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                                  कुम्भ मेला 

   
   भारत में आठवीं   शताब्दी से कुम्भ मेला भव्य तरीके से  मनाया जाता है। अलग -अलग समूहों ने इसके बारे में अपने मत व्यक्त किये है.  इसके प्रचलन में आदि शंकराचार्य का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके आयोजन में राजा हर्षवर्धन भाग लेते थे। उनके बारे में कहा जाता है। वे इस मेले में अपना सब कुछ दान कर देते थे। 
       समुद्र मंथन के समय अमृत निकलने पर देव और दानव  दोनों में इसे प्राप्त करने की होड़  लग गई। अंतत विष्णु भगवान मोहिनी का रूप धर कर आये। उन्होंने उनसे अमृत बाँटने का अनुग्रह किया देव -दानव  तैयार हो गए। एक पंक्ति में देव बैठे थे दूसरी पंक्ति में दानव। पहले देवताओ को   मोहिनी ने अमृत देना शुरू कर दिया। राहु -केतु को अमृत बंटवारे पर संदेह हुआ। वे चुपचाप देवताओ की पंक्ति में बेठ  कर अमृत पी  गए। जैसे ही देवताओ को इस बारे में पता चला उन्होंने राहु केतु का सिर काट  दिया। अब देव -दानव में युद्ध शुरू हो गया. वे अमृत को लेकर भागने लगे। उनके इस युद्ध के कारण अमृत की कुछ बुँदे हरिद्वार में गंगा नदी  ,प्रयाग में संगम , नासिक में गोदावरी नदी ,और उज्जैनकी शिप्रा नदी  में गिर गई। किंवदंती के अनुसार विशेष समय इनकी नदियों का जल अमृत तुल्य हो जाता है। उस समय स्नान करने से इंसान के सारे पाप धूल जाते है। उसे पूण्य की प्राप्ति होती है। 
     कुम्भ मेला 12  साल ,अर्ध कुम्भ 6 साल बाद,हर तीसरे साल किसी एक  स्थान पर कुम्भ मेला  लगता है। महाकुंभ 144  साल बाद लगता है। यह खुशनसीबो को देखने को मिलता है। इसमें भाग लेने  वाले संसार के सभी मेलो उत्सवों की अपेक्षा बहुत ज्यादा होते है। यह उत्सव 1 से डेढ़  महीने तक चलता है। इसमें इस समय लगभग 3 करोड़ लोग समय अनुसार सम्मिलित होते है। एक दिन में 40 लाख लोग तक यहाँ भाग लेते है। इतनी अधिक संख्या में लोगो के आने से  यहाँ लगता है पूरा एक नगर बस गया है।  
     कुम्भ मेले में पूरे भारत से धार्मिक लोग आते  है। इसमें अलग -अलग अखाड़ों के साधु -सन्यासी भाग लेते है। सभी अखाड़ों के साधुओं को यदि देखना चाहते है तो इससे अच्छा अवसर और कहीं नहीं मिलेगा। इन साधुओं के स्नान करने का समय निश्चित कर दिया जाता है। इसमें सभी अखाड़े अपने पुरे साजो -सामान के साथ आते  है। उनके अद्वितीय करतव भी यहाँ दिखाई देते है। जिन्हे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते है। 
        पुराने समय में शासन का इसके प्रबंध में कोई योगदान नहीं होता था तब इन साधुओं के अहंकार के कारण बड़ी संख्या में लड़ाई और मार -काट होने लगी। जैसे नासिक में 1789  में 12000 लोगो की मृत्यु हो गई। तब से सरकार की देखरेख में इसका आयोजन होने लगा। इतने बड़े आयोजन को सफलता पूर्वक निर्वाह करना दुःसाध्य काम  है। 
    अलग -अलग राशि के अनुसार इनका आयोजन होता है  जब सिंह राशि में कुम्भ मेला लगता है उसे सिंहस्थ कुम्भ कहते है। यह उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे लगता है। इस समय एक महीने के लिए उज्जैन में कुम्भ मेला लगा हुआ है। 
     हिन्दू मान्यता के अनुसार स्नान -दान का बहुत महत्व है। यहाँ पधारने पर आत्मिक शांति का अहसास होता है। हमें लगता है। हम भगवान के करीब पहुंच गए है। यदि मन में अधयात्म में आस्था है तो इसमें जरूर सम्मिलित होना चाहिए। 

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