कामी और हिंसक गुरु के अंध भक्तो का कारनामा
राम -रहीम की खबरे सुनकर हैरानी हो रही है। 27 साल के अंदर एक साधारण इंसान से कोई इंसान इस कदर प्रसिद्ध हो गया। उसके गलत कामो पर सजा मिलने पर कई लाख लोग शहर को तबाह करने के लिए तैयार हो गए। बहुत सारे लोगो को उम्मीद थी कि राम -रहीम को सजा मिलेगी।सजा जिस बात पर मिल रही है। उस बारे में उन्होंने अपने दिमाग से सोचने की जरूरत भी नहीं समझी।भारत जैसे लोकतंत्र में इतने बड़े इंसान को गलत सजा नहीं मिल सकती। क्योंकि उसका रसूख राजनीती के गलियारों तक था। इस केस की फरियाद करने के 15 साल बाद मुजरिम को सजा मिल रही थी।
वह कोई साधारण इंसान नहीं था। जिसे गलत इल्जाम में सजा देने की हिम्मत कोई जज दिखा सके। जिस जज की कोर्ट में सजा देने का प्रावधान किया जा रहा था उसने अपने लिए विशेष सुरक्षा की मांग की थी। उसे अपनी जान दाव पर लगा कर फैसला देना पड़ रहा था। उस जज की हिम्मत को दाद देने का मन कर रहा है।
जो इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी अपने फैसले पर अडिग रहा। कोई और इंसान ऐसे समय में हिम्मत छोड़ बैठता है।
उनके किस काम के लिए सजा मिल रही है। गुरु के समर्थक उसकी सच्चाई के बारे में जानने की अपेक्षा सब कुछ तबाह करने के लिए भी पुरे परिबार के साथ कई दिन से पंचकूला में डेरा जमाये बैठे थे। उन्होंने इस बीच कितनी परेशानियों का सामना करना होगा इसकी परवाह नहीं की बल्कि अपने गुरु की खातिर परेशानियाँ सहन करने से उन्हें गुरेज नहीं था।
लोग अपनी जवान बेटियों को किसी रिश्तेदार के घर ठहराने के लिए राजी नहीं होते। गुरु के प्रति इतनी अधिक भक्तिभावना की अपनी बेटियों को छोड़ने के बाद उनके साथ कैसा सलूक हो रहा है। इसे जानकर भी अपनी बेटी की गुरु के प्रति बताई सच्चाई पर यकीन करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे ।
उन्हें स्वयं के अभिभावक से ज्यादा देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी पर भरोसा करके चिट्ठी लिखकर दया की याचना करनी पड़ी। इसे अंध विशवास नहीं तो और क्या कहेंगे। या बेटियों के प्रति अभिभावकों की गैर जिम्मेदाराना हरकत है।ये कैसा मोक्ष प्राप्ति का रास्ता है। जिसमे अपनी बेटी को वेश्या के समान जीवन जीता देखकर भी ग्लानि नहीं हुए। उन्हें गुरु को समर्पित करके जिम्मेदारियों से बचने का कायराना फेसला लिया।
यह परोक्ष रूप में देवदासी प्रथा का आधुनिक रूप ही दिखाई देता है जिसमे कोई मनोकामना पूर्ण होने पर बेटी को मंदिर में देवदासी के रूप में समर्पित कर दिया जाता था। उसके बाद उसके बारे में सोचना गवारा नहीं था। किसी तरह से आधुनिक युग में देवदासी प्रथा से छुटकारा मिला तो यह देवदासी का नया रूप दिखाई देने लगा है।
ये आधुनिक गुरु कितने ताकतवर हो रहे है कि उन्हें कोर्ट के द्वारा सजा देने के समय उस राज्य की पुलिस,BSF और सेना को बुलाकर भी राज्य को जलने से बचाना मुश्किल हो गया।
लेकिन सरकार ने इतनी तबाही के बाद उनके आश्रमों के द्वारा इस नुकसान की भरपाई करने का आदेश देकर हिम्मत का काम किया है। यदि इसे लागू करके नुकसान की भरपाई राज्य के द्वारा की जा सकी तो इसके बाद कोई और लोगो की भावनाओ को भड़का कर नुकसान करवाने की हिम्मत नहीं कर सकेगा।
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