मेहनत और किस्मत का साथ( कोविंद )
हमारे राष्ट्रपति रामनाथ कोविद छोटे से गांव के दलित परिवार से सम्बन्धित है। जब 1945 में उनका जन्म हुआ होगा तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह बालक भारत की सर्वोच्च कुर्सी का हक़दार बनेगा। उस समय दलित समाज को बहुत सारी समस्याओ से जूझना पड़ता था। उनकी जिंदगी में इस तरह खुशियाँ ही खुशिया बिखर जाएँगी। इसकी कल्पना करना भी मजाक लगता होगा। इसे किस्मत का खेल समझना चाहिए। लालकृष्ण अडवाणी जी को पहले भारत के प्रधानमंत्री पद का हकदार समझा जाता था। उनके पाकिस्तान में जाकर जिन्ना के लिए दिए गए बयान के कारण उनकी किस्मत पलट गयी। सभी उनसे खफा हो गए। जिसने पाकिस्तान को भारत से अलग करवाया उसके लिए उन्हें सम्मानित किया जाना भारतीयों को नागवार गुजरा। इस कारण काफी समय तक वह अपनी पार्टी से अलग थलग रहे। बाद में पार्टी में शामिल किया गया पर उन्हें अपना रुतवा वापिस नहीं मिल सका।बाद में सुनने में आया उन्हें राष्ट्रपति बनाया जा सकता है लेकिन बाबरी मस्जिद के कारण उनसे इसकी उम्मीदवारी भी छीन गयी। सत्ता के गलियारे में अनर्गल बयानबाजी किस तरह खेल बिगाड़ सकती है ये अडवाणी जी को देखकर लगता है।
सोच कर हैरानी होती हे कोविद जी ने कितने मुश्किल समय में ,अपने अथक प्रयासों से शिक्षा हासिल की होगी। उनकी पढ़ाई ने उन्हें आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया होगा। इसकी बदौलत उन्होंने जीवन के अन्य पायदान तय किये होंगे। जिस भारत में आज भी प्रत्येक गांव में बिजली नहीं है। उस ज़माने में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है वह तारीफ के काबिल है।
इनसे पहले केवल के आर नारायण दलित राष्ट्रपति बने थे। इतने सालो बाद ये दूसरे दलित राष्ट्रपति के पद की शोभा बढ़ा रहे है। एक इंसान की मेहनत केवल उसकी मेहनत नहीं होती बल्कि उसकी खुशियों में उसका पूरा परिवार ,रिश्तेदार, राज्य और गांव के लोग भी शामिल हो जाते है। इस बात का प्रमाण आज दिखाई दे रहा है।
एक चायवाले का बेटा प्रधानमंत्री और बेहद गरीब दलित परिवार का बेटा लोकतंत्र में ही राष्ट्रपति बन सकता है।
जो लोग उनका विरोध कर रहे थे उन्होंने भी बढ़चढ़कर अपना अमूल्य वोट देकर उनके रस्ते को आसान बना दिया। उन्हें अनेक राष्ट्रपतियो से ज्यादा वोट प्राप्त हुये है
उनके जीवन काल में उन्हे लेकर किसी विवाद का सामना नहीं करना पड़ा। उन्हें बेहद सीधा -सादा जीवन जीने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। वे हमेशा सादा जीवन उच्च विचार के समर्थक रहे है।
ये बीजेपी के अग्रिम पंक्ति के नेताओ में भी शुमार नहीं थे। इनके बारे में इससे ज्यादा कभी लोगो ने सुना नहीं था। उनकी निश्छल छवि और मेहनत ने उन्हें ऊँचे पद पर आसीन किया है।

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