालात  को बदलने की कोशिश किस तरह की जा सकती है। इस बारे में सोचती रहती थी।
      सब ठीक होते ही वह  बच्चे के लिए नई तकनीकों का सहारा लेने लगी।  उसने testtube बेबी तकनीक से दो बच्चो को जन्म दिया। अब उसका घर खुशियों से महक उठा था। अब उसके चाचा जी दुनियाँ  से कूच  कर गए थे। चाची जी को उसने मदद के लिए अपने पास बुला लिया था।
      कुछ  समय बाद उसने स्वस्थ होते ही बच्चेदानी निकलवा दी। अब उसे इसकी जरूरत नहीं थी। उसके घर में बच्चो की किलकारियां गूँजने  लगी थी। बच्चेदानी का कैंसर फिर से पनपने लगे इससे अच्छा उसे निकलवाने में भलमनसाहत दिखाई दी।
      मनमीत का जीवन दुखो से भरा हुआ था लेकिन उसने अपने जुझारूपन से वह लड़ाई भी अपने हक़ में बदल दी।  उससे मिल कर जिंदगी जीने के प्रति मेरा नजरिया बदल गया।

     
          

#HAPPY JOURNEY OF MANALI

                 मनाली का सुहाना सफर 


  मनाली का सफर बहुत सुहाना था। हरीभरी वादियों के बीच  घुमना  और रहना अद्भुत अहसास दिलाता है।  हमारा कॉटेज एप्पल गार्डन के बीच  होने के कारण हमे सेब के पेड़ देखने और उनके बारे में जानकारी  हासिल हुई। सेब का पेड़ लगने के 15  साल बाद फल देता है। काफी लम्बे समय तक उसकी सेवा करनी पड़ती है। इसका मतलब उसे एक पीढ़ी लगाकर भूल जाये और दूसरी पीढ़ी उसका फल चखती है। उसको बड़ा होते देखना मानो  एक बच्चे की परवरिश करने के समान  है।
     हमारे कोटेज  के आसपास बहुत शांति थी क्योंकि वह शहर से एक घंटे की दूरी  पर था। सेब के बगीचे में बैठकर नीले   आकाश को देखकर गाने की पंक्तिया "हरीभरी वसुंधरा पर नीला -नीला ये गगन। ये किस कवि  की कल्पना का चमत्कार है। " याद आने लगी।
         यहाँ पर फिश गार्डन बना हुआ है। शुरू में उसके पोस्टर देखकर हमने सोचा नहीं था इसमें हमारे मतलब का कुछ होगा। लेकिन वहाँ  हम अनमने मन से चले गए। कि  कुछ अद्भुत मछलिया देखने का मौका क्यों छोड़ा जाये। यहाँ  पर मछलियों की विविधता के साथ मछलियां खाने के शौकीनों लिए उनके सामने ताजी  मछलियां पकड़ कर उनके सामने साफ करके बना कर पेश की जाती है। उनके लिए इससे ज्यादा लाजबाब चीज और क्या हो सकती है।
      लोगो ने इसे मनोरंजक पार्क के रूप में बदल दिया था। उसमे अनेक तरह के पक्षी दिखाई दिए। हमारे सामने पक्षियों की चहलकदमी  दिखाई दी। उनका दो पैरो  पर इंसानो के सामान चलना अजीब लग रहा था। कुछ पक्षी बहुत बड़े पिंजरे में थे।
      यहाँ पर अनेक साहसिक खेलो का इंतजाम भी था। जिसके बारे में   मैने  सोचा भी नहीं था। मेने जिंदगी में इतने साहसिक खेलो के बारे में इससे पहले व्यवहार में नहीं देखा था। पहली बार देखकर मेरे अंदर हिम्मत इन्हे खेलने की जागी। इन खेलो को खेलते वक्त शरीर पूरी तरह पसीने से भीग गया। मैंने  इतने अधिक पसीने की कल्पना भी नहीं की थी। मुझसे किसी को उम्मीद नहीं  थी  की इन खेलो में हिस्सा लेकर पूरा कर सकूंगी। बर्मा ब्रिज पर पहुंच कर वापिस आते  समय मेरी हिम्मत खत्म होने लगी थी। मुझसे किसी को उम्मीद नहीं थी मै  वापिस आ सकूंगी। मेरी सहायता करने के लिए सहायक  आगे बड़ा लेकिन बिना किसी की मदद के में वापिस आ गयी।
       हम जून के महीने में मनाली घूमने गए थे। ये घूमने के हिसाब से  माकूल समय होने के कारण मुख्य बाजार में लोगो की गहमा -गहमी थी। लोगो की भीड़ -भाड़ देखकर हैरानी हो रही थी। बस -अड्डे से बाहर निकलते ही यहाँ का मॉल रोड शुरू हो जाता था। जिसे देखकर लगता हे पूरा मनाली सड़को पर निकल पड़ा है।
       वहां का प्रसिद्ध हिडिम्बा मंदिर देखने के लिए हम चल पड़े हमे उसकी दुरी ढाई किलोमीटर बताई गई। इतनी लम्बी दूरी  पैदल पार करना हमें मुश्किल लग रहा था। हमने गाड़ी करने के बारे में सोचा। कुछ लोगो से गाड़ी के बारे में बात की. तब पता चला। सारा रास्ता गाड़ियों के कारण जाम  पड़ा है। यदि गाड़ी से गए तो बहुत मुश्किल में फंस जाएगे।
      एक आदमी की दास्ताँ सुनकर हमें हैरानी हुइ। उसने बताया" -मै  और मेरा परिवार गाड़ी से आ रहे थे।मुझे  जाम  में फंसने के कारण  गुस्सा आने लगा।"
    मेने परिवार के लोगो से कहा -""मेँ  पैदल जा रहा हूँ। तुम्हारी मर्जी है  पैदल चलो या गाड़ी में आ जाओ। "उन्होंने आने से मना  कर दिया। उसने बताया उसे यहाँ पहुंचे हुए  दो घंटे हो गए है। लेकिन गाड़ी से उसका परिवार अभी तक नहीं आया।
     उसकी कहानी सुनकर हमने गाड़ी के स्थान पर पैदल चलने का मन बना लिया। जबकि दिल्ली में रहने के कारण हमें पैदल चलने की आदत नहीं थी। हिडिम्बा मंदिर के पास तक गाड़ियां जा सकती है। लेकिन इतने ऊँचे पहाड़ पर  लोगो का भारी  जमाबड़ा था।
      हम पैदल रास्ते  से गए थे। उस रस्ते  से भी बहुत लोग पहुंच रहे थे। उस तरफ  भी अनेक दुकाने सजी हुई थी जिनपर खाने -पीने  और जरूरत का समान बिक रहा था। यहाँ याक की सवारी ,मैंमने के साथ फोटो खिचवाने के प्रबंध थे।
       हिडिम्बा मंदिर पर पहुंच कर जान में जान आयी। इस समय तक यहाँ पर छाया हो गयी थी। ऊँचे -ऊँचे पेड़ो के कारण ठंडक का अहसास होने लगा था। इस मंदिर में प्रवेश के लिए बहुत लम्बी लाइन लगी हुई थी जिसे देखकर लगा यदि लाइन में लगकर प्रवेश करने के बारे में सोचा तो कई घंटे में नंबर आएगा।
       आप कही भी मौसम के हिसाब से घूमने का कार्यक्रम बनाओ तो भीड़ का अंदाजा लगाने में गलती मत करना। मेरे साथ ऐसा कई बार हो चूका है। जब हम जिस मकसद से गए समय की कमी के कारण हमे उसे अधूरा छोड़ना पड़ा है।           
       हमारी शाम के समय वापिस लौटने की  टिकट बुक थी। इसलिए बेमन से हमने वापिस चलने का मन बनाया। मंदिर के  अंदर प्रवेश का रास्ता बहुत छोटा गुफा जैसा बना हुआ था। यहाँ पर राक्षसी देवी के समान पूज्य है।
      वापिस बस तक पहुंचने के लिए भी हमें पैदल सफर करना पड़ा वहां तक का रास्ता भी जाम  था। इस तरह मनाली में एक दिन का सफर तय करने के लिए हमारा पैसा काम नहीं आया बल्कि  शरीर की ताकत के कारण हम  घुम  सके। .
    वापसी के रस्ते में ब्यास नदी के किनारे  चलना बहुत अच्छा लग रहा था। उसका शुद्ध ,सफ़ेद पानी मन को लुभा रहा था  सारे  रस्ते में नदी हमारे साथ चलती रही। जब तक रात  हुई मै  लगातार नदी को देखती रही। एक तरफ  ऊँचे -ऊँचे पहाड़   दूसरी तरफ नदी।  सफर में इतनी दूर तक नदी के किनारे चलना अद्भुत अहसास देता है।
       सुबह होने पर दिल्ली पहुंचने पर मन अभी तक मनाली में ही घूम रहा था।  

