सांवले रंग की औरतो को लोग हेय नजर से देखते है। बचपन से इसका सामना करते हुए उन्हें इस बात की आदत पड़ जाती है.हमारे समाज में गोरा रंग सुंदरता की पहचान बन गया है। ऐसी अवधारणा मेरे दिमाग में भी थी।
कॉलेज के समय में मेरी सहेली बनिता थी। मुझे वह कभी सुंदर नही लगी। लेकिन उसका और मेरा विषय सामान था। हमारा घर का रास्ता सामान होने के कारण हम करीब आ गए। उसका स्वभाव अच्छा था . उस समय हमारा ध्यान किसी की विशेषता पर नही जाता था। हमें केवल गपशप से मतलब होता था। साथ -साथ चलते हुए कब घर पहुँच जाते पता ही नही चलता था। उन दिनों मौज मस्ती और गपशप ही हमारी जिंदगी हुआ करती थी।
कभी ओरो से तुलना करने लगती तब लगता इससे ज्यादा बदसूरत लड़की हमारी पूरी कक्षा में नही थी। उसकी आँखे बहुत छोटी सी थी। भवे बिलकुल आँखों से सटी हुई थी। नाक मोटी ,होठ मोटे उस पर सांवला रंग ,वह बहुत ज्यादा पतली थी। मेरे ख्याल से वह सुंदर नही दिखाती थे।
उसके पिताजी का देहाबसान हो चूका था।इस कारण उसकी शादी भी जल्दी हो गयी। इसके बाद काफी समय तक उससे हमारा मिलना नही हुआ समय कितनी जल्दी बीत गया हमे इसका अहसास नही हुआ।
मेने पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी शुरू की। वहाँ पर मेरी एक सहेली सुधा बन गयी। वह सुंदर लड़कियों में नही आती थी लेकिन वह अधिकतर अपनी भाभी की सुंदरता की बहुत तारीफ करती थी। उसके द्वारा इतनी तारीफ सुनकर मुझे उनसे मिलने की बहुत इच्छा होती थी।
सुधा की शादी के समय मेरा सामना वनिता से हुआ। मै उसे देखकर हैरान हो गयी। लेकिन उसका रंग गोरा था। जिसके कारण उसके ससुराल में उसे बहुत सुंदर समझा जाता था। हर तरफ उसकी सुंदरता का गुणगान होता रहता था।
कुछ समय बाद मेरा वनिता से मिलना हुआ। में वनिता को पहचान नही सकी। तब तक उसका एक बेटा हो चूका था। उसका शरीर कुछ मांसल होने के कारण उसका रंग साफ लग रहा था। उसके नाक -नक्श भी मांसलता के कारण बदल गए थे। शादी के बाद मेकअप में देखने के कारण जमीन आसमान का अंतर आ गया था। उसने मुझे पहचाना उसमे इतना ज्यादा बदलाव आ गया था मै उसे किसी हालत में पहचान नही सकती थी। वनिता में बहुत परिवर्तन आ गया था। उसका ससुराल में जाकर धुप में घूमना बंद हो गया था।
उस दिन पहली बार अहसास हुआ कि धुप के आभाव और थोड़ी मांसलता इंसान के व्यक्तित्व को किस तरह बदल देती है।इंसान बदसूरत से कब सुंदर बन जाये इसका अहसास मुझे उस दिन हुआ।
कॉलेज के समय में मेरी सहेली बनिता थी। मुझे वह कभी सुंदर नही लगी। लेकिन उसका और मेरा विषय सामान था। हमारा घर का रास्ता सामान होने के कारण हम करीब आ गए। उसका स्वभाव अच्छा था . उस समय हमारा ध्यान किसी की विशेषता पर नही जाता था। हमें केवल गपशप से मतलब होता था। साथ -साथ चलते हुए कब घर पहुँच जाते पता ही नही चलता था। उन दिनों मौज मस्ती और गपशप ही हमारी जिंदगी हुआ करती थी।
कभी ओरो से तुलना करने लगती तब लगता इससे ज्यादा बदसूरत लड़की हमारी पूरी कक्षा में नही थी। उसकी आँखे बहुत छोटी सी थी। भवे बिलकुल आँखों से सटी हुई थी। नाक मोटी ,होठ मोटे उस पर सांवला रंग ,वह बहुत ज्यादा पतली थी। मेरे ख्याल से वह सुंदर नही दिखाती थे।
उसके पिताजी का देहाबसान हो चूका था।इस कारण उसकी शादी भी जल्दी हो गयी। इसके बाद काफी समय तक उससे हमारा मिलना नही हुआ समय कितनी जल्दी बीत गया हमे इसका अहसास नही हुआ।
मेने पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी शुरू की। वहाँ पर मेरी एक सहेली सुधा बन गयी। वह सुंदर लड़कियों में नही आती थी लेकिन वह अधिकतर अपनी भाभी की सुंदरता की बहुत तारीफ करती थी। उसके द्वारा इतनी तारीफ सुनकर मुझे उनसे मिलने की बहुत इच्छा होती थी।
सुधा की शादी के समय मेरा सामना वनिता से हुआ। मै उसे देखकर हैरान हो गयी। लेकिन उसका रंग गोरा था। जिसके कारण उसके ससुराल में उसे बहुत सुंदर समझा जाता था। हर तरफ उसकी सुंदरता का गुणगान होता रहता था।
कुछ समय बाद मेरा वनिता से मिलना हुआ। में वनिता को पहचान नही सकी। तब तक उसका एक बेटा हो चूका था। उसका शरीर कुछ मांसल होने के कारण उसका रंग साफ लग रहा था। उसके नाक -नक्श भी मांसलता के कारण बदल गए थे। शादी के बाद मेकअप में देखने के कारण जमीन आसमान का अंतर आ गया था। उसने मुझे पहचाना उसमे इतना ज्यादा बदलाव आ गया था मै उसे किसी हालत में पहचान नही सकती थी। वनिता में बहुत परिवर्तन आ गया था। उसका ससुराल में जाकर धुप में घूमना बंद हो गया था।
उस दिन पहली बार अहसास हुआ कि धुप के आभाव और थोड़ी मांसलता इंसान के व्यक्तित्व को किस तरह बदल देती है।इंसान बदसूरत से कब सुंदर बन जाये इसका अहसास मुझे उस दिन हुआ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें