#national policy for women 2016

              औरतो के लिए राष्ट्रीय नीति 2016 

 आजकल महिलाओं को सबल बनाने के प्रयास हर तरफ दिखाई दे रहे है। अमीर  गरीब सब अपनी बेटियों को सक्षम देखना चाहते है। अब केवल उनकी शादी की चिंता घरवालों को परेशान नहीं करती वे सारी  जिंदगी उनकी शादी के लिए जोड़ने के साथ बेटी की पढ़ाई  लिखाई  पर भी जोर दे रहे है।
         बहुत कम घरों में लड़कियों को बिना पढ़ाए  रखा  जाता है। अब ऐसी लड़कियों के विवाह में बहुत परेशानी होती है  .उन्हें अच्छा परिवार नहीं मिल पता। 
      सरकार की निशुल्क शिक्षा के कारण अधिकतर घरों में लड़कियों को विद्यालय भेजा  जा रहा है। विद्यालयी शिक्षा के आलावा लड़कियों को ऊँची शिक्षा में भी पैसो की सहूलियत दी जानी  चाहिए। उनकी ऊँची शिक्षा पर परिवार वाले आसानी से व्यय करने के लिए तैयार नहीं होते। उनके शब्दों में उलाहना रहता है। इतनी  पढ़ाई काफी है। तेरी शिक्षा बहुत हो गई अब  शादी के लिए भी हमे बहुत खर्च करना है। 
     लड़कियां बहुत  मेहनती होती है  वे घर के काम के साथ पढ़ाई में अच्छे अंक ला  रही है। लेकिन नौकरी में उनका % बहुत कम है। इसका कारण ऊँची शिक्षा का अभाव  है। 
    नौकरी के लिए फार्म की कीमत और उसपर खर्च करने के लिए अभिभावक तैयार नहीं होते है। यदि महिलाओं को नौकरी के फार्म पर शुल्क अनुसूचित जाती के लोगो की तरह माफ़ कर दिया जाये तो अच्छे परिणाम दिखाई देंगे। 
       
नौकरी के लिए कोचिंग की निशुल्क व्यवस्था भी सुखद परिणाम लाएगी। यदि नौकरी में ३३ % का कोटा बन जाये तो उनकी तरक्की के अवसर बढ़  जायेंगे।
       एक महिला की शिक्षा तीन  परिवारों की इज्जत बढ़ाती  है। पहला मायका ,दूसरा ससुराल ,तीसरा उसका पूरा योगदान उसके परिवार को मिलता है। शिक्षित और स्वावलम्बी औरत अपने बच्चों को भी शिक्षित और स्वाबलम्बी बनाती  है। उसका पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित होता है। 
     वह अपने परिवार को अच्छा भोजन देने में सक्षम हो जाती है। सस्ता और पोषक खाना  परिवार को देती है जिससे कमजोर  और बीमार परिवार नहीं होता है 
वह जैसा भोजन बेटे को देती है वैसा ही भोजन बेटी को भी मुहैया कराती है। जिससे  उसका शारीरिक विकास उत्तम होता है 
   स्वाबलम्बी महिलाएं अपनी बेटी को संसार में लाने की सामर्थ्य रखती है। गर्भ में ऐसी औरतो की बेटियों का शमशान नहीं बन पाता  है। वे बेटियों को दुनियाँ  में लाने  के लिए ज़माने से टकरा जाती है। आपको कई उदाहरण दिखाई देंगे जिसमे बेटियों के हित की खातिर औरतो ने पति से बगाबत की। 
      यदि माँ -बेटी स्वावलम्बी होंगी तो बेटी की शादी में ज्यादा खर्च यानी दहेज़ की मांग भी नहीं की जाती। मुझे आज भी दुःख होता है। जब भारतीय शादी में लोग अपनी जिंदगी भर की पूंजी लगा देते है। उसके बाद लड़के और लड़कियों के परिवार पूरी तरह से खाली  हो जाते है। मै चाहती हुँशादी सीधी - सादी ,कम खर्च वाली हो जितना पैसा परिवार वाले वाह -वाही में लूटा  देते है  वह बच्चों के नाम से जमा करवा दिया जाये।   जो  उनकी उन्नति के काम आ सके।पाकिस्तान की शादियों में अधिक खर्च करने पर पाबंदी है। वहाँ विवाह समारोहों में केवल एक भोजन परसा  जाता है। अमीर -गरीब सभी के लिए सामान नियम लागु है। सानिया मिर्जा की शादी के समय पाकिस्तान  में केवल पुलाव की दावत हुई थी। भारतीयों के लिए ये हैरानी का सबब बन सकता है। क्योंकि भारतीय शादी में खाने में बहुत ज्यादा व्यय होता है जितना खाना खाया जाता है। उससे कही ज्यादा भोजन बर्बाद होता है जबकि बहुत सारी आबादी को पेट भर भोजन नहीं मिल पाता है। 

