आज का कश्मीर (खबरों से अलग )
बर्षो से मेरी इच्छा कश्मीर घूमने की थी। लेकिन 90 के दशक से वहाँ का माहौल बहुत ख़राब था जिसके कारण में कश्मीर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। अब उम्र अधिक हो गयी थी और जिम्मेदारी भी लगभग खत्म सी हो रही थी तब मेने जान हथेली पर लेकर कश्मीर भ्रमण का मन बना लिया। हर समय समाचारो में कश्मीर की दर्दनाक खबरे मन को दहला देती थी। जिसके कारण हिम्मत जुटाना मुश्किल था। टिकट खरीदने के बाद भी बहुत लोग मेरी हिम्मत खत्म करने में लगे रहते थे। में भी हर समय डरी रहती थी।मेरी एक सहेली ने कश्मीर की टिकट बुक कराने के बाबजूद केंसिल करवा दी। क्योंकि उसके लिए पूरे परिवार को लेकर, खतरा उठाने की हिम्मत नहीं हुई। मैंने भी अपने बच्चो का रिस्क नहीं लिया। उन्हें अपने साथ नहीं लेकर गयी। क्योंकि अपनी जान का खतरा उठाया जा सकता है लेकिन बच्चे हमारी जान से भी कीमती होते है।
कुछ लोग हाल ही में कश्मीर घूम कर आये उन्होंने तसल्लीवक्श जबाब दिए। उनके कारण हम कश्मीर घूमने की हिम्मत कर सके। लेकिन पुरे सफर में लगता था कुछ गलत होने वाला है। हर समय भगवान से प्रार्थना करती रहती थी। कुछ गलत न हो जाये। यहाँ तक दिल्ली आने तक प्रार्थना करना बंद नहीं हुआ। जब दिल्ली पहुंच गए तब हमने राहत की साँस ली।
लेकिन वहाँ जाने पर अहसास हुआ कि हालात इतने खराब नहीं है जितना समाचारो में दिखाये जाते है। मेरे हर तरफ मुस्लिम समुदाय के लोग रहते थे लेकिन उनका व्यवहार सभ्य था। लेकिन बाहरी लोगो से(दिल्ली वालो ) बात करने पर ऐसा लगता था जैसे बहुत ख़राब माहौल है. मेरे अंदर मुस्लिमो को लेकर डर व्याप्त था जैसे मुझे अगवा कर लिया जायेगा या हिंसक वारदात का सामना करना पड़ेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हमारा डर हमे अशांत बनाये रहा।
पहले दिन हमारा ड्राइवर हमें एयरपोर्ट पर हमारा इंतजार करते हुए मिला। लेकिन एयरपोर्ट पर फोन सिग्नल आने बंद हो गए। आज के समय में अनजान शहर में बिना फोन के जीना कितना भयावह लगता है। उसके लिए तैयार रहने की जरूरत है.वहाँ केवल पोस्टपेड फोन ही काम करते है। हमारे सारे फोन बेकार साबित हुए।
उसके हाथो में हमारे नाम के बैनर थे। उसे देखकर लगा हम 20 साल पुराने समय में पहुँच गए है। ट्राली में सामान रखकर हम टेक्सी तक पहुंच रहे थे इतने में एक मिनट के रास्ते में एक कश्मीरी ने हमारी ट्राली हमसे ले ली। हमने उसे मना किया लेकिन जबरदस्ती की, जो हमे पसंद नहीं आयी। हमे अपनी गाड़ी उस जगह से सामने दिखाई दे रही थी। गाड़ी में सामान रखने के बाद उसने बक्शीस मांगी तब मुझे बहुत गुस्सा आया ये कैसा जबरदस्ती का रोजगार ढूंढ लिया है। जबकि ट्राली से समान ले जाने में किसी को परेशानी नहीं होती है।
