#ranikhet or jivan

                                                  रानीखेत 

     
दिल्ली की भीड़भाड़ में रहने वालो के लिए रानीखेत का माहौल ऐसा  लग रहा था मानो  स्वर्ग में आ गए है। बिलकुल शांत वातावरण प्रदुषण का नामोनिशान नहीं था। हरे भरे जंगल और साफ सुथरी सड़के कही कूड़ा -कर्कट नहीं दिखाई दिया। लग रहा था यहाँ के लोग कितने सफाई पसंद है। हर तरफ सफाई दिखाई दे रही थी। पेड़ों के पत्ते बिना धूल के हरे भरे बहुत सुंदर लग रहे थे।ये पेड़ लगभग ४० से 60 फीट तक ऊँचे थे।  उन्हें देखकर मन नहीं भर रहा था। दिल्ली के पत्तो को बिना पानी  से  साफ किये मुंह में डालने की हिम्मत कोई विरला ही कर  सकता है।  वहाँ के पत्तो को छूने का मन अनायास ही कर  उठता है। 
      एक बार मेरी सहेली ने मुझे बताया था कि -खेतों में घूमते हुए जब कोई सब्जी खाने का मन करता था हम उसे तोड़ कर और पोंछ कर खा लेते थे। 
     हमने उसका बहुत मजाक बनाया था कि - तुम बहुत गंदगी पसंद हो बिना धोए कभी  खाना नहीं चाहिए।लेकिन यहाँ आकर पता चला कि  रानीखेत जैसी जगह पर धूल -मिटटी और गंदगी का नाम ही नहीं था।
       वहाँ के होटलों की खिड़किया अधिकतर कांच की बनी हुई है। उनसे देखते हुए पता ही नहीं चलता की कमरे और बाहर के बीच में कांच की दीवार है। वे शीशे इतने साफ थे कि  उनकी विशेष सफाई के बारे में लोगो से पूछा तो जानकर हैरानी हुई। बाहर से उन शीशों को कोई साफ ही नहीं करता। वे तो केवल अंदर की तरफ से साफ किये जाते है। बाहर से साफ करना उन्हें बहुत कठिन था। क्योंकि उनको बाहर  खड़े होकर साफ करने का कोई स्थान  नहीं था। इसलिए उनकी बातो पर यकीं करना पड़ा। 
     रानीखेत में किसी तरह की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। वहाँ  केवल प्रकृति की आवाज ही गुंजायमान थी इतना शांत माहौल  मन को मोह रहा था। 7 बजे तक सड़के सुनी हो गई। सारी दुकाने बंद हो जाने के कारण बाहर निकल कर घूमना व्यर्थ हो जाता है। कमरे में बैठ क्र t.v.  देखकर या कोई खेल खेलकर समय बिताया जा सकता है। यहाँ डिश ऐन्टेना के द्वारा ही t.v.  सिग्नल पकड़ पाता  है। यहाँ  सरकार  के लिए प्रत्येक स्थान तक बिजली पहुंचा  पाना बहुत कठिन है। इसके लिए सड़कों पर सोलर लाइट का इंतजाम किया गया है। मेने जीवन में पहली बार सूर्य की ऊर्जा से सड़के रोशन देखी। सोलर ऊर्जा से पहाड़ों पर बिजली की जरूरत पूरी करना आसान है। 
       रानी खेत की आबादी बहुत कम है। यहाँ के लोग बहुत मेहनती  और सीधे -सादे है । मुझे वहाँ की औरते बहुत कम शाल पहने दिखाई दी जबकि ठण्ड बहुत अधिक थी। उन्हें  काम करने में दिक्क्त महसूस न हो इसलिए शाल का इस्तेमाल नहीं करती है।पहाड़ी लोग मुझे मोटे नहीं दिखाई दिए। वहाँ का वातावरण और उनकी कर्मठता ही उन्हें सुडौल बनाए हुए थी  
      मुझे वहाँ इंटरनेट की कमी महसूस हुई। दिल्ली में रहने के कारण इसकी बहुत आदत पड जाती है कई फोन के सिग्नल नहीं आ रहे थे. हमें लगा हमारा फोन ख़राब हो गया लेकिन दिल्ली आने पर फिर से सब ठीक हो गया।
       वहाँ का पानी का स्वाद बहुत अच्छा था। उसमे प्रदूषण का कण नहीं था। वहाँ कही भी हमें पानी  की बोतल खरीदने की जरूरत महसूस नहीं हुई। हर जगह का पानी लग रहा था मानो r.o. से साफ करके लाया गया है। 
      रानीखेत में गोल्फकोर्स बहुत बडी  और खुली हुई जगह थी इतनी बड़ी जगह में यह फैला हुआ था कि  मैदानी इलाका लग रहा था। 
      सैनिक संग्रहालय में कुमाऊ रेजिमेंट से सम्बंधित चीजे रखी गई थी वहाँ के सैनिक अधिकारी ने इतने मनोरंजक तरी के से उन सबका वर्णन किया कि हमारे मन में फौजियों के कठोर बर्ताव का भरम दूर हो गया।  .चौबटिया बाग,राममंदिर ,झुला देवी मंदिर बहुत अच्छे लगे। इस मंदिर को आप घंटियों वाला मंदिर भी कह सकते है। इस मंदिर में लोगो की इच्छाएं पूरी होने पर लोग घंटिया बांध जाते है. कहावत है जबसे यह मंदिर बना हे हिंसक प्राणियों के आक्रमण कम हो गए है। 
    जीवन का अनूठा अनुभव लेना चाहते हो तो रानीखेत का भ्रमण अवश्य करना चाहिए। आपको स्वर्गिक अनुभूति का अहसास होगा।    

