#FINE THREADS OF LOVE

              प्रेम की डोर 

  जिन्हे हम प्यार करते है उन्हें कभी अपने प्यार का अहसास सही तरह से नहीं करवा पाते। हमारा पूरा जीवन उनके लिए समर्पित है। हमारा त्याग और बलिदान उनके लिए नगण्य होता है। वह सारा जीवन हमारे किये कामो में कमियां ही निकालते   रहते है और हम हमेशा कसमसाते रह जाते है। हमसे ऐसी क्या गलती हो गई जिस कारण हमारे सारे  कार्यो को व्यर्थ समझा जा रहा है।  

       हमें जीवन में हमेशा अधूरेपन का अहसास होता रहता है। ये सभी के जीवन की विडंबना है। उनके किये निस्वार्थ कार्यो को समझने की कोई कोशिश नहीं करता। वे दूर रहने वालो के किये एक काम के भी गुणगान कर रहे होते है जबकि जो साथ में रहते हुए, पूरी जिंदगी उनपर   कुर्बान कर देते है उनके कार्यो को समझने की कोशिश नहीं करते है। 

        लोग परिवार चाहते है लेकिन परिवार के कार्यो को महत्व नहीं देते है। उन्हें उनके हर काम में कमियां दिखाई दे रही होती है। उनका  परिवार के प्रति कड़वाहट से मन भरा होता है। 

        बुरा व्यवहार करने वाले लोग कुछ होते है। जबकि परिवार के अच्छे कार्यो को भी महत्त्व देने से सभी डरते है। जब परिवार से दूर हो जाते है तब उन्हें परिवार का महत्त्व समझ आता है। यदि परिवार में रहते हुए ही उसका महत्त्व समझ जाये तो सभी का जीवन ख़ुशी से भर जाये। 

     आजकल सिंगल परिवार होते है बच्चे और बड़े दोनों परस्पर बेजार होते है। वे एक दूसरे को कड़वे शब्द सुनाने से नहीं चुकते। जब बड़े हो जाते है तब उन्हें बड़ो के हर काम में कमियां दिखाई देती है।

        बचपन का विरोध सहनीय  हो जाता है क्योंकि हम सोचते है उन्हें दुनियां की समझ नहीं है  वे हमसे अलग होकर कहाँ जायेंगे। 

      बड़े होने पर उन्हें दुनियां की इतनी अधिक समझ आ चुकी होती है कि उन्हें बड़े दुनियां के सामने कमतर नजर आने लग जाते है। 

         हम जिनके साथ रहते है उनके साथ प्यार के बंधन में बंधे होते है। इस बंधन की डोर पतली होती है लेकिन जिस प्यार के धागे से बंधी होती है उसे हम नजरअंदाज कर जाते है। 

        उस डोर को तोड़ देते है डोर टूटते ही दुनियां की सच्चाई सामने आती है। लेकिन जब तक डोर  से जुड़े होते है तब तक उसका महत्व नहीं समझ पाते  है। इसकी समझ बरसो बाद आती है  तब बहुत देर हो चुकी होती है। काश हम समय रहते ही उस डोर का महत्त्व समझ लेते। 

#families break up due to anger and pride

    तलाक श्रृंखला 

 गुस्से और घमंड के कारण टूटते परिवार 

   इंसानी आदत ऐसी होती है। लोग मन से दुखी होते है उस दुःख से बाहर निकलना चाहते है लेकिन अपने घमंड के कारण झुकने के लिए तैयार नहीं होते। ऐसे में उन्हें घर में रहना ,खाना और पीना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा होता है। लेकिन घमंड के कारण सब कुछ खत्म कर लेते है। पर शब्दों के माध्यम से सामने वाले को माफ़ करने के लिए तैयार नहीं होते है। 

         मैंने ऐसे इंसान भी देखे है  जो सामने वाले की एक गलती  माफ़ नहीं कर पाते  और पूरा जीवन अलग रहते हुए  छटपटाते रहते है।

