शादी के बाद का अकेलापन
आजकल लड़के और लड़कियां दोनों नौकरी करते है। उनके लिए नौकरी के बिना जिंदगी की कल्पना करना मुश्किल होता है। वे नौकरी छोड़ना नहीं चाहते है। शादी के बाद नौकरी और शादी में समझौता करना बहुत मुश्किल हो जाता है। यदि नौकरी अलग -अलग शहरो में होती है तो जिंदगी जीना बहुत मुश्किल हो जाता है। जो लोग शादी से पहले प्यार के बंधन में बंधे होते है उनके लिए अपने साथी के बिना रहना असंभव लगने लगता है।
जो शादी से पहले दूर रहते हुए भी पास महसूस कर रहे होते है। उनके लिए शादी के बाद की दूरियां बर्दास्त के बाहर हो जाती है। यदि उन्होंने स्थानांतरण के लिए पत्र लगा रखा होता है। उनका स्थानांतरण नहीं होता तो उनकी हालत पागलो जैसी हो जाती है। उन्हें किसी तरह चैन नहीं मिल रहा होता है। उन्हें लगता है जैसे दुनियां वीरान हो गई है। उनके जीवन में कुछ नहीं बचा। अब वे जिन्दा रहकर क्या करेंगे। उन्हें संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने साथ रहने के मकसद से शादी की होती है। जब वह मकसद पूरा नहीं होता तब बेचारे कहाँ जाये? सरकारी नौकरी या प्राइवेट नौकरी दोनों में परिवार टूटने का कारण अकेलापन बनता जा रहा है। जिसे पास देखना चाहते है वह नजरो से दूर होता है। जिनसे दूर रहना चाहते है। जिनसे नफरत करते है. वे हर समय सामने दिखाई दे रहे होते है। उनके अंदर मायूसी घर करने लगती है। वे बागी हो जाते है। उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा होता है। उनकी भूख -प्यास सब उड़ जाती है। उनके लिए जिंदगी के प्रति मोह पैदा करना मुश्किल हो जाता है।
आपको मेरी बातो पर यकीन नहीं आ रहा होगा। आप सेना में काम करने वाले सैनिको के बारे में जानकारी हासिल करके देखिये। वहां अधिकतर आत्महत्या कारण परिवारिक बिछोह होता है। वहां किसी के गुस्से में साथियो पर गोलाबारी की वारदाते अक्सर सुनने में आती है ये उनकी ऊब या खीझ होती है। जब उन्हें उनका अफसर गिड़गिड़ाने पर भी छुट्टी नहीं दे रहा होता है। ऐसे में उनमें तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। जो उन्हें और उनके आसपास वालो पर भारी पड़ रही होती है.
ऐसे समय वहां मिलने वाली सहूलियतें भी उन्हें लुभाने में असमर्थ होती है वे केवल अपने साथी से मिलने के लिए तड़प रहे होते है। ये तड़पन शादी के बाद बहुत बढ़ जाती है। उन्हें संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए अब सेना में मनोवैज्ञानिक रखे जा रहे है.जो उनकी मन की उलझने सुलझाने में मदद करे। लेकिन सेना के आलावा भी बहुत सारे क्षेत्र है। जहां दम्पत्ति एक साथ रहने में असमर्थ होते है। ऐसे में संस्थानों के संचालको को उन्हें साथ मिलाने के नियमो पर कार्यवाही करनी चाहिए। वरना परिवार और लोगो को टूटते देर नहीं लगेगी। स्वस्थ इंसान ही स्वस्थ परिवार का निर्माण कर सकते है। उनसे ही देश के निर्माण की उम्मीद की जा सकती है। कुंठित लोग दूसरो के दुखो का कारण बनते है।
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