#DANGEROUS ROAD TRAVELS TO PAHALGAM

            खतरनाक रास्तो का सफर पहलगाम 

  कश्मीर में पहलगाम की यात्रा का भी आकर्षण रहता है। फिल्मो में पहलगाम के बारे में अधिकतर जिक्र होता था। जिसके कारण यहाँ आने की   चाहत थी। लगभग श्रीनगर से सौ  किलोमीटर की दूरी  तय करके हम पहलगाम पहुँचे  . वहाँ  पर खच्चरों वालो ने हमें घेर लिया। सब हमें फायदों और नुक़्सानो के बारे में बताने लगे। उन्होंने हमें सरकार का लगाया हुआ कीमतों वाला बोर्ड भी दिखाया। लेकिन उसके बाबजूद हमने भाव -ताव  करके सही पैसे लगवा लिए।
       उन्होंने हमें कई सारी  जगह दिखाने  के बारे में बताया। जिसे सुनकर लगा यहाँ  अनेक विविधताएँ  दिखाई देंगी लेकिन जब हमने वहाँ  जाकर देखा तो निराशा हाथ लगी। उन्होंने हरी  -भरी जगहों के ही अलग -अलग नाम रख कर हमे बरगलाने की कोशिश की। लेकिन हम डल  लेक में पहले ही इस तरह की धोखाधड़ी के शिकार हो चुके थे। इसलिए हमने सबसे कम पेसो वाला पैकेज लिया था। यहाँ आकर हमे कोई खास मजा नहीं आया। बल्कि यदि उन्होंने हमें इसके अनेक नाम नहीं बताये होते तो शायद हम इतने पैसो  के लिए तैयार नहीं होते।
       उन्होंने कई पॉइंट तो ऐसे दिखाए जैसे यहाँ राजा ने शिकार किया था।
      २ यहाँ से कश्मीर वेली  दिखाई  देती है।
      3 मिनी स्विट्जर्लेंड है। यह एक समतल जगह थी। जिसके अंदर एक बहुत बड़ा गुब्बारा था जिसमे बच्चे बैठ  कर मनोरंजन कर रहे थे। यह एक पार्क जैसा था जिसके चारो तरफ घुड़सवारी करने का रास्ता बना हुआ था। इस जगह को देखकर अच्छा लगा। इसमें बहुत सारे  सामान बेचने वाले घूम रहे थे।
       पहलगाम में घूमने का रास्ता बहुत खतरनाक है। आपने वैष्णोदेवी पर खच्चरों की सवारी की होगी लेकिन वहाँ  पर रास्ते  सही तरह से बने होने के कारण डर  नहीं लगता। पहलगाम में कोई सही रास्ता नहीं बना हुआ है जिसके कारण हर समय डर  लगता है कि गिर जायेंगे। एक बार भी आस -पास के माहौल को देखने की इच्छा नहीं हुई बल्कि हर समय लगता रहा सही सलामत वापिस पहुंच जाये। बारिश के कारण बहुत ज्यादा फिसलन के कारण खच्चरों के पैर फिसल रहे थे। पेड़ो की जड़े  मिट्टी  से बाहर निकल आयी थी। खच्चरों के रास्ते  में गहरे गड्डे बन गए थे। .जिसमे खच्चरों वाले के भी घुटनो तक पैर धंस जाते थे। उसके खतरनाक रास्ते  पर चलते हुए लग रहा था यदि इस भीगे हुए रास्ते  पर गिर कर कपड़े गंदे हो गए तो हमारे पास बदलने के लिए भी कुछ नहीं है। चोटों  का डर साथ ही  भयभीत कर रहा था।
       मेरे साथ खच्चर वाला था जिससे वह मुझे अगाह करता जाता था कि कब आगे झुकना है या कब पीछे होना है। लेकिन मेरे दो साथियो के साथ कोई नहीं था जिसके कारण उनकी जान हलक तक आ जाती थी।
        पहलगाम में यात्रा करने का सबसे सही तरीका चलकर जाना है। उनके अनगढ़  रास्तो पर खच्चरों से भी सुविधा नहीं होती है।
       रास्तो में मेमने लेकर बहुत सारे लोग बैठे होते है। जो जबरदस्ती हमारे घोड़े पर मेमने  लादकर  फोटो खिचवाने के लिए विवश करते है। उन्होंने इसे जबरदस्ती का व्यापार  बना दिया है। जिससे मन में कोफ़्त होती है।
       लगभग सौ  किलोमीटर की दुरी तय करके पहलगाम में हमें मजा नहीं आया।  सारा सफर धड़कने बढ़ाने वाला था। 

#A WONDERFUL JOURNEY FROM SONMARG TO JOJILA POINT

           सोनमर्ग से जोजिला पॉइंट का अद्द्भुत सफर 


   कश्मीर का सफर बहुत सुहाना रहा क्योंकि वहाँ  पर गर्मी नहीं थी हमारे सामने हल्की -हल्की बूंदाबांदी होती रही। जिसके कारण यदि हम दिल्ली में होते तो कभी बाहर नहीं निकलते। लेकिन जब कुछ समय के लिए सपनो की दुनियाँ  देखने निकले तब कैसे होटल के कमरे में बंद रह सकते थे। हमें वहां काफी ठण्ड का अहसास हो रहा था।
      हमारे होटल में खुले स्थान पर खाने का इंतजाम किया जाता था। कश्मीर में जितने स्थान पर पक्का बना हुआ स्थान होता उससे कई गुना बड़ी जगह में हरियाली दिखाई देती थी जितनी जगह में यहाँ सीमित कमरे बने थे। उतनी जगह में दिल्ली में दस गुना ज्यादा कमरे बना कर दस गुणा  ज्यादा फायदा उठाया जाता।
        एकदम शांत और गंदगी विहीन जगह को देखकर लग रहा था मानो  किसी और दुनियाँ  में पहुँच  गए है। पहाड़ी इलाको में बारिश के बारे में अनुमान लगाना कठिन होता है। कभी धुप कभी छाँह  का चोली -दामन  का साथ रहता है। इसलिए इन स्थानों पर जाते वक्त पूरी तरह से तैयार होकर निकलना चाहिए। मौसम की लुका -छिपी चलती रहती है।
       धूप निकलने पर गर्म कपड़े असहनीय हो जाते है। यदि बारिश  हो जाये  तो केवल जैकेट की तरह के कपड़ो में ठण्ड रूकती है। स्वेटर जैसे कपड़े लगते ही नहीं शरीर पर कुछ है। ऐसे में जैकेट ऐसी होनी चाहिए जब गर्मी लगे तो उनकी बाजू निकाल कर आधी जैकेट बना सको।
      बारिश होने पर स्वेटर में पानी चला जायेगा जबकि जैकेट के ऊपर पानी पड़ा रहेगा जिसे आप तौलिये  से पोंछ  कर सूखा सकते हो। आपको गीलेपन का अहसास नहीं होगा। साथ ही ठण्ड से बचे रहोगे।
     सोनमर्ग जाते समय हमे सिंधु नदी के दर्शन हुए। इसका साफ -सुथरा पानी और उद्गम स्थल मन को लुभा रहा था। एक पतली सी धारा  किस तरह विशाल नदी का रूप लेती  है। इस नदी की खासियत है कि ये कश्मीर से ही पाकिस्तान चली जाती है।
        बारिश में ठंड से  भीगने  से हम लोग डरते है कही बीमार पड़  गए तो क्या होगा लेकिन कश्मीर में लोगो को हलकी बूंदाबांदी में बिना किसी छतरी आदि के रोजमर्रा के काम करते देखा। जबकि इतनी बारिश में हमारे अंदर भीगने का होंसला नहीं था।
      सोनमर्ग का हमने बहुत नाम सुना था। लेकिन वहां जाने पर केवल पहाड़ो पर सिर्फ हरियाली दिखाई दी। इतनी बारिश में हमारी इच्छा हरियाली देखते हुए बारिश में  भीगने की नहीं हुई।
       सोनमर्ग से जोजिला पास के लिए टेक्सी जाती है। जोजिला पॉइंट लद्दाख में आता  है। वहां से पूरा सफर दुर्गम  पहाड़ी चढाई का  है। जहाँ  का सफर करते हुए अच्छे -अच्छो  की हिम्मत भी पस्त  हो जाती है।  इतने  पतले  रास्तो पर एक समय में एक गाड़ी निकल पाती  है। जिसके कारण अधिकतर जाम  का सामना करना पड़ता है।
     इन रास्तो पर चलते हुए हमने कारगिल युद्ध में फतह की गई चोटियों के दर्शन किये। इन चोटियों को फतह करने के लिए कितने सैनिको  ने अपनी जान गवाइ  थी। यदि इन्हे फतह नहीं किया जाता तो लद्दाख पाकिस्तान का हिस्सा बन जाता क्योंकि इन दुर्गम पहाड़ियों के बीच  अन्य रास्ता बनाना बहुत मुश्किल है। क्योंकि इन चोटियों से इस एक मात्र रास्ते पर बमबारी करके  कब्जा किया जा सकता  है। बिना खाने -पीने  और अस्त्र -शस्त्रों के हमारे सैनिक कितने दिन सीमाओं की निगरानी कर पाते। इसलिए हमें कारगिल युद्ध में मारे  गए शहीदों की क़ुरबानी नहीं भूलनी चाहिए।
          जोजिला पॉइंट पर रहने की जगह नहीं है। बल्कि यहाँ गर्मी में लोग बर्फ के दर्शन करने और बर्फ के खेल खेलने  आते  है।हर तरफ बर्फ की सफेदी फैली हुई थी। हमने बारिश के बीच  सफेदी के दर्शन किये थे। इस कारण खुला आसमान नहीं था वरना इसकी चकाचौंध में आँखे खोलनी मुश्किल हो जाती।
        यहाँ पर जितने बर्फ के खेल थे  उनकी शुरू  में    जितनी कीमत बोली जाती है उससे चौथाई कीमत में तैयार हो जाते है। इसलिए भावताव करना बहुत जरूरी है। वे हम पर्यटकों को अमीर  समझने के कारण बहुत बड़ा -चढ़ा कर कीमते बोलते है। हम कितना भी मना  करे पीछा नहीं छोड़ते। सारे  खेल खेलने के लिए मजबूर कर देते है।
     जोजिला पॉइंट पर रुकने की जगह नहीं है बल्कि सब कुछ आधे अधूरे टेंट में बना हुआ होता है। शौचालय, चाय -नाश्ते के लिए स्थान सब इन खुले हुए टेंटो में होने के कारण बहुत असुविधा होती है। यहाँ रोजगार चलाने  वाले अपना समान रोज गाड़ियों में भरकर लाते और ले जाते है। कोई रात  के समय नहीं रुकता।  शाम के चार बजे तक सब खत्म जाता है।  हमने भी वापसी की यात्रा आरम्भ कर दी। 