        वे एक बार झुकना नहीं चाहते बल्कि दुसरो की सुखी जिंदगी को देखकर जलते रहते है। वे एक बार भी  नहीं समझ पाते ,उन्हें   जिनकी   जिंदगी सुखी लग रही है। उन्होंने जीवन में बहुत समझौते किये होते है। उन्हें सुख थाली में परोस कर नहीं मिले बल्कि इसके लिए उन्होंने खुद  बहुत प्रयास किये है।  

     लोग सुख की उम्मीद ऊपर वाले से करते है। वे पूजा पाठ  के माध्यम से हर समय भक्ति में लगे रहते है लेकिन जिसके सामने आकर  शब्दों को संभालने की जरूरत होती है उसके सामने आने से भी कतराते है उनका मुँह भी नहीं देखना चाहते  ऐसे में  वे अपने जीवन को खुद ही यातनामय बनाते चलते है।

        उसके  लिए प्रयास करने वाले भी उन्हें दुश्मन लगने लगते है। उनपर भी गुस्सा उतारने में उन्हें देर नहीं लगती। वो कुछ समय बाद बहुत चिड़चिड़े हो जाते है। उनके सामने आने से शुभचिंतक भी डरने लगते है। वे अपनी जिद के कारण अपने आप और सभी को नुकसान पहुंचा रहे होते है। 

      अपनी इस आदत के कारण एक दिन वे एकाकी हो जाते है। उस समय वे ऐसे लोगो को ढूंढ  रहे होते है। जिससे वे अपने मन की बात साझा कर सके लेकिन  वे इस समय तक अपने सभी हमदर्दो को खो चुके होते है। क्योंकि कब तक  कोई अपना अपमान करवा सकता है। हर चीज की एक सीमा  होती है। 

    उस सीमा  के खत्म होने से पहले संभलने  में  बुराई नहीं है। आप एकाकी रहकर दुखमय जीवन बीता कर अकेले मौत को गले लगाओ। इससे अच्छा है सामने वाले को माफ़ कर दो। 

        इससे अच्छा है सम्बन्धो को सुलझाने के लिए कदम उठाये जाये।  जिंदगी हमे एक बार मिली है। उसे हर समय दुःख में बिताने की जगह कुछ झुक जाये ,यदि सामने वाला झुकने के लिए तैयार है। उसे माफ़ करने में कोई बुराई नहीं है।

         भारतीय समाज में एक का दुःख पुरे परिवार का दुःख होता है ऐसे मे  अपने जीवन में खुशियां वापिस लाने  में कोई बुराई नहीं है।  

#EXPRESS LOVE THROUGH FOOD

 तलाक श्रंखला 

      खाने के माध्यम से प्यार का इजहार 

  जो लड़कियां प्यार करके शादी करती है। वे बहुत लाढ -प्यार  से पली  होती है। उनपर घर की जिम्मेदारी का बोझ डाला नहीं जाता बल्कि सपनो की दुनियां में पलने वाली लड़कियां होती है। जब ससुराल में आकर उन्हें सारी  जिम्मेदारी संभालने के लिए कहा  जाता है। तब  वे एकदम धरती पर आ गिरती है।

         वे घर के काम संभालने की कोशिश करती है। लेकिन काम में गलती होती जाती है क्योंकि उससे पहले उन्होंने काम नहीं किया होता है। क्योंकि पहली बार काम में गलती सभी से  होती है। मायके में यदि बेटियां काम करे तो गलत काम पर भी कोई उसके  काम में नुक्स नहीं निकालता जबकि ससुराल में सही काम में भी  नुक्स ढूंढे जाते है  उस समय उसका मजाक उड़ाया  जाता है। उनका अनेक प्रकार से अपमान किया जाता है तब उनके अंदर की ख़ुशी और  आत्मविश्वास खत्म होता जाता है।