        शिक्षित और स्वावलम्बी महिलाओं के बच्चे भी कम  होते है। इससे भारत की अधिक  जनसंख्या की समस्या भी खत्म हो जाएगी।  
उन्हें स्वास्थ्य योजनाओं का अधिक लाभ मिल सके। जिससे उनकी मृत्यु दर  में कमी आ जाये। आज भी पिछड़े इलाको में औरतो की मृत्यु बहुत होती है। 
       स्वावलम्बी महिलाओं में आत्मविश्वास होता है। जिसके कारण बहुत सारी समस्याओं का समाधान खुद कर लेती है। वे किसी पर निर्भर नहीं रहती है। वे समाज के उत्थान में सहायक होती है। उनका स्वावलंबन समाज और परिवार की  आर्थिक उन्नति में सहायक होता है। 
    औरतो को सुरक्षित माहौल देने की कोशिश की जानी  चाहिए।  उनको नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था दी जानी चाहिए। ताकि हमारी 50% आबादी देश और समाज के उत्थान में बराबरी का सहयोग दे सके।  

#dharm or shasn


                                                       धर्म और शासनं 

      भारतीय सभ्यता हिन्दू सभ्यता कहलाती  है। प्राचीन काल में जब यूरोपियन देश जंगलों में निवास कर रहे थे। उस समय हिन्दू सभ्यता दूर तक फैली हुई थी। हमारी सभ्यता के अवशेष अमरीका ,मध्य पूर्व के देशो तक में मिल जायेंगे। समय -समय पर इनकी खबरें आती  रहती है। 

