लिखने या बोलने की आजादी का मतलव ये कभी नहीं होता कि इसके कारण देश या इंसानो की भावनाओ को आहत किया जाये। यदि देश के बारे में कोई विदेशी कुछ गलत लिखता या बोलता है तो हम एकजुट होकर विरोध करते है। इसके उदाहरण आपको बहुत मिल जायेंगे।
कुछ समय पहले वेंडी डोनिगर की किताब "द हिन्दुज: एन अलटरनेटिव हिस्टरी " में हिन्दू देवी देवताओ को कामुकता के शिकार बताया है। चण्डिका ने शुम्भ को यौन के उन्माद में मार डाला। यम -यमी के संवाद को विकृत रूप में प्रस्तुत किया है। सीता और लक्ष्मण के बीच कामुकता का संबंध बताने का प्रयास किया गया है जबकि बाल्मीकि की रामायण में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है। पुस्तक के मुख्य पृष्ठ पर कृष्ण को निर्वस्त्र गोपियों से घिरे हुए दिखाया है। सूर्य ने कुन्ती से बलात्कार किया है। ये सब हिन्दुओ की भावनाओ से अलग था।
वेंडी ने जानबूझकर बताया - विवेकानंद ने श्रोताओं से गोमांस खाने का आग्र्रह किया। हिन्दुओ की पूजा में नारियल तोड़ने की प्रकिया को बलि प्रथा से जोड़कर दिखाया है। यह किताब मूलत: ईसाई मान्यताओं को मजबूती प्रदान करने और हिन्दुत्ब को बदनाम करने का प्रयास था।
इस किताब का विरोध किया गया जिसके कारण इस किताब को बाजार से लेखिका को हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा। पेंग्विन प्रकाशन ने माफ़ी मांगते हुए आगे इसकी छपाई करने से मना कर दिया।
चित्रकार हुसैन को हिन्दू विरोध के कारण भारत छोड़ना पड़ा।
बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को बांग्लादेश छोड़कर दूसरे देश की शरण में जाना पड़ा। उसकी किताबो का उस देश में प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
मेकेल एडवर्ड,जसवंत सिंह,जोसेफ लेलीवेल्ड ,डी.एन,झा की पुस्तकों पर प्रतिबन्ध लगाया गया। क्योंकि इनकी किताबो के द्वारा भारतीयों की भावनाएं आहट हो रही थी। इन पर पाबन्दी लगाने वाली कांग्रेस सरकार थी।
आज कांग्रेस के द्वारा बनाई गई इण्डिया सांस्कृतिक सेंटर के सदस्य हिन्दुओ की बर्बादी का कारण बन रहे है क्योंकि मोदी सरकार ने इस संस्था पर प्रतिबन्ध लगाने की कोशिश की तो इन सब सदस्यों के हितों पर आघात होने लगा तब ये सभी एकजुट होकर अपने पुरस्कार वापिस करने लगे। विदेशो और भारत में असहिषुणता पर अपनी टिप्पणी देकर केवल अपने हितों को साधने में लगे है। इससे भारत की कितनी बदनामी हो रही है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है
लेकिन आज के माहौल में हमारी राजनीतिक दायरा इतना बढ़ गया है कि हिन्दू धर्मग्रन्थ हमारे विश्विद्यालयो में जलाए जा रहे है। जब मनुसमृति लिखी गई थी उसमे चार वर्ग कामो के आधार पर बांटे गए थे। उन्हें जन्म के आधार पर निर्धारित नहीं किया गया था। ये विकृति बाद में आई थी। यदि हम ही अपने धर्म ग्रंथो का अनादर करेंगे तब हिन्दू धर्म का उत्थान कौन करेगा।
हमारे विरोधी राजनीतिक दल इनको सजा देने पर इसे बोलने की आजादी का हनन कह रहे है। सभी अधिकार तभी तक मान्य होते है जब तक उससे किसी इंसान या देश की हानि ना हो वरना हर तरफ अराजकता फैल जाएगी। इस अराजकता के कारण केवल बोलने की आजादी का हनन ही नहीं होगा बल्कि जीवन जीना भी बहुत कठिन हो जायेगा।इंसान के अंदर का नरपशु जाग जाने पर हर तरफ मार -काट मच जाएगी। तब आजादी के लिए इंसान छट्पटाएगा।
