#abrogation of right to do (justice karnan)

 जस्टिस कर्णन  को दी गयी सजा मुझे    भ्रस्टाचारीयो को बेनकाब किये जाने का बदला लग रही हे। उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री जी को चिट्ठी में भ्रस्टाचारीयो के नाम लिख कर भेजे थे। उस पर उचित कार्यवाही नहीं की गयी बल्कि पदस्थ जस्टिस पर मानहानि का मुकदमा चला दिया गया। यदि वे गलत होते तो सबसे पहले प्रधानमंत्री को पत्र से इत्तिला नहीं देते। उन्होंने कुछ देखा था तभी इतना बड़ा कदम उठाने का फैसला किया।
 
    उनके साहस को दाद देने का मन करता है। जिन्होंने भ्रस्ट जजों के खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटाई। मेरा किसी तरह से जजों से वास्ता नहीं पड़ता लेकिन आस -पास से उड़ती खबर सुनाई देती है। जिससे मुझे जजों की ईमानदारी पर शक होता है। बहुत कम लोग अपने पेशे के लोगो का पर्दाफाश करने की कोशिश करते है। वरना सभी को लगता है यदि सामने वाले पर कीचड़ उछालेंगे तो छींटे हम पर भी गिरेंगे। उन्ही छीटों का सामना कर्णन को करना पड़ रहा है
        उनसे कहा जा रहा था यदि तुम खुद को मानसिक बीमार मान लो तब  तुम्हारे ऊपर कार्यवाही नहीं की जाएगी। उन्हें अनेक तरह से अपमानित किया जा रहा है। उनकी सेवानिवृति जून में होनी है। उनकी सेवानिवृति का इंतजार भी नहीं किया जा सका।
       पहली बार पदस्थ जस्टिस को इतनी बड़ी(6 महीने जेल ) सजा मानहानि की दी गयी है। मानहानि के लिए ये सबसे बड़ी सजा है। कोई भी जज मानहानि के दायरे में आकर सलाखों के पीछे जायेगा इससे पहले किसी ने सोचा भी नहीं था। ये कलकत्ता हाईकोर्ट के जज है। इससे पहले जो भी जज कानून के दायरे में अपराधी साबित हुए वे पैसो के कारण अपराधी साबित हुए। इनपर इस तरह का कोई आरोप साबित नहीं हो सका।
     जज की परीक्षा को पास को मानसिक बीमार कभी नहीं कर सकता। इतनी बड़े पद तक पहुंचने वाले को मानसिक रोगी करार देने की कोशिश करना। न्यायव्यवस्था की कमी है
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