      ईसाई ,  मुस्लिम  बौद्ध  धर्म हिन्दू धर्म के बहुत बाद में आये थे । लेकिन आज अधिकतर देशो में प्रथम स्थान पर ईसाई धर्म ,दूसरे पर इस्लाम, तीसरे पर हिन्दू धर्म और चौथे स्थान पर बौद्ध  धर्म पहुँच  गया है। आपको जानकर हैरानी होगी ईसाई धर्म को मानने वाले ८० देश ,इस्लाम को मानने वाले 56  देश है। जबकि हिन्दू धर्म वाला कोई देश नहीं है। 
        भारत में से जितने देश बने जैसे अफगानिस्तान ,बांग्लादेश ,पाकिस्तान इन सबने इस्लाम को अपना राष्ट्रीय धर्म मान लिया। इन्होने हिन्दू धर्म के मंदिर,मूर्तिया  तक नष्ट करवा दी।
         अकबर ,जहाँगीर शाहजहाँ ने लोगो को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए लालच और कई तरह की सहूलियतें दी। जिसके कारण लोगो ने अपनी मर्जी से इस्लाम धर्म कबूल किया। 
       ओरंगजेब के शासन में जबरदस्ती मुस्लिम धर्म कबूलने के लिए मजबूर किया गया। आप खुद सोचिये इस्लाम धर्म के लोगो ने भारत पर आक्रमण करके इसे गुलाम बनाया था। इसलिए भारतीय आबादी के हिसाब से इस्लामी लोग मुश्किल से १० % दूसरे देशो से आये  थे। भारत में इतने सारे  मुसलमान कैसे हो गए। ये सब भारतीय  है जिन्हे  जोर जबरदस्ती से इस्लाम धर्म कबूलवाया गया ।
      ये 56  इस्लामी देश कटटर एक धर्म को मानने वाले कैसे हो गए। इन देशो में दूसरे धर्म के लोगो को इतनी अधिक यातनाएं दी गई कि उन्होंने अपना धर्म बदल लिया या दूसरे देशो में चले गए। भारत में भी ओरंगजेब के समय ऐसा माहौल बन गया था। जिससे हिन्दू धर्म करहा उठा  था। उस समय हमारे देश के दिग्गजों ने आत्म बलिदान दे कर भारत को मुस्लिम देश बनने से बचाया। इसमें गुरु तेगबहादुर ,गुरु गोबिंदसिंह ,शिवाजी की हिम्म्त को दाद  देनी पड़ेगी। शिवाजी ने जबरदस्ती मुसलमान बनाए गए लोगो को वापिस हिन्दू बनाया। 
       गुरु तेगबहादुर को अनेक यातनाएँ  दी गई। उन्हें जलते तवे  पर बिठाया गया। उनका सिर काट  दिया गया। उनके बेटे गुरु गोबिंदसिंह ने अपने पिता की शहादत देखकर मूक दर्शक बनने की जगह सिखों को जुझारू बनाया। गुरु गोबिंदसिंह ने अपने अंतिम समय तक ओरंगजेब की सेना से टककर ली।
         गुरु गोबिंदसिंह को पकड़ने में असफल रहने पर उनके दो बेटो को  पकड़ कर इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया जा रहा था उनसे कहा गया -इस्लाम कबूल करो नहीं तो तुम्हे जिन्दा दीवार में चुनवा दिया जायेगा। उन दोनों मासूमो ने  दीवार में चुनवाया जाना  कबूल किया लेकिन इस्लाम कबूल नहीं किया। यदि जिंदगी बचाने के लिए वे नौनिहाल धर्म बदल लेते तो बहुत से लोग मुसलमान बन जाते। उन्हें अपने पिता के कार्यो को सही  अंजाम तक पहुंचाने   के लिए अपनी आहुति दे दी। 
      गुरु जी ने अपने पुरे जीवन में धर्म को बचाने के लिए इतनी तकलीफे सही जिससे उनकी हिम्म्त टूटने लगी। क्योंकि साधारण लोग शासन के सामने झुक जाते है। एक नेता ही डटकर शासन के गलत कामो  का विरोध  कर  सकता है लेकिन उन्होंने इतने अधिक अपनों की मौत देखकर धर्म के नाम पर जीवित गुरु परम्परा ही खत्म कर दी। सिख धर्म के पवित्र गन्थ को गुरु की मान्यता दिलवा दी। 
             शिवाजी  के बाद उनके बेटे संबा जी  को  पकड़ कर इस्लाम कबूल करवाने की बहुत कोशिश की गई। उन्हें अँधा कर दिया  गया उनके प्रत्येक अंग को जीते जी काट  दिया गया।उन्हें तड़प -तड़प कर मरने के लिए मजबूर किया लेकिन 31  साल की उम्र में उन्होंने मौत को गले लगा लिया लेकिन इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया। ये कुछ उदाहरण है। ऐसी शहादते हजारो लोगो ने दी तभी भारत में हिन्दू धर्म अभी तक जीवित है। 
       आपको मालूम है भारत की आजादी के समय धर्म के आधार पर तीन  देश बने उनमे से पाकिस्तान में 21 %हिन्दू थे। बांग्ला देश में 35 % हिन्दू थे। लेकिन अब पाकिस्तान में केवल 1 %,और बांग्ला देश में 7  % हिन्दू कैसे रह गए जबकि भारत में उस समय केवल 10  % मुस्लिम रह गए थे. ये 18  % कैसे हो गए। किसी धर्म को बढ़ाने का काम उस देश की शासन व्यवस्था करती है।  
       आपको जानकर हैरानी होगी गांधी जी ने मुसलमानो के कत्ल का विरोध किया था। आपको शायद मालूम होगा उनके एक बेटे हरिराम ने मुस्लिम धर्म अपना रखा था। जवाहर लाल नेहरू की बेटी इंदिरागांधी ने जिससे विवाह किया था उसका नाम फिरोज खान था। नेहरू इस शादी के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। बेटी की जिद और अपने राजनीतिक भविष्य को बचाने के लिए.,गांधी जी  की सलाह पर फिरोज को उपनाम गांधी दिलवा कर उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य को बचाया। शीलादीक्षित की बेटी ,सुबह्मण्यम स्वामी की बेटी ,सिकंदर वक्त, 