      यहां तक जब उसके हाथ का बनाया हुआ खाना ठुकरा कर या फेंक कर चले जाते है। कई बार तो खाना फेंकते समय इतना भी नहीं सोच पाते कि  उस थाली से बहु को चोट तो नहीं लग रही. माना  ख़राब खाना खाना  सबके बस की बात नहीं होती लेकिन उस अनजानी  लड़की की भावनाओ को समझने की कोशिश कितने लोग करते है। जिसने पहली बार  सबको खुश करने के लिए खाना बनाने  की कोशिश की होती है।    सोचो उसका कैसा हाल  होता होगा।

         वह पति जो शादी से पहले प्राण देने के लिए तैयार रहने की कसमे  खाता  था। जब वही अपमानित करने वालो में शामिल हो जाता है तब उसके दिल पर क्या गुजरती होगी। वह उसके बाद जिंदगी भर खाना बनाने का विश्वास  अपने अंदर नहीं जुटा  पाती। 

     मैने  ऐसी औरते भी देखी  है। जो ऐसे माहौल के बाद कभी भी खाना नहीं बनाती।  यहां तक उस इंसान से पैदा हुए बच्चो को  भी खाना बना कर देने के लिए तैयार नहीं होती। उस बच्चे की सारी  जरूरते पापा पूरी करते है  यहां तक ऐसे घरो में  बेटी की जिम्मेदारी भी माँ नहीं लेती । वह उस बेटी को भी बाप के भरोसे छोड़ कर उसी घर में रहते हुए अपनी जिंदगी जीती थी। उसका सारा मोह खत्म हो जाता है।  . 

     वे सारी  जिंदगी नौकरानी के हाथ से खाना बनवाती है। जब काम वाली नहीं आती तब बाहर जाकर या बाहर से खाना मंगवा कर खाती  है। पुराने समय में तलाक नहीं होते थे लेकिन उस जमाने में भी घरो में तलाक जैसा माहौल देखा जा सकता था। 

      इसके बाद  यदि  पति अपने कृत्य की सारी  जिंदगी माफ़ी मांगता रहे। लेकिन उसे माफ़ी नहीं मिलती ।

      आज के समय  औरत अपना बदला तलाक लेकर पूरा करती  है।  कुछ समय बाद किसी अन्य के संग फिर से गृहस्थी बसा लेती है।

       दोनों तरीके मेरे हिसाब से गलत है। आपको क्या सही लगता है सोच कर देखो ?

#THE PAIN OF HAPPINESS BEHIND WHICH IS NO LONGER AVAILABLE

 तलाक श्रंखला 

              पिछले सुख का दर्द 

  हम अपने अब के दुःख से जितने दुखी होते है। उससे ज्यादा अपने पिछले सुख से भी दुखी होते है। जो हमे अब नहीं मिल रहा। मेरी सखी बताती है। मैं  अपने पति के साथ शादी से पहले  जब भी घूम रही होती थी तब वह जहां फुलवाला दिखाई देता था तो मुझे गाड़ी रोककर फूल खरीद कर  देता था। यदि उसकी निगाहो से फुलवाला ओझल हो जाता था। मेरे याद  दिलाने पर गाड़ी मोड़कर वापिस उसके पास जाकर फूल खरीदकर देता था। 

       शादी के बाद मेरे फूल मांगने के बाद भी  कभी फूल खरीद कर नहीं देता था । उसे मेरा बचपना कहकर टाल  देता है। 

     शादी से पहले उसके पति का घर शाहदरा में था। करोलबाग के विद्यालय में  नौकरी करती थी। उसका मायका जनकपुरी में था। उसका पति उसे छुट्टी होने पर रोज करोलबाग से जनकपुरी छोड़ने जाता था। उसे उस समय अपने आराम की कोई चिंता नहीं थी। आप सोच कर देखिये शाहदरा से करोलबाग होते हुए जनकपुरी जाने में कितना समय लगता होगा। 

