#REJUVENATION OF INDORE

                      इंदौर का कायाकल्प 




मै  उस समय के भारत में पैदा हुई थी जब भारत में सफाई केवल VIP  इलाको में दिखाई देती थी। बाकि हर तरफ गंदगी दिखाई देती थी। सफाई कर्मचारियों के हिस्से का पैसा भी ऊँचे ओहदेदार लोग खा जाते थे। यानी  20  सफाई कर्मचारियों को दिखाकर उनका वेतन हड़प लिया जाता था। केवल दो कर्मचारियों को काम करवाया जाता था। वे भी कितना काम करते, वे भी काम चोरी करते थे। इसलिए गंदगी का साम्राज्य चारो तरफ दिखाई देता था। बरसात के दिनों में सड़क पर पैर  रखने की हिम्मत भी हर किसी में नहीं होती थी। 

      मै  हमेशा सोचती थी  क्या विदेशो की सफाई देखने का मौका कभी मुझे नसीब होगा। उसके सपने देखते हुए जीवन बीत  रहा था। विदेश जाने की हैसियत मेरी नहीं हो सकी।  कई सालो से जब से मोदी सरकार आयी है। उन्होंने सफाई के लिए शहरो को इनाम देना शुरू किया है। तब से मेरी इंदौर  देखने की बहुत इच्छा थी क्योंकि वह कई सालो से सफाई के लिए न. 1  रहा है। 

        आखिर कार  मेरी इच्छा पूरी हुई। जब में रेलगाड़ी से उतरी  तभी हर तरफ सफाई देखकर हैरान हो गई। वहां की पटरी, आरामगृह बहुत साफ थे। उसके बाद मुझे शहर घूमने का मौका मिला तब और भी अच्छा लगा। क्योंकि कही  भी गंदगी नहीं थी। यहां तक कूड़ा इकट्ठा  करने के लिए बड़े -बड़े कूड़ेदान भी कही दिखाई नहीं दिए। हम सुबह 6  बजे इंदौर पहुंच गए थे। सफाई हो रही थी। लेकिन कही भी कूड़े के ट्रक या बड़े कूड़ेदान दिखाई नहीं दिये। 

       हमें वहां पर दुकान दार  भी कूड़े को लेकर सचेत दिखाई दिए। वे कोई भी कूड़ा सड़क पर फैकने नहीं देते थे उसका भी सही तरीके  से इंतजाम किया गया था।

         वहां के मंदिरो में भी नंगे पैर  चलने में दिक्क्त नहीं आ रही थी। बड़ी से बड़ी जगह जहां बहुत लोग चल रहे थे उन जगहों पर भी नंगे पैर  चला जा सकता था।  प्रत्येक कोने में धूल -मिटटी का नामोनिशान नहीं था जबकि हमारे घरो में भी किसी न किसी कोने में धूल दिखाई दे जाएगी। 

    वहां के जिम्मेदार अफसरों ने अपनी कर्मठता से इंदौर को बहुत सूंदर बना दिया है। उनकी सख्ती के कारण  हर इंसान अनुशासन में रहना सीख  गया है। यहां तक की ऑटोरिक्शा वाले भी बेहद गर्मी के माहौल में पूरी वर्दी में गाड़ी चलाते  है। क्योकि जुर्माना  वसूल करने वाले अपने काम में बिलकुल ढिलाई नहीं बरतते है। 

      मुझे पहली बार लगा किसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए सख्ती की बहुत जरूरत होती है। वरना  हर  राज्य में गलतियों के लिए जुरमाना लेने के नियम है लेकिन उन्हें वसूलने वाले अपनी जिम्मेदारी सही तरीके  से नहीं निभाते। जिसके कारण  हमे भारत में अच्छाई  दिखाई नहीं देती है। नियमो को बनाने से फायदा नहीं होता है। जब तक  उसे यदि सही तरीके  से लागु करवाने वाले लोग नहीं हो। वे केवल कागजो की शोभा  बढ़ाते रह जाते है 

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