मुख्तार नकवी ,शाहनवाज हुसैन,लाल कृष्ण  अडवाणी की भतीजी ,हमारे उपराष्ट्रपति  हिदायतुल्ला 
सब हिन्दू मुस्लिम रिश्तों में जुड़े हुए है। जब खून के रिश्ते आपस में इस तरह से जुड़े हो तब अपनों के साथ नाइंसाफी कैसे कबूल की जा सकती है।
     हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उतसव  में बुलाए जाने पर मुसलमानो ने जमकर विरोध किया। जामा  मस्जिद के बुखारी के बेटे की दस्तारबंदी में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बुलावा भेजा गया लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को निमंत्रण नहीं दिया गया। उसके बाबजूद भारत को असहिष्णु कहा गया है। किसी अन्य मुस्लिम देश में  ऐसा हो सकता है।  
    सम्राट अशोक के समय में बौद्ध धर्म का बहुत  प्रसार हुआ। उन्होंने इसे विदेशो तक में फैलाया। जो आपको आज भी दिखाई  देता है। लेकिन भारत में बोद्ध मठ या अनुयायी दिखाई नहीं देते जितने अन्य देशो में दिखाई देते है।
       इसका कारण सम्राट अशोक के पोते सम्प्रति और पुष्यमित्र राजा हुए है। उनके काल  में हर और बौद्ध  थे हिन्दू धर्म का विनाश हो गया था। उन्होंने बोध मठो को तुड़वा दिया। उसमे रहने वाले बोद्धो को मरवा दिया। पुष्यमित्र ने तो ऐलान करवा दिया था जो किसी बोद्ध साधु का कटा  हुआ सिर  लाएगा उसे इनाम दिया जायेगा।  उनके डर  से लोगो ने अपना धर्म बदलने में ही भलमनसाहत समझी।
       बहुत समय तक भारत में बोद्ध  धर्म को मानने  वाले न के बराबर थे। भीमराव अम्बेडकर के बोद्ध  धर्म को अपनाने के बाद फिर से बोद्ध  अनुयायी और  बौद्ध  विहार दिखाई देने लगे है। 
       इसलिए कहा जाता है शासन व्यवस्था के उदार  होने पर कोई भी धर्म फलता -फूलता है। वरना उसके विनाश देर  नहीं लगती। 
         

#grmiyo me aag

                           गर्मियों में आग 

       
आग आज के जीवन की आवश्यकता बन गई है। लाभ के साथ इसकी हानि के दुष्परिणाम गर्मियों में बहुत ज्यादा दिखाई देते है। एक तरफ आग उगलता सूरज पूरी ताकत से जलाने की कोशिश कर रहा होता है। जिसके कारण वातावरण में नमी खत्म हो जाती है।  थोड़ी सी लापरवाही आग लगने की बड़ी दुर्घटना बन जाती है। 
         दिल्ली में आप इन दिनों बहुत ज्यादा आग लगने के समाचार सुन रहे होंगे।जिसका असर दिल्ली के प्रदूषण पर पड़ा। इसके कारण  दिल्ली में सरकार की ओड -इवन नीति भी बहुत असरदार नहीं रही। दूसरी तरफ  किसानों ने पुआल जला दिए। उसका धुंआ दिल्ली में प्रदूषण को बड़ा गया। 
      आपको सुनकर हैरानी होगी। आग की दुर्घटनाओं से बचाव के लिए बिहार सरकार ने आदेश जारी किया है खाना बनाने का काम सुबह 9 बजे तक पूरा करना पड़ेगा उसके बाद यदि किसी के घर आग जलती दिखाई दी तो उनपर जुर्माना लगाया जायेगा। शाम को 6 बजे के बाद खाना बना सकते है। उससे पहले खाना बनना निषेध है। पहले इस बारे में जानकर मुझे बहुत हैरानी हुई थी क्योंकि शहरो में लोग गर्म खाने के आदि होते है। यहाँ पुरे दिन रसोई में  कुछ न कुछ बनता रहता है। गैस की सुविधा और पक्के मकानों में रहने वाले इस आदेश को तुगलकी फरमान की संज्ञा देंगे लेकिन कच्चे घरों में रहने , चूल्हे और अंगीठी पर खाना बनाने बालों की सुरक्षा के लिए इस तरह के आदेश उचित है।
       हमारे देश में केवल 20 %हरियाली है जबकि ३३% हरियाली होनी चाहिए। हमारी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र में इसे बढ़ाने का बचन दिया था। लेकिन अप्रैल में उत्तराखंड में लगी आग बहुत ज्यादा बढ़ गई इसकी चपेट में हिमाचल प्रदेश ,जम्मू -कश्मीर भी आ गए।  हमारे पौने 8 हजार एकड़ जंगल तबाह हो गए। जो पहाड़ अपने साफ वातावरण के लिए प्रसिद्ध थे। अब वे प्रदूषण की मार से सिसक रहे है। वहाँ साँस लेना भी तकलीफदेह हो रहा है। 
     इतनी बड़ी आग हमारे सरकारी तंत्र की असफलता साबित करती है। जंगलों में रहने वाले आदिवासियों से उनके अधिकार छीन लिए गए। वे भी इस के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ पा  रहे और लापरवाह हो गए  है। आदिवासियों का जीवन जंगलों से जुड़ा होता है। वे जंगलों से जितना पाते  है। उतना उसकी देखभाल करके उसे लौटा  देते है। शहरो में रहने वाले उनके महत्त्व को नकारते आये है। जिसका दुष्परिणाम इतनी भयंकर आग के रूप में हमारे सामने आया है।
      आदिवासियों के  पुरातन ज्ञान को नकारने के कारण  सरकारी तंत्र जंगलों के पनपने और फैलने की सीमा का निर्धारण नहीं कर  सके।  जब एक जगह आग लगी उसको रोकने की किसी ने कोशिश नहीं की। जब तक कोशिश की गई वह असाधारण रूप ले चुकी थी। हमारे पास उस आग को बुझाने के साधन ही नहीं थे। हमारे सरकारी तंत्र ने सजगता नहीं दिखाई।इसकी भयावहता से सब डर  गए। 
       जंगल की आग ऊपरी और निचली सतह, दो अलग -अलग तरह से लगती है। ऊपरी आग  से ज्यादा भयानक निचली सतह पर लगने वाली होती है।  निचली सतह की आग  से जीवतन्तुओ के मरने की  ज्यादा आशंका होती है। आपको सुनकर हैरानी होगी जंगल के जानवर अव सड़कों पर दिखाई देने लगे है जब उनके बसेरे ही खत्म हो गए तब वे कहाँ रहेंगे। 
      जमीन पर पड़े हुए पत्ते जमीन में जल सोखने की क्षमता बढ़ाते है। उनके कारण पानी धीरे-धीरे  से जमीन में चला जाता है।  इस आग के कारण जंगली जीवन के नुकसान के आलावा हमें बाढ़ की भयावहता का सामना भी ज्यादा करना पड़ेगा। 
      कहते है पेड़ों की पुकार सुनकर बादल बरसते है। जंगलों के खात्मे के बाद हमे बारिश का आभाव भी झेलना पड़ सकता है। 
    जंगलों को नियोजित तरिके से बसाना पड़ता है। जिसे आदिवासी हमसे ज्यादा अच्छी तरह से जानते है। तभी अब से   पहले इतनी भयंकर आग कभी नहीं लगी। सरकारी तंत्र को आदिवासियों के ज्ञान का फायदा उठा कर  समायोजन बिठाना चाहिए। आग  से निपटने के लिए सभी तरीकों का एक साथ इस्तेमाल करना भी आना चाहिए। आपने हर साल दूसरे देशो में आग लगने की खबर सुनी होगी लेकिन इतना भयंकर रूप, आग को लेते नहीं सुना होगा।  शायद हमारा सरकारी तंत्र इस घटना से सबक लेकर आगे  से सजग हो जायेगा। 