कुछ समय पहले वेंडी डोनिगर की किताब "द हिन्दुज: एन अलटरनेटिव हिस्टरी " में हिन्दू देवी देवताओ को कामुकता के शिकार बताया है। चण्डिका ने शुम्भ को यौन के उन्माद में मार डाला। यम -यमी के संवाद को विकृत रूप में प्रस्तुत किया है। सीता और लक्ष्मण के बीच कामुकता का संबंध बताने का प्रयास किया गया है जबकि बाल्मीकि की रामायण में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है। पुस्तक के मुख्य पृष्ठ पर कृष्ण को निर्वस्त्र गोपियों से घिरे हुए दिखाया है। सूर्य ने कुन्ती से बलात्कार किया है। ये सब हिन्दुओ की भावनाओ से अलग था।
वेंडी ने जानबूझकर बताया - विवेकानंद ने श्रोताओं से गोमांस खाने का आग्र्रह किया। हिन्दुओ की पूजा में नारियल तोड़ने की प्रकिया को बलि प्रथा से जोड़कर दिखाया है। यह किताब मूलत: ईसाई मान्यताओं को मजबूती प्रदान करने और हिन्दुत्ब को बदनाम करने का प्रयास था।
इस किताब का विरोध किया गया जिसके कारण इस किताब को बाजार से लेखिका को हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा। पेंग्विन प्रकाशन ने माफ़ी मांगते हुए आगे इसकी छपाई करने से मना कर दिया।
चित्रकार हुसैन को हिन्दू विरोध के कारण भारत छोड़ना पड़ा।
बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को बांग्लादेश छोड़कर दूसरे देश की शरण में जाना पड़ा। उसकी किताबो का उस देश में प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
मेकेल एडवर्ड,जसवंत सिंह,जोसेफ लेलीवेल्ड ,डी.एन,झा की पुस्तकों पर प्रतिबन्ध लगाया गया। क्योंकि इनकी किताबो के द्वारा भारतीयों की भावनाएं आहट हो रही थी। इन पर पाबन्दी लगाने वाली कांग्रेस सरकार थी।
आज कांग्रेस के द्वारा बनाई गई इण्डिया सांस्कृतिक सेंटर के सदस्य हिन्दुओ की बर्बादी का कारण बन रहे है क्योंकि मोदी सरकार ने इस संस्था पर प्रतिबन्ध लगाने की कोशिश की तो इन सब सदस्यों के हितों पर आघात होने लगा तब ये सभी एकजुट होकर अपने पुरस्कार वापिस करने लगे। विदेशो और भारत में असहिषुणता पर अपनी टिप्पणी देकर केवल अपने हितों को साधने में लगे है। इससे भारत की कितनी बदनामी हो रही है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है
लेकिन आज के माहौल में हमारी राजनीतिक दायरा इतना बढ़ गया है कि हिन्दू धर्मग्रन्थ हमारे विश्विद्यालयो में जलाए जा रहे है। जब मनुसमृति लिखी गई थी उसमे चार वर्ग कामो के आधार पर बांटे गए थे। उन्हें जन्म के आधार पर निर्धारित नहीं किया गया था। ये विकृति बाद में आई थी। यदि हम ही अपने धर्म ग्रंथो का अनादर करेंगे तब हिन्दू धर्म का उत्थान कौन करेगा।
हमारे विरोधी राजनीतिक दल इनको सजा देने पर इसे बोलने की आजादी का हनन कह रहे है। सभी अधिकार तभी तक मान्य होते है जब तक उससे किसी इंसान या देश की हानि ना हो वरना हर तरफ अराजकता फैल जाएगी। इस अराजकता के कारण केवल बोलने की आजादी का हनन ही नहीं होगा बल्कि जीवन जीना भी बहुत कठिन हो जायेगा।इंसान के अंदर का नरपशु जाग जाने पर हर तरफ मार -काट मच जाएगी। तब आजादी के लिए इंसान छट्पटाएगा।
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