# truth of quarantine center


                                   कवारण्टीन  का सच 

   
  जिस राज्य में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के  जाने पर  बंद का ऐलान  कर दिया जाता है। जहां कमिश्नर किरण बेदी को आधी रात  को शहर छोड़ना पड़ा, सोचो  उस राज्य में साधारण बाहरी  लोगो के साथ कैसा  सलूक होता होगा। 
    बाहरी  लोगो को वहां के लोग स्वीकार नहीं करते। उनके चेहरे और भाषा बिलकुल अलग होने के कारण हम उनके बीच जगह नहीं बना पाते। 
    यदि ऐसे में मणिपुरी लोग हमारी मदद भी करना चाहते है तब उनको भी अलगाववादी लोग अनेक तरह से परेशान करते है। भाषा के आभाव में हम उन्हें अपनी बात सही तरीके  से समझा नहीं पाते। ऐसे में इन स्थानों पर आम बाहरी  इंसान को सोचो कितना डर  लगता है। वह हमेशा डर  कर जीता है। 
       सं 2017  में उत्तर  पूर्वी राज्यों में पहली बार  औरतो और दिव्यांग लोगो की केंद्रीय विद्यालय संगठन  ने नौकरी दी। इससे पहले कभी इन राज्यों में दिव्यांगों और औरतो की नियुक्ति नहीं होती थी। वहां उनकी सुरक्षा और रहने का उचित इंतजाम नहीं किया गया। 
          जिन विद्यालयों में रहने का इंतजाम नहीं होता वहां पर  लोगो के घर जाकर अनजाने लोगो से अपने लिए घर मांगना कितना मुश्किल होता है। ऐसी हालत का सामना मुझे करना पड़ा।  
          केंद्रीय विद्यालय अभी खुले नहीं है। लेकिन उनके प्रधानाचार्य ने उन्हें समय से पहले बुला लिया। जबकि अभी केवल ऑनलाइन क्लासेज हो रही है। ये कक्षाएं कही से भी ली जा सकती है। 
        उनके मणिपुर पहुंचने  पर उन्हें  क्वारंटाइन सेण्टर में रखा गया  .जहाँ किसी तरह की सुविधा नहीं थी। ये सुबह पांच बजे 23..6 . 20   को घर से निकले थे। रात  8  बजे कवारण्टीन में रहने की जगह दी गई। ये  थकने के कारण जल्दी सो गए।  24  को उन्होंने सफाई के लिए बात की। लेकिन किसी ने नहीं सुना। अब ये दो दिन से नहीं नहाये थे। इनके पास कपड़े भी बहुत कम  हे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था । इतने गंदे स्नानागार में कैसे नहाये और कपड़े धोये।  इस समय सफाई कर्मचारी से सफाई को लेकर इनकी कहासुनी  हो गई। उसने थाने  जाकर FIR  दर्ज करवा दी।
        अगले दिन पुलिस 12  बजे इन्हे ले गई। उनके अनुसार इनकी शिकायत दर्ज हुए  दो दिन हो गए थे। अब शनिवार और इतवार की छुट्टी के कारण कोई काम नहीं हो सकेगा। 
      जो  बच्चे कोरोना काल  में घर में घुसते ही घर के हैंडल, चाबी,थैले  साफ करते थे।   सिर  से पैर  तक नहाते थे। उन्हें ऐसे  क़्वारण्टीन केंद्र में ठहराया गया। जहां केवल गंदगी थी। स्नानागार और शौचालय भी गंदे थे। पानी का इंतजाम नहीं था  . 
        जिंदगी हर किसी  को प्यारी होती है। ऐसी गंदगी को साफ करने के लिए कहा  गया तब उन्होंने ध्यान नहीं दिया। झाड़ू, पोंछा जैसे सामान मांगने पर नहीं दिए गए। उन्होंने सोचा हम खुद सफाई कर लेंगे।  साफ जगह रहने से बीमारियों से बच सकते है।   भाषा के आभाव में उन्हें ये लोग अपनी बात समझा नहीं पा  रहे है। 