kuch sval ma se

                कुछ सवाल माँ से 

 कुछ सवाल माँ से माँ के लिए। ... 
क्यों खुश नहीं होती हो आज जब करती कुछ आपके लिए ?
क्यों नहीं कहती सब से आप  की बेटी नहीं बेटा हू मै  ?
क्यों नहीं आती नींद अब आपको रात में मेरे कारण ?
क्यों नहीं बोलती खुद से यही तो है वो जीती हुँ जिसके लिए ? 
क्यों चाहती हुँ पराये घर जाकर करू और दू वो सब जो सिखाया आपने  ? 
क्या एक मौका न दोगी मुझे कुछ पल आपके लिए ?
क्यों न करने देती हो मुझे कुछ भी अपने लिए ?
परायी  नहीं हुँ माँ ,तुम्हारी  जिंदगी भर की कमाई हुँ 
क्यों नहीं याद दिला पाती  हु मै ?
क्यों सब अपनी कमाई  देते दूसरों को ?
माँ एक विनती है आपसे की जब जाना हो , तब ही दूर  करना ,
पर हर रोज दूर होने की बात का जिक्र मत करना ,
माफ़ी मांगनी थी  हर उस बात की। . 
जिन होठो को बोलना आपने सिखाया ,
उनसे ही कुछ ऐसे शब्दों को बोलकर आपका दिल दुखाया। 
माँ गुरुर हुँ मै आपका बोझ नहीं। ... 
खुद से एकबार बोलो तो सही। ... 
जो रिश्ता बना नहीं उसके बारे में क्या सोचना। .. 
जो जन्म से जुड़ा हे उसको क्यों  छोड़ना। .. 
आज हु आपके पास कल नहीं हुई  तब मत रोना। ......... 
मुग्धा पाठक 