       शादी के बाद उसने शाहदरा में स्थानांतरण करवा लिया। उसके ससुराल से विद्यालय का रास्ता मुश्किल से अपनी गाड़ी से केवल 5  मिनट का  था। लेकिन उस 5  मिंट का समय उसके पति के  पास नहीं था। जब सुबह गाड़ियां नहीं मिलती तब वही 5  मिनट  का रास्ता कितने घंटो में बदल जाता है सोच कर देखिये।  उसके साथ ही घर में खड़ी हुई गाड़ियों और  सोते हुए लोगो को देखकर कितना गुस्सा आता होगा। 

     भारत में रहने वाले अधिकतर पतियों का यही हाल  होता है। शादी से पहले जिसे इतने अधिक सपने दिखाए होते है उसके सपने शादी के बाद  एक- एक  करके  तोडना शुरू कर दिया जाता है। उस हाड़मांस की लड़की को सब पत्थर की समझने लग जाते है।

        जिस लड़की का दिल शादी से पहले किसी ने नहीं तोडा होता। उसका दिल पल -पल टूट रहा होता है। वह सिसक रही होती है। उसके आंसू निकल रहे होते है।  लेकिन उन आंसुओ को मगरमच्छ के  आंसू समझे जाते है। 

    उस औरत की टूटन एक दिन परिवार को भी तोड़ सकती  है।  .इसका अहसास उसके घर में रहते हुए किसी को नहीं होता।जब वह इसे बर्दास्त नहीं कर पाती  .घर छोड़कर चली जाती है। 

      उसके जाने के बाद उन दिनों को वापिस पाना बहुत कठिन होता है। धीरे -धीरे वह भी पति के लिए कठोर होती जाती है। उसके आंसू उसकी अपनी आंख से नहीं निकल रहे होते बल्कि वह पूरे  परिवार की आंख से निकलवा रही होती है।  समय रहते उसके आंसुओ के दर्द को समझो। 

   

# INDIAN MEN AND WOMEN OF TODAY

            भारतीय पुरुष और आज की नारी 

         मै  आपको समाज में हो रहे तलाक पर लड़कियों का  नजरिया बताना चाह  रही हूँ। समाज में होने वाले तलाक से लड़कियां,लड़के या उनके परिवार वाले सभी दुखी होते है। अभिभावक  अपने बच्चो से जुड़े होते है। उनके दुःख अभिभावकों को भी परेशान कर देते है। उनका दुःख केवल उनका नहीं होता। बल्कि पूरा परिवार इसे झेल नहीं पाता  है। 

       दूर के लोग इससे खुश भले हो। लेकिन परिवार वाले हर हालत में दुखी हो जाते है। उनका दुःख बच्चो के दुःख से भी बड़ा होता है। क्योंकि बच्चे  केवल अपने बारे में सोचते है। उनकी सोच में उनका परिवार शामिल नहीं होता। इस तलाक का असर बहुत सारे  लोगो पर पड़ता है। इसलिए मै किसी परिवार को टूटने से बचा पाई तो इससे बड़ी ख़ुशी मेरे लिए नहीं होगी। 

      मेरी एक सखी ने अपनी  पसंद के इंसान से  शादी की थी। हम सोच रहे थे उसका जीवन खुशियों से भर जायेगा लेकिन  वह शादी के बाद बहुत परेशान रहने लगी। उसे देखकर उससे परेशानी का कारण पूछा, तब  उसने बताया -" मै  घर से रोज भूखी आती हूँ।  चाय भी नहीं पी  सकती।" उस पर हमें बहुत हैरानी हुई। तब  उसने कहा-" मेरी ससुराल में सारी  चीजे सुबह बिलकुल ताजी  इस्तेमाल होती है। रात  को दूध भी बचाया नहीं जा सकता। मेरे कहने के बाबजूद कोई मेरी बात सुनता ही नहीं है। इतनी जल्दी सुबह दूध वाला आता नहीं है। तो क्या बनाऊँ  या खा कर आऊं." उसकी ससुराल में कोई  बदलने के लिए तैयार नहीं था। 