        खाने का भी सही इंतजाम नहीं था।  विरोध करने पर इन्हे झूठे इल्जाम में फंसा  कर जेल भेज दिया गया उन्होंने एक बार भी हालत बदलने के बारे में नहीं सोचा। 
      नॉन मणिपुरी लोगो से वहां के लोग बहुत नफरत करते है। इससे पहले भारत के  किसी राज्य में आपने  क़्वारण्टीन किये लोगो को जेल जाते सुना है? कभी नहीं ? जिसमे चार लड़कियां और एक दिव्यांग लड़का है। 
        सफाई कर्मचारी ने खुद अपने को घायल कर लिया। FIR  दर्ज करा दी। अब हमारे बच्चे जेल में बंद कर दिए गए है। जिनकी कही सुनवाई नहीं हो रही है। भारत में एक तरफ बेटी बचाओ ,बेटी पढ़ाओ का अभियान चलाया जा रहा है  .तो वही  दूसरी तरफ पढ़ाती हुई बेटियों को जेल में डाला जा रहा है। 
       दिव्यांग पर भी तरस  नहीं खाया जा रहा है। जबसे ये बच्चे वहां गए तभी से ये सभी जगह फरियाद कर रहे थे। किसी ने सुनवाई नहीं की। लेकिन उस सफाई कर्मचारी के आरोप को सच मान कर इन्हे जेल में डाल  दिया गया है।उसके कहे पर किसी ने सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की 
      जेल में भी खाने का इंतजाम नहीं है। वही के एक शुभचिंतक ने दो समय खाना भिजवाया है। देखते है कितने समय तक  वे उन्हें खाना पहुंचाने  की जिम्मेदारी निभाते है  .
           सरकार के ऐसे इंतजामों से मौतों की संख्या हजारो में नहीं बल्कि करोड़ तक पहुंच जाये तो मुझे हैरानी नहीं होगी। 
     अब मुझे लगता है इन्ही हालातो के कारण लोग क़्वारण्टीन केन्द्रो में पहुंचना नहीं चाहते। ट्रेन वाले आउटर पर गाड़ी रुकवा कर उतर  रहे है।  यदि पहुंचते है तो आत्महत्या कर रहे है।
             जेल से निकलने के बाद इन्हे निलंबित कर दिया गया है। अब आप ही बताओ मोदी जी ने सफाई अभियान किसलिए चलाया था। हमे पहले गंदगी में रहने की आदत थी। आपने ही सफाई से रहने का अहसास दिलाया। अब सफाई पर जोर देने पर , ऐसे हश्र के बारे में किसने सोचा था
         लड़कियों की नौकरी मुश्किल से लगती है  .उसपर दूर जाकर नौकरी करने की इजाजत कितने परिवार वाले दे पाते  है।
      दिव्यांग लड़का जिसकी एक आंख नहीं है। दूसरी आंख  का नंबर दस है। ऐसे समय में उस इंसान के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे।  इनका भविष्य अंधकारमय हो गया है। 
        आप केवल कमजोर वर्ग के लिए आवाज बुलंद कर रहे है।   इन रोते  बिलखते दर्द में डूबे  लोगो की आवाज  कौन सुनेगा।
           मणिपुर में अलगाव का दंश इस तरह से लगा है। उनकी मदद करने के लिए कोई तैयार नहीं है। हमे केवल आप  पर भरोसा है।
        पिछले पत्र  का कोई असर  नहीं हुआ। यदि आप हमारी तकलीफ समझते है तो अवश्य कुछ कार्यवाही कीजिये। हमें किसी तरह सूचित कीजिये ताकि हमें अहसास हो की कही हमारी सुनवाई  हो रही है।
      दर्द में डूबे  दिव्यांग और लड़कियों के अभिभावक 
         
