#national policy for women 2016

              औरतो के लिए राष्ट्रीय नीति 2016 

 आजकल महिलाओं को सबल बनाने के प्रयास हर तरफ दिखाई दे रहे है। अमीर  गरीब सब अपनी बेटियों को सक्षम देखना चाहते है। अब केवल उनकी शादी की चिंता घरवालों को परेशान नहीं करती वे सारी  जिंदगी उनकी शादी के लिए जोड़ने के साथ बेटी की पढ़ाई  लिखाई  पर भी जोर दे रहे है।
         बहुत कम घरों में लड़कियों को बिना पढ़ाए  रखा  जाता है। अब ऐसी लड़कियों के विवाह में बहुत परेशानी होती है  .उन्हें अच्छा परिवार नहीं मिल पता। 
      सरकार की निशुल्क शिक्षा के कारण अधिकतर घरों में लड़कियों को विद्यालय भेजा  जा रहा है। विद्यालयी शिक्षा के आलावा लड़कियों को ऊँची शिक्षा में भी पैसो की सहूलियत दी जानी  चाहिए। उनकी ऊँची शिक्षा पर परिवार वाले आसानी से व्यय करने के लिए तैयार नहीं होते। उनके शब्दों में उलाहना रहता है। इतनी  पढ़ाई काफी है। तेरी शिक्षा बहुत हो गई अब  शादी के लिए भी हमे बहुत खर्च करना है। 
     लड़कियां बहुत  मेहनती होती है  वे घर के काम के साथ पढ़ाई में अच्छे अंक ला  रही है। लेकिन नौकरी में उनका % बहुत कम है। इसका कारण ऊँची शिक्षा का अभाव  है। 
    नौकरी के लिए फार्म की कीमत और उसपर खर्च करने के लिए अभिभावक तैयार नहीं होते है। यदि महिलाओं को नौकरी के फार्म पर शुल्क अनुसूचित जाती के लोगो की तरह माफ़ कर दिया जाये तो अच्छे परिणाम दिखाई देंगे। 
       
नौकरी के लिए कोचिंग की निशुल्क व्यवस्था भी सुखद परिणाम लाएगी। यदि नौकरी में ३३ % का कोटा बन जाये तो उनकी तरक्की के अवसर बढ़  जायेंगे।
       एक महिला की शिक्षा तीन  परिवारों की इज्जत बढ़ाती  है। पहला मायका ,दूसरा ससुराल ,तीसरा उसका पूरा योगदान उसके परिवार को मिलता है। शिक्षित और स्वावलम्बी औरत अपने बच्चों को भी शिक्षित और स्वाबलम्बी बनाती  है। उसका पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित होता है। 
     वह अपने परिवार को अच्छा भोजन देने में सक्षम हो जाती है। सस्ता और पोषक खाना  परिवार को देती है जिससे कमजोर  और बीमार परिवार नहीं होता है 
वह जैसा भोजन बेटे को देती है वैसा ही भोजन बेटी को भी मुहैया कराती है। जिससे  उसका शारीरिक विकास उत्तम होता है 
   स्वाबलम्बी महिलाएं अपनी बेटी को संसार में लाने की सामर्थ्य रखती है। गर्भ में ऐसी औरतो की बेटियों का शमशान नहीं बन पाता  है। वे बेटियों को दुनियाँ  में लाने  के लिए ज़माने से टकरा जाती है। आपको कई उदाहरण दिखाई देंगे जिसमे बेटियों के हित की खातिर औरतो ने पति से बगाबत की। 
      यदि माँ -बेटी स्वावलम्बी होंगी तो बेटी की शादी में ज्यादा खर्च यानी दहेज़ की मांग भी नहीं की जाती। मुझे आज भी दुःख होता है। जब भारतीय शादी में लोग अपनी जिंदगी भर की पूंजी लगा देते है। उसके बाद लड़के और लड़कियों के परिवार पूरी तरह से खाली  हो जाते है। मै चाहती हुँशादी सीधी - सादी ,कम खर्च वाली हो जितना पैसा परिवार वाले वाह -वाही में लूटा  देते है  वह बच्चों के नाम से जमा करवा दिया जाये।   जो  उनकी उन्नति के काम आ सके।पाकिस्तान की शादियों में अधिक खर्च करने पर पाबंदी है। वहाँ विवाह समारोहों में केवल एक भोजन परसा  जाता है। अमीर -गरीब सभी के लिए सामान नियम लागु है। सानिया मिर्जा की शादी के समय पाकिस्तान  में केवल पुलाव की दावत हुई थी। भारतीयों के लिए ये हैरानी का सबब बन सकता है। क्योंकि भारतीय शादी में खाने में बहुत ज्यादा व्यय होता है जितना खाना खाया जाता है। उससे कही ज्यादा भोजन बर्बाद होता है जबकि बहुत सारी आबादी को पेट भर भोजन नहीं मिल पाता है। 

        शिक्षित और स्वावलम्बी महिलाओं के बच्चे भी कम  होते है। इससे भारत की अधिक  जनसंख्या की समस्या भी खत्म हो जाएगी।  
उन्हें स्वास्थ्य योजनाओं का अधिक लाभ मिल सके। जिससे उनकी मृत्यु दर  में कमी आ जाये। आज भी पिछड़े इलाको में औरतो की मृत्यु बहुत होती है। 
       स्वावलम्बी महिलाओं में आत्मविश्वास होता है। जिसके कारण बहुत सारी समस्याओं का समाधान खुद कर लेती है। वे किसी पर निर्भर नहीं रहती है। वे समाज के उत्थान में सहायक होती है। उनका स्वावलंबन समाज और परिवार की  आर्थिक उन्नति में सहायक होता है। 
    औरतो को सुरक्षित माहौल देने की कोशिश की जानी  चाहिए।  उनको नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था दी जानी चाहिए। ताकि हमारी 50% आबादी देश और समाज के उत्थान में बराबरी का सहयोग दे सके।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...