#art of living

                                                    जीने की कला 
       
मेने कई योगगुरु के व्यायाम से संबंधित ज्ञान प्राप्त किया है लेकिन जब रविशंकर जी की" जीने की कला" कार्यक्रम में भाग लिया तब मुझे  अलग अनुभूति हुई। जिसे में आप सबके साथ साझा करने जा रही हूँ। 
       उन्होंने अधिकतर  व्यायाम में  हमें आँख बंद करके और साँस पर ध्यान केंद्रित करवाया। जिसके कारण शरीर के साथ मन का भी व्यायाम हो जाता है। आँख बंद करने से हमारा संसार से सम्बन्ध कट  जाता है। हमारे विचार इधर -उधर नही जाते हम केवल अपने तक सीमित रहते है।
        साँस पर ध्यान लगाने से हम किसी और विषय पर नही सोचते। इस गतिविधि के करने के बाद हमें आत्मिक शांति मिलती है। 
     . मुझे जब नीद नही आ  रही होती हे। मुझे सोना बहुत जरूरी लगता है तब में उनके द्वारा बताई हुई योग क्रियाएँ करती हूँ। उन्हें करते हुए कब निंद्रा की गोद में चली जाती हूँ पता ही नही चलता। 
     यदि मुझे नीद ना भी आये तब भी नई ऊर्जा से भर जाती हूँ। मेरी सारी थकान मिट जाती है। मुझे लगता है। अब आलस छोड़कर नए काम में लग जाओ।हमारे मन के बुरे विचार भी तिरोहित हो जाते है। हमारी सोच सकारात्मक हो जाती है। 
       यहाँ आने से पहले मुझे ध्यान लगाना बहुत मुश्किल चीज लगती थी। लेकिन आती -जाती  सांसो  के बारे में सोचना भी ध्यान लगाने की  आरम्भिक सीढ़ी है। यह मुश्किल काम कब आसान लगने लग जाता है उसका पता  चल पाता। ध्यान लगाने के बारे में कोई और इस तरीके को  नही  बता पाता था। इसलिए मै इससे पहले कभी ध्यान नही लगा सकी।
       ध्यान लगाने के बाद मेने अनुभव किया मै अपने काम पहले से अधिक अच्छी तरह से कर पाती हूँ । मेरे रोजमर्रा के काम में गलती भी पहले से कम होने लगी है। मेरा आत्मविश्वास पहले से बढ़  गया है।
      कई व्यायाम हमें पद्मासन में  बैठकर लगाने होते है। लेकिन आजकल हमे पद्मासन लगाना बहुत मुश्किल लगता है। अधिकतर लोग इसे पूरी तरह लगा ही नही पाते। जिसके कारण आधे -अधूरे  पद्मासन के फल हमें पूर्णतया मिल ही नही पाते।
       आर्ट ऑफ़ लिविंग में वज्रासन में बैठकर योग क्रियाएँ करवाई जाती है जिसके कारण शुरू में इस आसन में बैठना बहुत कठिन लगता है लेकिन एक हफ्ते में ही लोग वज्रासन (उलटे पैर करके बैठना )लगाने लगते है। इसके द्वारा पूरे पैर का व्यायाम हो जाता है इसके आलावा पेट के सारे  रोग भी दूर होने लगते है। यहाँ प्राणायाम से संबंधित क्रियाएँ भी इसी आसान में करवाई जाती है जिससे हमारे  पूरे शरीर को इसका सुफल मिलता है। 
        हमें अपना ध्यान दोनों भवो के बीच में केंद्रित करने के लिए कहा गया तब मुझे इसका औचित्य समझ नही आया लेकिन हमारी इस जगह पर पिनियल ग्रंथि होती है। यह सुप्त अवस्था में रहती है। इससे वह कार्य करने लगती है। 
        कुछ समय पहले मेने अमरीकी शोध में पड़ा यदि आपके सिर में दर्द हो रहा है तो आप अपने दांतो के बीच में पेंसिल हलके से रख ले उसे दबाये नही आपका कुछ समय में सिर का दर्द ठीक हो जायेगा।सच में पेंसिल दांतो के बीच रखने से मेरे सिर का दर्द ठीक हो गया।  मेने जब अपना ध्यान भ्रूमध्य केंद्रित किया तब मुझे लगा मेरे दांतो के बीच पेंचिल के बराबर अंतर आ गया है इसके  कारण मेरे चेहरे और सिर को बहुत आराम मिल रहा है। आप भी अपने दांतो को ऊपर रखने के स्थान पर कुछ दूर रख कर देखे स्वयं इसकी अनुभूति होगी। 
     मेरा पोस्चर सही नही था। इसके कारण मेरी पीठ और कंधो  में बहुत दर्द रहता था। अधिक समय तक काम करना मेरे लिए यंत्रणा के सामान था।जिंदगी दुःख सहते हुए गुजर रही थी। यहाँ के व्यायाम के द्वारा मेरा पोस्चर सही हो गया।
       आधुनिक और शहरी माहौल में रहते हुए हमारी आदते कब दुखदायी हो जाती है पता ही नही चलता। हम आगे झुककर पूरे दिन काम करते रहते है। हम गाव के लोगो के सामान सिर पर समान लेकर नही चलते इस कारण हमें हाथ ऊपर करने की आदत नही रहती जिसके कारण आधुनिक समाज में पीठ ,गर्दन और कंधे का दर्द अधिकतर लोगो को अपने कब्जे में ले रहा है। इन्होने हाथ ऊपर करने की कसरते करवा कर हमें इस दर्द से मुक्ति दिलवाई। 
      हम मोटापे की समस्या से जूझ रहे है। अधितर लोगो को मोटापे को कम करने का तरीका पता नही होता यहाँ आकर मुझे उन्होंने समझाया हमारे लिए जीने के लिए  एक मुट्ठी खाना काफी है। जितना अधिक खाना हम खाते है वह हमारी जरूरत से ज्यादा होने के कारण मोटे हो रहे है। इसका मतलब एक रोटी और एक कटोरी सब्जी काफी है।
       कम खाना खाने के कारण मुझे आलस नही आता साथ ही मेरी मोटापे की समस्या भी हल हो गयी आरम्भ में मुझे कम खाना बहुत दुखदायी लग रहा था। लेकिन अब मै ज्यादा खाना खा ही नही पाती हूँ। अब मुझे ज्यादा खाने के कारण आलस और बेचैनी होती है। मुझे लगता है मेँ ज्यादा खाना खाकर  बीमारो की तरह जीवन जी ही नही सकती हूँ। 
मेने इस कक्षा के बाद अपने अंदर बहुत जयादा बदलाव महसूस किये। आज में आत्मविश्वास से परिपूर्ण और सफल जिंदगी जी रही हूँ। उनका योगदान कभी भूल नही सकूंगी।  

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