कवारण्टीन का सच
बाहरी लोगो को वहां के लोग स्वीकार नहीं करते। उनके चेहरे और भाषा बिलकुल अलग होने के कारण हम उनके बीच जगह नहीं बना पाते।
यदि ऐसे में मणिपुरी लोग हमारी मदद भी करना चाहते है तब उनको भी अलगाववादी लोग अनेक तरह से परेशान करते है। भाषा के आभाव में हम उन्हें अपनी बात सही तरीके से समझा नहीं पाते। ऐसे में इन स्थानों पर आम बाहरी इंसान को सोचो कितना डर लगता है। वह हमेशा डर कर जीता है।
सं 2017 में उत्तर पूर्वी राज्यों में पहली बार औरतो और दिव्यांग लोगो की केंद्रीय विद्यालय संगठन ने नौकरी दी। इससे पहले कभी इन राज्यों में दिव्यांगों और औरतो की नियुक्ति नहीं होती थी। वहां उनकी सुरक्षा और रहने का उचित इंतजाम नहीं किया गया।
जिन विद्यालयों में रहने का इंतजाम नहीं होता वहां पर लोगो के घर जाकर अनजाने लोगो से अपने लिए घर मांगना कितना मुश्किल होता है। ऐसी हालत का सामना मुझे करना पड़ा।
केंद्रीय विद्यालय अभी खुले नहीं है। लेकिन उनके प्रधानाचार्य ने उन्हें समय से पहले बुला लिया। जबकि अभी केवल ऑनलाइन क्लासेज हो रही है। ये कक्षाएं कही से भी ली जा सकती है।
उनके मणिपुर पहुंचने पर उन्हें क्वारंटाइन सेण्टर में रखा गया .जहाँ किसी तरह की सुविधा नहीं थी। ये सुबह पांच बजे 23..6 . 20 को घर से निकले थे। रात 8 बजे कवारण्टीन में रहने की जगह दी गई। ये थकने के कारण जल्दी सो गए। 24 को उन्होंने सफाई के लिए बात की। लेकिन किसी ने नहीं सुना। अब ये दो दिन से नहीं नहाये थे। इनके पास कपड़े भी बहुत कम हे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था । इतने गंदे स्नानागार में कैसे नहाये और कपड़े धोये। इस समय सफाई कर्मचारी से सफाई को लेकर इनकी कहासुनी हो गई। उसने थाने जाकर FIR दर्ज करवा दी।
अगले दिन पुलिस 12 बजे इन्हे ले गई। उनके अनुसार इनकी शिकायत दर्ज हुए दो दिन हो गए थे। अब शनिवार और इतवार की छुट्टी के कारण कोई काम नहीं हो सकेगा।
अगले दिन पुलिस 12 बजे इन्हे ले गई। उनके अनुसार इनकी शिकायत दर्ज हुए दो दिन हो गए थे। अब शनिवार और इतवार की छुट्टी के कारण कोई काम नहीं हो सकेगा।
जो बच्चे कोरोना काल में घर में घुसते ही घर के हैंडल, चाबी,थैले साफ करते थे। सिर से पैर तक नहाते थे। उन्हें ऐसे क़्वारण्टीन केंद्र में ठहराया गया। जहां केवल गंदगी थी। स्नानागार और शौचालय भी गंदे थे। पानी का इंतजाम नहीं था .
जिंदगी हर किसी को प्यारी होती है। ऐसी गंदगी को साफ करने के लिए कहा गया तब उन्होंने ध्यान नहीं दिया। झाड़ू, पोंछा जैसे सामान मांगने पर नहीं दिए गए। उन्होंने सोचा हम खुद सफाई कर लेंगे। साफ जगह रहने से बीमारियों से बच सकते है। भाषा के आभाव में उन्हें ये लोग अपनी बात समझा नहीं पा रहे है।
खाने का भी सही इंतजाम नहीं था। विरोध करने पर इन्हे झूठे इल्जाम में फंसा कर जेल भेज दिया गया उन्होंने एक बार भी हालत बदलने के बारे में नहीं सोचा।
नॉन मणिपुरी लोगो से वहां के लोग बहुत नफरत करते है। इससे पहले भारत के किसी राज्य में आपने क़्वारण्टीन किये लोगो को जेल जाते सुना है? कभी नहीं ? जिसमे चार लड़कियां और एक दिव्यांग लड़का है।
सफाई कर्मचारी ने खुद अपने को घायल कर लिया। FIR दर्ज करा दी। अब हमारे बच्चे जेल में बंद कर दिए गए है। जिनकी कही सुनवाई नहीं हो रही है। भारत में एक तरफ बेटी बचाओ ,बेटी पढ़ाओ का अभियान चलाया जा रहा है .तो वही दूसरी तरफ पढ़ाती हुई बेटियों को जेल में डाला जा रहा है।
दिव्यांग पर भी तरस नहीं खाया जा रहा है। जबसे ये बच्चे वहां गए तभी से ये सभी जगह फरियाद कर रहे थे। किसी ने सुनवाई नहीं की। लेकिन उस सफाई कर्मचारी के आरोप को सच मान कर इन्हे जेल में डाल दिया गया है।उसके कहे पर किसी ने सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की
जेल में भी खाने का इंतजाम नहीं है। वही के एक शुभचिंतक ने दो समय खाना भिजवाया है। देखते है कितने समय तक वे उन्हें खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाते है .
