यूक्रेन युद्ध और कराहती मानवता
यूक्रेन पर हुए हमले ने सभी की धड़कने बड़ा दी है। किसी देश पर प्रत्यक्ष रूप में रूस ने बहुत साल बाद हमला किया है। इससे पहले इतने बड़े रूप में रूस ने ऐसा नहीं किया था। अब से 33 साल पहले जब USSR से 15 देशो को अलग कर दिया गया था। तब भी उसने इतना सख्त रुख नहीं अपनाया था। उस समय अमरीका अपनी इच्छा पूरी करने में कामयाब हुआ था।
अब पुतिन जैसे धाकड़ नेता को यूक्रेन को NATO में शामिल करने का इरादा बर्दास्त नहीं हुआ। क्योंकि बाकि देश रूस से अलग होकर भी उससे जुड़े हुए थे। यदि यूक्रेन नाटो में शामिल हो जाता तब वह बिलकुल अमरीका की तरह सोचना शुरू कर देता। अमरीका और रूस आजतक दुश्मन की तरह व्यवहार करते है। खुद को न. ONE साबित करने से नहीं चूकते है। इसमें कितने भी लोग जान से हाथ धो बैठे लेकिन उनकी बादशाहत कायम रहनी चाहिए।
यही रवैया उन्होंने अफगानिस्तान , सीरिया आदि देशो में अपनाया। जिसके कारण ये देश पूरी तरह तबाह हो गए। अब इनकी दुश्मनी की भेंट कहीं यूक्रेन न चढ़ जाये। अब युद्ध केवल देश अपने हित के लिए लड़ते है। इस समय यदि यूक्रेन के अलगाववादी नेता यदि यूरोपियन गुट में शामिल हो गए ,उससे रूस को बहुत नुकसान का सामना करना पड़ेगा।
रूस में बहुत सारी गैस है जिसे वह यूरोपियन देशो तक पाइपों के द्वारा भेजता है। ये अधिकतर यूक्रेन से होकर जाती है। यदि यूक्रेन इन पाइपों के लिए रूस से मुआवजा लेना चाहेगा तब वह हर साल अरबो रूपये मांगेगा। यह रूस को गवारा नहीं है। यह एक तरह से अधिकारों की लड़ाई है। जो कोई देश छोड़ना नहीं चाहता।
इस युद्ध की आग में कितने लोग तबाह होगे। ये वक्त बताएगा।
करोना के कारण 28 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच गए है। इस युद्ध का असर भारत जैसे देशो पर भी पड़ेगा। हमे महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी। गरीब देशो से लगता है मुँह का निवाला तक छीन जायेगा।
यूक्रेन भले ही छोटा देश है लेकिन इस युद्ध में परोक्ष रूप में महाशक्ति शाली देश लड़ रहे है। इन्हे रोकने की ताकत किसी में नहीं है। इनका साथ देने के लिए यदि और देश प्रत्यक्ष रूप में शामिल हो गये तब इसे तीसरे महायुद्ध का आगाज समझा जायेगा। जिसमे करोड़ो लोगो की जाने गई थी।
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