मुस्लिम औरतो की एकता की जीत बनाम तलाक
मुस्लिम औरतो के बारे में जितना मालूम पड़ता था उन पर उतना तरस आता था। एक लड़की को ससुराल के बारे में बचपन से सपने दिखाए जाते है जैसे स्वर्ग से बढ़कर सुख मिलेंगे लेकिन उनसे पूछो जिन्होंने पति से वफ़ा के बदले में बेबफाई पाई है। जिन्होंने हमेशा के लिए उसे और उसके बच्चो को लावारिस के तौर पर सड़क पर छोड़ कर उनकी तरफ मुख नहीं किया। उनकी फ़रमाबदार पत्नी उन बच्चो के साथ गरीबी की जिंदगी बसर कर रही है ऐसी बेरुखी का व्यवहार कोई दुश्मनो से भी नहीं करता मजहब के नाम पर जिस औरत ने उसकी तन -मन और धन से पूजा की उसके प्रति इतनी लापरवाही सोचने पर मजबूर करती है।इन औरतो को कभी दहेज कम लाने पर ,कभी बेटी पैदा करने के एवज में ,कभी बीमार होने पर , चूल्हे पर रोटियां न बना सकने पर या किसी अन्य सुंदर औरत पर दिल आने का खामियाजा उठाना पड़ता है। पुरुषो का मन वैसे ही उच्छंखल होता है उस पर मजहब की लाठी थमा देंने पर उनमे मानवीयता ही खत्म हो गयी थी। कहा जाता हे औरत में समाज के द्वारा देवी के सारे गुण भरने की कोशिश की जाती है वही आदमी को इतनी ताकत दे दी जाती है कि उसमे इंसानियत ही खत्म कर दी जाती है। इस कारण औरत और आदमी दोनों ही इंसान की तरह जी नहीं पाते।
1985 में शाहबानो को 62 साल की उम्र में उसके पति ने तलाक दे दिया। इसके विरोध में उसने अदालत का दरवाजा खटखटाया वहाँ उसके साथ इंसाफ के रूप में उसके पति को उसका और उसके बच्चो के लिए गुजारा भत्ता देने का आदेश हुआ लेकिन उसके पति ने उसे शरीयत के खिलाफ कहकर अदालत के आदेश को नहीं माना तब सारे कठमुल्ला उसके साथ हो गए। उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी मुसलमानो के विरोध के सामने झुक गए। शाहबानो जीत कर भी हार गयी।
उस समय शाहबानो अकेली सबका सामना करने के कारण हार गयी थी। लेकिन आज की अदालत का फैसला मुस्लिम औरतो की एकजुटता की लड़ाई है। उनके आक्रोश को संगठित कर दिया है। जो कटटरपंथी इसे धर्म पर आघात मान रहे थे। आज वे औरतो की संगठित शक्ति का विरोध करने का साहस नहीं कर सकेंगे।
सबसे पहले हिंदी फिल्म" निकाह "में इस मुद्दे को उठाया गया था। उनके रिवाजो और तलाक के बारे में अन्य समाज के लोगो ने पहली बार तलाक और हलाला का मतलब जाना था। उस समय कटटरपंथियो ने निकाह का भरसक विरोध किया था। एक अमीर औरत किस तरह तलाक कहते ही अर्श से फर्श पर आ जाती है। एक शब्द उसकी सारी दुनिया बदल देता है। उसका सारा वजूद खत्म कर देता है। जिंदगी आँसुओ का सैलाब बन कर रह जाती है।
कल बहस में एक आदमी का जबाब सुनकर हैरान रह गयी जब उसने कहा -"औरतो को तलाक देने का हक़ इसलिए नहीं मिलना चाहिए क्योंकि उनमे दिमाग की कमी होती है। "उस समाज की हालत के बारे में सोच कर देखिये जहाँ एक औरत के किसी गुण का कोई महत्व नहीं है उसके लिए औरत होना सबसे बड़ा गुनाह बन जाता है।
एक तरफ आदमी कहता है औरत में दिमाग की कमी है ऐसी कम दिमाग की औरत उसके बच्चो की परवरिश अकेले कैसे कर पायेगी उसने इस बारे में सोचना भी गवारा नही किया।
मुझे पहली बार पता चला इस बार गरीब या निम्न वर्ग की औरतो ने ये लड़ाई नहीं लड़ी बल्कि सभी पढ़ी लिखी औरतो ने साथ मिलकर शरीयत और कुरान के हर पन्ने का खुलासा कोर्ट में कठमुल्लाओ के सामने किया है। जिसे कम पढ़े -लिखे मजहवी लोग अपने हिसाब से अर्थ निकाल कर गुमराह करते थे। इससे सबक मिलता है आत्मविश्वाश से भरी हुई और पढ़ी लिखी औरतो की एकता अपना भाग्य बदल सकती है।
उप्र में औरतो के वोट बैंक के कारण बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हुई। उनकी एकता के कारण कोई भी पार्टी का नेता इसके खिलाफ बोलने की हिमाकत करता नजर नहीं आ रहा है। भारत में 9 करोड़ औरते एकजुट होकर अपनी किस्मत बदल सकती है।
इनकी एकता के कारण कोई भी पार्टी संसद में कानून बनने के रास्ते में रोड़ा अटकाने से पहले कई बार सोचेगी। उसका वोट बैंक कही दूसरी पार्टी के पाले में न चला जाये। हम बीजेपी की हौसला हफजाई कहने के स्थान पर एकता की ताकत कहना पसंद करेंगे। आज भारत बदल रहा है। हमें भी रूढ़ियों और अंधविश्वासों से ऊपर उठकर सोचना चाहिए।
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