#HAPHAZARD FORM OF CHILD MARRIAGE PART 3

              #बाल विवाह  वीभत्स रूप भाग 3 

   रूपम अब पहले से बहुत बदल गया था। उससे बचपना रूठ  गया था। वह पश्चाताप  की आग में सुलग रहा था। लेकिन उसका पश्चाताप रश्मि को जिन्दा नहीं कर सकता था । उसकी रातो की नींद उड़ चुकी थी। जागते -सोते हर समय रश्मि उसके ख्यालो में बनी रहती थी। उससे छुटकारा पाना चाहता था।
        उसके घर -वालो ने उसे जेल से बाहर तो निकलवा लिया था। उसके लिए उनकी सारी  जमा -पूंजी स्वाहा हो गयी थी। पुत्र -मोह के कारण उन्होंने बाहर निकलवाने के सारे  उपाय कर डाले  थे लेकिन उनके अंदर रूपम के प्रति मोह नहीं रहा था। उसकी भौतिक जरूरते सभी पूरी की जा रही थी लेकिन उसके मन की उथल -पुथल से सभी अनभिज्ञ थे। सब अपराध बोध के कारण चुप थे। लेकिन उनके अंदर रूपम के प्रति गुस्सा उबल रहा था। जिसके कारण कोई उसके मन के दर्द को समझ नहीं पा रहा था।
           रूपम अपने दर्द को कम करने के लिए गलत लोगो की संगत में पड़  गया। उनके कारण वह नशेड़ी हो गया। कुछ समय में उसके चेहरे की सारी रौनक खत्म हो गयी। उसका गोरा रंग मद्धिम हो गया। उसकी सारी  सुंदरता खत्म हो गई। उसे देखकर उसकी उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था।
         वह अपने बेटे अरूप को कभी पिता का प्यार नहीं दे सका। संयुक्त परिवार में जैसे बच्चे पलते है  वैसे ही वह बड़ा होने लगा।
        रूपम ने औरत  का सुख भोग लिया था। जो भले ही कम समय रहा हो लेकिन अब उसे इसकी ललक सताती थी। लेकिन उसके कारनामे के कारण उसकी शादी के बारे में परिवार का कोई सदस्य सोचना  भी नहीं चाहता था।
         कोई शादी के लिए रिश्ता आ भी नहीं रहा था। जबकि ऐसे में कई लड़के जिनकी पत्नी विधाता के  क्रोध के कारण दुनिया से चली गई थी उनकी दूसरी शादी भी हो गई थी। ऐसे में उसे रश्मि की बहुत याद आती थी।
         वह राह में जाती हुई हर लड़की को एकटक देखता रहता था। मानो आँखों ही आखो में पी  जाना चाहता हो। लेकिन इस व्यवहार के कारण उसपर लफंगा का लेबल और लगने लगा था। उसकी आदिम भूख हर समय बेचैन  किये रहती थी। गरीब  औरतो और लड़कियों को फंसाने  की कोशिश भी करता हुआ देखा गया था। लेकिन उसके जाल में कोई नहीं फंसी।
        उससे किसी को हमदर्दी नहीं रही थी। वह अंदर ही अंदर घुट रहा था। देखते ही देखते उसकी शादी को बीस साल बीत  गए। इतने समय में उसका बेटा  अरूप भी 19  साल का हो गया था। लेकिन कोई भी उसकी शादी के बारे में सोचना नहीं चाहता था। सब उसकी पढ़ाई  के बारे में सोच रहे थे। अरूप कुछ समय से गलत संगति में पड़ने लगा था। उसे किसी की सख्ती की जरूरत थी। जिसका इस घर में आभाव था।
      अरूप के प्रति सभी जिम्मेदारी समझते थे। लेकिन उसका भविष्य क्या होगा अभी कहा नहीं जा सकता।
   रूपम नशेड़ी होने के कारण दिन -दुनिया से बेखबर रहता था। उसकी दुनिया कल्पना लोक तक सीमित  थी क्योंकि यह दुनिया उसे रास नहीं आयी थी। उसका सारा सुख खो गया था। नशे के कारण उसकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता खत्म हो गई थी।
     एक दिन उसे बुखार आया। जब तक उसकी बीमारी के प्रति लोग सजग होते वह दुनिया से कूच  कर गया।       उसके बारे में सोच कर दुःख होता हे। उसकी जिंदगी के मायने क्या थे। उसके जीवित रहने का मकसद क्या था। कुछ लोग बेमकसद दुनिया में रह कर सभी के दुःख का कारण बन कर चले जाते है। उसकी बेमकसद जिंदगी का कारण बाल विवाह तो नहीं था।
     रश्मि और रूपम का बेटा  होने का अहसास अरूप को कभी नहीं हो सका। रश्मि के मृत होने के कारण और रूपम के  जीते जी लापरवाह और नशेड़ी  होने के कारण  अरूप कभी समझ ही नहीं सकेगा पिता का मतलब क्या होता है।
       बाल विवाह का इतना भयानक रूप मैने  इससे पहले कभी नहीं देखा था। अरूप को देखकर मन तड़प उठता है। बेचारे अरूप को किस गुनाह की सजा मिली थी। 

#haphazard form of child marriage part -2

                      बालविवाह का वीभत्स रूप भाग -2 

  अरूप के  रोने की आवाज से उसकी बुआ की चेतना लौटी। नमिता ने अरूप की देखभाल करनी शुरू की। इतने छोटे अरूप की जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी थी। इतने छोटे लाचार और बेबस अरूप की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा था।उसकी चीखो से बड़ा सबका गम था।  उसकी पूरी ताकत से चिल्लाने की आवाज भी कमरे के बाहर तक नहीं जा रही थी।
     घबराये हुए रूपम को रश्मि के मायके उसकी मौत  की खबर देने की जिम्मेदारी सौंपी  गई। रूपम की हिम्मत वहाँ  जाने की नहीं हो रही थी। वह उन लोगो को रश्मि की मौत की खबर देने के बाद के परिणाम की कल्पना करके सिहर उठता था। लेकिन उसकी नानुकर काम नहीं आयी। सभी को इस हालत का सामना करने से डर लग रहा था।
     रश्मि के मायके वाले दबंग लोग थे।संयुक्त परिवार में रहते हुए उनकी बेटी को मौत के घाट उतारने  वाले का वो लोग स्वागत कभी  नहीं करेंगे।ये बात सभी जानते थे।  इस समय किसी के शब्द उनके जख्मो को भर नहीं सकते थे। यदि बड़े उसके परिवार में जाते तब उन्हें जितना अपमान सहना पड़ता शायद वे लोग भी मुखर हो उठते।ऐसे समय में  बेटी की मौत किसी और की लाश  भी उठवा सकती थी। इसलिए रूपम को खबर देने की जिम्मेदारी सौंपी गयी।
          रूपम के मुँह से मौत की खबर सुनकर उसके मायके वाले स्तब्ध रह गए। अपने नवासे की पैदायश की खबर से सभी अभिभूत थे वही बेटी की मौत की खबर से सभी को धक्का लगा। होश में आते  ही सभी को बहुत तेज गुस्सा आ रहा था। उनके लिए अपने गुस्से पर नियंत्रण करना मुश्किल था। उनके गुस्से के कारण सभी ने रूपम पर अच्छी तरह अपने हाथ आजमाये। जिसके कारण उसकी हालत खस्ता हो गयी थी। यानी  अधमरा हो गया था
      अपने किये गए कृत्य के कारण वह शांत बना रहा और माफ़ी  मांगता रहा।आदमियों का भयंकर गुस्सा देखकर रोती -बिलखती औरते बाहर आयी और  उन्हें समझाने लगी- ये वक्त रश्मि की मिट्टी  समेटने का है। हमें वहाँ  चलना चाहिए।
        ऐसे माहौल में दूसरी बेटी  रमा के कारण उन्होंने अपने पर नियंत्रण रखा वर्ना रश्मि के परिवार वाले इतने दबंग थे कि  वे रूपम को भी रश्मि के पास पहुंचाने  में देर न करते।रश्मि के मायके वाले जब तक गाँव  से दिल्ली पहुंचे   पुलिस केस बन चूका था। पुरे घर में पुलिस फैली हुई थी। हर तरफ चुप्पी छाई  हुई थी।
           पोस्टमार्टम  के  बाद रश्मि के  मृत शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया। रूपम को पुलिस पकड़ कर ले गई। उस घर में हर तरफ मातम छाया हुआ था।
       सबका ध्यान रमा की खुशामद करने में लगा हुआ था। उसके बयान पर रूपम की जिंदगी की डोर बंधी हुई थी। वह रश्मि की जेठानी के अलावा सगी बहन होने के कारण अहम थी उसी के शब्दों पर रूपम के जेल की अवधी  तय होनी थी।
       रमा के लिए रूपम को माफ़ करना असम्भव प्रतीत हो रहा था।वह रूपम का मुँह भी देखना नहीं चाहती थी। ऐसे समय उसका मन बदलवाना आसान काम नहीं था। 
        ऐसे माहौल में रिश्तेदार भी ज्यादा दिन तक नहीं टिके। वे बहाना बना कर जल्दी चले गए। रमा का  घर में रुकने का मन नहीं था लेकिन परिवार के दबाब में उसे रुकना पड़ा।
          15  दिन बीतने के बाद रमा का मन स्थिर हुआ। लेकिन वह रूपम और अरूप के प्रति बेरुख रही। उसे अरूप से कोई मोह नहीं रह गया था।उसे रह -रह कर अपनी बहन की मौत का जिम्मेदार नन्हा अरूप  भी नजर आता  था। उसे बार -बार लगता यदि अरूप पैदा नहीं होता तो उसकी बहन जीवित होती।  जिसके कारण    अरूप की सारी  जिम्मेदारी उसकी बुआ  नमिता ने उठा ली थी।
          रमा को परिवार के प्रत्येक सदस्य से नफरत हो गई थी। ये नफरत उसे खुद से भी हो रही थी कि  मेरे घर में रहते हुए मेरी छोटी बहन को मार  दिया गया। उसे बचाने  के लिए मै कुछ नहीं कर सकी.
      उसने घर छोड़ने का फैसला कर लिया। लेकिन सबकी अनुनय -विनय के कारण घर नहीं छोड़ सकी। उसका पति विनोद बहुत अच्छा था। जिसमे उसे कोई कमी दिखाई नहीं देती थी। लेकिन परिवार के हर सदस्य से बात तक करने से मना कर दिया। वह किसी का मुँह भी नहीं देखना चाहती थी।
     अंतत उसने समझौता स्वरूप  घर के बीच  में दीवार खड़ी  करवा दी। अब इस परिवार में विनोद के अलावा किसी और  सदस्य से उसने सारे  सम्बन्ध तोड़ लिए। अब वह सीधी -साधी  बहू की जगह अपनी शर्तो पर घर चलाने  वाली दबंग औरत  बन गई थी।
         रूपम को जेल की चार -दीवारी से बाहर लाने   के लिए परिवार के सारे  सदस्य हर उपाय करने लगे। उनके उपाय सार्थक हुए रमा का गुस्सा कुछ शांत हुआ। लोगो की अनुनय-विनय  काम आयी रमा के बयान के आधार पर   रूपम एक साल बाद जेल से बाहर आया  .
      अरूप को  पैदा होते ही माँ - बाप के प्यार से महरूम होना पड़ा। इसमें अरूप का क्या दोष था।जिंदगी में माँ  का अहसास वह कभी महसूस नहीं कर पायेगा। हमेशा माँ का प्यार उसे दादी और बुआ से मिला। उन्होंने उसे भरसक प्यार दिया लेकिन एक खलिस जीवन में हमेशा रहेगी।
     बाकी  अगली बार ---------   
        

