#THE SORROWS OF KRISHNA" S LIFE



                         कृष्ण के जीवन के दुःख 


    हमारे दिमाग में कृष्ण का रूप तस्वीरों वाला बसा हुआ है। हम मथुरा के प्रत्येक आदमी को कृष्ण के प्रतिरूप में देखते है। जब मै  पहली बार मथुरा गई उस समय मैने  जितने आदमियों को देखा उनमे कृष्ण को ढूंढने लगी। लेकिन मेरा मोहभंग हो गया। उनके जैसे इंसान कहीं दिखाई नहीं दिए। 

      जब हम अपने जीवन की तुलना कृष्ण के जीवन से करते है। तब हमे अपना दुःख बहुत कम प्रतीत होता है। खुद सोच कर देखिये कितनो  का जन्म जेल की कोठरी में हुआ,उनके माँ -बाप ने पैदा होते ही उन्हें अपने से दूर कर दिया ताकि जिन्दा रख सके। भरी बरसती  रात  मै  उफनती नदी में टोकरी में छुपा कर ले जाना पड़ा। एक राजा के बेटे को ग्वालो के बीच  में रहना पड़ा। जहां हर पल चारो तरफ मौत (कालिया नाग, शकटासुर,पूतना आदि के रूप में  ) मंडराती रहती थी।  उन्हेोने  किसी से इनकी शिकायत नहीं की। मुझे उनके बचपन में राक्षसो के मारने  के तरीको पर यकीन नहीं आता था। लेकिन अतिश्योक्ति में कुछ सच्चाई जरूर रही होगी। बचपन शिक्षा के अभाव  में गाये  चराते हुए बिता।  मानव हारे  हुए लोगो को कभी याद  नहीं करता बल्कि विजेता को भूलता नहीं है। जिसके कारण सबका जीवन बदल जाता है। 

      अपनों के रहते हुए हम खुद को सुरक्षित महसूस करते है। उन्हें अपनों के कारण ही कष्ट सहने पड़े। दुनियां से छुपना पड़ा। कंस मामा  के वध के बाद जरासंध से युद्ध रोकने के लिए वे मथुरा से द्वारका बस गए। इसके कारण उनका नाम रणछोड़दास पड़ा क्योंकि  युद्ध के कारण जान माल  की हानि होती है। 

     उन्होंने महाभारत के युद्ध को रोकने की भरसक कोशिश की। युद्ध रोकने में असफल रहने की स्थिति में उन्होंने हथियार उठाने की अपेक्षा सारथी  बनाना पसंद किया। किसके खिलाफ युद्ध करे जबकि सभी अपने थे। 

    किवदंती है -उनकी सोलह हजार आठ रानियां थी। लेकिन उनकी केवल आठ रानियां थी। सोलह हजार औरतो को उन्होंने राजा की कैद से मुक्ति दिलवाई थी। मुक्त होने के बाद उन्होंने कहा -हमें समाज में कोई स्वीकार नहीं करेगा। हमारा मर जाना ही सही होगा। तब उन्होंने औरतो को दिलासा देते हुए कहा था तुम मेरी पत्नी कहलवाओगी। 

     उनके अंतिम समय में उनके कुल में इतना  अधिक  कलह बढ़  गया कि  यादव कुल खुद ही अपना विनाश कर बैठा। उनकी आँखों के सामने सारे मर्द मर गए। उन्हें अपने  कुल की  औरतो की सुरक्षा के लिए  अर्जुन की सहायता लेनी पड़ी। 

     अर्जुन और कृष्ण दोनों का बुढ़ापा था। इसलिए वे उनकी सुरक्षा करने में असमर्थ रहे।  उनके सामने ही उनके परिवार की औरतो को डकैत ले गए। वे उन्हें सुरक्षित रख पाने में असमर्थ रहे। 

   सबके विनाश के कारण दुखित अवस्था में सन्यांस लिया। वहां  उनकी शिकारी के तीर से मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु के बाद द्वारका नगरी समुद्र में समा  गई।