     आखिर कार  वह ससुराल वालो से अलग होकर पति के साथ रहने लगी।

        पति के साथ अलग रहकर भी उसका दुःख कम नहीं हुआ क्योंकि उसका पति  MBBS  डॉ था। डॉ को अच्छी नौकरी MD  करने के बाद ही मिलती है उससे पहले उसे सही नौकरी नहीं मिल पाती  है। जबकि  वह सरकारी विद्यालय में   अध्यापिका थी  इस कारण यदि  वह कभी पति से पैसे मांगती तब वह देने से इंकार कर देता या  उसका पति कहता -'अपने बैंक से निकलवा लो।'क्योंकि उसके पास अच्छी नौकरी नहीं थी।  

        घर के कामो में भी कोई सहायता नहीं करता था। जब वह सुबह उठ कर घर के काम कर रही होती तब वह सोता रहता। कभी किसी तरह की मदद नहीं करता था। देर होने पर विद्यालय तक छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं होता था। 

       तब उसने कहा  -इस रिश्ते में बंधे रहने का क्या फायदा। जब पतिदेव किसी तरह की मदद नहीं करते। उनसे अच्छे पैसे मै  कमा लेती हूँ।

 उसके बाद वह पति से हमेशा के लिए अलग हो गई। मुझे  शुरू में  उसके निर्णय से हैरानी हुई थी। लेकिन आज हर तरफ ऐसा माहौल ही दिखाई दे रहा है। मुझे लगता है  नौकरीपेशा औरत को घर से जोड़ने का कोई कदम परिवार वालो को उठाना पड़ेगा।  परिवार में रहते हुए अकेले जिम्मेदारी उठाना उस नाजुक कली  के बस की बात नहीं है। 

      

papa"s angel or maid

         पापा की परी  या नौकरानी 

  पहले समय में लड़कियों को घर के काम  संभालने के हिसाब से पाला  जाता था। उनसे नौकरी की उम्मीद नहीं की जाती थी। इसलिए उन्हें घरेलू  काम में दक्ष होने पर जोर देते थे। लड़कियों का   सुदर और काम में निपुण होना काफी होता था। लेकिन आजकल लड़के वाले लड़कियों से  नौकरी करवाना पसंद करते है 

        .लड़कियों को नौकरी उनके लड़की होने के आधार पर नहीं मिलती बल्कि उनके अंदर काबिलियत भी लड़को के बराबर देखी  जाती है। इसलिए लड़कियों को घरेलु काम

 सिखाना  इतना जरूरी नहीं समझा जाता बल्कि उसको पढ़ने  लिखने के लड़को के बराबर अवसर दिये  जाते है। जिसके कारण अधिकतर लड़कियां घरेलू काम नहीं सीख पाती। लेकिन ससुराल में जाने के बाद उन्हें मायके जैसा माहौल नहीं मिलता। उसे घर की हर जिम्मेदारी का भार  अकेले सहने के लिए मजबूर किया जाता है। लड़को के बारे में मानसिकता अब भी हजारो साल पुरानी  है। कि  लड़को को घर के काम नहीं करने चाहिए।  तब लाढ -प्यार से पली  बेटियों को ससुराल जेल लगने लगती है।

          उन्हें वहां उन्हें अपनेपन का अहसास नहीं होता है। वे उस कैदखाने से निकलने के  लिए छटपटाने लगती है। क्योंकि उनके बराबर पढ़ाई  करके और नौकरी करने के बाद लड़के यदि पानी भी अपने हाथ से पी  लेते है तो उनकी पत्नी कामचोर समझी जाती है। ऐसे मै  घर -परिवार के साथ नौकरी की जिम्मेदारी अकेले उठाना उसे सजा लगने लगती है। शादी होने के बाद भारतीय पति  को अधिकतर  लगता है। मेने शादी कर  ली मेरी जिम्मदेदारी पूरी हो गई अब ये कैसे भी घर संभाले , मुझे सोचने की जरूरत नहीं है। 

