#grmiyo me aag

                           गर्मियों में आग 

       
आग आज के जीवन की आवश्यकता बन गई है। लाभ के साथ इसकी हानि के दुष्परिणाम गर्मियों में बहुत ज्यादा दिखाई देते है। एक तरफ आग उगलता सूरज पूरी ताकत से जलाने की कोशिश कर रहा होता है। जिसके कारण वातावरण में नमी खत्म हो जाती है।  थोड़ी सी लापरवाही आग लगने की बड़ी दुर्घटना बन जाती है। 
         दिल्ली में आप इन दिनों बहुत ज्यादा आग लगने के समाचार सुन रहे होंगे।जिसका असर दिल्ली के प्रदूषण पर पड़ा। इसके कारण  दिल्ली में सरकार की ओड -इवन नीति भी बहुत असरदार नहीं रही। दूसरी तरफ  किसानों ने पुआल जला दिए। उसका धुंआ दिल्ली में प्रदूषण को बड़ा गया। 
      आपको सुनकर हैरानी होगी। आग की दुर्घटनाओं से बचाव के लिए बिहार सरकार ने आदेश जारी किया है खाना बनाने का काम सुबह 9 बजे तक पूरा करना पड़ेगा उसके बाद यदि किसी के घर आग जलती दिखाई दी तो उनपर जुर्माना लगाया जायेगा। शाम को 6 बजे के बाद खाना बना सकते है। उससे पहले खाना बनना निषेध है। पहले इस बारे में जानकर मुझे बहुत हैरानी हुई थी क्योंकि शहरो में लोग गर्म खाने के आदि होते है। यहाँ पुरे दिन रसोई में  कुछ न कुछ बनता रहता है। गैस की सुविधा और पक्के मकानों में रहने वाले इस आदेश को तुगलकी फरमान की संज्ञा देंगे लेकिन कच्चे घरों में रहने , चूल्हे और अंगीठी पर खाना बनाने बालों की सुरक्षा के लिए इस तरह के आदेश उचित है।
       हमारे देश में केवल 20 %हरियाली है जबकि ३३% हरियाली होनी चाहिए। हमारी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र में इसे बढ़ाने का बचन दिया था। लेकिन अप्रैल में उत्तराखंड में लगी आग बहुत ज्यादा बढ़ गई इसकी चपेट में हिमाचल प्रदेश ,जम्मू -कश्मीर भी आ गए।  हमारे पौने 8 हजार एकड़ जंगल तबाह हो गए। जो पहाड़ अपने साफ वातावरण के लिए प्रसिद्ध थे। अब वे प्रदूषण की मार से सिसक रहे है। वहाँ साँस लेना भी तकलीफदेह हो रहा है। 
     इतनी बड़ी आग हमारे सरकारी तंत्र की असफलता साबित करती है। जंगलों में रहने वाले आदिवासियों से उनके अधिकार छीन लिए गए। वे भी इस के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ पा  रहे और लापरवाह हो गए  है। आदिवासियों का जीवन जंगलों से जुड़ा होता है। वे जंगलों से जितना पाते  है। उतना उसकी देखभाल करके उसे लौटा  देते है। शहरो में रहने वाले उनके महत्त्व को नकारते आये है। जिसका दुष्परिणाम इतनी भयंकर आग के रूप में हमारे सामने आया है।
      आदिवासियों के  पुरातन ज्ञान को नकारने के कारण  सरकारी तंत्र जंगलों के पनपने और फैलने की सीमा का निर्धारण नहीं कर  सके।  जब एक जगह आग लगी उसको रोकने की किसी ने कोशिश नहीं की। जब तक कोशिश की गई वह असाधारण रूप ले चुकी थी। हमारे पास उस आग को बुझाने के साधन ही नहीं थे। हमारे सरकारी तंत्र ने सजगता नहीं दिखाई।इसकी भयावहता से सब डर  गए। 
       जंगल की आग ऊपरी और निचली सतह, दो अलग -अलग तरह से लगती है। ऊपरी आग  से ज्यादा भयानक निचली सतह पर लगने वाली होती है।  निचली सतह की आग  से जीवतन्तुओ के मरने की  ज्यादा आशंका होती है। आपको सुनकर हैरानी होगी जंगल के जानवर अव सड़कों पर दिखाई देने लगे है जब उनके बसेरे ही खत्म हो गए तब वे कहाँ रहेंगे। 
      जमीन पर पड़े हुए पत्ते जमीन में जल सोखने की क्षमता बढ़ाते है। उनके कारण पानी धीरे-धीरे  से जमीन में चला जाता है।  इस आग के कारण जंगली जीवन के नुकसान के आलावा हमें बाढ़ की भयावहता का सामना भी ज्यादा करना पड़ेगा। 
      कहते है पेड़ों की पुकार सुनकर बादल बरसते है। जंगलों के खात्मे के बाद हमे बारिश का आभाव भी झेलना पड़ सकता है। 
    जंगलों को नियोजित तरिके से बसाना पड़ता है। जिसे आदिवासी हमसे ज्यादा अच्छी तरह से जानते है। तभी अब से   पहले इतनी भयंकर आग कभी नहीं लगी। सरकारी तंत्र को आदिवासियों के ज्ञान का फायदा उठा कर  समायोजन बिठाना चाहिए। आग  से निपटने के लिए सभी तरीकों का एक साथ इस्तेमाल करना भी आना चाहिए। आपने हर साल दूसरे देशो में आग लगने की खबर सुनी होगी लेकिन इतना भयंकर रूप, आग को लेते नहीं सुना होगा।  शायद हमारा सरकारी तंत्र इस घटना से सबक लेकर आगे  से सजग हो जायेगा। 

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