केजरीवाल और जंग की शुरुआत
हम जब भी किसी अच्छे समय की कल्पना करते है। तब दिमाग में एक ही बात रहती है वही समय हमारे लिए अच्छा होगा जब किसी की पाबंदी के बिना काम करेंगे। बचपन में सोचते है वो वक्त बड़े होने पर आएगा। बड़े होने पर अपने से बड़े और रोबदार लोग बुरे लगते है जिनके हिसाब से हमे चलना पड़ता है। उस समय हम ऊँचे पद की कल्पना करने लगते है। लेकिन मेने अब तक की जिंदगी में ऐसा कोई पद या इंसान नहीं देखा जो किसी के प्रति जबाबदेह न हो।जिन देशो में तानाशाही होती है। वहाँ कोई तानाशाह किसी के प्रति जबाबदेह नहीं होता है। लेकिन एक तानाशाह कितना डरा सहमा जीवन जीता है। उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते ,उसे रातो को नींद नहीं आती। वह किसी को अपना नहीं समझ पाता। सभी को संदेह की नजर से देखता है। वह विल्कुल अकेला होता है वह जरा सा संदेह होने पर अपने प्रियजन को मरवाने से बाज नहीं आता।
एक बार रूस के तानाशाह स्टालिन की बेटी का बयान सुनकर हैरान रह गयी -"उसने कहा मुझे बचपन में समझ नहीं आता था में जिस रिस्तेदार को एकबार देख लेती हूँ वो मुझे दुबारा क्यों दिखाई नहीं देता।" बड़े होने पर उसे समझ आया की उसके सभी जानने वालो को संदेह के कारण मरवा दिया गया था। उसने बाद में रूस छोड़कर अमरीका में रहना शुरू कर दिया था। वही वह अपने अंतिम समय तक रही।
मेने अपने आसपास के लोगो से लेकर ऊँचे पदों पर रहकर काम करने वाले लोगो तक परखा है। लेकिन जो लोग जितना अधिक काम करते है उनपर उतना ज्यादा आक्षेप लगाए जाते है। लेकिन वो उनको सहते हुए भी अपने काम में डटे रहते है। वो जिस जगह जाते है। वही फरियादी अपनी फरियाद लेकर पहुँच जाते है। काम के लिए धन्यवाद कम और शिकायते ज्यादा करते दिखाई देते है। उसके बाबजूद उनके होठो पर मुस्कान बनी रहती है। जबकि हम जैसे साधारण लोगो को यदि कोई जरा सा अपशब्द कह दे तो तिलमिला जाते है।
मोदी जी जैसे नेताओ को हर तरफ से अपशब्द सुनने को मिलते है लेकिन उनका काम करने का तरीका तारीफ के काबिल है। वे किसी के सामने मुखर होकर गलत नहीं बोलते। लगातार काम करते रहते है। उनका दृढ़निश्चय उन्हें किसी आरोप प्रत्यारोप के सामने झुकने से नहीं रोकता। उनके जैसे कठोर फैसले लेने वाला कद्दाबर नेता आसानी से नहीं मिलेगा। उनकी जबान से कभी नहीं सुना मुझे कोई काम नहीं करने देता मै तुम्हारी भलाई के लिए बहुत सारे काम करना चाहता हूँ। जैसे -जैसे उनके बारे में जाना उनकी परेशानिया समझ में आने लगी।
उनके गुजरात के प्रधानमंत्री बनते ही गोधरा कांड हो गया। उससे मुकाबला करने के लिए उन्होंने केंद्र से सेना मांगी। उन्होंने नहीं भेजी उन्होंने अपने दम पर दंगा रोका। जिसके लिए उन्हें लगभग पंद्रह सालो तक रुसवाई का सामना करना पड़ा इस कांड के बाद । कई देशो ने उन्हें अपने देश आने का वीजा तक देने से मना कर दिया। जैसे ये दंगा फैलाने वाले वे अकेले इंसान थे। लेकिन इसके बाद पूरे कार्यकाल में कभी ऐसा दंगा भड़कने नहीं दिया। उसकी शाबासी किसी ने नहीं दी।
दूसरे नेता केजरीवाल जी के बारे में जितना जानने की कोशिश करती हूँ। उतना ही उलझती जाती हूँ वे अपने हर काम के लिए दुसरो को दोष देने से बाज नहीं आते। वे पहले हर काम के लिए केन्द्र को दोष देकर बचने का रास्ता देखते थे। आज वे हर काम के लिए बीजेपी या मोदी पर लांछन लगाने लगते है। आजकल उनका आक्षेप शुंगलू कमेटी, ऑफिस, थाली या विज्ञापन से सम्बंधित बाते। वे आजकल हर बात के लिए चुनाव मे हराने का ढोंग करते है। उनसे कौन कहे -जब वे दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे तब बीजेपी ने उन्हें हराने की कोशिश नहीं की थी तब वे अपने दम पर भारी बहुमत से जीते थे। आज उन्हें अपने पर भरोसा खत्म होता दिखाई दे रहा है.
नेता वही होता है जो दूसरो के मनोभावों को समझ कर रणनीति बनाता है। हजारो में कोई एक नेता के गुण लेकर आता है। भीड़ का हिस्सा हर कोई बन सकता है। वह हर दबाब के बीच निर्णय ले सकता है। जब उन्होंने राजयपाल से अनुमति लेकर काम करना जरूरी नहीं समझा तो उसकी जिम्मेदारी लेना भी सीखना चाहिए। उन्होंने राजयपाल नजीब जंग पर आक्षेप लगा कर उन्हें उनके पद से हटवा दिया। आजकल राजयपाल बैजल से कड़वाहट साफ दिखाई दे रही हे.
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