      इतने अधिक काम की जिम्मेदारी वह अकेले उठा नहीं पाती क्योंकि उसने इससे पहले कभी इतना अधिक काम नहीं किया होता है।  आज के जमाने में पति -परमेश्वर के रूप में नहीं देखा जाता। उसे भी अपने समान इंसान समझा जाता है. औरते अकेले सारी  जिम्मेदारी उठाते हुए गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो जाती है। पापा की परी   नौकरानी से बदतर समझी जाने लगती है।

        आजकल इसलिए बहुत सारी लड़कियां शादी नहीं करना चाहती। उन्हें पता है ससुराल स्वर्ग का द्वार नहीं है। जो लड़कियां शादी कर लेती है। वे जल्दी ही इस से बाहर  निकलना चाहती है। क्योंकि आसपास तलाक को बुरा नहीं समझा जाता।  .अकेले लड़कियों का रहना हिकारत की निगाह से नहीं देखा जाता। इस कारण बहुत सारे  परिवार टूटते दिखाई  दे रहे है। 

    अब हमे खुद ही सोचना पड़ेगा हम अपनी मानसिकता बदले या अपने परिवार को टूटने दे।   

#importance of love

   


                        

   







   प्यार की महत्ता 


     भारतीय परिवेश में दम्पत्ति का प्यार जताना बेशर्मी कहलाता है। जिसके कारण बाहर समाज में आते समय वे दर्शाते है जैसे वे परस्पर अजनबी है। जिसके कारण उनके बच्चे भी अभिभावकों के सम्बन्ध के बारे में नहीं जान पाते।  ऐसा ही एक संयुक्त परिवार का उदाहरण देने जा रही हूँ। 

     उस परिवार में जब दो भाई -बहनो ने घर में हो रही शादियों के बारे में आपस में बात करते हुए पूछा-" यहाँ सबकी शादी होती है। हमारे मम्मी  पापा की शादी क्यों नहीं होती है।" क्योंकि हमारे समाज में बच्चो को समझाया ही नहीं जाता।  तब उनकी बात सुनकर हंसी भी आयी क्योंकि संयुक्त परिवार में रहते हुए उनका अधिकतर समय अपने दादी -बाबा के साथ बीतता था। 

       मेने कभी अपने मम्मी -पापा या सास -ससुर को परस्पर हाथ पकड़े नहीं देखा था। इस कारण में भी कभी कमरे से बाहर पति का हाथ नहीं पकड़ सकी।

        एक बार कश्मीर में फोटो खिचवाते समय फोटोग्राफर ने जब मुझे इनका हाथ पकड़ने के लिये  कहा तब मुझे बहुत अजीब लगा। उसके बहुत  जोर देने पर जब हाथ पकड़ा तो एक अलग सा अहसास हुआ। जो इतनी पाबंदियों में रहते हुए कभी नहीं हुआ था।

          भारत में रहते हुए हम इतना  अधिक नियंत्रण  रखते है। कि कोमल भावनाओ का अहसास करना भूल जाते है। धीरे -धीरे जीवन में रूखापन उभरता चला जाता है।

      जब में पोर्टब्लेयर  मे समुद्र के   किनारे घूम रही थी तब हाथ पकड़ने पर आत्मविश्वास बड़ा क्योंकि जब लहरे आकर वापिस लौटती है तब वापिस जाते हुए पैर  के नीचे  की रेत  भी ले जाती है। जिसके कारण गिरने और बह  जाने का डर  लगता है। 

   पोर्टब्लेयर में बहुत सारे नवविवाहित जोड़े घूम रहे थे उन्हें देखकर हमारे अंदर  जो  प्यार सूख चुका   था वह अहसास जग उठा।जीवन में प्यार का अलग महत्व है उसे नकारते रहने से किसे सुख मिलता है। सोच कर देखो ? 

