#LONELY GIRL IN UNKHOWN TRIP

             अनजान सफर में अकेली लड़की 

  कई बार यात्राएं कितनी परेशानी खड़ी कर देती है। इसका अहसास उस वक्त होता है। जब हमारी जिंदगी बहुत आराम से चल रही होती है। हम आत्मविश्वास से पूर्ण होते है। हम सोचने लगते है -" हमारे साथ कभी गलत हो नहीं सकता।"
      एकदम हम कितने असहाय हो जाते है। ये मुझे पूणे से बम्बई की यात्रा में पता चला।
     मुझे शाम के 6 बजे की ट्रेन बम्बई से पकड़नी थी। मैने पुणे से 12 बजे की बस बम्बई के लिए पकड़ ली। मेरे हिसाब से मैने 2 घंटे फालतू का समय लिया था। यदि यातायात में फंस भी गयी तो इतने समय में गंतव्य तक पहुँच जाऊँगी।
     बस बहुत धीरे चल रही थी। मुझे उसकी गति पर बहुत गुस्सा आ रहा था। मेरे बस में उसकी गति बढ़ाना संभव नहीं था। इसलिए मन मसोस कर रह जाना पड़ा।
          कुछ समय बाद चालक ने एक होटल पर गाड़ी रोक दी। दो बजे के समय में लोगो को भूख का अहसास भी हो रहा था। उनकी अन्य जरूरते भी पूरी करने का समय  हो रहा था। उसका बस रोकना कुछ समय तक अच्छा लगा लेकिन  फिर उसने काफी समय तक गाड़ी की सवारियों को बुलाने की कोशिश नहीं की। जिसके कारण पौने घंटे तक गाड़ी होटल पर ही खड़ी रही। मेरे ख्याल से होटल वाले से  उनका कमीशन बंधा हुआ था। तभी वह देर कर रहा था।
          में अकेली अनजान जगह पर व्याकुल हो रही थी किसी तरह ये गाड़ी चले। लेकिन मेरी व्याकुलता का चालक पर कोई असर नहीं हो रहा था। किसी तरह बस चलने लगी लेकिन उसकी रफ्तार बहुत धीमी थी। उसकी रफ्तार को देखकर मेरे पास कुडने के सिवा कोई चारा नहीं था।
           बंबई पहुंचने के बाद हमे जाम का सामना करना पड़ा। उसके कारण गाड़ी आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही थी। ये सोच कर  मेरी साँस रुक सी रही थी। आज मुझे अपनी ट्रेन सही वक्त पर मिल सकेगी या नहीं। विक्टोरिया टर्मिनल तक पहुँचना मुझे असम्भव लगने लगा। तब मेने लोकल ट्रेन पकड़ कर समय पर पहुँचने के लिए बस से उतरने का फैसला किया। फिर बस से उतर  कर स्टेशन पहुँच गयी।
     मेरी परेशानी तब भी खत्म नहीं हुई। इस समय प्लेटफार्म पर   बहुत ज्यादा भीड़ थी। मेरे पास दो बड़ी अटेचिया थी जिसके कारण मै ट्रेन में चढ़ नहीं पा  रही थी। मुझे अपनी बेबसी पर रोना आने लगा था। मुझे बहुत मुश्किल लग रहा था ट्रेन में चढ़ना। कई ट्रेन निकलने के बाद किसी तरह में आधे घंटे बाद  चढ़ सकी।
     इतनी ज्यादा भीड़ में दम सा घुट रहा था। अपने को हिलाने में भी असमर्थ थी। लेकिन अब मुझे उम्मीद हो रही थी  ट्रेन मिल जाएगी। निश्चित स्टेशन पर उतरने के बाद भी राहत नहीं मिली। मेरे सही स्थान पर पहुंचने से पांच मिनट पहले ही दिल्ली की ट्रेन निकल चुकी थी।
        मुझे ट्रेन के निकलने का बहुत दुःख हो रहा था। बम्बई में मेरी जान पहचान का कोई नहीं था। ऐसे में किसका सहारा लिया जा सकता है। कुछ समझ नहीं आ रहा था।
      ऐसे मै मुझे पति की याद आयी। उन्हें सारे हालात फोन से बताते हुए आंसू रोकने मुश्किल हो रहे थे। उन्होंने मुझे दिलासा देने की बहुत कोशिश की। लेकिन मेरी घबराहट बढ़ती जा रही थी।
      उन्होंने कहा मै देखता हूँ ऐसे में क्या कर सकता हूँ। उन्होंने इंटरनेट पर ट्रेन का समय देखना शुरू किया। एक ट्रेन 8 बजे चलने वाली थी। उसमे मुझे एक टिकट मिल गयी। .फिर से दो घंटे मेने प्लेटफार्म पर गुजारे। लेकिन अंतत मुझे आठ बजे की ट्रेन में चढ़ना नसीब हुआ। . लेकिन गाड़ी में चढ़ने के बाद भी मुझे अपनी बेबसी पर दुःख हो रहा था।
      कुछ समय बाद टिकट चेकर के आने के बाद पता चला। इस डिब्बे में अधिकतर यात्रियो ने गाड़ी के चलने से दो घंटे पहले ही रिजर्वेशन करवाया था।
     पहली बार पता चला गाड़ी चलने से कुछ समय पहले रिजर्वेशन दुबारा से खोली जाती है। मेरे डिब्बे में एक आदमी मेरी तरह परेशान था। जिसकी फ्लाइट छूट गयी थी और ट्रेन भी छूट गयी थी। उसे देखकर कुछ राहत मिली। लेकिन मुझे उस दिन और अगली दोपहर तक कुछ खाने की इच्छा नहीं हुई।
     जहॉ मेरा सफर कुछ घंटे का था। वही सफर बहुत लम्बा साबित हुआ। इतनी परेशानी के कारण मेरी अकेले सफर करने की हिम्मत पस्त हो गयी थी। 

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