#MUMBAI TRAVEL AND TROUBLE ALON

             अकेले हवाई सफर और दिक्क़ते 


  जो इंसान अधिकतर यात्राएं करता रहता हैं  वह भी परेशानियों में किस तरह फंस सकता हैं। उसके बारे में जानकर हैरानी होती हैं जिनको इस बात पर गर्व होता हैं। वे किसी भी मुसीबत में से आसानी से निकल सकते है। उन्हें भी परेशानियाँ रुलाने से बाज  नहीं आती। ऐसी ही एक दास्ताँ में आपके सामने पेश कर रही हूँ।
        साक्षी ने कभी अकेले यात्रा नहीं की थी। उसे  जरूरी काम के कारण रुकना पड़ रहा था। उसने परिवार को पांच दिन पहले मुंबई जाने दिया क्योंकि बेटी के पेपर के कारण वे उसके  लिए नहीं रुक सकते थे। वे उससे पहले पहुंच कर वहाँ घूम फिर सकते थे। उसने बाकि लोगो को ट्रैन से जाने दिया।
        अपने लिए एरोप्लेन की टिकट बुक करवाने के लिए कह दिया। जब टिकट बुक होकर आयी तो उसे अहमदाबाद से दूसरा प्लेन पकड़ना था। टिकट को देखकर उसकी जान निकल गयी। उसने कभी अकेले ट्रैन में सफर नहीं किया था। वह कैसे प्लैन का सफर कर  सकेगी। उसने अपना डर किसी के सामने जाहिर नहीं किया  .हमेशा डर का सामना करने की हिम्मत जुटाती रही। लेकिन छोटी बेटी के सामने एक दिन निकल ही गया उसे बहुत घबराहट हो रही है। तब सारा घर परेशान हो उठा। लेकिन उसने उस बात को हल्के में लेकर बात पलट दी।
         दूसरे दिन  बेटी से उसने एयरपोर्ट पहुंचने का तरीका पूछा किस तरह से एयरपोर्ट पहुंच सकते है। तब उसने लम्बे तरिके से पहुंचने के स्थान पर कैव बुक करवा दी। सारे रास्ते  फोन करके मेरी घबराहट दूर करती रही। मै लगभग समय से एक घंटे पहले एयरपोर्ट पहुंच गयी। साथ में उस दिन का अख़बार भी ले गयी थी। सारे काम करते हुए कब प्लेन में पहुंच गयी पता नहीं चला।
       फिर अहमदाबाद भी आ  गया। मुझे अहमदाबाद से  एक घंटे बाद की दूसरी फ्लाइट मिलनी थी। मुझे सफर का ज्यादा अंदाजा नहीं था इसलिए में केबल सिर्फ एक हेंड़बैग लेकर गयी थी क्योंकि एक फ्लाइट से दूसरी फ्लाइट पकड़ने में कितना समय लगेगा,सामान   लेने में कितना समय लगेगा उसका अंदाजा नहीं लगा पा रही थी  जब अहमदाबाद पर प्लेन रुका तो उसके लगभग पंद्रह मिनट बाद उतरने की सीढिया लगी तब में नीचे उतर सकी।
       मेरा डर सतर्क रहने पर विवश कर रहा था। मेरे साथ की सीट पर  बैठी   लड़की भी वही उतरी।उसे उतरते देखकर मेरी जान में जान आयी। मैंने  उससे आगे का तरीका पूछा। मुझे लगा उसे भी मेरी तरह दूसरी फ्लाइट पकड़नी होगी लेकिन उसका सफर वही खत्म हो गया था
      वहाँ के लोगो से पूछ कर में आगे बढ़ती रही। लेकिन मुझे बहुत हैरानी हुई जब मुझे पूरी तरह बाहर निकलने के लिए कहा गया क्योंकि उसी कम्पनी की दूसरी फ्लाइट से मुझे मुंबई जाना था। फिर से दुबारा से दिल्ली एयरपोर्ट वाला तरीका शुरू हुआ। प्रत्येक स्टेप पार करती हुई लगभग पंद्रह मिनट बाद इंतजार करने वाली जगह पर पहुंची। लोगो को प्रतीक्षा करते देखकर मुझे राहत मिली। मैंने अहमदाबाद के एयरपोर्ट को घूम कर देखना शुरू किया। हर तरफ शांति थी। बहुत कम लोग दिखाई दे रहे थे। जबकि दिल्ली एयरपोर्ट पर हजारो की भीड़ में बैठने की कुर्सी मिलनी मुश्किल थी।
            कुछ दिव्यांग लोगो के लिए व्हीलचेयर का प्रबंध भी था। लोगो को किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड रहा था। धीरे -धीरे हम अपने प्लेन की सीट पर बैठ गए।
        मेरी सीट खिड़की के पास थी जिसके कारण में नीचे का दृश्य देखने में मशगूल हो गयी। उस दिन मौसम साफ होने के कारण धरती दिखाई दे रही थी। सब कुछ बहुत सुंदर तो कभी भयावना लग रहा था। मुझे नीचे उड़ते हुए बादलो को देखना अच्छा लग रहा था। लेकिन उसके नीचे समुद्र का पानी मिटटी के रंग का बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था। छिटके हुए  बादल भी उस पानी के कारण मिट्टी में सने हुए गंदी रुई के सामान लग रहे थे।
      इन सब के बीच कब मुंबई एयरपोर्ट आ गया उसका अहसास नहीं हुआ। मेने फोन से सूचित कर दिया मै मुंबई आ गयी हूँ। प्लेन से निकल कर बाहर आने पर मेरे  फोन ने काम करना बंद कर दिया।किसी का फोन नहीं लग रहा था। मुझे उम्मीद थी कोई इंतजाम मेरे लिए किया गया होगा। लेकिन कुछ नहीं हो रहा था। मुझे अब लगा किसी से पहले ही वहाँ का पता ले लिया होता तो अच्छा रहता। लेकिन "अब पछताए होत  क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत".पुरे सफर में इतनी परेशानी नहीं हुई जितनी अब मेरी धड़कने बढ़ने लगी जिस शहर में पहली बार आयी हूँ। उस शहर में बिना पते के कैसे पहुँचूँगी। इसी उधेड़बुन में कब एक घंटा बीत गया अहसास नहीं हुआ।
       सिग्नल मिलने के इंतजार में एयरपोर्ट से बाहर आ गयी। काफी दूर जाने पर फोन मिला तब  जगह मालूम की। तब जान में जान आयी। बाहर निकलने के बाद ऑटो स्टेण्ड के बारे में मालूम करके में गंतव्य तक पहुंची। पुरे सफर में सबसे ज्यादा घबराहट मुंबई एयरपोर्ट पर पता न मिलने के कारण हुई।
     मुंबई की सड़के और यातायात भी दिल्ली जैसा था। यहाँ घूमने के कारण ज्यादा अंतर् नहीं लग रहा था यातायात के साधन बहुत अच्छे थे। ड्राइवर ने कोई चालाकी नहीं दिखाई सही रास्ते से सही पैसो में सही स्थान पर पहुंचा दिया। सबसे मिलकर राहत मिली।   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...