    

#LIVE PARENTS AS CHILDREN

               बच्चो के साथ जीवन जीते अभिभावक 

  आप यदि भारत या किसी अन्य देश में आत्महत्या के बारे में जानकारी हासिल करोगे।  तब आपको पता चलेगा  कि  गरीब देश या राज्य में लोग आत्महत्या कम करते है बल्कि अमीर देश या राज्यों में लोग अधिक  आत्महत्या करते है। आपको ये जानकर हैरानी हुई या नहीं?
         संसार में अमरीका और यूरोप के देशो में आत्महत्या का औसत ज्यादा है। वैसे ही भारत में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में आत्महत्या ज्यादा की जाती है। बनिस्वत गरीब राज्यों या देशो के ?
        अमीर या मध्यम वर्ग के   लोगो के बच्चे ही अधिक आत्महत्या करते है।  इसका कारण उनका बचपन में सभी जरूरतों का पूरा होना है। अभिभावक उनकी इच्छा पूरी करते   समय, ऐसा  महसूस करते है जैसे उनकी अपनी इच्छा, इस रूप में पूरी हो रही है। . 
     बचपन में बच्चो की इच्छाएं पूरी करने में अभिभावक समर्थ होते है। लेकिन जैसे -जैसे वे बड़े होते है, समाज से जुड़ते है। उनकी इच्छाएं  दुसरो पर निर्भर हो जाती है। बाहर के लोग  उनसे जुडी सभी इच्छाएं  पूरी करना जरूरी नहीं समझते। तभी आपने आजकल 7  साल के बच्चो की आत्महत्या की खबरे भी सुनी होंगी। जबकि आजादी से पहले आपको इस तरह की खबर सुनाई नहीं देती होंगी।
     पहले समय में बच्चे संयुक्त परिवार में रहते थे। कोई भी उन्हें गलती होने पर डांट  और मार  सकता था। उनके अंदर अपमानित होने पर सहन करना सिखाया जाता था। । उन्हें  समाज द्वारा ,नौकरी में या शादी  के बाद के जीवन में अपमानित होने पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था।
       एकल परिवार में अभिभावक,  बाहरी  व्यक्ति के द्वारा कहे गए  हर शब्द को,  बच्चे के साथ खुद को भी जोड़ लेते है। उन्हें वह अपमान बच्चे से ज्यादा खुद का अपमान लगता है इसलिए  बच्चे को हर अपमान से बचाने  में दूसरो  से सम्बन्ध तोड़ने में भी देरी नहीं करते  जिसके कारण बच्चो को अपमानित होने की आदत नहीं होती।

  •      बाद में  बड़े होने पर   अपमान सहने पर उन्हें दुनियाँ  वीरान लगने लगती है। वो आत्महत्या का रास्ता चुन लेते है।
  •  ऐसे में यदि आप सारे  जीवन अपने बच्चो को जीवित देखना चाहते है। तो उनकी सभी जरूरते कभी पूरी मत कीजिये। 
  •  यदि उनकी इच्छाएं  पूरी करते है तो उसके साथ कुछ शर्ते जरूर रखे..
  •  उन्हें कभी -कभार थप्पड़ मारने  में बुराई नहीं है। 
  • क्योंकि समाज आपके समान दयालु नहीं होता। उन्हें हर कदम पर अपमान और प्रतियोगिता का सामना करना पड़ेगा।
  •  उन्होंने यदि जीवन में कभी अपमान नहीं सहा होगा तब उन्हें सुशांत  सिंह के सामान कदम उठाने में देर नहीं लगेगी। 