#rail ke safar me badlav

     
रेल का सफर मेने कई बार किया है लेकिन इस बार सफर में आन्नद का अनुभव हुआ। मुझे रेल के सफरमें पहले की अपेक्षा सफाई अधिक देखने को मिली पहले मुझे  कभी रेल में इतनी ज्यादा सफाई कभी दिखाई नही दी थी।  रेल की पटरियां और प्लेटफार्म इस तरह साफ थे जैसे घर के फर्श हो दिल्ली जैसी जगह जहाँ  लाखो लोग आते है वहाँ  घर जैसी सफाई हैरानी का सबब बन रही थी। इससे पहले रेल की पटरी को देखने की हिम्मत नही होती थी वहाँ  भी सफाई दिख रही थी।
     रेल के टॉयलेट में सफाई थी लेकिन पानी के कम प्रयोग के कारण बदबू का अनुभव हो रहा था। उससे मुक्ति का भी कोई उपाय होना चाहिए। 
      इससे पहले शताब्दी ट्रेन में पत्रिका "रेलबंधु "नही मिली। इस बार पत्रिका पढ़ने के बाद उसके लेख अच्छे लगे। इसमें रेल के सफर के बारे में बताया गया था। उसमे मनोरंजक लेख भी थे। रेल बजट में हुए परिवर्तन को विस्तृत रूप से बताया गया था। रेल से जुड़े स्थानो पर होने वाले उत्सवो  के बारे में बताया गया था। जिन्हे घूमने का शौक हे यह उनके लिए लाभप्रद साबित होगा। 
      गाड़ी के शुरू होते ही गाड़ी में पानी की व्यवस्था शुरू हो गयी सुबह और ठण्ड के समय एक लीटर की पानी की बोतल पीने   की हिम्मत नही होती लेकिन एक लीटर की  बोतल मिलने पर थोड़ी  देर बाद उसे पीने के बारे में सोचना पड़ा लेकिन दिल्ली से काठगोदाम के पांच  घंटे के सफर में पूरी बोतल खत्म बहुत कम लोग कर सके थे. अधिकतर लोग आधी  से अधिक पानी भरी बोतले  वहाँ छोड़ कर चले गए। पानी की बर्बादी देख कर दुःख हो रहा था। इसके स्थान पर लम्बे सफर और  गर्मी के दिनों में एक लीटर और छोटे सफर में आधी लीटर पानी की बोतलों की  व्यवस्था करने से पानी की बचत होगी। जिन्हे ज्यादा प्यास लगती है उनके मांगने पर दूसरी बोतल का प्रबंध किया जा सकता है। सर्दी में ज्यादा पानी पीने  वाले २० % लोग ही होंगे। 
    पानी के एकदम बाद नींबू पानी दे गए। उसके बाद अख़बार आ गया। लगभग आधे घंटे के बाद चाय और बिस्कुट दे गए।  ये सब इतनी जल्दी आ  रहे थे कि उनके काम की प्रशंसा करने का मन कर रहा था। साढ़े  आठ बजे तक नाश्ता भी दे गए। अभी एक सामान खा कर निबटे भी नही थे की दूसरा सामान आ  जाता  था।  उनके काम की फुर्ती देखकर हैरानी हो रही थी। खाना भी गर्म और स्वाद था। . उसके बाद पुरे सफर में कुछ नही मिला। 
     लेकिन नाश्ता करने के बाद वेटर जब हमसे टिप लेने आये वह बिलकुल अच्छा नही लगा। ये सरकारी कर्मचारी है। इन्हे महीने भर का वेतन मिलता है। उनके टिप मांगने पर पाबंदी लगनी चाहिए। 

