#adhunikta or safai

                                 आधुनिकता और सफाई 

 
 भारतीय सभ्यता अति प्राचीन सभ्यता कहलाती है।  हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता  में सफाई और नालियाँ  विकसित और ढकी हुई थी।  मोहनजोदड़ो की सभ्यता लगभग ८००० साल पुरानी  है। उसे शहरी सभ्यता कहा जाता है। 
       पुराने समय में सरकार की तरफ से सफाई का पर्याप्त बंदोबस्त नहीं किया जाता था बल्कि हर घर में कचरे का निपटान किया जाता था। आज आपको इस बात पर यकीन करना मुशकिल लग रहा होगा लेकिन हमारी भारतीय सभ्यता में  पशु -पक्षियों को समान महत्व दिया जाता था। रसोई  से निकलने वाले छिलके और  खाद्य -पदार्थ पशुओं के खाने के काम आते थे । कृषि के सहारे पशुओं को पालने में ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता था। . पशुओं के लिए अलग से कुछ जुटाना नहीं पड़ता था। उनके द्वारा दूध -घी घर का और शुद्ध मिल जाता था। 
     कुछ घरों में मुर्गिया और बतख पाली जाती थी। बकरी और सूअर के द्वारा उनकी मांसाहारी  जरूरतें पूरी हो जाती थी। उनके लिए कुछ अलग से इंतजाम नहीं करना पड़ता था। हमारे खाने में से ही उनका गुजारा हो जाता था। 
      आप अपनी दादी -नानी का समय याद करके देखिये उनके समय में हर रोज शहरो में भी एक गाय और कुत्ते की रोटी निकलती थी। पक्षियों के लिए भी दाना  डाला  जाता था। 
        आज अच्छे इलाको में जानवरों को रखना कोई पसंद नहीं करता जबकि कुत्ते अमीर  घरों की शोभा बढ़ा  रहे है। जानवर भी कचरा निपटाने में सहयोग देते है.आज .जब तक हरा भरा खाना जानवरों तक पहुंचता है तब तक वह सड़ चुका होता है। बदबू आने के कारण कोई उसे अपने जानवरों को खिला कर बीमार नहीं करना चाहता। 
         गाँव के घरों में शौचालय नहीं बनाये जाते थे बल्कि सभी गांवों  में शौच के लिए खेतों में  निश्चित जगह बना  दी जाती थी। गांव के सभी लोग वहाँ जाकर शौच करते थे। काफी समय तक ये वहाँ पड़ा  रह कर खाद में बदल कर   जमीन की पोषकता बढ़ाता  था। 
      प्राचीन समय में भारत की जनसंख्या बहुत कम थी। इस कारण कचरा निपटान बहुत बड़ी समस्या नहीं थी। आपने अपने घरों में पूजा से सम्बंधित सामान नदियों में विसर्जित होते देखा होगा। उस ज़माने में जलीय जीव -जन्तुओ का ध्यान रख कर , पूजा सामग्री को किसी के द्वारा अपमानित होने से बचाने के लिए, उसे जल में जीव -जन्तुओ के उपयोग का साधन बना  दिया गया। लेकिन पूजा की सामग्री और मूर्तियाँ (प्लास्टर औफ  पेरिस ) इतनी अधिक संख्या में उपयोग होने लगी कि  उनके कारण नदियों का पानी  विषाक्त हो गया।
         पहले पूरे  इलाके में एक मंदिर या मूर्ति के द्वारा उत्स्व का आयोजन होता था लेकिन अब हर घर में मंदिर की स्थापना और बहुत सारे भगवान की मुर्तिया और हर बार मूर्तियों के बदले जाने के कारण उनका निपटान करना भी अब समस्या बन गया है। 
       भौतिकवादी सभ्यता के कारण जिंदगी दिखावा बन गई है। हम अपनी जरूरत से ज्यादा चीजों का प्रयोग करके समस्या पैदा कर रहे है। 
        अंग्रेजी सभ्यता के द्वारा हमने   इलाके की गंदगी, नालियों के द्वारा दूर ले जाकर नदी में बहा दी जाये सीखा । इतनी अधिक जनसंख्या की गंदगी जब नदियों में मिलने लगी तब नदियाँ  भी गंदे नाले में बदल गई। आप किसी भी मैदानी इलाके की नदी में जाकर नहाने की हिम्म्त नहीं जुटा  पाएंगे। हमें नहाने के लिए अब तालाबों की जरूरत महसूस होती है या साफ पानी की। आप दिल्ली में घूमने जायेंगे तब आपको  हर इलाके में गंदे नाले मिल जायेंगे जबकि नहाने लायक एक नदी खोजना मुश्किल है । 
        यदि हम सफाई का महत्व समझेंगे तभी अपने माहौल को साफ रख सकेंगे। हमें प्राचीन सफाई व्यवस्था को अपनाना पड़ेगा। हर इलाके का कूड़ा उसी इलाके में निपटाया जाये। उसे किसी दूर डम्पिंग यार्ड में फेंका ना  जाये बल्कि हर ढलाव में कूडे  से खाद बनाने के लिए साधन बनाए जाये। लोगो को वहाँ  से बनी हुई  खाद  उपयोग के लिए दी जाये। 
      लोगो को  घरों में गमलों में पोधे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाये जिससे खाद का उपयोग हो सके। लोग अपने घरों में सब्जियों के पोधे लगा कर भारत की खाद्य समस्या से जूझने में भी सरकार की मदद कर  सकेंगे। हमें घर की साफ और बिना दबाई  वाली सब्जियां मिल सकेगी ,पैसो की बचत भी होगी ।  
       प्रत्येक इलाके में सरकार की तरफ से पशु -पक्षियों को पालने का केंद्र स्थापित किया जाये। जिससे उस इलाके का हरा कचरा तत्काल जानवरों तक पहुंचकर उपयोग किया जा सके।  हर इलाके और घर  में कचरा निपटान किया जा सकेगा । 
        जैविक कचरे से अलग दूसरे तरह के कचरे को रिसाइकिल करके निपटाया जा सकता है। 
      आप आज से 40  साल पहले का समय याद करके देखिये शहरो में  जितना कचरा आज एक घर से निकलता है उतना पहले 10  घरों में से भी नहीं निकलता था। हमें कचरे को समस्या बनाने की जगह उसका सही उपयोग करके कचरे की समस्या से निपटना चाहिए। तभी भारत "जीरो कचरा" कहला सकेगा। जबकि आज सभी भारत को गंदगी का ढेर समझते है। क्योंकि हमने सारे काम सरकार या दूसरों पर छोड़ दिए है। यदि हर इंसान जागरूक हो जाये तो कचरा निपटाना मुश्किल नहीं है  
        
  

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