विधि की विडंबना
रुक्मी के बच्चे अब बड़े हो गए थे। वह जिम्मेदार और सभ्य नागरिक बन गए थे। उसने जिंदगी भर बहुत मेहनत की थी। उसके बराबर मेहनत करते मैंने बहुत कम औरतो को देखा था।उनकी जिंदगी का रुख एकदम बदल जायेगा। वह मेरी सोच से बढ़कर था। जितनी तरक्की उसके बेटे ने की थी। उतनी तरक्की करते मैने अपने आसपास के लोगो को नहीं देखा था। उसकी तरक्की कल्पनातीत थी।
उसके बेटे को फालतू सड़क पर खड़े या फालतू किसी से बात करते नहीं देखा था। मैंने अपने पड़ोस से इतनी पढ़ाई करके इतना सफल होने वाले लड़के नहीं देखे थे। उसकी तरक्की उसकी खुद के प्रयास से संभव हुई थी। हम ये भी कह सकते है। उसने जिंदगी भर परिवार को दुःख से जूझते देखा था इसलिए वह भी मेहनती बन गया था। उसने छोटी उम्र से पैसे कमाने का हुनर सीख लिया था। उसने अपना समय व्यर्थ नहीं गवाया था बल्कि अपने हर पल का सदुपयोग किया था।
इतने दुःख सहने के बाद रुक्मी का शरीर छलनी हो गया था। उसके पैर और घुटने उसका साथ नहीं देते थे। काफी साल परेशानी झेलने के बाद उसने पैरो का ओपरेशन करवाना ठीक समझा। ओपरेशन करवाने के बाद कुछ साल वह सही ढंग से काम करने में समर्थ हो सकी. अब उसे अपने स्वस्थ शरीर की कीमत समझ आने लगी थी। ये शरीर एक समय के बाद हमारा साथ छोड़ने लगता है। इस शरीर का विकल्प कोई नहीं बन सकता। अपने शरीर से पैदा हुए बच्चे भी सुख नहीं दे सकते जब तक शरीर स्वस्थ नहीं है।
विधि की विडंबना देखिये उसने अभी पैरो का सही तरह से सुख उठाया भी नहीं था। एक दिन सड़क पर चलते हुए कार टक्कर मार गई दुर्घटना भयंकर थी उसके कूल्हे की हड्डी टूट गयी । वह अपने शरीर से लाचार हो कर बिस्तर पर पड़ गई थी।
उसकी बहु अपने दो बच्चो के साथ सास की सेवा करते वक्त अब चिड़चिड़ाने लगी थी। रुक्मी तन और मन से बहुत दुखी थी। उसके जैसे कर्मठ इंसान को भगवान् ने बिस्तर पर ला पटका था। उसकी आँखों में हर वक्त आंसू रहते थे।