        अब खुद देखिये इतना दुःख कितने लोगो के जीवन में होता है।  उनके जीवन में कृष्ण की अपेक्षा कुछ कम दुःख होते है। लेकिन हम सारी  उम्र दुखो का विलाप करते रहते है। कभी सुखो के बारे में बात नहीं करते। 

    मै चाहूंगी आज के बाद यदि अपने को दुखी महसूस करो तो एक बार कृष्ण से अपनी तुलना जरूर करके देखना।कृष्ण भी इस दुनियां में इंसान के रूप में आये थे लेकिन उन्होंने हर परेशानी का सामना डट कर किया। लोगो के जीवन के अंधकार को दूर करने की कोशिश की इसलिए उनका नाम युगांधर पड़ा। 

     हम जिन्हे ईश्वर के रूप में पूजते है। उन्होंने दुनियां में इंसान के रूप में जन्म लिया था। लेकिन अपने अद्भुत कार्यो के कारण लोगो का जीवन बदलने की कोशिश की इसलिए लोगो ने उनसे प्रेरणा लेकर   पूजना   शुरू किया  आज हमारे मंदिर में विराजमान है। 

#INDIRECT EFFECT OF OBESITY

           मोटापे के परोक्ष प्रभाव 

   माधव अपने मोटापे से खुद भी बहुत परेशान था। लेकिन मोटापे को कम करने के लिए  जितनी दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए वह उसमे नहीं थी। वह रोज निश्चय करता कल से व्यायाम करूंगा और खाने पर भी नियंत्रण करूंगा लेकिन वह उसे निभा नहीं पाता  था। उसके जीवन में कल कभी नहीं आ सका। जब उसने एक किलो भी वजन कम करने के लिए प्रयास किये हो।  

            उसके अभिभावकों ने अनेक विशेषज्ञों से परामर्श किया जो उसका एक दिन में एक किलो तक वजन कम करवा  सकते थे। लेकिन उसे अपने शरीर को तकलीफ देना बिलकुल पसंद नहीं था।वो तरीके  वह दूसरो  को बता कर खुश होता था। लेकिन अपने ऊपर आजमाने की कभी कोशिश नहीं की। 70  किलो से कब उसका वजन डेढ़ सौ  किलो पर पहुंच गया। वह इसका अंदाजा नहीं लगा पाया। 

        उसके लिए केवल व्यायाम और खाने के द्वारा वजन कम करने के प्रयास किये गए। यदि अदनान सामी या आकाश अम्बानी की तरह  माधव  ने सर्जरी की सहायता ली होती तो  शायद उसका मनोबल बढ़ जाता।  वह वजन कम करने के लिए उत्साहित हो जाता। 

     मेने उसके सामान एक मोटे  इंसान को  जाने की सलाह दी तब उसने कहा - ""मैं सर्जरी करवा लुंगा  लेकिन  मुझसे व्यायाम नहीं होता।  मैं  खाना भी कम  नहीं खा सकता हूँ। "" मैं  मध्यवर्गीय इंसान  के मुँह से  सर्जरी की बात सुनकर हैरान हो गयी। क्योंकि मुझे लगता है बिना मतलब सर्जरी करवाने से  दूसरी परेशानियां पैदा हो जाती है। अधिकतर लोग सर्जरी से इसलिए डरते रहते है ,

         माधव को करोना  हो गया। उसके साथ ही उसके बूढ़े  माँ -बाप को भी करोना  हो गया. हम उसके अभिभावकों की बढ़ती उम्र और करोना  से डरे हुए थे।क्योंकि वे पक्षाघात और दिल के मरीज थे उन्हें रक्तचाप और मधुमेह की बीमारी थी। अधिकतर  अस्पताल वाले उनके अभिभावकों को अस्पताल में प्रवेश देने के लिए तैयार  नहीं थे क्योन्कि उनकी उम्र ज्यादा थी जबकि माधव को हर अस्पताल  प्रवेश  देने के लिए तैयार था।  उसने प्रण  ले लिया था जिस अस्पताल में माँ =पापा का इलाज  हो सकेगा उसी में अपना इलाज करवाऊंगा। बड़ी मुश्किल से एक अस्पताल उसके अभिभावकों को लेने के लिए तैयार हुआ  तब सब अस्पताल में इलाज करवा पाए। उसका सोचना सही था। हम सब इकट्ठे होंगे तब सबकी अच्छी तरह से देखभाल कर सकेंगे।  हमें माधव को लेकर कोई चिंता नहीं थी। हमें लग रहा था। उसकी जवान उम्र इस बीमारी को झेल जाएगी। उसे कुछ नहीं होगा।

