#pradushan or ham

     आजकल हर जगह प्रदूषण को लेकर होने वाली पहले  बाते  हमें सोचने पर मजबूर कर रही है। आज से 40  साल पहले तक प्रदूषण का इतना अधिक  जिक्र नही होता था। जितना आजकल हो रहा है। जबसे विश्व प्रदूषण पर  सम्मेलन हुआ है। हर देश प्रदूषण घटाने पर जोर दे रहा है।
   आपने चीन के समाचार सुने होंगे। चीन के बीजिंग शहर से लोग पलायन करके छोटे शहरो में जा  रहे है। और स्वच्छ हवा में सांस लेना उनको जिंदगी की जद्दोजहद से अधिक जरूरी लग रहा है।
      पहले रोजगार के लिए लोग शहरो की तरफ उन्मुख होते थे । जब उन्हें और उनके परिवार को अनेक बीमारिया घेर लेती है। तब उन्हें स्वच्छ वातावरण का महत्व समझ आता  है। बीमारियो पर ढेरो पैसा खर्च करने के बाद ही लोगो को इसका अहसास होता है। अब वे अधिक पैसे की अपेक्षा स्वास्थ्य का महत्ब  समझ रहे है।
    ये प्रदूषण कही और से नही आया है। ये सारी परेशानियाँ  इंसान की लापरवाही से पैदा हुई है। पहले समय में जनसँख्या कम थी। पिछले 200  सालो में संसार की जनसंख्या 1  अरब से 7  अरब तक पहुँच  गयी है  लगभग दो सौ  सालो में हमने जनसंख्या के मामले में 7  गुना इजाफा कर लिया है।
     मानव की जरूरते पूरी करने के लिए वन और वन्य प्राणियों का विनाश कर दिया है। ये जीव जंतु हमारे वातावरण को बचाने  में सहायता देते है। हर प्राणी की जरूरते एक दूसरे से जुडी हुई  है। एक प्राणी के द्वारा छोड़ा गया गंद  दूसरे प्राणी की जरूरत होता है। लेकिन अपनी जरूरत पूरी करने के लिए हमने सारे  पर्यावरण को अपने इशारो पर चलाना  चाहा।
     .कहते है -सबसे बड़ा दंड प्रकृति देती है। इसके लिए आप कही गुहार नही लगा सकते। आपकी  दयनीय हालत की   सुनवाई किसी अदालत में नही हो सकती। आज हमारी हालत दयनीय हो गयी है। प्रकृति का सबसे ज्यादा विनाश मानव ने किया है। लेकिन भुगतना सभी प्राणियों को पड़  रहा है। हमने अन्य प्राणियो का विनाश करते हुए उनके दर्द को नही समझा लेकिन आज यही बेदर्दी इंसान को रुला रही है।
    इससे बचने के लिए हमें अमीर  देशो की तरफ देखने की जगह अपनी पुरानी मान्यताओ और धारणाओं की तरफ लौटना होगा। सहजीविता के सिद्धांत का पालन करना पड़ेगा। जहाँ मनुष्य सभी प्राणियों का आदर और सहयोग करता था।
     हमें अपनी जरूरते सीमित  करनी पड़ेगी। हरियाली को अधिक बढ़ाना  होगा। धरती, आकाश ,जल, ध्वनि  स्वच्छ रखने के लिए प्रयास करने पड़ेंगे। दूसरो  और खुद को वातावरण को सुधारने की और कदम बढ़ाने पड़ेंगे।
     मालद्वीप जैसे छोटे देशो   ने " पर्यावरण कर" लगाने शुरू कर दिए है क्योंकि भविष्य में मालद्वीप समुद्र में डूब जाने का खतरा है। उनके देश का अस्तित्व खत्म हो जायेगा। ऐसे में नए सिरे से उन्हें जीवन की शरुरात करनी पड़ेगी।  उन्हें दूसरो की गलतियों का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। इसमें उनका कसूर इतना नही है। जितना उन्हें परेशान होना पडेगा।
    अभी वक्त  हमारे पास है  .हमारी जागरूकता हमे इस भयानक स्थिति से   निकाल  सकती है। इसके लिए सरकार या किसी एक व्यक्ति के प्रयास से काम नही चलेगा बल्कि सारे समाज को मिलकर कदम उठाना पड़ेगा। ये समस्या बहुत भयानक रूप ले चुकी है। इसको और बढ़ने से रोकने के लिए हम सबके प्रयास जरूरी है। 

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