#increase noise cause the problem

              बढ़ता शोर परेशानी का सबब  

  पूजा पाठ, जागरण , अजान शादी व्याह के लिए होने वाले शोर शराबे के कारण सभी की एकाग्रता भंग होती है। पढ़ने वालो को बहाना मिल जाता है। बीमार लोगो की तकलीफ बढ़ जाती है। इस शोर का सामना हर बड़े शहर में रहने वाले को करना पड़ रहा है। तकलीफ हर किसी को हो रही है। लेकिन सभ्यता के नाते कोई बोलना नहीं चाहता है।सोनू निगम ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद करने की कोशिश की तो उसको लेकर कटाक्ष किये जा रहे है। ये कदम  समुदाय विशेष के लिए  नहीं बल्कि हर शोर के खिलाफ उठाया जाना चाहिए।
 
   
 बड़े शहरो में रहने वाले हर समय शोर गुल का सामना करते है। उन्हें प्रकृति की आवाज सुनाई ही नहीं देती। जबकि एकाग्रता के लिए शांत माहौल होना चाहिए।
       यदि आप किसी छोटे शहर में जाओ तो आपको बड़े शहरो की अशांति का पता चलता है। वहाँ की शांति मन को मोह लेती है। ध्वनि प्रदूषण के बढ़ जाने के कारण सरकार ने कई स्थानों पर  हॉर्न बजाने पर पाबन्दी लगा दी है।
        मेने एक जगह विद्यालय के सामने सिनेमा हॉल देखा वहाँ  बहुत ज्यादा विज्ञापन आदि किया जा रहा था। जिसके कारण मेरा ही ध्यान उस तरफ आकर्षित हो रहा था। बच्चो के मन के बारे में सोचिये उनके लिए पढ़ाई में ध्यान लगाना कितना कठिन होता होगा।
        मंदिर और मस्जिद के पास के मकानों की कीमत कम होने लगी है। अब लोगो के लिए भक्ति भाव कम और काम के प्रति एकाग्रता की भावना ज्यादा महत्व रखने लगी है।  इससे आपको शोर का अंदाजा हो जायेगा।
        नॉर्वे जैसे देशो में लाऊड स्पीकर के आवाज तो दूर वहाँ पार्क में खेलने वाले बच्चो की खिलखिलाहट पर भी पाबंदी लगी हुई है। हम शोर शरावे के बीच रहने के कारण शांति के महत्व का मतलब नहीं समझ पा रहे है।
      शहरो में लोगो की सुनने की क्षमता कम होने लगी है। वे कई तरह की सूक्ष्म आवाज नहीं पहचान पाते।
      पहले जमाने में हर तरफ शांति का माहौल होने के कारण ऊँची आवाज कभी -कभार सुनाई देती थी इस कारण लोग उसे सुनकर आनंदित होते थे। लेकिन बढ़ता शोर, बेचैनी का कारण बनता जा रहा है।
       यदि आप मेरी बात से सहमत है तो like  और share कीजिये। 

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