       आप खुद सोचिये चार बहनो का दुलारा,मन्नतो से माँगा गया बेटा , [पढ़ने -लिखने में विलक्षण ,जिस रास्ते  पर कदम रखा हर जगह सफलता पाई। ऐसे इंसान को किसी ने डांटने के बारे में सोचा होगा। कभी नहीं ?  इसलिए वह  इस वक्त समाज की बेरुखी सहन नहीं कर सका।
        ऐसी बेरुखी फिल्म लाइन में बहुत लोगो ने सहन की है। लेकिन जिन्दा है। बाद में सफल भी हुए  है।  यदि आप मेरे विचार से सहमत है। तो अन्य लोगो तक पहुंचाने  की कोशिश कीजिये क्योंकि बच्चे के जीवन में अभिभावकों की  आत्मा बसती  है।  उनकी मौत का जख्म बहुत कम  लोग सहन कर पाते  है। 
 ऐसा दुःख किसी और को सहना न पड़े इसलिए अधिक से अधिक लोगो तक इसे शेयर  करे। 

#sushant died due to factionalism

          सुशांत सिंह की मौत गुटबाजों के कारण हुई 


  सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने मुझे झकझोर दिया है। लोगो की संवेदना व्यक्त करके, उसे  श्रद्धांजलि  देना सुखद लग रहा है। लेकिन इतनी छोटी उम्र में भाग्य के दुलारे से जीवन छीन लेने वाले कौन लोग हो सकते है। उसका जानना भी जरूरी है।
      सुशांत  एक विलक्षण विद्यार्थी थे। तभी उन्हें इंन्जीनिरयरिंग के लिए दिल्ली के टेक्निकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया। उसके बाद अपने अभिनय के झुकाव के चलते इंजीनियरिंग छोड़ कर मुंबई जाने की हिम्मत जुटाई। वरना  यहाँ से पढ़ाई  करने वालो की  अच्छी  जगह नौकरी लगते देर नहीं लगती।
         उन्होंने अपने अभिनय के  शौक को पूरा करने के लिए मुंबई में पवित्र रिश्ता जैसे सीरियल में काम करके अपने लिए जगह  बनाई। इसके हिट  होने  पर  फिल्मो में प्रवेश मिल गया। उनकी अधिकतर फिल्मे हिट रही। . उनकी पिछली फिल्म छिछोरे  भी हिट साबित हुई।
      ऐसा क्या कारण था उन्हें मौत को मुँह लगाना पड़ा।  हिट फिल्मो के हीरो को  वेव सीरीज में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
     हमारे देश में मुंबई के  बाहर से आने वालो के रास्ते  बंद करने के लिए सारे  दिग्गज एक जुट हो गए थे। उसे कोई फिल्म मिलने नहीं दे रहे थे।
     जो उन्हें फिल्म में रोल देना चाह  भी रहा था। उसे डराया जा रहा था। जिससे वो उन्हें अपनी फिल्मो  से निकाल  दे।
     ये सिर्फ मेरे विचार नहीं है। बल्कि मुंबई के बहुत सारे  दिग्गज धीमी आवाज में ऐसे ;लोगो को  गिद्ध कह रहे है।नेताओ ने ऐसी गुटबंदी पर सख्ती करने के लिए आवाज उठाई है। 
      यदि आप मुझसे सहमत है।
     ऐसा कैम्पेन  शुरू करे, ऐसे बड़े बैनर की फिल्मे नकार दे। जिससे उनमे  अपने भगवान  होने का अहसास खत्म हो जाये।
        बम्बई से बाहर के लोगो को भी सपने देखने और उन्हें साकार करने का अधिकार होना चाहिए।वरना  आपके परिवार का कोई सदस्य मुंबई की मायानगरी में कदम रखने के बारे में सोच भी नहीं पायेगा।
  यदि आप मुझसे सहमत है तो इसे अधिक से अधिक फ़ैलाने में मेरी मदद कीजिये।  उसकी मौत पर मातम मनाने  का नहीं ऐसे गुटबाजों के खिलाफ एकजुट होने का समय आ गया है।
      यदि आप मुझसे सहमत है तो अधिक से अधिक  इसे शेयर कीजिये।  

