हम पिछले दिनों नैनीताल घूमने गए। दिल्ली में रहने वालो के लिए स्वर्गिक आनंद की अनुभूति थी। हमें दिल्ली में प्रदूषित वातावरण में रहना पड़ता है। हम इस माहौल के आदि हो जाते है।
मैने बहुत दिनों बाद आकाश का आसमानी रंग देखा जो हम भूल चुके थे। इतना सुंदर और साफ आकाश अब केवल तस्वीरों में दिखाई देता है। दिल्ली का आकाश हमेशा स्लेटी रंग का दीखता है। नई पीढ़ी दिल्ली से बाहर निकल कर ही आकाश के सही रंग को समझ सकती है वर्ना सब स्लेटी रंग को ही आकाश का रंग समझेंगे। इसलिए बच्चो को बड़े शहरो से बाहर भी ले जाकर वातावरण की सुंदरता का अनुभव कराना चाहिए।
नैसर्गिक हरियाली का अनुभव भी नैनीताल में हुआ। वहाँ पेड़ो का हरा रंग कैसा होता है सही मायने में समझ आया। वहाँ 7 बजे से ही ओस पड़ने लगती है। आपको 8 बजे के बाद खुले में बैठने की हिम्मत जुटानी पड़ती है। खुले में पड़ी कुर्सियों पर बैठते हुए उन पर हाथ का स्पर्श करके देखना पड़ता है कुर्सिया सुखी है या गीली है। सूखी कुर्सी ढूंढ कर बैठने पर वहाँ की हरियाली मन को मोह लेती है। नदी के किनारे हरियाली के बीच में बैठ कर हरियाली का अनुभव सवर्ग की सैर कराने में समर्थ होता है।
शाम होते ही ऊँचे पेड़ो की तरफ देखने पर आपको बहुत सारे छोटे -छोटे सफ़ेद समूह बनते दिखाई देंगे। जिन्हे देखकर आपको पहले तो लगेगा आकाश में धुँआ उठ रहा है लेकिन ये केवल दिल्ली वालो की सोच है उन्होंने आकाश में पेड़ो से उठते हुए वाष्प कण इससे पहले कभी देखे नही होते है। उन्होंने इतनी संख्या में पेड़ से बादल या ओस बनती नही देखी होती है। शाम होते ही सभी पेड़ो से सफ़ेद समूह आकाश में उठने लगते है। जिन्हे देखना बहुत अच्छा लगता है। हमारे सामने ही सारे समूह इकठ्ठे होकर बादल का रूप लेकर सारे वातावरण को ढक लेते है।
शहरो में पौधो को पनपने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। वहाँ जंगलो में पेड़ो को पानी या खाद देने की जरूरत नही पड़ती। पेड़ अपने लिए खाद और पानी का इंतजाम खुद ही कर लेते है। खुद जमीं से पानी सोख लेते है। स्वय उसको वाष्पित कर देते है। उस वाष्पन से उनकी पानी की जरूरत भी पूरी हो जाती है। साथ ही सुबह सारे पेड़ पोधे साफ भी हो जाते है। हर तरफ फैली हुई हरियाली और उसकी सुगंध मन को मोहित करती है।
मेरी सहेली गाँव से सम्बन्ध रखती है वो एक बार कह रही थी हम खेत से खाने की चीजे तोड़ कर पोंछ कर खा लेते थे तब मुझे उसकी बात बहुत गंदी लगी थी लेकिन नैनीताल की हरियाली का अवलोकन करने के बाद लगा। ये बात सही थी। वहाँ हमें कही भी गंदगी दिखाई नही दी।
नैनीताल में धुप भी चटकीली थी। यदि ठंडी हवा ना चल रही हो तो उस धुप में आप 1 घंटा मुश्किल से बैठ पाओगे। वहाँ सुबह के समय कोहरा नही था बल्कि जब धुप निकली तब वह अपनी पूरी सुंदरता लिए हुए थी। इसका अहसास आपको नैनीताल पहुंच कर ही होगा। वहाँ ठण्ड केवल छाया में थी धुप में पहुचने पर ठण्ड का अहसास गायव हो जाता है। पहाड़ी इलाको में चढ़ने से शरीर में बहुत गर्मी आ जाती है। गर्म कपड़े उतारने का मन करता है।
शहरो में घुसते ही चारो और गंदगी के ढेर दिखाई दिए। सड़क के किनारो से लगे हुए पेड़ो पर ढेर सारी मिट्टी दिखाई दी जिससे मन ख़राब हो गया।