#world culture festival

       
 विश्व सांस्कृतिक महोत्सव  की भव्यता देखकर आँखे चकाचोंध हो गयी। उसके मंच की लम्बाई और चौड़ाई  इससे पहले कभी किसी ने नही देखी  थी। इतना बड़ा मंच जिसपर एक समय में 35 हजार लोग अपना कार्यक्रम दे सके इससे पहले किसी ने कल्पना भी नही की थी।
          इस कार्यक्रम  को लेकर बहुत ज्यादा राजनीतिक  कठिनाइयाँ  पैदा की गयी। उन लोगो को इतनी भी शर्म नही आई कि  इसके द्वारा भारत का गौरव बढ़ेगा घटेगा नही। इस कार्यक्रम की धूम देश -विदेश में छाई हुई है।  गुरूजी का नाम शांति स्थापित करने वालो में अग्रगणीय है। इसके लिए उनका नाम शांति के नोबल पुरुस्कार के लिए अमरीका के द्वारा भेज दिया गया है।
     अभी तक विवेकानंद जी के आलावा किसी अन्य ने धर्म के मार्ग पर बिना किसी मतभेद के इतना नाम देश विदेश में नही कमाया है।हम उनके नाम को मिटटी में मिलाने में लगे ये अच्छा नही है।
        प्राकृतिक विपदा रूपी बारिश ने भी अवरोध पैदा किया जिसके कारण चारो और ठण्ड और कीचड़ बड़  गयी। बारिश की बूंदे और ठिठुरन का सामना करते हुए भी लोगो ने पूरे कामो को देखा और अपना सहयोग दिया। इस संगठन के लोग दुसरो की सहायता करने के लिए सदैव तैयार रहते है।  
            लोगो का उत्साह देखने लायक था। मुझे इस कार्यक्रम को देखने के लिए 3  घंटे जाम में फंसना पड़ा। उसके बाद कीचड़ में  4  किलोमीटर पैदल चलकर वहाँ पहुँच,  लोगो का जमघट देखकर हैरान हो गयी। मेरे जैसे अनेक लोग इतनी परेशानियों के बाबजूद वहाँ पहुंचकर अपने जीवन को सार्थक समझ रहे थे। लोगो के उत्साह में कोई कमी नही थी.
        इस कार्यक्रम को 185  देशो में देखा गया और 168 देशो के लोगो ने इसमें शिरकत की। इस में सभी धर्मो के लोगो ने अपने विचार प्रस्तुत किये। सभी देशो के लोगो ने अपने देश के भव्य कार्यक्रम पेश किये। हमें एक ही मंच पर सभी देशो के लोगो को देखने का मौका पहली बार मिला है। 185 देशो के लोगो ने भारत की विविधता में एकता देखी। भारतीय कपड़ो , नृत्य कलाओ और  वाद्य यंत्रो की  विविधता कही और नही देखी जा सकती है।
      कई देशो ने गुरूजी से विश्व सांस्कृतिक महोत्सव कार्यक्रम को उनके देश में आयोजित करने के लिए आग्रह किया है। यह हम सबके लिए सम्मान की बात है।
     इस कार्यक्रम में जब पाकिस्तान का सूफियाना नृत्य  पेश हुआ तब लोगो में विशेष उत्साह देखने को मिला। मुझे लग रहा था मुस्लिम देशो के लोग विरोध स्वरूप इसमें भाग नही लेंगे। लेकिन अधिकतर मुस्लिम देशो के लोग इसमें शामिल हुए जो   इनकी हिन्दू छवि को सर्वधर्म समभाव में बदलने में सफल रहा ।
      जीने की कला के माध्यम से हमें बताया गया हमारे शरीर की ९०% गंदगी सांसो के द्वारा बाहर निकाल दी जाती है लेकिन साँस लेने का तरीका यदि हमे सही तरह से आ जाये।
     हमें सदेव मुस्कुराते रहने का पाठ सिखाया जाता है हम निश्छल  भाव से मुस्कुराना भूल चुके है। मुस्कुराने से हमारे चेहरे की बहुत सारी मांसपेशिया कार्य करती है जिससे खून का दौरा बढ़ जाता है।  चेहरे की सुंदरता भी बढ़ जाती है। जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश करते -करते कब  हमारे  दुःख दूर हो जाते है। और हम खुशियो के सागर में गोते लगाने लगते है इसका अहसास ही नही होता। वैज्ञानिक शोध से भी यह सही साबित हो चूका है।
     भारत के बहुत सारे मुख्यमंत्रियों और मंत्रियो ने आकर इस उत्सव का गौरव बढ़ाया है। केवल कांग्रेस ने अपनी कड़वाहट छिपाने की कोशिश नही की।
     दिल्ली के मुख्यमंत्री जी ने गुरूजी से स्वछता अभियान में सहयोग देने का आह्वान किया है इनके सहयोग से भारत सफाई के कार्यक्रम में सफल होगा। इस संगठन के लोग निष्काम भाव से समर्पित होते है। उन्हें दुसरो के लिए काम करके ख़ुशी होती है।  