#HAPHAZARD FORM OF CHILD MARRIAGE

                    बालविवाह का वीभत्स रूप  


 बालविवाह के कारण कुछ लोगो की जिंदगी बुरी तरह बर्बाद हो जाती है। उसका उदाहरण मेरे पड़ोस में रहने वाले रूपम की जिंदगी है। गुस्से और नासमझी के   कारण उसने छोटी उम्र में सब कुछ खो दिया। बाकी  जीवन प्रायश्चित स्वरूप बीत  गई।
         मेरे पड़ोस में  रहने वाले विनोद के   लिए बहुत सुंदर लड़की का रिश्ता आया। जब घर  के लोग लड़की देखने गए उन्हें वह  लड़की बहुत पसंद आयी।  उन्हें छोटी बहन जो उस समय केवल 15  साल की थी।  वह भी पसंद आ गयी। उन्होंने लड़की वालो से उसका रिश्ता भी छोटे भाई रूपम के लिए मांग लिया। उस समय रूपम की उम्र मुश्किल से 18  साल की थी। उन लोगो ने रूपम से पसंद -नापसंद पूछना जरूरी नहीं समझा।
        विनोद की शादी, समय आने पर धूमधाम से हुई सारे  रीति -रिवाज पूरे  किये गए। विनोद शादी की ख़ुशी से सराबोर था। लेकिन रूपम आखिरी समय तक अपनी शादी का विरोध करता रहा। लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी। वह   गुस्से में  किसी तरह के रीति -रिवाज  करवाने के लिए तैयार नहीं हुआ। सिर्फ सारे  रस्मो -रिवाज विनोद के हुए।
        मैंने  शादी के समय रूपम की हठधर्मी देखी  थी। जिसे देखकर लग रहा था कि  शादी के समय हमारे समाज में लड़के की भी कोई नहीं सुनता।
      सगा  भाई होने के कारण रूपम शादी में शामिल हुआ।  उसका बस चलता तो बाराती बनकर भी नहीं जाता। उसका बेबस और मुरझाया चेहरा मुझे द्रवित कर रहा था। उसकी बेबसी मुझे बेचैन कर रही थी।
      अगले दिन विनोद की बहू  आयी तब मैने  देखा रूपम की बहू रश्मि   भी उसके साथ है। उसकी मुँह दिखाई करने गई तब उसकी सुंदरता देखकर अवाक् रह गई। वह बड़ी से भी ज्यादा सुंदर थी।
           दोनों बहने चार दिन ससुराल में रहकर  मायके चली गई। उन्होने  एक महीने बाद बड़ी बहन रमा  को भेज दिया छोटी बहनरश्मि  को नहीं भेजा  . उन्होंने उसका गौना  कुछ साल बाद करने के लिए कहा। रूपम के परिवार वालो ने इसका विरोध नहीं किया। क्योंकि उन दोनों की उम्र छोटी थी।
        चार दिन साथ रहने के  परिणामस्वरूप  रश्मि गर्भवती हो गई।  जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी जबकि विनोद की पत्नी रमा  के गर्भवती होने के कोई आसार  नहीं थे।
      नासमझ रूपम का सभी अनेक तरह से मजाक बनाने  लगे। उस मजाक से वह खिसियाया रहता। उसका गुस्सा सातवे आसमान में चढ़ा रहता। रश्मि शादी के बाद  केवल दो बार ससुराल आयी थी। उसके बाद बच्चे होने के समय उसका ससुराल में पदार्पण हुआ।
       नौ  महीने के बाद रश्मि ने एक सुंदर और स्वस्थ बेटे  को जन्म दिया।हर तरफ खुशियाँ  मनाई जा रही थी। जिस घर में एक साल के अंदर दोहरी ख़ुशी आ गई हो उसकी खुशियों का क्या ठिकाना।
        रूपम के दोस्त उसकी खिल्ली उड़ा  रहे थे। जिसका सामना नासमझ रूपम नहीं कर पा  रहा था। वह हर समय गुस्से में भरा रहता।उसकी झल्लाहट से सब बेपरवाह थे। 19  साल के रूपम को बेटे का जन्म कोई ख़ुशी नहीं दे रहा  था । उसकी पढ़ाई  भी पूरी नहीं हो सकी थी। उस पर रोजगार मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। अब तक घर के बड़े उसका खर्चा उठा रहे थे। उसपर रूपम का अब पूरा परिवार हो गया था। उसकी खीझ और तिलमिलाहट उसके चेहरे से साफ झलकती थी। खुशियों के माहौल में रूपम की बेबसी को समझने का किसी ने प्रयास नहीं किया।
      रूपम अपना गुस्सा किसपर निकालता। कोई उसे समझ नहीं पा रहा था।जब  रात  में  रूपम अपने कमरे में गया तब उसका रश्मि से झगड़ा हो गया। वह गुस्से में भरा हुआ था। विरोधस्वरूप कमजोर और लाचार रश्मि के शब्द उसे सहन नहीं हुए।
      रूपम को अपनी मर्दाना ताकत का अंदाजा नहीं था। उसने गुस्से में उसकी गर्दन पर अपने हाथ रख दिए उसकी गिरफ्त कब बढ़ती चली गई उसे इसका अंदाजा नहीं हुआ। कुछ ही समय में रश्मि की  निर्जीव देह उसकी बाहों  में झूल गई तब उसके होश फाख्ता हो गए। उसे रश्मि के धरती से कुच  कर जाने का कोई अंदाजा नहीं था।
        रूपम हड़बड़ाता और  घबराया हुआ  अपने कमरे से बाहर आया। उसने चिल्ला कर सबको इकट्ठा कर लिया। उसके सोचने -समझने की शक्ति खत्म हो गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था ये क्या हो गया। इसकी उसने उम्मीद नहीं की थी।
      परिवार के सभी बड़े इकट्ठे हुए ऐसे माहौल का सामना कैसे किया जाये किसी को समझ नहीं आ रहा था। रश्मि के मायके वालो को मृत्यु का समाचार देने कौन  जाये। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी।
       रश्मि की बड़ी बहन रमा  उस  के शब  के पास बैठी बिलख रही थी। जिस बहन के साथ खेल -कूद कर बड़ी हुई उसकी मौत का सदमा उसकी बर्दास्त के बाहर था।रश्मि का बेटा  भूख के मारे  चिल्ला रहा था। उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। चिल्ला -चिल्ला कर एक हफ्ते का अरूप बेदम हुआ जा रहा था।
      इसका अगला भाग जल्दी आएगा।
       