       लेकिन माधव करोना  का सामना नहीं कर सका और दुनियां छोड़ कर चला गया। उसके  बिना उसका पूरा परिवार उजड़ गया। उसके अभिभावक  करोना बच गए। लेकिन बेटे के बिना  वह हर रोज भगवान  से मौत मांगते है।  जिस व्यवसाय को उसने उन्नति के शिखर पर पहुंचा दिया था। वह उसके जाते ही खत्म हो गया। 

          उसकी पत्नी बिना पति  के ससुराल में रहने के लिए तैयार नहीं थी। वह मायके चली गयी।  उनके बच्चे दादा -दादी,बाप और बुआ का प्यार  सभी से महरूम हो गए हें।

        एक इंसान की मौत उसकी लापरवाही किस तरह परिवार  की तबाही का कारण बन जाती है। यह माधव की मौत ने मुझे दिखा दिया। उनके सभी हमदर्द उसकी मौत के सबा साल बाद भी गम से उबर नहीं सके है। यदि वह किसी भी तरिके से अपना वजन कम कर लेता तो उसके परिवार को ये दिन नहीं देखना पड़ता। 

#GROWING OBESITY CONCERNED FAMILY

          बढ़ता मोटापा ,फिक्रमंद परिवार 

   माधव का मोटापा दिनोदिन बढ़ता जा रहा था।  उसका मोटापा अब सबका ध्यान खींचने लगा था। उसका पेट लटका हुआ दिखने लगा था। उसे चलने में दिक्क्त आने लगी थी। वह लेटने के बाद गहरी नींद सो नहीं पाता  था। उसे साँस संबंधी परेशानियां शुरू हो गई थी। अब उसे सीढ़ियां चढ़ने , चलने, उठने बैठने में भी दिक्क़ते आने लगी थी। उसे समाज से  जुड़ने में भी परेशानी होने लगी थी। उसमे नकारात्मक भावनाए  भी पनपने लगी थी। लेकिन उसने अपने फैलते शरीर को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की। 

          उसके घर में पैसों  की कमी नहीं थी। उसके पापा उसे जरूरत से ज्यादा पैसे देते थे। वह  बचपन में घर से नाश्ता करने के बाबजूद , विद्यालय में पहुंचने से पहले खोमचे वालो से लेकर कुछ औऱ खा  लिया करता था। लंच में घर का खाना होने के बाबजूद केंटीन से भी कुछ लेकर खा लेता था। विद्यालय से छुट्टी के बाद ,वह बाहर निकल कर  कुछ मनपसंद  खा  कर  ही घर जाता था।  घर पहुंचने पर घर का बना खाना भी चुपचाप खा लेता था। उसे भरे पेट खाना खाने में कोई दिक्क्त महसूस नहीं होती थी।  इस कारण जितना काम करता था। उससे कई गुना ज्यादा खाता  था ,हमारे समाज में गोल -मटोल बच्चे अच्छे लगते है। लेकिन एक सीमा  के बाद जब  शरीर बैडोल होने लगता है उसे संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। 

         जब माधव  छोटा था यानी नौ साल का होने पर उसके अभिवावको ने  उसके मोटापे  की तरफ ध्यान देना शुरू किया। उसके घर में सभी  अमीरी का मतलब आराम दायक जिंदगी  को  समझते थे। तब वह भी आरामदायक जिंदगी जीना ही पसंद करता था।

        उसके अभिवावको ने उसे खेलो की तरफ प्रोत्साहित करने की कोशिश की। उसे जबरदस्ती खेलने भेजने लगे। तब वह खेलने जाता जरूर था। लेकिन क्रिकेट खेलते वक्त, बेटिंग करना पसंद करता था। दौड़ने के काम  या बॉलिंग करने के लिए,दूसरो   को किसी न  किसी तरह मना  लेता था।