hindi vishay me jyada marks kese laye

                                         हिंदी में ज्यादा अंक कैसे लाये 
         
 हिंदी में अच्छे अंक के बारे में सभी के दिमाग में यही बात रहती है।कि  इस विषय में कम नम्बर मिलते है। इस कारण बच्चे हिंदी की अपेक्षा दूसरे विषय लेते है। कुछ पाढ़यक्रम में या सरकारी नौकरी के लिए 10 कक्षा में हिंदी विषय को पास करना बहुत जरूरी होता है। इसके बिना सरकारी नौकरी या किसी विशेष पाठ्यक्रम में प्रवेश निषेध होता है। निजी विद्यालयों में पढ़ने  वाले या अंग्रेजी माद्यम से पढ़ने वालो के दिल में हिंदी विषय को लेकर विशेष डर बैठा होता है। आज में उनके मन से वह डर दूर करने की कोशिश कर रही हूँ। 
          पेपरों में जितने नम्बर का प्रश्न आये उसे उतने ही हिसाब से करना है। मान लो एक प्रश्न एक नंबर का है। उसे केवल एक अक्षर में उत्तर दे देना चाहिए या अधिक से अधिक एक लाइन में उत्तर देना काफी है। इससे ज्यादा समय देना समय की बर्बादी मानी जाएगी। 
    दो नम्बर की प्रश्न का उत्तर केवल दो लाइनो तक सीमित रखे। 
    तीन नम्बर के प्रश्न का उत्तर केवल तीन से पांच लाइनो तक सीमित रहना चाहिए। 
    कुछ प्रश्न एक नंबर और पांच नंबर दोनों में आ  जाते है। एक नंबर के प्रश्न को केवल सीमित शब्दों में उत्तर दे। उसमे पूरा ज्ञान उड़ेलने की जरूरत नही होती है। जबकि 6  नम्बर के प्रश्न में कमसकम आधा पेज जरूर भरे वरना सही नंबर नही मिल सकेंगे।
       सबसे अधिक अंक निबंध  के  है। छात्र उसे याद करने की अपेक्षा मन से लिखने पर जोर देते है। लेकिन जब आप निबंध मन से लिखोगे तो नम्बर 3  या चार ही मिलेंगे। उससे ज्यादा नंबरों के लिए आपको इसे याद करना बेहद जरूरी है। लेखको के वाक्य या कविताओ की पक्तियों को लिखने से अधिक नंबर मिलते है। जिसका महत्व हम नही समझते। हमेशा पहला पेराग्राफ और आखिरी पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसका प्रभाव पुरे निबंध के नंबरों पर पड़ता है। 
     पत्र  लिखने के तरीके के अनुसार नम्बर मिलते है। यदि पत्र पेराग्राफ की तरह लिखोगे तो उसे काट दिया जाता है कोई उसे पढ़ना  जरूरी नही समझता। पत्र अधिकतर पांच नंबर का होता है  जिसमे लिखने के तरीके के ही 3 नंबर तक प्राप्त हो सकते है। आप पत्र   का महत्व समझ ही गए होंगे। 
        प्रश्नो के उत्तर पेराग्राफ में देने की जगह पॉइंट में लिखने से ज्यादा नंबर मिलते है। पेराग्राफ में अद्यापक  को सीमित ज्ञान का आभास होता है जबकि क्रम  से लिखने पर उसे ज्यादा और विशेष  ज्ञान का भ्रम होता है।  
       व्याकरण के प्रश्नो के नंबर सही होने पर पूरे मिलते है। इस का विशेष ध्यानं रखना चाहिए। व्याकरण हमेशा अच्छी तरह याद करना चाहिए। जो आपने 2 कक्षा में पड़ा होता है। वह किसी ना किसी रूप में हमेशा प्रयोग होता रहता है। जबकि बाकि पाठ्यक्रम बदलता रहता है। जबकि व्याकरण हमेशा एक ही रहता है। यदि आपने शुरू की कक्षाओ में सही तरीके से व्याकरण का अभ्यास किया है तो इसका  सारी जिंदगी के अलावा नौकरी की प्रतिस्पर्धा में फायदा पहुचेगा।
          यदि पेपर 100 नंबर का है। तो उसमे 40  नम्बर के प्रश्न केवल व्याकरण से सम्बंधित होते है जो कभी बदलते भी नही है। 
      हमेशा सुलेख पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सुलेख लिखने वाले को  हमेशा गन्दी लिखावट वाले से ज्यादा नंबर  मिलते है।  समान लिखने पर भी अच्छी लिखावट वाला ज्यादा नंबरों का भागीदार बन जाता है। सुंदर लेख का अपना महत्व है। 
   यदि इन सब बातो पर विशेष ध्यान रखा जाये तो आजकल हिंदी में भी 100  में से 100 नंबर मिल सकते है। 
   