#SHRINAGAR KA SHANKRACHARAYA MANDIR

                                  श्रीनगर का  शंकराचार्य मंदिर 

     कश्मीर में अधिकतर स्थानों से  डल झील दिखाई देती है। वह बहुत बड़ी जगह में फैली हुई है। कहा जाता है -"अब  श्  ये पहले की जगह केवल एक चौथाई   रह गई है। " जब ये अब मुझे इतनी बड़ी लग रही है तब सोच कर देखो पहले  कितनी बड़ी  जगह में   होगी। . कश्मीर का जन -जीवन इससे जुड़ा हुआ है। इस समय इसके चारो तरफ आबादी है। हर समय चहल -पहल दिखाई देती है। झील के चारो तरफ अनेक होटल है। जिनकी खिड़कियों से आप हर समय इसका नजारा देख सकते है।
       अधिकतर पहाड़ी इलाको में मुख्य घूमने की जगह माल  रोड होते है। यहाँ  का माल  रोड आप डल  लेक के चारो तरफ बनीं  हुई सड़क को कह सकते है। यहाँ  पर शाम के समय रौनक  देखने लायक होती है। इसी रोड पर सेन्टॉर  होटल बना हुआ है। जिसमे प्रधान -मंत्री  जैसे बड़े लोग आकर रुकते है। इस रोड के चारो तरफ का   दृश्य  बहुत लुभावना है। लेकिन सुरक्षित स्थान होने के कारण इसकी सुरक्षा के विशेष प्रबंध किये जाते है।
       हमारे  सामने प्रधान -मंत्री के आने के कार्यक्रम के कारण दो दिन ये सड़क आम  जनता के लिए बंद कर दी गयी थी जिसका खामियाजा हमे उठाना पड़ा। उस समय हमे बहुत गुस्सा आया  था। वहाँ  के लोगो ने बताया -यदि मोदी जी की जगह कोई और प्रधानमंत्री होता था तब इतनी अधिक सुरक्षा का प्रबंध नहीं किया जाता था। यहाँ के लोग मोदी जी को पसंद नहीं करते इसलिए इतनी अधिक सुरक्षा का इंतजाम करना पड  रहा  है।
         उस दिन शाम के समय हमने शंकराचार्य मंदिर देखा। शंकराचार्य मंदिर के रास्ते  में कई स्थानों पर विशेष रूप से सुरक्षा के इंतजाम किये गए थे। उसे देखकर लग रहा था। हमारे मंदिर कितने असुरक्षित हो गए है। जबकि दरगाह वगैरह में किसी विशेष प्रकार की सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे। जहाँ  हमारी गाड़ी ने हमें छोड़ा। वहाँ  से ढाई सौ  सीढिया  ऊपर चढ़नी थी उसके बाद हमे शिवलिंग के दर्शन होने थे। हर जगह जाने के लिए हम जैसे लोगो को गाड़ियां  मिल जाती है इसलिए इतनी अधिक सीढिया  देख कर हिम्मत पस्त  होने लगी कोई और चारा न होने के कारण सारी  हिम्मत इकठ्ठी करके ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया। लेकिन शरीर साथ नहीं दे पा  रहा था इस कारण दस सीढ़ियों के बाद रुक कर कुछ देर आराम करना पड  रहा था।
        अंतत हम मंदिर तक पहुँच  गए। वहाँ  से श्रीनगर का भव्य नजारा देखकर हम अपनी थकान  भूल गए। श्रीनगर पूरा हमे दिखाई दे रहा था। डल झील जो हमे सड़क के किनारे से बहुत विशाल दिखाई दे रही थी। वह ऊपर से सही रूप में दिख रही थी।
       शंकराचार्य मंदिर की बनावट देखकर लगता है  प्राचीन समय के लोग कितने जुझारू होते थे। जिन ऊंचाइयों तक  हम बिना समान लिए चढ़ नहीं पाते।  उन्होंने प्राचीन समय में बिना किसी सुविधा के अपनी शारीरिक क्षमता के आधार पर इतना विशाल निर्माण कर दिया। जब शुरू में हमारे सलाहकार ने इस मंदिर की चर्चा की थी तब मैने उन्हें मना  कर दिया था। इतनी ऊंचाई के कारण हिम्मत जुटानी बहुत मुश्किल थी। लेकिन इतने अधिक परिश्रम का फल हमे मीठा मिला।  
      हम दूर से परेशानियाँ  देखकर डर  जाते है। लेकिन मंजिल पर पहुँचने  का सुखद अहसास   आत्मविभोर कर देता है

#panoramic edges of the lake kancheria and sabarmati river

      काँकरिया  झील और साबरमती  का मनोरम किनारा 




   अहमदाबाद में बहुत ज्यादा गर्मी का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में लोग ठंडी जगह पर समय  बि- ताना  पसंद करते है। मोदी जी के समय में अहमदाबाद में दो स्त्थान बहुत ज्यादा अच्छे बनाये गए है।
       उसमे एक साबरमती रिवर फ्रंट जिसकी देश विदेश में धूम है।  किसी नदी के किनारे इस तरह का पिकनिक स्पॉट इससे पहले कभी नहीं देखा था। यह पहला नदी का किनारा है जिसके दोनों तरफ सीमेंटेड पक्का किनारा है। कई सारी  बैठने की व्यवस्था की गई है। पेड़ -भी लगाए गए है। जिसकी छाया और ताजी  हवा सकून  देती है.
       दूसरा कांकरिया झील। इन्हे  पिकनिक स्पॉट के तौर  पर विकसित किया गया है।
        कांकरिया नाम सुनकर मेरा वहाँ  जाने का मन नहीं था। क्योंकि इसका मतलब मेरी समझ से बाहर था। फिर भी बेमन से यहाँ  गयी। अंदर जाने के लिए छह रूपये की टिकट लगती है। अंदर जाते ही मेरी आंखे खुली रह गयी। यहाँ  पर मन को लुभाने वाले सारे  तरीके  इस्तेमाल किये गए थे। बच्चो से लेकर बड़ो को अच्छे लगने वाले सारे  झूले लगे हुए थे।
        यहाँ टॉय  ट्रेन के द्वारा पूरी झील  को हर तरफ से देखा जा सकता है मुझे बहुत दुःख था क्योंकि  मै  अपने पैरो  से पूरी झील के चककर  नहीं लगा सकी  क्योंकि यह झील बहुत बड़ी जगह मै  फैली है।  मुझे लग रहा था इस ट्रेन में बच्चे बैठते है  .लेकिन मेने बड़ो को भी इसमें बैठे देखा था। यदि आपको वहाँ जाने का मौका मिले तब इस ट्रेन में सफर जरूर करना। इसे तभी हर कोने से देख सकोगे।
          हरियाली और झील की ठंडी हवा  हमे वहाँ बैठे रहने के लिए मजबूर कर रही थी। पेड़ो की छाव के नीचे  बेंचे बनाई गई है। जिसके कारण भरी दोपहरी में भी बैठा जा सकता है।  अनेको स्थानों पर बैठने का इंतजाम किया गया है। बेंचेस या घास जहाँ  मन चाहे बैठा जा सकता है।
           कांकरिया झील के चारो तरफ खाने -पीने  के सामान की बहुतायत है। पूरे भारत का सामान यहाँ उपलब्ध है। यहाँ की लोकल चीजों जैसे  आइसक्रीम का स्वाद भी बहुत अच्छा है। कांकरिया झील में वोटिंग भी की जाती है।   रात  के समय रौशनी की विशेष व्यवस्था की जाती है।
       मैने पहली बार मुस्लिम समुदाय के लोगो को पिकनिक मानते हुए शाम के समय इतनी अधिक संख्या में इससे पहले कही  नहीं देखा था।
 यहाँ के मुस्लिम लोग पिछड़े हुए कम लग रहे थे वरना  जब शाम के समय खाना बनाने का समय होता है  मुस्लिम औरते  पिकनिक स्पॉट पर बच्चो के साथ घूमती हुई कभी किसी अन्य शहर में दिखाई नहीं दी। मुझे हमेशा लगता था। मुस्लिम समुदाय के लोग औरतो  को केवल घर की जिम्मेदारी तक सीमित  रखते है। उन्हें मौज -मस्ती भरा  जीवन जीने का अधिकार नहीं होता।
       मेने केवल गुजरात में बहुत सारी जगहों पर सफेद दागो  वाले लोगो को पिकनिक स्पॉट पर घूमते देखा। जबकि दिल्ली जैसी जगहों पर इस तरह के बहुत कम  लोग दिखाई देते है। उनका आत्मविश्वास देखने लायक था।
      कांकरिया झील के एक द्वार से चिड़ियाघर में भी प्रवेश किया जा सकता है। यहाँ जाने के चार द्वार है। आप अपनी  इच्छा मुताबिक किसी भी जगह से अंदर जा सकते है। हर स्थान पर आपको अपनी इच्छानुसार सारी  सुविधाएं मिल जाएँगी।
       कांकरिया झील का नाम इस जगह पर बहुतायत से पाए जाने वाले कंकर के कारण पड़ा था। अब आपको कांकरिया नाम सुनकर हताशा नहीं होगी जैसी मुझे हुई थी इसलिए आप इस जगह के लिए कई सारे  घंटे बचा कर रखना।  आपको यहाँ  आने के बाद घर जाने की जल्दी नहीं होगी। यहाँ  पर कम बजट के लोग भी  ख़ुशी हासिल कर सकते है।


