हनुमनथप्पा की मौत
हनुमनथप्पा ऐसा जावांज सैनिक है जो एक मिसाल बन गया है जिस ठंडी हवा में लोगो के लिए जीवित बचना असम्भव है। ऐसे सर्द मौसम में उसने 125 घंटे गुजारे। इस सर्द मौसम में 15 मिनट में यदि मदद न मिले तो अधिकतर लोग दुनिया से कूच कर जाते है। उसके 6 दिन जीवित बचे रहना जादू के समान है। इसके लिए वैज्ञानिक शोध कर रहे है कि उसकी मजबूत इच्छाशक्ति या उसका तंदरुस्त शरीर उसे इतने समय तक जीवित रख सका।
जिस वातावरण में ऑक्सीजन की कमी ,पानी का अभाव, -50 डिग्री तापमान ,35 फीट तक बर्फ में दबा हुआ इंसान किस तरह इतने समय तक जीवित रह सका। इस कदर विपरीत माहौल में इंसान की त्वचा गलने लगती है। कुछ समय में शरीर के अंग काम करना बंद कर देते है। इंसान की मानसिक स्थिति काम करने लायक नही रहती उसकी हालत पागलो के समान हो जाती है। खाने के अभाव में उसका जीवन जिज्ञासा का कारण बन गया है। इतने ख़राब मौसम में सैनिको की भूख -प्यास खत्म हो जाती है। नींद नही आती ,बेहद ठण्ड के कारण हार्ट अटैक जैसी बीमारी के शिकार हो जाते है।
हनुमनथप्पा एक ऐसे छोटे से गाँव से ताल्लुक रखते है जहाँ उन्हें पढ़ने के लिए 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। बचपन से उनके अंदर सेना में जाने की इच्छा थी। तीन बार सेना में ना चुने जाने के बाद भी उनके अंदर सैनिक बनने की इच्छा कम नही हुई। चौथी बार में उनका सेना के लिए चयन हो सका।
उनके 13 साल के कार्यकाल में उन्होंने अपनी पसंद से अधिक जोखिम वाली जगहे मांगी। नौकरी के १० साल उन्होंने जोखिम वाली जगह जैसे कश्मीर,उत्तर -पूर्व और लद्दाख में बिताये । ऐसे जबांज सैनिक आजकल कम मिलते है जो मौत का डट कर सामना करते है।
हनुमनथप्पा ऐसा जावांज सैनिक है जो एक मिसाल बन गया है जिस ठंडी हवा में लोगो के लिए जीवित बचना असम्भव है। ऐसे सर्द मौसम में उसने 125 घंटे गुजारे। इस सर्द मौसम में 15 मिनट में यदि मदद न मिले तो अधिकतर लोग दुनिया से कूच कर जाते है। उसके 6 दिन जीवित बचे रहना जादू के समान है। इसके लिए वैज्ञानिक शोध कर रहे है कि उसकी मजबूत इच्छाशक्ति या उसका तंदरुस्त शरीर उसे इतने समय तक जीवित रख सका।
जिस वातावरण में ऑक्सीजन की कमी ,पानी का अभाव, -50 डिग्री तापमान ,35 फीट तक बर्फ में दबा हुआ इंसान किस तरह इतने समय तक जीवित रह सका। इस कदर विपरीत माहौल में इंसान की त्वचा गलने लगती है। कुछ समय में शरीर के अंग काम करना बंद कर देते है। इंसान की मानसिक स्थिति काम करने लायक नही रहती उसकी हालत पागलो के समान हो जाती है। खाने के अभाव में उसका जीवन जिज्ञासा का कारण बन गया है। इतने ख़राब मौसम में सैनिको की भूख -प्यास खत्म हो जाती है। नींद नही आती ,बेहद ठण्ड के कारण हार्ट अटैक जैसी बीमारी के शिकार हो जाते है।
हनुमनथप्पा एक ऐसे छोटे से गाँव से ताल्लुक रखते है जहाँ उन्हें पढ़ने के लिए 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। बचपन से उनके अंदर सेना में जाने की इच्छा थी। तीन बार सेना में ना चुने जाने के बाद भी उनके अंदर सैनिक बनने की इच्छा कम नही हुई। चौथी बार में उनका सेना के लिए चयन हो सका।
उनके 13 साल के कार्यकाल में उन्होंने अपनी पसंद से अधिक जोखिम वाली जगहे मांगी। नौकरी के १० साल उन्होंने जोखिम वाली जगह जैसे कश्मीर,उत्तर -पूर्व और लद्दाख में बिताये । ऐसे जबांज सैनिक आजकल कम मिलते है जो मौत का डट कर सामना करते है।

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