#art of living

                                                    जीने की कला 
       
मेने कई योगगुरु के व्यायाम से संबंधित ज्ञान प्राप्त किया है लेकिन जब रविशंकर जी की" जीने की कला" कार्यक्रम में भाग लिया तब मुझे  अलग अनुभूति हुई। जिसे में आप सबके साथ साझा करने जा रही हूँ। 
       उन्होंने अधिकतर  व्यायाम में  हमें आँख बंद करके और साँस पर ध्यान केंद्रित करवाया। जिसके कारण शरीर के साथ मन का भी व्यायाम हो जाता है। आँख बंद करने से हमारा संसार से सम्बन्ध कट  जाता है। हमारे विचार इधर -उधर नही जाते हम केवल अपने तक सीमित रहते है।
        साँस पर ध्यान लगाने से हम किसी और विषय पर नही सोचते। इस गतिविधि के करने के बाद हमें आत्मिक शांति मिलती है। 
     . मुझे जब नीद नही आ  रही होती हे। मुझे सोना बहुत जरूरी लगता है तब में उनके द्वारा बताई हुई योग क्रियाएँ करती हूँ। उन्हें करते हुए कब निंद्रा की गोद में चली जाती हूँ पता ही नही चलता। 
     यदि मुझे नीद ना भी आये तब भी नई ऊर्जा से भर जाती हूँ। मेरी सारी थकान मिट जाती है। मुझे लगता है। अब आलस छोड़कर नए काम में लग जाओ।हमारे मन के बुरे विचार भी तिरोहित हो जाते है। हमारी सोच सकारात्मक हो जाती है। 
       यहाँ आने से पहले मुझे ध्यान लगाना बहुत मुश्किल चीज लगती थी। लेकिन आती -जाती  सांसो  के बारे में सोचना भी ध्यान लगाने की  आरम्भिक सीढ़ी है। यह मुश्किल काम कब आसान लगने लग जाता है उसका पता  चल पाता। ध्यान लगाने के बारे में कोई और इस तरीके को  नही  बता पाता था। इसलिए मै इससे पहले कभी ध्यान नही लगा सकी।
       ध्यान लगाने के बाद मेने अनुभव किया मै अपने काम पहले से अधिक अच्छी तरह से कर पाती हूँ । मेरे रोजमर्रा के काम में गलती भी पहले से कम होने लगी है। मेरा आत्मविश्वास पहले से बढ़  गया है।
      कई व्यायाम हमें पद्मासन में  बैठकर लगाने होते है। लेकिन आजकल हमे पद्मासन लगाना बहुत मुश्किल लगता है। अधिकतर लोग इसे पूरी तरह लगा ही नही पाते। जिसके कारण आधे -अधूरे  पद्मासन के फल हमें पूर्णतया मिल ही नही पाते।
       आर्ट ऑफ़ लिविंग में वज्रासन में बैठकर योग क्रियाएँ करवाई जाती है जिसके कारण शुरू में इस आसन में बैठना बहुत कठिन लगता है लेकिन एक हफ्ते में ही लोग वज्रासन (उलटे पैर करके बैठना )लगाने लगते है। इसके द्वारा पूरे पैर का व्यायाम हो जाता है इसके आलावा पेट के सारे  रोग भी दूर होने लगते है। यहाँ प्राणायाम से संबंधित क्रियाएँ भी इसी आसान में करवाई जाती है जिससे हमारे  पूरे शरीर को इसका सुफल मिलता है। 