मैने बहुत दिनों बाद आकाश का आसमानी रंग देखा जो हम भूल चुके थे। इतना सुंदर और साफ आकाश अब केवल तस्वीरों में दिखाई देता है। दिल्ली का आकाश हमेशा स्लेटी रंग का दीखता है। नई पीढ़ी दिल्ली से बाहर निकल कर ही आकाश के सही रंग को समझ सकती है वर्ना सब स्लेटी रंग को ही आकाश का रंग समझेंगे। इसलिए बच्चो को बड़े शहरो से बाहर भी ले जाकर वातावरण की सुंदरता का अनुभव कराना चाहिए।
नैसर्गिक हरियाली का अनुभव भी नैनीताल में हुआ। वहाँ पेड़ो का हरा रंग कैसा होता है सही मायने में समझ आया। वहाँ 7 बजे से ही ओस पड़ने लगती है। आपको 8 बजे के बाद खुले में बैठने की हिम्मत जुटानी पड़ती है। खुले में पड़ी कुर्सियों पर बैठते हुए उन पर हाथ का स्पर्श करके देखना पड़ता है कुर्सिया सुखी है या गीली है। सूखी कुर्सी ढूंढ कर बैठने पर वहाँ की हरियाली मन को मोह लेती है। नदी के किनारे हरियाली के बीच में बैठ कर हरियाली का अनुभव सवर्ग की सैर कराने में समर्थ होता है।
शाम होते ही ऊँचे पेड़ो की तरफ देखने पर आपको बहुत सारे छोटे -छोटे सफ़ेद समूह बनते दिखाई देंगे। जिन्हे देखकर आपको पहले तो लगेगा आकाश में धुँआ उठ रहा है लेकिन ये केवल दिल्ली वालो की सोच है उन्होंने आकाश में पेड़ो से उठते हुए वाष्प कण इससे पहले कभी देखे नही होते है। उन्होंने इतनी संख्या में पेड़ से बादल या ओस बनती नही देखी होती है। शाम होते ही सभी पेड़ो से सफ़ेद समूह आकाश में उठने लगते है। जिन्हे देखना बहुत अच्छा लगता है। हमारे सामने ही सारे समूह इकठ्ठे होकर बादल का रूप लेकर सारे वातावरण को ढक लेते है।
शहरो में पौधो को पनपने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। वहाँ जंगलो में पेड़ो को पानी या खाद देने की जरूरत नही पड़ती। पेड़ अपने लिए खाद और पानी का इंतजाम खुद ही कर लेते है। खुद जमीं से पानी सोख लेते है। स्वय उसको वाष्पित कर देते है। उस वाष्पन से उनकी पानी की जरूरत भी पूरी हो जाती है। साथ ही सुबह सारे पेड़ पोधे साफ भी हो जाते है। हर तरफ फैली हुई हरियाली और उसकी सुगंध मन को मोहित करती है।
मेरी सहेली गाँव से सम्बन्ध रखती है वो एक बार कह रही थी हम खेत से खाने की चीजे तोड़ कर पोंछ कर खा लेते थे तब मुझे उसकी बात बहुत गंदी लगी थी लेकिन नैनीताल की हरियाली का अवलोकन करने के बाद लगा। ये बात सही थी। वहाँ हमें कही भी गंदगी दिखाई नही दी।
नैनीताल में धुप भी चटकीली थी। यदि ठंडी हवा ना चल रही हो तो उस धुप में आप 1 घंटा मुश्किल से बैठ पाओगे। वहाँ सुबह के समय कोहरा नही था बल्कि जब धुप निकली तब वह अपनी पूरी सुंदरता लिए हुए थी। इसका अहसास आपको नैनीताल पहुंच कर ही होगा। वहाँ ठण्ड केवल छाया में थी धुप में पहुचने पर ठण्ड का अहसास गायव हो जाता है। पहाड़ी इलाको में चढ़ने से शरीर में बहुत गर्मी आ जाती है। गर्म कपड़े उतारने का मन करता है।
शहरो में घुसते ही चारो और गंदगी के ढेर दिखाई दिए। सड़क के किनारो से लगे हुए पेड़ो पर ढेर सारी मिट्टी दिखाई दी जिससे मन ख़राब हो गया।
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