सरकार के ऐसे इंतजामों से मौतों की संख्या हजारो में नहीं बल्कि करोड़ तक पहुंच जाये तो मुझे हैरानी नहीं होगी।
सरकार के ऐसे इंतजामों से मौतों की संख्या हजारो में नहीं बल्कि करोड़ तक पहुंच जाये तो मुझे हैरानी नहीं होगी।
अब मुझे लगता है इन्ही हालातो के कारण लोग क़्वारण्टीन केन्द्रो में पहुंचना नहीं चाहते। ट्रेन वाले आउटर पर गाड़ी रुकवा कर उतर रहे है। यदि पहुंचते है तो आत्महत्या कर रहे है।
जेल से निकलने के बाद इन्हे निलंबित कर दिया गया है। अब आप ही बताओ मोदी जी ने सफाई अभियान किसलिए चलाया था। हमे पहले गंदगी में रहने की आदत थी। आपने ही सफाई से रहने का अहसास दिलाया। अब सफाई पर जोर देने पर , ऐसे हश्र के बारे में किसने सोचा था।
लड़कियों की नौकरी मुश्किल से लगती है .उसपर दूर जाकर नौकरी करने की इजाजत कितने परिवार वाले दे पाते है।
दिव्यांग लड़का जिसकी एक आंख नहीं है। दूसरी आंख का नंबर दस है। ऐसे समय में उस इंसान के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। इनका भविष्य अंधकारमय हो गया है।
आप केवल कमजोर वर्ग के लिए आवाज बुलंद कर रहे है। इन रोते बिलखते दर्द में डूबे लोगो की आवाज कौन सुनेगा।
मणिपुर में अलगाव का दंश इस तरह से लगा है। उनकी मदद करने के लिए कोई तैयार नहीं है। हमे केवल आप पर भरोसा है।
पिछले पत्र का कोई असर नहीं हुआ। यदि आप हमारी तकलीफ समझते है तो अवश्य कुछ कार्यवाही कीजिये। हमें किसी तरह सूचित कीजिये ताकि हमें अहसास हो की कही हमारी सुनवाई हो रही है।
दर्द में डूबे दिव्यांग और लड़कियों के अभिभावक
जेल से निकलने के बाद इन्हे निलंबित कर दिया गया है। अब आप ही बताओ मोदी जी ने सफाई अभियान किसलिए चलाया था। हमे पहले गंदगी में रहने की आदत थी। आपने ही सफाई से रहने का अहसास दिलाया। अब सफाई पर जोर देने पर , ऐसे हश्र के बारे में किसने सोचा था।
लड़कियों की नौकरी मुश्किल से लगती है .उसपर दूर जाकर नौकरी करने की इजाजत कितने परिवार वाले दे पाते है।
दिव्यांग लड़का जिसकी एक आंख नहीं है। दूसरी आंख का नंबर दस है। ऐसे समय में उस इंसान के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। इनका भविष्य अंधकारमय हो गया है।
आप केवल कमजोर वर्ग के लिए आवाज बुलंद कर रहे है। इन रोते बिलखते दर्द में डूबे लोगो की आवाज कौन सुनेगा।
मणिपुर में अलगाव का दंश इस तरह से लगा है। उनकी मदद करने के लिए कोई तैयार नहीं है। हमे केवल आप पर भरोसा है।
पिछले पत्र का कोई असर नहीं हुआ। यदि आप हमारी तकलीफ समझते है तो अवश्य कुछ कार्यवाही कीजिये। हमें किसी तरह सूचित कीजिये ताकि हमें अहसास हो की कही हमारी सुनवाई हो रही है।
दर्द में डूबे दिव्यांग और लड़कियों के अभिभावक



