#DUE TO HUMAN NEGLIGENCE MANY BIGGER DEATH

                 मौत का पहाड़ या कूड़े का ढेर 

  पहले समय में भारत में कूड़े की समस्या इतने  भयंकर रूप में नहीं थी।  भारत में  जीरो गार्बेज होता था। इसका मतलब है जितना कूड़ा निकलता था उसका निस्तारण खुद ही कर लिया जाता था। पहले जीरो गार्बेज का विचार केवल भारत तक सीमित था।लोग अपने आस -पास के वातावरण को खुद साफ करते थे। सरकार की तरफ से ज्यादातर कदम नहीं उठाये जाते थे।
       लेकिन पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण भारतीयों ने दिखावे की संस्कृति को महत्व देना शुरू कर दिया जिसके कारण पहले जितना दस परिवारों से कूड़ा निकलता था। आज उतना कूड़ा एक परिवार से निकलता है।
      भारतीय संस्कृति कृषि प्रधान रही है। इंसान के लिये जितनी खाने की आवश्यकता थी वह खेती से प्राप्त कर लेता था। खेती के कारण उसे पशु पालने के लिए कुछ खास उपाय नहीं करना पड़ता था । कृषि और घर की रसोई में से बचने वाले खाद्य पदार्थ पशुओ के काम आ जाते थे।
       बड़े और खुले घर होने के कारण पशुओ के लिए अलग से प्रबंध नहीं करना पड़ता था। आधुनिक सभ्यता और छोटे घर के कारण गाय -भैस,बकरी और मुर्गे -मुर्गिया  जैसे दुधारू पशु किसी घर में दिखाई नहीं देते। लोग उन्हें गंदगी का घर समझने लगे है। इतनी प्रचंड कूड़े की समस्या इसी कारण पैदा हुई।
       पहले  हरियाली चारो तरफ बिखरी रहती थी।  घरेलू गंदगी को खाद के रूप में बदल कर पेड़ -पौधे की जरूरत बन जाती थी।
         कही भी नालियों का जाल नहीं बिछा था।पानी का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार होने के कारण अधिकतर गन्दा पानी जमीन सोख लेती थी  आबादी कम होने के कारण नदियाँ ज्यादा दिखाई देती थी गन्दा नाला नहीं दिखाई देता था।बिना गंदे पानी का शोधन किये नदियों में पानी डालने के कारण नदिया गंदे नाले जैसी दिखाई देती है।    अब तो नदियों में गंदे नाले का पानी डालने के कारण पानी इस कदर गन्दा हो गया है कि  कोई नदियों के पानी से हाथ धोने से भी झिझकता है।
      पहले प्लास्टिक का समान नहीं होता था जिसके कारण सारा कूड़ा जैविक खाद में बदलते देर नहीं लगती थी। अब हरा कचरा भले ही काफी समय बाद  मिटटी में बदल जाये लेकिन उसमे से झांकती हुई पन्नियाँ और प्लास्टिक के टुकड़े मन में घृणा पैदा करते है।
        हर चीज का अधिकता से प्रयोग भी कूड़े का अम्बार खड़ा कर रहा है। इंसान जितना अमीर होता जाता है वह उतना ही" प्रयोग करो और फेंको" में विश्वास करने लगा है।
       दिल्ली की आबादी के कारण लैंडफिल sight कम पड़ गयी है। पुरानी जगह भर गयी है। नयी जगह मिल नहीं रही जहाँ दिल्ली का कूड़ा फेंका जा सके। इसी के कारण गाजीपुर जैसी दुर्घटना हुई है। जिसमे अनेक लोगो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है।
        ये दुर्घटना दोपहर के समय हुई यदि यह सुबह या शाम होती तो जान और माल की बहुत हानि होती क्योंकि उसके पास के रस्ते से बहुत ज्यादा लोग निकल रहे होते  . कूड़े का अम्बार  पानी में गिरने के कारण बाढ़ जैसे हालत पास के इलाके में हो गए थे. वहाँ रहने वालो ने इस कदर कूड़े का पहाड़ दरक कर सड़क और नदी में गिरकर तबाही का कारण बन सकता है कभी सोचा भी नहीं होगा।
    अब ये समस्या केवल सरकार के भरोसे छोड़ने से काम नहीं चलेगा। अब इस समस्या से बचने के लिए हमें खुद आगे बढ़कर इसका हल ढूढ़ना होगा। क्योंकि अब हमने कूड़े के कारण जमीन ,वायु, जल   सभी को प्रदूषित कर दिया है  जलता हुआ घर दुसरो का तो देखा जा सकता है लेकिन उसकी आग अब हमारे घर  तक पहुंचने लगी है। अब हमे भी इस समस्या का निवारण करने के लिए मुस्तैद होना पड़ेगा।

  1.         इस समस्या से निजाद पाने के लिए दक्षिण भारत के कुन्नूर जिले के लोगो ने प्लास्टिक की अधिकतर चीजों का निषेध कर दिया है।
  2.  घर से थैले या बर्तन लेकर समान लाते  है।
  3.  यहाँ तक कि  बॉल पेन की जगह स्याही वाले पेन का प्रयोग करने लगे है।
  4.  सामने की अच्छी पेकिंग के स्थान पर बिना पेकिंग के समान को अधिक महत्व देने लगे है क्योंकि हम जरूरी समान का प्रयोग करते है पेकिंग तो फालतू होने के कारण सबसे पहले कूड़े दान की शोभा बढ़ाती है। 
  5. जरूरत के मुताबिक कागज का इस्तेमाल कीजिये उसे बर्बाद मत करो क्योंकि कागज बनाने के लिए बहुत सारे पेड़ो को काटना पड़ता है। पेड़ इंसान के लिए बहुत जरूरी है   सभी के प्रयास से इस समस्या का हल निकल सकेगा। 
  6. सरकार को हर इलाके में गोबर गैस और बायो गैस प्लांट लगाकर  कूड़े का निस्तारण करने का   प्रबंध करना चाहिए। 


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