       मै  सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ। जो प्यार हमारे अंदर होता है। उसे बाहर दिखाने  में बुराई नहीं है। क्योंकि आजकल तलाक बहुत हो रहे है लोग अपनी नफरत को उजागर कर देते है। लेकिन प्यार और अपनापन दर्शाने से झिझकते है। 

#show love

                               प्यार को दर्शाना  

   

   पहले समय में दम्पत्ति आपस में कितना भी प्यार करते हो लेकिन कभी जताना पसंद नहीं करते थे। बल्कि अपनी भावनाओ को मन तक सीमित  रखने में शान समझते थे। वे शब्दों में ऐसा महसूस करवाते थे जैसे उनका साथी उनपर बोझ है। या उसके साथ रहकर वह  उसपर  अहसान कर रहे है। शब्दिक प्यार कभी दिखाई नहीं देता था। औरत का प्यार तो कभी  दिखाई भी दे जाता था।  लेकिन आदमी हमेशा अपनी पत्नी को जूते  की नोक पर रखता है। यही साबित करने में जिंदगी बीता  देता था। उस जमाने में तलाक नहीं होते थे इसलिए पत्नी अवांछित महसूस होते हुए भी जिंदगी उसी घर में बीता देती थी। 
      मेने ऐसे आदमी  भी देखे है। जो नौकरी खत्म होने के बाद भी इधर -उधर बैठ कर रात  12  बजे घर में घुसते थे। उनके लिए समय पर घर आना शर्मिंदगी का कारण था । ऐसे में औरते भी पूरी तरह आजादी महसूस करती है। उनके ऊपर बड़ो का अंकुश न रहने के कारण, वे भी आजादी के साथ किसी और से संबंध बना सकती है। जब उनके  पति की   आंखे खुलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 
        यदि एक आदमी औरत को पटाना  चाहता है तो उसे इसके लिए काफी प्रयास करने पड़ते है। लेकिन औरतो के लिए एक मुस्कुराहट ही काफी है।  ऐसे समय औरतो को नजरअंदाज करना कितना सही है सोच कर देखना ?
     मेने आदमियों को पत्नी के न रहने पर बौराया हुआ देखा है। उनका सारा आत्मविश्वास खत्म होते देखा है  लेकिन जब तक पत्नी सामने रहती है। उसे अपमानित करने में शान समझते है। उनके जाने के बाद उनकी तारीफ के पुल  बांध रहे होते है। यदि यही तारीफ पहले हो जाती तो उनके साथी को  कितनी ख़ुशी मिलती इसे सोच कर देखो ?  साथी के जाने के बाद मुझे नहीं पता उनके ये प्यारे शब्द उनके साथी तक पहुंच भी पाते  है या नहीं। इसलिए समय रहते चेत जाओ। 
      पहले जमाने में मायके में भी लड़कियों को इज्जत नहीं मिलती थी। इसलिए ससुराल में कितना भी अपमान मिले  वह सह जाती थी लेकिन आजकल लड़कियों को मायके में इतना अपमान नहीं मिलता। उनपर प्यार की बौछार हो रही होती है। इसलिए वे ससुराल में रहकर अपमान नहीं झेल पाती  है। 
      यदि लड़की नौकरीपेशा है तो उसे आर्थिक तंगी नहीं होती। पैसे से मिलने वाला सम्मान भी वह अपने दम  पर पाती   है इसलिए उसके लिए तलाक लेते देर नहीं लगती है। 
       यदि आप अपने साथी को प्यार करते हो तो उसे दर्शाना  सीखो वरना  परिवार टूटते देर नहीं लगेगी। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...