जुझारूपन से किस्मत को मात
जिंदगी के खेल निराले होते है। ऐसी ही एक दास्ताँ मेरे सामने आयी । एक दिन मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई। वह 1984 के दंगो में अपने माता -पिता को खो चुकी थी।उस समय उसकी उम्र केवल तीन साल की थी। उसे अभी दुनियाँ की समझ भी नहीं थी। वह हर समय माँ के पल्लू से चिपकी रहती थी। अचानक उसकी दुनिया में झंझावात आ गया। उसे इन हालातो की सही तरह से समझ भी नहीं थी।
जो हो रहा है। क्यों हो रहा है। वह चीख -चीख कर रो कर ही इन को रोकने का प्रयास कर रही थी। अपने छोटे -छोटे हाथो से उन आताताइयों को रोकने की कोशिश कर रही थी. उन नृशंस लोगो को किसी पर तरस नहीं आया। उसके सामने उसके माँ -बाप और बड़े भाई -बहनो को जिन्दा आग के हवाले कर दिया गया। उस पर किसी की नजर नहीं पड़ी। या उसको किसी ने महत्व नहीं दिया।
अगले दिन लाशो के ढेर में मनमीत मिली। जो घायल थी मगर जिन्दा सांसे ले रही थी। एक रहमदिल पडोसी का ध्यान उसकी तरफ गया। उसने इस बात को अन्य लोगो पर जाहिर नहीं होने दिया।उसे चुपचाप अपने घर ले आया। घर में उसकी देखभाल से वह स्वस्थ हो गयी। इस बीच दंगे खत्म हो गए। जिस भले पडोसी ने इतने दिन देखभाल की थी। अब वह मनमीत के रिश्ते दारो को केम्प में ढूंढने लगे।
एक दिन उन्हें उसके चाचा मिल गए। वे भी दंगे से प्रभावित थे। लेकिन उन्होंने माल का नुकसान उठाया था। लेकिन उनके परिवार की जान बच गई थी। उनकी तीन बेटियाँ और दो बेटे थे। सब सही सलामत थे। उन्हें सही समय पर केम्प में पहुँचा दिया गया था।
उनके मकान को जला दिया गया था। और दुकान को लूट लिया गया था। लेकिन जान बच गयी थी उसका उन्होंने तहे दिल से शुक्रिया अदा किया।
उनके लिए इतने बड़े परिवार की देखभाल करना बहुत मुश्किल था। उन्हें विभाजन के बाद दूसरा उजड़ने का दंश साल रहा था। दादाजी बिलकुल चुप हो गए थे। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। जवानी में विभाजन का झटका झेल गए थे लेकिन बुढ़ापा बहुत दुखदाई प्रतीत हो रहा था।
सरदारों की हिम्मत कभी खत्म नहीं होती। उन्होंने जोशीले अंदाज से मनमीत को अपने गले लगा लिया। साथ ही आंसुओ की धारा बह निकली उन्हें अपने बड़े बेटे के परिवार के खत्म होने का दुःख सता रहा था । उन्होंने घर आकर अपने उजड़े आशियाने को संभालना शुरू किया। लुटी हुई दुकान में फिर से सामान डाला। जिंदगी की जद्दोजहद शुरू हो गयी।
सबसे पहले बच्चो की पढ़ाई का इंतजाम किया। बच्चे पढ़ने में मन लगाने लगे। इस तरह समय बीतता गया। समय आने पर सब काम -काज में लग गए तब उन्होंने सबकी शादी कर दी। । जिंदगी पटरी पर आ गयी थी। अब मनमीत के चाचाजी ने सुख की साँस ली।
मनमीत बैंक में बड़ी अफसर बन गयी थी। उसकी शादी को तीन साल हो गए थे। अचानक उसे बच्चेदानी के कैंसर का पता चला। इसकी खबर सुनते ही सन्न रह गयी। अभी तक उसने मेहनत की थी। उस मेहनत का फल अब मिलने लगा था। तभी किस्मत ने फिर से झटका दे दिया। कई दिन आंसुओ में डूब गए। फिर हिम्मत जुटा कर डॉक्टर की देखरेख में इलाज चलने लगा। डॉ ने उन्हें बच्चेदानी निकालने का सुझाव दिया। लेकिन अभी तक वे बेऔलाद थे। इसलिए इसके उपचार के उपाय किये गए। कुछ खराब हिस्सा काट कर निकाल दिया गया। जिसके बाद बच्चेदानी में बीस टांके आये।
अब मनमीत घर में रह कर आराम कर रही थी।हर समय उसका मन किस्मत के रंग बिरंगे खेल को समझने में लगा रहता लेकिन वह निराश नहीं हुई थी बल्कि इस हालात को बदलने की कोशिश किस तरह की जा सकती है। इस बारे में सोचती रहती थी।
सब ठीक होते ही वह बच्चे के लिए नई तकनीकों का सहारा लेने लगी। उसने testtube बेबी तकनीक से दो बच्चो को जन्म दिया। अब उसका घर खुशियों से महक उठा था। अब उसके चाचा जी दुनियाँ से कूच कर गए थे। चाची जी को उसने मदद के लिए अपने पास बुला लिया था।
कुछ समय बाद उसने स्वस्थ होते ही बच्चेदानी निकलवा दी। अब उसे इसकी जरूरत नहीं थी। उसके घर में बच्चो की किलकारियां गूँजने लगी थी। बच्चेदानी का कैंसर फिर से पनपने लगे इससे अच्छा उसे निकलवाने में भलमनसाहत दिखाई दी।
मनमीत का जीवन दुखो से भरा हुआ था लेकिन उसने अपने जुझारूपन से वह लड़ाई भी अपने हक़ में बदल दी। उससे मिल कर जिंदगी जीने के प्रति मेरा नजरिया बदल गया।

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