#changing equations

                                 बदलते समीकरण 

 महाशक्ति का  पतन किस तरह  हो सकता है। ये आज दिखाई दे रहा है। भारत एक ट्रिलियन डालर से पांच ट्रिलियन डॉलर  के सपने देख रहा  है। पता नहीं ये सपना भारत का पूरा हो सकेगा या नहीं ? जबकि अमरीका इस समय 22  ट्रिलियन डॉलर  के साथ महाशक्ति बना हुआ है।
     आजकल के हालत सोचने पर मजबूर कर  रहे  है। इस महाशक्ति के कमजोर होने का वक्त आ गया है। या फिर से संसार की महाशक्ति के रूप में उठ खड़ा हो जायेगा। अपनी ताकत के घमंड में अमरीका ने कितने देशो को बर्बाद कर दिया, इसका उदाहरण आप कुछ बरस  पीछे  जाकर देख सकते है।
         पहले करोना  के कहर  ने उसे घुटनो पर ला दिया था। अब अश्वेत की मौत  के  कारण उपजा दंगा कब शांत हो पायेगा समझ नहीं आ रहा। भारत में दंगे इतने दिनों तक फैलते नहीं देखे थे। जितने दिन भी दंगे होते थे ,उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाता था।
          इस महाशक्ति के पास सैन्यबल भी है। लेकिन हो सकता है वहां की नेतृत्ब क्षमता के पास इससे निबटने का मनोबल नहीं है।  अब यह दंगा गृह युद्ध का रूप लेता जा रहा है।
        कई  बार लगता है। चीन जैसे विरोधी गुट  के कारण इन दंगो को भड़काया जा रहा है। जिससे अमरीका की महाशक्ति खत्म करके, चीन महाशक्ति के रूप में उठ खड़ा हो। क्योंकि चीन को इस समय रोकने की क्षमता केवल महाशक्तियों (अमरीका,इंग्लैंड ,इटली )  में है। अमरीका के आलावा यूरोप के अधिकतर देश सुलग उठे है। आने वाले समय में हो सकता है शक्ति का झुकाव एशिया की तरफ हो जाये। 

#natural disaster

          प्रकृति का विकराल रूप    

         हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो और  लोथल की सभ्यता खत्म कैसे हो गई?  मुझे समझ नहीं आता था। लेकिन अब करोना  काल  के हालात  साबित कर रहे है पूरी सभ्यता कैसे खत्म हो सकती है?
    हमारे  सामने इस समय,आजतक  ग्यारह बार भूकंप आ गए है। मेने कभी इतने कम समय में इतने भूकंप आते कभी नहीं देखे। पूरे  भारत में भूकंप  लगातार आ रहे है
    आपने बंगाल की खाड़ी  में तूफान की तबाही देखी  है ,इसकी हमे आदत पड़  गई है  क्योंकि बंगाल की खाड़ी में अक्सर तूफान आते रहते है।
        लेकिन अरब  सागर में इतना भयानक तूफान 129  साल बाद आया।
      बारिश और बाढ़  की तबाही का सामना  भारतीय लोग  करते रहते है।
      टिड्डीदल का विकराल रूप किसानो की सारी  फसल चट  कर सकता  है । अकाल जैसे हालत पैदा हो  सकते है।
      इस समय कारोबार बंद होने के कारण बेरोजगारी।
     करोना  के कारण होने वाली मौतों ने जिंदगी पर से भरोसा हटा दिया है।
       .यदि इन सब से लोग  बच भी गए। तब भी अधिकतर भारतीय लोग भूख से मर सकते है।
          पहले समय में राम ,कृष्ण और शिवजी के समय में उन्नत जीवन  की कल्पना अतिश्योक्ति लगती थी। लेकिन अब  सभ्यताओं के खत्म होने का कारण समझ में आने लगा है।मेरे मिथक टूटने लगे है।
        

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...