मेरे मन में डल लेक को लेकर बहुत सुंदर सपने थे। लेकिन श्रीनगर में घुसते ही डल लेक शुरू हो गई। शुरू में डल लेक में शिकारे और हाउसवोट दिखाई दिए। अब से पहले शिकारे और हॉउसवोट फिल्मो में देखे थे। शिकारे तो अधिकतर फिल्मो जैसे ही थे लेकिन शिकारों के द्वारा हर तरह के सामानो की खरीदारी की जा सकती है। वहाँ पर खाने -पीने के सामान से लेकर हर तरह की चीजे खरीदी जा सकती है। यहाँ तक की फोटो खींचने वाले भी अपने शिकारे से हमारे शिकारे में पूरे कश्मीरी लिबास में, पूरे साजोशिंगार के साथ फोटो खींचने में चतुर है। आरम्भ में शिकारे पर जाते हुए लोगो के हाथो में खाने का सामान देखकर हैरानी हुई थी लेकिन बाद में सभी के हाथो में कुछ न कुछ दिखाई देने लगा।
शिकारे वाले शिकारे की सैर कराने के चार या पांच पॉइंट बताते है .उनके पॉइंट का मतलब मै पांच मैदानी जगह समझी थी। लेकिन झील के अंदर ही उसने हमे "चार -चिनार "जो एक बगीचा था जिसमे चार पेड़ चिनार के लगे हुए थे। केवल यही उतर कर हमने कुछ फोटो खींची। इसके आलावा हमे उसने तैरता हुआ लॉट्स पॉइंट ,फ्लोटिंग खेती ,राजा हरिसिंह की झील दिखाने का वायदा किया था। जिसके हमने उसे मुँह मांगे पैसे दिए थे लेकिन हमें लगा इसने हमें बातो के जाल में फंसा कर लूट लिया है क्योंकि यह अलग -अलग पॉइंट न होकर डल झील का हिस्सा थे। यानि पानी में तैरते हुए पौधे।
दिन के समय में डल झील के पानी के अंदर झांकते हुए बहुत सारे पेड़ -पौधे दिखाई दिए उन्हें देखकर लग रहा था। मानो कांच के शीशे के अंदर पेड़ -पौधे दिखाई दे रहे है। डल झील के अंदर और बाहर बहुत सारी हरियाली दिखाई देती है।
हॉउसवोट अंदर से बहुत सुंदर थे। उनके अंदर बहुत सुंदर सजावट थी। उसमे बैठने का अलग कमरा था। खाने -पीने के लिए अलग कमरे का इंतजाम था। इसके आलावा झील का दृश्य देखने के लिए बिलकुल बाहर की तरफ भी बैठने का अलग से इंतजाम था। मानो बालकनी में बैठ गए हो। दिल्ली में आती -जाती गाड़ियों और लोगो को देखने की आदत होती है। लेकिन यहाँ पर शिकारे पर सब कुछ देखा जा सकता है। हॉउसवोट में व्यक्तिगत कमरा बाथरूम के साथ भी होते है।
यहाँ का खाना -पीना हमारे स्वाद का था। उसमे हमे दिक्क्त नहीं आयी। हॉउसवोट का किराया भी होटल के किराये के समान था। होटल में हमेशा रहते आये हो यहाँ आकर एक बार हॉउसवोट में रुकने का भी लुत्फ़ उठाना चाहिये . जहाँ हॉउसवोट है वहाँ अनेक हॉउसवोट होने के कारण पानी रुका हुआ है। जिसके कारण पानी में अजीब सी गंध महसूस होती है। जिसकी कुछ समय बाद आदत पड़ जाती है।
कश्मीर में वातावरण बहुत साफ -सुथरा है। सड़के बिलकुल साफ है हवा -पानी और आकाश दिल्ली वालो के लिए बहुत मनमोहक है।
सुरक्षा के हिसाब से आतंक की खबरे समाचारो में सुनी थी लेकिन आम हालात अन्य शहरो जैसे ही है। वहाँ मुख्यमंत्री और फारुख अब्दुल्ला के घर के पास तक आम जनता आ -जा सकती है। सैन्य शिविरों पर हमले की खबरे आये दिन सुर्खियों में रहती है। इन सब जगहों की छोटी चार -दीवारी और उस पर बंधे तार मन में हैरानी पैदा कर रहे थे।
मुझे लगता है समाचारो का मतलब केवल सनसनी फैलाना रह गया है। उनसे सच्चाई कोसो दूर है।
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