श्रीनगर का शंकराचार्य मंदिर
कश्मीर में अधिकतर स्थानों से डल झील दिखाई देती है। वह बहुत बड़ी जगह में फैली हुई है। कहा जाता है -"अब श् ये पहले की जगह केवल एक चौथाई रह गई है। " जब ये अब मुझे इतनी बड़ी लग रही है तब सोच कर देखो पहले कितनी बड़ी जगह में होगी। . कश्मीर का जन -जीवन इससे जुड़ा हुआ है। इस समय इसके चारो तरफ आबादी है। हर समय चहल -पहल दिखाई देती है। झील के चारो तरफ अनेक होटल है। जिनकी खिड़कियों से आप हर समय इसका नजारा देख सकते है।अधिकतर पहाड़ी इलाको में मुख्य घूमने की जगह माल रोड होते है। यहाँ का माल रोड आप डल लेक के चारो तरफ बनीं हुई सड़क को कह सकते है। यहाँ पर शाम के समय रौनक देखने लायक होती है। इसी रोड पर सेन्टॉर होटल बना हुआ है। जिसमे प्रधान -मंत्री जैसे बड़े लोग आकर रुकते है। इस रोड के चारो तरफ का दृश्य बहुत लुभावना है। लेकिन सुरक्षित स्थान होने के कारण इसकी सुरक्षा के विशेष प्रबंध किये जाते है।
हमारे सामने प्रधान -मंत्री के आने के कार्यक्रम के कारण दो दिन ये सड़क आम जनता के लिए बंद कर दी गयी थी जिसका खामियाजा हमे उठाना पड़ा। उस समय हमे बहुत गुस्सा आया था। वहाँ के लोगो ने बताया -यदि मोदी जी की जगह कोई और प्रधानमंत्री होता था तब इतनी अधिक सुरक्षा का प्रबंध नहीं किया जाता था। यहाँ के लोग मोदी जी को पसंद नहीं करते इसलिए इतनी अधिक सुरक्षा का इंतजाम करना पड रहा है।
उस दिन शाम के समय हमने शंकराचार्य मंदिर देखा। शंकराचार्य मंदिर के रास्ते में कई स्थानों पर विशेष रूप से सुरक्षा के इंतजाम किये गए थे। उसे देखकर लग रहा था। हमारे मंदिर कितने असुरक्षित हो गए है। जबकि दरगाह वगैरह में किसी विशेष प्रकार की सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे। जहाँ हमारी गाड़ी ने हमें छोड़ा। वहाँ से ढाई सौ सीढिया ऊपर चढ़नी थी उसके बाद हमे शिवलिंग के दर्शन होने थे। हर जगह जाने के लिए हम जैसे लोगो को गाड़ियां मिल जाती है इसलिए इतनी अधिक सीढिया देख कर हिम्मत पस्त होने लगी कोई और चारा न होने के कारण सारी हिम्मत इकठ्ठी करके ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया। लेकिन शरीर साथ नहीं दे पा रहा था इस कारण दस सीढ़ियों के बाद रुक कर कुछ देर आराम करना पड रहा था।
अंतत हम मंदिर तक पहुँच गए। वहाँ से श्रीनगर का भव्य नजारा देखकर हम अपनी थकान भूल गए। श्रीनगर पूरा हमे दिखाई दे रहा था। डल झील जो हमे सड़क के किनारे से बहुत विशाल दिखाई दे रही थी। वह ऊपर से सही रूप में दिख रही थी।
शंकराचार्य मंदिर की बनावट देखकर लगता है प्राचीन समय के लोग कितने जुझारू होते थे। जिन ऊंचाइयों तक हम बिना समान लिए चढ़ नहीं पाते। उन्होंने प्राचीन समय में बिना किसी सुविधा के अपनी शारीरिक क्षमता के आधार पर इतना विशाल निर्माण कर दिया। जब शुरू में हमारे सलाहकार ने इस मंदिर की चर्चा की थी तब मैने उन्हें मना कर दिया था। इतनी ऊंचाई के कारण हिम्मत जुटानी बहुत मुश्किल थी। लेकिन इतने अधिक परिश्रम का फल हमे मीठा मिला।
हम दूर से परेशानियाँ देखकर डर जाते है। लेकिन मंजिल पर पहुँचने का सुखद अहसास आत्मविभोर कर देता है
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