#BROKEN LIMITATIONS OF RELATIONSHIPS

                       रिश्तो का खून 

 जिंदगी हर पल एक नये रूप में हमारे सामने आती  है। जिसके बारे में  हर पल सोचते रह जाते है  . क्या  यह सच है।  बहुत दिन तक इस वाकये ने दिल को दहला दिया। मन इसकी सच्चाई पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं था।
       एक दिन छठी  कक्षा की लड़की जो बहुत चुप और डरी  सहमी रहती थी। कभी -कभी  गुस्से में बहुत कुछ अनर्गल बोल जाती थी। उसकी कक्षा की लड़कियाँ उसकी शिकायत करती थी। वो छोटी लड़कियाँ उसके शब्दों का सही मतलब नहीं लगा पाती थी। उनके लिए उसका व्यवहार अजूबा था।
      एक दिन मेरे सामने उसकी शिकायत लेकर कुछ लड़किया  आयी। उनका गुस्से का कारण  समझ नहीं आ रहा था।  वे मुझे सही तरह से समझा नहीं पा रही थी। मेने उनसे बहस करने के स्थान पर उस लड़की मानसी को अपने पास बुलाया।
      उसने मुझे कुछ बताने की कोशिश की लेकिन उसके कहने के तरीके और हाव -भाव के कारण मेरे दिमाग ने मुझे जागरूक कर दिया। ये लड़की जो बोल रही है उसे इसका मतलब समझ में आता भी है या नहीं। सारांश में उसके कहने का मतलब था कि - उसके साथ उसका सगा  बड़ा भाई  रोज शारीरिक सम्बन्ध बनाता  है। इस कारण वह पूरी रात  सो नहीं पाती। यदि वह नहीं कहती है  तो उसे बहुत पीटता  है।
       पहले तो इस बात पर मेरा मन यकीन करने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। उससे मेने बहुत सारे प्रश्न घुमाफिरा के पूछे जिससे उसके शब्दों की सच्चाई पता चल सके।
      उसने कहा -मेरे पूरे  शरीर में दर्द रहता है। जिस तरह से उसने बयान किया तब हमे यकीं आया ये लड़की इस तरह के सम्बन्धो के बारे में सही तरह से जानती है। इसके बारे में जान कर मै  हक्की -बक्की रह गई।
      हमने उससे कहा- तुम इस बारे में अपनी माँ को बताओ।
     तब उसने कहा -मैने  माँ को बताया था लेकिन माँ दूसरे कमरे में छोटे भाई के साथ सोती रहती है। उसने कुछ नहीं किया बल्कि मुझे ही डांटती रहती है।अनेक बार मारा भी है। साथ में कहती है किसी और को कुछ नहीं बताना।
     उसके ये शब्द सुनकर मुझे बहुत हैरानी हुई। कि  उसकी माँ सौतेली  है क्या । लेकिन उसके अनुसार उसके पिताजी उनके साथ नहीं रहते है। माँ ने उनका पालन -पोषण किया है।
     उसके अनुसार दिन में माँ नौकरी करने जाती है। वह घर के काम करने में माँ की मदद करती है। रात  में माँ थक के सो जाती है। तब सारी  रात  उसका भाई उसे सोने नहीं देता।

  •       मुझे लगता है उसका भाई बहुत बिगड़ा हुआ है  जिसके कारण उसपर माँ का बस नहीं चलता। 
  •  साथ ही माँ   भाई की  कमाई का लालच भी चुप रहने के लिए मजबूर कर रहा था।
  •  समाज के सामने अपने परिवार को रुसवाई से बचाने के लिए माँ ने चुप्पी लगा ली है। 
  • माँ का गुस्सा और हताशा अनेक रूपों में मानसी पर निकल रहा है। 


     मुझे समझ नहीं आ रहा था ऐसे में मै  क्या करूँ। मैने  उससे कहा -अपनी पड़ोसन को इस बारे में अवगत कराओ। तब उसका जबाब सुनकर मै  और भी हैरान हो गई। उसने कहा -मेने पड़ोसन को बताया था लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया।
     मुझे लगता है  उन्हें भी उसकी सच्चाई पर यकीं नहीं आया होगा क्योंकि लड़की की उम्र काफी कम थी।
      माँ ने पड़ोसन के कहने पर उसे ही फटकार लगा दी होगी जिसके कारण उसने चुप्पी लगा ली होगी 
       वो लड़की काफी छोटी थी लेकिन उसे इस बात का अहसास था। उसके साथ गलत हो रहा है। वह एक तरह से सबसे फरियाद कर रही थी जो हो रहा है उसे रुकवाओ। लेकिन इतनी छोटी लड़की सच बोल रही है इसपर यकीन करना सभी के लिए मुश्किल हो रहा था
        
      तब मैंने  उस लड़की को ऊपर से नीचे  तक ढंग से देखा तब उसमे यौवन के उभार  नहीं दिखाई दिए। उस लड़की पर माँस  नाम की चीज नहीं थी वह केवल हड्डियों का ढांचा थी। शक्ल भी सुंदर नहीं थी। मासूमियत की झलक भी दिखाई नहीं दे रही थी। रंग भी दबा हुआ था.  किस  कारण उसका ऐसा हश्र हो रहा है समझना मुश्किल था  । उसके शरीर पर सलवार -सूट  था। जिसके कारण हम नहीं कह सकते ये लड़की अंग प्रदर्शन कर रही  है। वरना दस साल की लड़कियाँ  फ्राक या स्कर्ट में आती  है।
        सारी बाते  स्पष्ट होने के बाद मैंने  अपने साथियो से सलाह की तब सबने कहा- ये बात बहुत बड़ा रूप ले चुकी है। हमारे सुलझाने से नहीं सुलझेगी। हमें पुलिस को सूचित करना चाहिए।
     पुलिस ने आकर उससे बाते की जिनका निचोड़ यही निकला इसके साथ परिवार वाले ही नाइंसाफी कर रहे है। इसे उस माहौल से निकाला  जाये।
       पुलिस वालो के बीच में आने के कारण  परिवार वालो   ने कोई विरोध नहीं किया। उसे नारी निकेतन भेज दिया गया। जहाँ  उसके रहने -खाने और पढ़ने  लिखने की उचित व्यवस्था हो गई।
       लगभग तीन महीने के बाद मानसी को देखने का मौका मिला। उसे देखकर हैरानी हुई। उसे वहाँ अच्छा खाना मिल रहा था जिसके कारण उसके शरीर पर माँसलता दिखाई देने लगी थी।वहाँ  पढ़ने  की सहूलियत के साथ  उसको आराम दायक जिंदगी मिल रही थी जिसके कारण चेहरे की मलिनता खत्म हो कर  रौनक  आ गई थी।उसके अंदर गलत होने का अहसास खत्म हो गया था जिसके कारण उसके अंदर का आक्रोश और बेबसी  भी दिखाई नहीं दे रही थी।
       लोग कहते है  घर स्वर्ग के सामान होता है  .बाहर की दुनियाँ  नर्क जैसी है जहाँ  हर तरफ लूटने -खसोटने वाले घूम रहे  है। आप ही बताओ मानसी का स्वर्ग कहाँ  था। जिस परिवार में उसे सुरक्षा का माहौल मिलना चाहिए था। वहाँ  सबसे ज्यादा असुरक्षा का माहौल मिला। सरकार  के अनुसार लड़कियों के साथ 90 % गलत घटनाये परिवार में होती है केवल 5 % बाहर के लोग करते है। उन ५% के कारण हर तरफ शोर मचता है। लेकिन 90 % घटनाये कब समाज के सामने आएंगी। जिसका दंश लड़कियाँ  झेल रही है।
         


