मनाली का सुहाना सफर
मनाली का सफर बहुत सुहाना था। हरीभरी वादियों के बीच घुमना और रहना अद्भुत अहसास दिलाता है। हमारा कॉटेज एप्पल गार्डन के बीच होने के कारण हमे सेब के पेड़ देखने और उनके बारे में जानकारी हासिल हुई। सेब का पेड़ लगने के 15 साल बाद फल देता है। काफी लम्बे समय तक उसकी सेवा करनी पड़ती है। इसका मतलब उसे एक पीढ़ी लगाकर भूल जाये और दूसरी पीढ़ी उसका फल चखती है। उसको बड़ा होते देखना मानो एक बच्चे की परवरिश करने के समान है।
हमारे कोटेज के आसपास बहुत शांति थी क्योंकि वह शहर से एक घंटे की दूरी पर था। सेब के बगीचे में बैठकर नीले आकाश को देखकर गाने की पंक्तिया "हरीभरी वसुंधरा पर नीला -नीला ये गगन। ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है। " याद आने लगी।
यहाँ पर फिश गार्डन बना हुआ है। शुरू में उसके पोस्टर देखकर हमने सोचा नहीं था इसमें हमारे मतलब का कुछ होगा। लेकिन वहाँ हम अनमने मन से चले गए। कि कुछ अद्भुत मछलिया देखने का मौका क्यों छोड़ा जाये। यहाँ पर मछलियों की विविधता के साथ मछलियां खाने के शौकीनों लिए उनके सामने ताजी मछलियां पकड़ कर उनके सामने साफ करके बना कर पेश की जाती है। उनके लिए इससे ज्यादा लाजबाब चीज और क्या हो सकती है।
लोगो ने इसे मनोरंजक पार्क के रूप में बदल दिया था। उसमे अनेक तरह के पक्षी दिखाई दिए। हमारे सामने पक्षियों की चहलकदमी दिखाई दी। उनका दो पैरो पर इंसानो के सामान चलना अजीब लग रहा था। कुछ पक्षी बहुत बड़े पिंजरे में थे।
यहाँ पर अनेक साहसिक खेलो का इंतजाम भी था। जिसके बारे में मैने सोचा भी नहीं था। मेने जिंदगी में इतने साहसिक खेलो के बारे में इससे पहले व्यवहार में नहीं देखा था। पहली बार देखकर मेरे अंदर हिम्मत इन्हे खेलने की जागी। इन खेलो को खेलते वक्त शरीर पूरी तरह पसीने से भीग गया। मैंने इतने अधिक पसीने की कल्पना भी नहीं की थी। मुझसे किसी को उम्मीद नहीं थी की इन खेलो में हिस्सा लेकर पूरा कर सकूंगी। बर्मा ब्रिज पर पहुंच कर वापिस आते समय मेरी हिम्मत खत्म होने लगी थी। मुझसे किसी को उम्मीद नहीं थी मै वापिस आ सकूंगी। मेरी सहायता करने के लिए सहायक आगे बड़ा लेकिन बिना किसी की मदद के में वापिस आ गयी।
हम जून के महीने में मनाली घूमने गए थे। ये घूमने के हिसाब से माकूल समय होने के कारण मुख्य बाजार में लोगो की गहमा -गहमी थी। लोगो की भीड़ -भाड़ देखकर हैरानी हो रही थी। बस -अड्डे से बाहर निकलते ही यहाँ का मॉल रोड शुरू हो जाता था। जिसे देखकर लगता हे पूरा मनाली सड़को पर निकल पड़ा है।
वहां का प्रसिद्ध हिडिम्बा मंदिर देखने के लिए हम चल पड़े हमे उसकी दुरी ढाई किलोमीटर बताई गई। इतनी लम्बी दूरी पैदल पार करना हमें मुश्किल लग रहा था। हमने गाड़ी करने के बारे में सोचा। कुछ लोगो से गाड़ी के बारे में बात की. तब पता चला। सारा रास्ता गाड़ियों के कारण जाम पड़ा है। यदि गाड़ी से गए तो बहुत मुश्किल में फंस जाएगे।
एक आदमी की दास्ताँ सुनकर हमें हैरानी हुइ। उसने बताया" -मै और मेरा परिवार गाड़ी से आ रहे थे।मुझे जाम में फंसने के कारण गुस्सा आने लगा।"
मेने परिवार के लोगो से कहा -""मेँ पैदल जा रहा हूँ। तुम्हारी मर्जी है पैदल चलो या गाड़ी में आ जाओ। "उन्होंने आने से मना कर दिया। उसने बताया उसे यहाँ पहुंचे हुए दो घंटे हो गए है। लेकिन गाड़ी से उसका परिवार अभी तक नहीं आया।
उसकी कहानी सुनकर हमने गाड़ी के स्थान पर पैदल चलने का मन बना लिया। जबकि दिल्ली में रहने के कारण हमें पैदल चलने की आदत नहीं थी। हिडिम्बा मंदिर के पास तक गाड़ियां जा सकती है। लेकिन इतने ऊँचे पहाड़ पर लोगो का भारी जमाबड़ा था।
हम पैदल रास्ते से गए थे। उस रस्ते से भी बहुत लोग पहुंच रहे थे। उस तरफ भी अनेक दुकाने सजी हुई थी जिनपर खाने -पीने और जरूरत का समान बिक रहा था। यहाँ याक की सवारी ,मैंमने के साथ फोटो खिचवाने के प्रबंध थे।
हिडिम्बा मंदिर पर पहुंच कर जान में जान आयी। इस समय तक यहाँ पर छाया हो गयी थी। ऊँचे -ऊँचे पेड़ो के कारण ठंडक का अहसास होने लगा था। इस मंदिर में प्रवेश के लिए बहुत लम्बी लाइन लगी हुई थी जिसे देखकर लगा यदि लाइन में लगकर प्रवेश करने के बारे में सोचा तो कई घंटे में नंबर आएगा।
आप कही भी मौसम के हिसाब से घूमने का कार्यक्रम बनाओ तो भीड़ का अंदाजा लगाने में गलती मत करना। मेरे साथ ऐसा कई बार हो चूका है। जब हम जिस मकसद से गए समय की कमी के कारण हमे उसे अधूरा छोड़ना पड़ा है।
हमारी शाम के समय वापिस लौटने की टिकट बुक थी। इसलिए बेमन से हमने वापिस चलने का मन बनाया। मंदिर के अंदर प्रवेश का रास्ता बहुत छोटा गुफा जैसा बना हुआ था। यहाँ पर राक्षसी देवी के समान पूज्य है।
वापिस बस तक पहुंचने के लिए भी हमें पैदल सफर करना पड़ा वहां तक का रास्ता भी जाम था। इस तरह मनाली में एक दिन का सफर तय करने के लिए हमारा पैसा काम नहीं आया बल्कि शरीर की ताकत के कारण हम घुम सके। .
वापसी के रस्ते में ब्यास नदी के किनारे चलना बहुत अच्छा लग रहा था। उसका शुद्ध ,सफ़ेद पानी मन को लुभा रहा था सारे रस्ते में नदी हमारे साथ चलती रही। जब तक रात हुई मै लगातार नदी को देखती रही। एक तरफ ऊँचे -ऊँचे पहाड़ दूसरी तरफ नदी। सफर में इतनी दूर तक नदी के किनारे चलना अद्भुत अहसास देता है।
सुबह होने पर दिल्ली पहुंचने पर मन अभी तक मनाली में ही घूम रहा था।


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