#kumbh mela

                                  कुम्भ मेला 

   
   भारत में आठवीं   शताब्दी से कुम्भ मेला भव्य तरीके से  मनाया जाता है। अलग -अलग समूहों ने इसके बारे में अपने मत व्यक्त किये है.  इसके प्रचलन में आदि शंकराचार्य का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके आयोजन में राजा हर्षवर्धन भाग लेते थे। उनके बारे में कहा जाता है। वे इस मेले में अपना सब कुछ दान कर देते थे। 
       समुद्र मंथन के समय अमृत निकलने पर देव और दानव  दोनों में इसे प्राप्त करने की होड़  लग गई। अंतत विष्णु भगवान मोहिनी का रूप धर कर आये। उन्होंने उनसे अमृत बाँटने का अनुग्रह किया देव -दानव  तैयार हो गए। एक पंक्ति में देव बैठे थे दूसरी पंक्ति में दानव। पहले देवताओ को   मोहिनी ने अमृत देना शुरू कर दिया। राहु -केतु को अमृत बंटवारे पर संदेह हुआ। वे चुपचाप देवताओ की पंक्ति में बेठ  कर अमृत पी  गए। जैसे ही देवताओ को इस बारे में पता चला उन्होंने राहु केतु का सिर काट  दिया। अब देव -दानव में युद्ध शुरू हो गया. वे अमृत को लेकर भागने लगे। उनके इस युद्ध के कारण अमृत की कुछ बुँदे हरिद्वार में गंगा नदी  ,प्रयाग में संगम , नासिक में गोदावरी नदी ,और उज्जैनकी शिप्रा नदी  में गिर गई। किंवदंती के अनुसार विशेष समय इनकी नदियों का जल अमृत तुल्य हो जाता है। उस समय स्नान करने से इंसान के सारे पाप धूल जाते है। उसे पूण्य की प्राप्ति होती है। 
     कुम्भ मेला 12  साल ,अर्ध कुम्भ 6 साल बाद,हर तीसरे साल किसी एक  स्थान पर कुम्भ मेला  लगता है। महाकुंभ 144  साल बाद लगता है। यह खुशनसीबो को देखने को मिलता है। इसमें भाग लेने  वाले संसार के सभी मेलो उत्सवों की अपेक्षा बहुत ज्यादा होते है। यह उत्सव 1 से डेढ़  महीने तक चलता है। इसमें इस समय लगभग 3 करोड़ लोग समय अनुसार सम्मिलित होते है। एक दिन में 40 लाख लोग तक यहाँ भाग लेते है। इतनी अधिक संख्या में लोगो के आने से  यहाँ लगता है पूरा एक नगर बस गया है।  
     कुम्भ मेले में पूरे भारत से धार्मिक लोग आते  है। इसमें अलग -अलग अखाड़ों के साधु -सन्यासी भाग लेते है। सभी अखाड़ों के साधुओं को यदि देखना चाहते है तो इससे अच्छा अवसर और कहीं नहीं मिलेगा। इन साधुओं के स्नान करने का समय निश्चित कर दिया जाता है। इसमें सभी अखाड़े अपने पुरे साजो -सामान के साथ आते  है। उनके अद्वितीय करतव भी यहाँ दिखाई देते है। जिन्हे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते है। 
        पुराने समय में शासन का इसके प्रबंध में कोई योगदान नहीं होता था तब इन साधुओं के अहंकार के कारण बड़ी संख्या में लड़ाई और मार -काट होने लगी। जैसे नासिक में 1789  में 12000 लोगो की मृत्यु हो गई। तब से सरकार की देखरेख में इसका आयोजन होने लगा। इतने बड़े आयोजन को सफलता पूर्वक निर्वाह करना दुःसाध्य काम  है। 
    अलग -अलग राशि के अनुसार इनका आयोजन होता है  जब सिंह राशि में कुम्भ मेला लगता है उसे सिंहस्थ कुम्भ कहते है। यह उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे लगता है। इस समय एक महीने के लिए उज्जैन में कुम्भ मेला लगा हुआ है। 
     हिन्दू मान्यता के अनुसार स्नान -दान का बहुत महत्व है। यहाँ पधारने पर आत्मिक शांति का अहसास होता है। हमें लगता है। हम भगवान के करीब पहुंच गए है। यदि मन में अधयात्म में आस्था है तो इसमें जरूर सम्मिलित होना चाहिए। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...