उज्जैन की नदी
उज्जैन में शिप्रा नदी बहती है। इसकी पावनता मानी हुई है। जैसे लोग गंगा नदी में नहाकर अपने को पावन करते है। वैसे ही शिप्रा नदी के किनारे लोगो की भीड़ लगी होती है। इस नदी के किनारे बैठ कर लोग पत्तो में दीप, फूल और पैसे बहाते है।
शाम के समय शिप्रा नदी के कई घाटों पर आरती होती देखी जा सकती है। सभी जगह एक साथ आरती न होकर कुछ समय के अंतराल पर होती है जिसके कारण हम बहुत समय तक मंत्रमुग्ध होकर देखते रह जाते है।
यहां की आरती में ढोल,बाजो आदि वाद्ययंत्रों के साथ शंखध्वनि विशेष तौर पर इस्तेमाल की जाती है इसके कारण माहौल में आध्यात्मिकता का समायोजन हो जाता है। आरती में शंख का इस्तेमाल मैंने किसी और जगह पर नहीं देखा है। हर तरफ होती हुई आरती , ढलता हुआ सूरज देखते हुए दोनों घाटों से सुमधुर आती हुई आवाज मन को मोह लेती है।
नदी के किनारे मछलियों के लिए आटे की गोलिया बेचने वाले बैठे रहते है। जब इन गोलियों को नदी में डालते है तब बहुत सारी मछलियां इन्हे खाने के लिए आ जाती है। मछलियों को देखते हुए आरती का रसस्वादन करना बहुत अच्छा लगता है।
इस अलौकिक अनुभव का रसपान करने के लिए उज्जैन की नदी के किनारे जाना ही पड़ेगा।
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