#kude ka nistaran

    आजकल प्रदूषण के बारे में लोग सजग हुए है।  उन्हें इसकी भयावहता दिखाई दे रही है। इससे बचने के उपाय समझ नही आ  रहे है। मै इस बारे में अपने अनुभव  साझा कर रही हूँ।
   जब हमारी रसोई का कूड़ा निकलता है  उससे बचने का एक सटीक उपाय है। आप उससे बाकि कूड़े से अलग रखे। बाकि कूड़ा कूड़ेदान में डाल दे। रसोई का कूड़ा दूसरे प्राणियों के खाने के काम आ  सकता है। -जैसे हरा कूड़ा,मटर  के छिलके आदि।
      आजकल कुछ केंचुए मिलते है। जिन्हे लेकर ऐसी जगह रख दीजिये जहाँ रसोई का कूड़ा डाला जा सकता है। ये केंचुए इस कूड़े को खाद में बदल देंगे। इस खाद का उपयोग आप पोधो में कर सकते है।
     पहले समय में कूड़े की समस्या नही होती थी क्योंकि घरो में बचे हुए पदार्थो का इस्तेमाल दूसरे प्राणी कर लेते थे। लेकिन अब इंसान और जानवर शहरो में साथ नही रहते। इसलिए हर तरह के कूड़े की समस्या बढ़ती जा रही है। इसलिए  कई परिवारो को  साथ मिलकर उपाय करने पड़ेंगे। शहरो में छोटे परिवार और सीमित  जगह के कारण इस समस्या से मिलकर निजाद पायी जा  सकती है। 
     हम अधिक से अधिक प्राकृतिक चीजो का इस्तेमाल करे। इसका इस्तेमाल इंसानो और दूसरे प्राणियों के लिए फायदेमंद होता है। यह विखंडित होकर मिट्टी  में मिल जाता है।
      आप अपने चारो और कूड़े के ढेर देखकर घबरा जाते है। लेकिन कभी आपको बहुत बड़ी ऐसी जगह देखने का मौका मिले जहाँ  पूरी दिल्ली का कूड़ा डाला जाता है। तब आपको हैरानी होगी काफी समय बाद  उस स्थान पर मिट्टी  ही मिट्टी  दिखाई दे रही है। या कुछ प्लास्टिक की पन्नियाँ दिख रही है। वहाँ  का पूरा कूड़ा मिटटी में तबदील हो चूका है। इसका उदाहरण -रोहिणी के रस्ते में दिखाई देगा।  दूसरा उदाहरण दिल्ली का मिलेनियम पार्क है। जो आजकल पिकनिक स्पॉट बना हुआ है।
      कूड़े की समस्या से मुक्ति हमें लगता है सरकार की जिम्मेदारी है। यदि इस समस्या से बचने के लिए हम  सब मिलकर खुद उपाय करे तो  आपको कही गंदगी दिखाई नही देगी। सफाई कर्मचारी खुद काम से जी चुराता है। सफाई करने के लिए वह गलियो में नही आता। हम इससे बचने के लिए घर के आस -पास की सफाई खुद कर लेते है।हम अपने आस -पास की गंदगी के लिए सफाई कर्मचारी के भरोसे नही रहते।  तो कूड़ा निस्तारण के लिए किसी अन्य के भरोसे रहना बेकार है।
     मै मोहल्ले के सफाई कर्मचारी को तीज -त्यौहार पर देखती हूँ। जब उसे घरो से कुछ मिलने की उम्मीद होती है। वरना वे लोग ठाठ से चाय की दुकान पर चाय पीकर चले जाते है। 

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