#confluence of antiquity and modernity gujrat kirti temple

     प्राचीनता और आधुनिकता का संगम कीर्ति मंदिर 



  गुजरात में घूमते हुए हमे बहुत कम आबादी मिली अधिकतर खुली जगह दिखाई दे रही थी। सोचकर हैरानी हो रही थी कि  गुजरात भारत का ही हिस्सा है या हम किसी अन्य देश में घूम रहे है।  मोदी जी के साढ़े  6  करोड़ देश वासियो का आह्वान सोचने पर मजबूर कर रहा था यहाँ इतनी कम आबादी क्यों है। हम घनी आबादी में रहने वाले लोगो के लिए इतनी चौड़ी  और खुली जन विहिन  सड़को पर चलना अचंभा  सा लगता है।
       हमने इससे पहले उत्तर  प्रदेश जैसे इलाको में सफर किया है जहाँ  की आबादी लगभग बाइस करोड़ है। आपको मेरे विचारो का कारण समझ आ गया होगा।
         द्वारका से हम पोरबंदर गाँधी जी की  जन्मस्थली देखने के लिए रवाना हुए। हर तरफ पवनचक्की से बिजली बनाई जाती दिखाई दे रही थी। उनके बड़े पंखे और आकार मन को बेचैन  कर रहा था। यहाँ बहती हवा का सदुपयोग हो रहा था। उन्हें पास से देखने की लालसा ने मुझे उनके पास जाने पर मजबूर कर  दिया।
        वह केवल खड़ा हुआ ढांचा न होकर हमे  बहुत कुछ  बता रहा था। उसके सामने मानव बेहद अदना लग रहा था। उसमे ऊपर तक जाने के लिए सीढिया  बनी  हुई थी। जिनपर जिगरे वाले लोग ही चढ़ सकते थे। उसके नीचे  बहुत बड़ा द्वार बना हुआ था। मेरा कहने का मतलब वह  जो हमे दूर से दिखाई देता है केवल उतना नहीं बल्कि विराट मेकेनिज्म था।
        हमे पोरबंदर में गाँधी जन्मस्थली पहुंचने पर  भीड़भरा  इलाका दिखाई दिया। क्योंकि वह गाँधी जी के जन्म से पहले बसा हुआ था। जिसके कारण वहाँ  की आबादी  अधिक थी। वह भारत के अन्य शहरो के सामान ही था। वह इलाका रिहायश कम और बाजार ज्यादा दिखाई दे रहा था।
       गाँधी जी की जन्मस्थली को कीर्ति मंदिर नाम से पहचाना जाता है। उसका नामकरण उचित जान पड़ा क्योंकि भारत की कीर्ति उनके द्वारा ही दूर तक फैली थी। उस स्थान को काफी बदल दिया गया  है। बाहरी  रूप में यह बहुत सूंदर और आधुनिक बना दिया गया है। लेकिन अंदर से उसके प्राचीन रूप में परिवर्तन करने की कोशिश नहीं की गई है।
        उसे देखकर पुराने घरो की वास्तुकला का आभास होता है। उस जमाने में लकड़ी की सीढिया और छत  होती थी। सीढ़ियों पर रेलिंग काफी नीची थी जिसके कारण पकड़ने के लिए रस्सी भी बंधी हुई थी। उस जमाने के अमीर लोगो के घर देख कर अद्भुत अहसास हो रहा था.
       गाँधी जी के उद्गार  वहाँ  अनेक जगहों पर लिखे  दिखाई देते है। उनकी जन्म से लेकर मृत्यु तक के सामान  संग्रहालय में रखे हुए है। उनकी फोटो तो बहुत समय से देख रहे है  इसलिए उनको देखने में उतना मजा नहीं आया जितना उनके  प्रयोग किये गए सामान को देख कर आया उनका प्राचीन रूप मन को मोह रहा था।
      साबरमती आश्रम में भी गाँधी जी से संबंधित चीजों को देखना बहुत अच्छा लग रहा था। वहाँ का खुला माहौल ,साबरमती का किनारा  देखकर अद्भुत अहसास हुआ । गाँधी जी के आश्रम में बिना पंखे के भी ठंडक का अहसास हो रहा था। उसके प्राचीन रूप को यथासंभव बदलने से बचने का प्रयास किया गया  है। सिर्फ उतना परिवर्तन किया गया है जिससे इसके मूल रूप को ठेस नहीं पहुंचे। 
     भारत में केवल साबरमती नदी ऐसी नदी है जिसके साफ करने के प्रयास सार्थक हुए है। इसको पिकनिक स्थल के रूप में विकसित किया गया है। यहाँ पर फरबरी के महीने में 40  डिग्री का तापमान था जिसके कारण नदी का किनारा खुशनुमा अहसास दिला रहा था
  गुजरात के लोग काफी परिस्कृत रूचि के लगे उनके अंदर सद्भावना दिखाई दी।


      

#krishan"s hustle place ,bhalaka tirth

     










          कृष्ण की अवसान स्थली   भालका तीर्थ 




सोमनाथ में भालका तीर्थ है। इस नाम से आपको इसके महत्व का पता नहीं चला होगा। ये तीर्थ वह  है जहाँ कृष्ण को तीर लगा था जिसके कारण उनकी मृत्यु हुई थी इसका नाम भालका इसलिए पड़ा क्योकि यहाँ तीर को भाल भी कहा जाता है। भालका तीर्थ कृष्ण के समय में जंगल था लेकिन अब यहाँ आबादी  हे। इसे मंदिर के रूप में जाना जाता है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार हो रहा है। इसमें आज भी उस पेड़ का तना मौजूद है जिसके नीचे कृष्ण  के पैर में  तीर लगा था।
      जरा नामक व्याध को इसका  अहसास भी नहीं होगा उसके इस अपराध के कारण युगांधर के अंत का कारण बना है। जिसने अपने युग के अंधकार को मिटाने के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया  था।
        कृष्ण का अवसान मन में   दुःख भर देता है। एक युगपुरुष जिसने समय से लड़ कर जीवन के मायने बदल दिए एक दिन वही  अपने कुल के नाश का कारण बना। लोगो के लिए बचपन और जवानी में समय को बदलने  की क्षमता होती है। लेकिन वही  इंसान बुढ़ापे में कितना लाचार हो जाता है। इस बात का यहाँ  आकर अहसास होता है।
        ये मंदिर गुजरात के अन्य मंदिरो की अपेक्षा सुंदर था। इसमें उस दिन कथा सुनने के लिए बहुत सारे लोग आये हुए थे। लोगो के मन में कृष्ण आज भी विद्यमान है। उनके असाधारण कामो के कारण हम उनके पराभव को भूल कर उनके अच्छे कामो को ही स्मरण करते है।
    कृष्ण हमे येन -केन प्रकरेण जीतने की प्रेरणा देते है। गुजरात के रोम -रोम में कृष्ण बसे हुए है।
   
 ,जिस तरह से बिहार के गया में पिंड दान किया जाता है वैसे ही सोमनाथ में गोमती घाट पिंड दान के लिए प्रसिद्ध है। इस स्थान पर कपिला,हिरण्या  और सरस्वती नदी आकर मिलती है। इस घाट की सफाई और सुंदरता मन को मोह लेती है
      इस घाट के बाहर पक्षियों को खिलाने  का समान मिलता है। इस साफ -सुथरे और शांत माहौल में इतने सारे पक्षियो को कतारों  में बैठे देखना अलग अनुभूति का सृजन करता है। छोटे बच्चे इन पक्षियों के बीच  में आकर हुड़दंग मचा रहे थे।  इन पक्षियों के अंदर इंसानो के प्रति डर  नहीं था। हमारे चारो तरफ पक्षी ही पक्षी और शांत माहौल ें सात्विक भाव पैदा कर रहा था।
       यदि आपको इस जगह जाने का मौका मिले तो अवश्य इसका लाभ उठाये। 

#BETWEEN THE ANIMALS IN THE FOREST OF GIR

             गिर  के जंगलो में जानवरो के बीच 

           
   

    गुजरात जाकर उस  की शान बब्बर शेर को न देखो ऐसा कैसे  हो सकता। सोमनाथ से दो घंटे की दूरी  पर गिर के जंगल शुरू हो जाते है। सोमनाथ  केवल एक दिन में पूरा नगर  देखा जा सकता है। जब हमने  पूरा दिन शेष बचा पाया तब हम गिर के जंगलो में शेर की तलाश में निकल पड़े।
         हमें होटल वालो ने आने और जाने के लिए टेक्सी  मुहैया करा दी। टैक्सी में गुजरात की सड़के देखते -देखते मुझे कब  नींद आ गई पता नहीं चला ।गुजरात में फरवरी के महीने में पारा ४०  डिग्री को छू रहा था। इस कारण  गिर के जंगलो में पहुँचकर  ही मेरी आंख खुली। दोपहर में  कुछ समय के लिए गिर में पर्यटकों के आने पर विराम    है। सुबह और  दोपहर तीन बजे के आस -पास पर्यटकों को  जंगल में प्रवेश दिया जाता है। छुट्टी के दिन वहाँ बहुत सारे  लोग आये  हुए थे। उन्हें देखकर लगता था लोगो के लिए गर्मी और त्यौहार कोई मायने नहीं रखता बल्कि हर स्थिति में लोग मंगल मनाने  में लगे रहते है।
           जंगल में जहॉ हम पहुँचे वहाँ हरा -भरा जंगल था। उस जगह की विशेष देखभाल की जाती है। वहाँ जाकर पता चला। जंगल घूमने  के लिए  टैक्सी और बस से सफर किया जा सकता है। लेकिन टैक्सी की बुकिंग दो  महीने पहले करनी पड़ती है। हम टैक्सी से सफर नहीं कर सकते। पहले तो हमे बहुत दुःख हुआ लेकिन जब पता चला  बस के द्वारा हम जंगल की सैर  कर सकते है। हमारी जान में जान आयी।
      हमारे पहुंचने के कुछ समय बाद ही टिकट खिड़की खुल गई और हमे टिकट मिल गई। उस  टिकट की कीमत  केवल   150  रूपये थी जो हमारे बजट में आती थी। टिकट के मिलते ही घोषणा सुनाई दी कि  इस बस  के यात्री बैठ  जाये वरना उन्हें दूसरी बस में जाने का मौका नहीं दिया जायेगा। सब कुछ कम्प्यूटराइज्ड था। हम शीघ्रता से बस में बैठ गए।
     मन में जिज्ञासा और घबराहट दोनों का मिलाजुला मिश्रण था। मैने इससे पहले बहुत सारी फिल्मे देखी थी जिसमे जंगली जानवर आक्रमण करके लोगो को मौत के घाट उतार देते थे। मन में डर समाया हुआ था। हमे
मिनी बस में सफर करने के लिए कहा  गया।
         वह  बस साधारण थी उसकी खिड़कियाँ भी आम बसों के  समान खुली हुई थी।  मुख्य जंगल सूखा हुआ था वहाँ हरियाली नहीं थी लेकिन उन सूखे हुए जंगल में जानवर आराम फरमा रहे थे। हमें जंगल घूमते हुए गुड़खर ,नीलगाय ,हिरण,सियार आदि  अनेक जानवर दिखाई दिए। वे छाया की  तलाश में घूम रहे थे।
       हम जैसे यात्री जंगल में जानवरो को तलाश नहीं कर पाते। हमारा ड्राइवर जानवरो को देखकर गाड़ी रोक देता जिससे हमें जानवर होने का अहसास हो जाता। सभी यात्री जानवर की तलाश करने लगते। जैसे जानवर फिल्मो या चित्रों में दिखाई देते है। जंगल में जानवर इतने रंगबिरंगे और साफ -सुथरे नहीं होते बल्कि वे जंगल के रंग में ही मिल जाते है। जानकार लोग ही उन्हें सही ढंग से ढूंढ पाते  है।
      जानवरो के लिए बसे और इंसान देखना आम लग रहा था। उनमे बसों को देखकर किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं थी.
        बब्बरशेर  के बिलकुल पास ले जाकर ड्राइवर ने बस  रोक दी। उसने इस समय केवल शोर मचाने से मना किया। क्योंकि शेर को इतने पास देखकर सभी रोमांचित हो उठे थे। यदि वह हमें पहले से चेतावनी नहीं देता तो सभी एक दम जोश में भर कर उनके आराम में खलल डाल  देते।
        मेने इतने पास से शेर को देखने के बारे में सोचा नहीं था। एक पेड़ की छाया में दो शेर आराम फरमा रहे थे। मेने इससे पहले सुना था एक जंगल में दो शेर नहीं रह सकते लेकिन पहली बार एक साथ एक पेड़ की छाया तले दो शेरो को देखकर दंग  रह गई।
         उनके अयाल  भूरे और काले  रंग के थे। उन्हें देखकर समझ नहीं आ रहा था ये बूढ़े  है  या जवान। उनके बाल देखकर लग रहा था मानो  प्रौढ़ावस्था को पहुंचे हुए खिचड़ी बालो वाले शेर है उनके अंदर सारा जोश खत्म हो चूका है।  उनके साथ कोई शेरनी नहीं थी। वे केवल दो शेर थे।
      एक अलग स्थान पर आराम -फरमाती शेरनी दिखाई दी। उसके साथ कोई झुण्ड यानि बच्चे या अन्य शेरनियाँ नहीं थी।
       एक बहुत बड़ी चारदीवारी के बीच  में चीता  दिखाई दिया। इसे देखकर हमें और ज्यादा हैरानी हुई। क्योंकि शेर खुले में थे जबकि चीते को चारदीवारी के बीच  रखा गया था। चीता  एकाकी प्राणी है  वह  परिवार के साथ था  जबकि झुण्ड में रहने वाले प्राणियों को अकेले -अकेले देखा। जिंदगी के अजूबे बाहर निकल कर दिखाई देते है।
       इन  सब में डूबे  हुए हमें पता ही नहीं चला कैसे समय पूरा हो गया। इन दृश्यों को देखने से अभी मन नहीं भरा था। यहाँ आने का समय निश्चित है आप अधिक समय तक यहाँ नहीं ठहर सकते क्योंकि जंगल में रात  के समय अँधेरा हो जाता है। रौशनी का प्रबंध जानवरो के कारण नहीं किया गया है बल्कि जंगल में अँधेरा रहता है इसलिए प्राकृतिक रौशनी में जंगल की सैर  करवाई जाती है।
       जंगल से बाहर आने के रास्ते  में भी रौशनी का प्रबंध नहीं किया गया है। इसलिए जल्दी निकल कर यहां सैर  करना उचित रहेगा आपके रास्ते में किसी तरह की परेशानी नहीं आएगी। क्योंकि मुख्य सड़क तक आने के लिए कमसकम आपको आधे घंटे का सफर जंगली रास्ते से तय करना पड़ेगा।
       इतनी अधिक गर्मी में घूमते हुए हमें गर्मी का अहसास नहीं हुआ। लेकिन बस से   उतरते ही सभी लोग आइसक्रीम की दुकान पर जा खड़े हुए।
       गुजरात की सड़के बहुत छोड़ी और साफ -सुथरी है। उनपर सफर करना आराम -दायक होता है। 