        हमें अपना ध्यान दोनों भवो के बीच में केंद्रित करने के लिए कहा गया तब मुझे इसका औचित्य समझ नही आया लेकिन हमारी इस जगह पर पिनियल ग्रंथि होती है। यह सुप्त अवस्था में रहती है। इससे वह कार्य करने लगती है। 
        कुछ समय पहले मेने अमरीकी शोध में पड़ा यदि आपके सिर में दर्द हो रहा है तो आप अपने दांतो के बीच में पेंसिल हलके से रख ले उसे दबाये नही आपका कुछ समय में सिर का दर्द ठीक हो जायेगा।सच में पेंसिल दांतो के बीच रखने से मेरे सिर का दर्द ठीक हो गया।  मेने जब अपना ध्यान भ्रूमध्य केंद्रित किया तब मुझे लगा मेरे दांतो के बीच पेंचिल के बराबर अंतर आ गया है इसके  कारण मेरे चेहरे और सिर को बहुत आराम मिल रहा है। आप भी अपने दांतो को ऊपर रखने के स्थान पर कुछ दूर रख कर देखे स्वयं इसकी अनुभूति होगी। 
     मेरा पोस्चर सही नही था। इसके कारण मेरी पीठ और कंधो  में बहुत दर्द रहता था। अधिक समय तक काम करना मेरे लिए यंत्रणा के सामान था।जिंदगी दुःख सहते हुए गुजर रही थी। यहाँ के व्यायाम के द्वारा मेरा पोस्चर सही हो गया।
       आधुनिक और शहरी माहौल में रहते हुए हमारी आदते कब दुखदायी हो जाती है पता ही नही चलता। हम आगे झुककर पूरे दिन काम करते रहते है। हम गाव के लोगो के सामान सिर पर समान लेकर नही चलते इस कारण हमें हाथ ऊपर करने की आदत नही रहती जिसके कारण आधुनिक समाज में पीठ ,गर्दन और कंधे का दर्द अधिकतर लोगो को अपने कब्जे में ले रहा है। इन्होने हाथ ऊपर करने की कसरते करवा कर हमें इस दर्द से मुक्ति दिलवाई। 
      हम मोटापे की समस्या से जूझ रहे है। अधितर लोगो को मोटापे को कम करने का तरीका पता नही होता यहाँ आकर मुझे उन्होंने समझाया हमारे लिए जीने के लिए  एक मुट्ठी खाना काफी है। जितना अधिक खाना हम खाते है वह हमारी जरूरत से ज्यादा होने के कारण मोटे हो रहे है। इसका मतलब एक रोटी और एक कटोरी सब्जी काफी है।
       कम खाना खाने के कारण मुझे आलस नही आता साथ ही मेरी मोटापे की समस्या भी हल हो गयी आरम्भ में मुझे कम खाना बहुत दुखदायी लग रहा था। लेकिन अब मै ज्यादा खाना खा ही नही पाती हूँ। अब मुझे ज्यादा खाने के कारण आलस और बेचैनी होती है। मुझे लगता है मेँ ज्यादा खाना खाकर  बीमारो की तरह जीवन जी ही नही सकती हूँ। 
मेने इस कक्षा के बाद अपने अंदर बहुत जयादा बदलाव महसूस किये। आज में आत्मविश्वास से परिपूर्ण और सफल जिंदगी जी रही हूँ। उनका योगदान कभी भूल नही सकूंगी।  

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...