#HOLI IMPORTANCE IN KRISHNA"S CITY OF DWARKA

       कृष्ण की नगरी द्वारका में होली महोत्स्व      




  अहमदाबाद से द्वारका लगभग बस से 12  घंटे का सफर है। रात के समय सफर में बहुत ठण्ड का अहसास होता है। जब बस से सफर कर रही थी तो सोते समय ठण्ड के कारण कपकपी बंध  रही थी क्योंकि हम सफर में कोई गर्म कप.ड़ा लेकर नहीं गए थे।   जब द्वारका पहुंचे तब दोपहर के समय इतनी ज्यादा गर्मी लग रही थी कि हम सोच रहे थे  धूप में खड़े होकर क्यों इंतजार कर रहे है।
         हमने उसी दिन दोपहर में घूमने के लिए गाड़ी बुक करवा रखी थी। जिसके कारण हमने तैयार होकर सबसे पहले द्वादस ज्योतिर्लिंग नागेश्वर के दर्शन करने निकल पड़े। वह  बहुत अच्छी जगह था। इसकी मान्यता बहुत है। इसमें पूरे  दिन दर्शन किये जा सकते है। ज्यादा भीड़ भी नहीं थी।
       यहाँ के प्रसाद बेचने वाले प्रसाद बेचते वक्त पोस्टर लगा के रखते है" भगवान के चरणों में चढ़ा हुआ प्रसाद है।" मेने पहले जहाँ  से प्रसाद लिया तब  इस तरफ  ध्यान नहीं गया। बाद में अन्य दुकान पर इस वाक्य को पड़ा तो विशेष रूप से दोबारा प्रसाद ले लिया। बाद में ध्यान से देखने पर अहसास हुआ हर दुकान दार  ने ऐसे पोस्टर लगाए हुए है।
             गुजरात में दिल्ली की तरह सड़को पर ट्रैफिक जाम  की समस्या बहुत कम होती है। यहाँ  पर ट्रेफिक सिग्नल के  स्थान पर  गोल चककर  बने होते है  वहाँ  के लोगो को उसकी आदत होती है। मजेदार बात तो वहाँ  लगी जब मेने सिग्नल पर लोगो को लाइट के हिसाब से गाड़ी चलाते  हुए नहीं देखा जबकि सिग्नल के पास ही ट्रेफिक पुलिस खड़ी  हुई थी। हमारे चालक  ने जब कहा -यहाँ जाम  ज्यादा देर के लिए नहीं लगता इसलिए किसी को ज्यादा बुरा नहीं लगता सब अपनी बारी का इंतजार सब्र से करते रहते है।
     गोपी तालाब और रुक्मणि मंदिर प्रसिद्ध स्थान है। इन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है। गुजरात हिन्दुओं का तीर्थ स्थान होने के बाबजूद मंदिर का निर्माण कार्य उत्कृष्ठ  किस्म का नहीं है। बल्कि लगता है इनका उद्धार किया जाना चाहिए। यहाँ पर आधे- अधूरे का अहसास होता है।
       भेंट द्वारका समुद्र के बीच बना हुआ है। हमें भरी दोपहर में वहाँ  जाने का मौका मिला। हमारे गाइड ने चार बजे मंदिर के खुलने के बारे में बताया। हम लगभग तीन बजे पहुंच गए थे।भेंट द्वारका तक पहुंचने के लिए नाव से जाना पड़ता है। ये नावे ऊपर से खुली होती है जिसके कारण धूप असहनीय हो रही थी। लेकिन इस नाव के चलने पर हमारे चारो तरफ पक्षी खाने के लालच में उड़ने लगे मैने इससे पहले इतनी अधिक संख्या में निडर पक्षी इतने करीब से नहीं देखे थे। पक्षी खाने के समान को हवा में ही लपक लेते थे। उनका कार्यकलाप मन को मोह रहा था।   हम चार बजे के हिसाब से लाइन में लग गए। लाइन में खड़े होने पर पता चला वह मंदिर पांच बजे खुलता है। लगभग डेढ़ घंटे धक्का -मुक्की सहते हुए हमने इंतजार किया। हम होली पर द्वारका पहुंचने के कारण हर जगह भीड़ का सामना कर रहे थे क्योंकि कृष्ण की नगरी होने के कारण सारी द्वारका कृष्ण मय  हो रही थी।
      मुझे सुनकर बहुत हैरानी हुई जब लोगो ने बताया यहाँ के लोग लगभग 20 दिनों से पैदल द्वारका पहुंचने के लिए पुरे परिवार सहित निकले है। हमने रास्ते में बहुत सारी जगह सोने के लिए  रैन बसेरे देखे थे।ये लोग बहुत गरीब थे जिनके लिए खाने और सोने का इंतजाम भी सरकार या दूसरी संस्थाए करती है
        हमारा होटल ठीक उस जगह था जहाँ  मुख्य द्वारका मंदिर  है। उसी जगह मेला लगता था। मेला सुबह से रात  तक लगा रहता था। जब हम सुबह सोकर उठे तब भी लोग झुण्ड बना कर मेले का आनंद ले रहे थे। जब सोने गए तब भी मेले में उतनी ही चहल -पहल थी।

          आपने कभी कृष्ण लीला रात  भर  नहीं देखी  होगी लेकिन मेने लोगो को खुले में बिना किसी सहूलियत के श्रद्धा भाव से  रास लीला का आनंद लेते देखा। मै  उनका भक्तिभाव देख कर विभोर   हो गयी।
      होली वाले दिन लोगो का उत्साह संभाले नहीं सम्भल रहा था। द्वारकाधीश मंदिर में प्रत्येक दर्शनार्थी को कान्हा से होली खेलने के लिए गुलाल दिया गया था लेकिन कान्हा हमसे होली खेलने कैसे आते  हमने आपस में होली का मजा लिया लेकिन मंदिर में होली खेलते हुए हमें ऐसा अहसास हो रहा था कान्हा हमारे बीच  में है।
      द्वारका में होली का मजा दुगना हो गया था।

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...