        खेलने के बाद भी जब उसका  वजन कम नहीं हुआ तब उन्होने  उसके खेलने के तरीके  का पता लगाया।वह उसके कारनामे पर हैरान हो गए। तब  अभिभावको ने उसे बाहर जबरदस्ती खेलने  भेजना बंद कर दिया। 

       छोटे बच्चो को शारीरिक काम के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन बड़ा होने पर पर उनसे काम करवाना कठिन हो जाता है। आजकल यह समस्या बढ़ती जा रही है। आजकल बच्चे जिम आदि में जाकर खाने पर नियंत्रण करके,  कुछ समय के लिए वजन जरूर कम कर लेते है। व्यायाम और खाने पर नियंत्रण हटते ही फिर से मोटे  हो जाते है। 

       माधव ने किसी तरह से भी वजन कम  करने के बारे में सोचा ही नहीं। अभिवावको  के सारे  प्रयास बेकार गए। उसे उनकी रोकटोकी पसंद नहीं आती थी। उसके फैलते शरीर के कारण  सभी फिक्रमंद थे। लेकिन जिसे फ़िक्र करनी चाहिए थी। वह लापरवाह था। 

             

# INDIA & PAKISTAN AFTER INDEPENDENCE

          पाकिस्तान और भारत आजादी के बाद 

  15 अगस्त  को भारत आजाद हुआ था। 14  अगस्त को पाकिस्तान ने आजादी पाई थी देखा जाये तो पाकिस्तान भारत से एक दिन पहले आजाद हो गया था। लेकिन पाकिस्तान ने आजादी  के बाद कोई खास तरक्की नहीं की है।  उसका देश ताकतवर देशो से हर तरह से मदद की गुहार करता रहता है। हर देश के सामने दान का कटोरा लिए घूम रहा है।  

।                           पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अपनी छवि साफ दिखाने  के लिए खुद को आतंकपीडित दिखाते  है। यदि आपका देश आतंक से परेशान है तो आप अपने देश में आतंकवादियों को क्यों पाल  रहे है। उनके अड्डे क्यों नहीं खत्म कर देते। जब  आपका पाला हुआ भस्मासुर आपको ही नष्ट करने पर तुला है। तब अपनी इतनी बड़ी सेना के द्वारा  उनके अड्डों को खत्म करके उन्हें नेस्तनाबूत क्यों नहीं कर   देते। यहाँ उनकी इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती है। जो सेना भारत पर कब्जा करने के सपने देखती है।  वह आतंकवादियों का खात्मा क्यों नहीं कर पा  रही है इसे कहते है- दूसरो  के लिए गड्ढा  खोदोगे तब खुद भी गिर सकते हो। उसके पाले  हुए आतंकवादी अब पूरे  संसार में तबाही मचाने  पर तुले है।   पाकिस्तान का नाम खुले -आम आतंकवादियों से जोड़ा जा रहा है।             

        भारत अपनी पहचान बना चूका है। आप भारत से किसी भी देश में जाते है। जबसे मोदी जी प्रधानमंत्री बने है। भारतीयों को सम्मान की निगाहो से देखा जाता है। जबकि अब पाकिस्तानी विदेशी भूमि पर पहुंचकर अपनी पहचान पाकिस्तानी के तौर पर नहीं देते बल्कि खुद को दक्षिण एशियाई या भारतीय के रूप में देते है। उन्हें पाकिस्तानी कहने में शान का अहसास नहीं  होता है । 

     जिस देश में रहते हुए मुस्लिम भारत की कमियां बताते रहते है। इसे रहने  योग्य  नहीं मानते ,वही जब नागरिकता का प्रश्न उठता है। तब धरने पर बैठ जाते है इसके मायने क्या हुए। 56  देश  मुस्लिम है हिन्दू राष्ट्र बताइये पूरे  संसार में कितने है।  

            हिन्दुओ को दूसरे देशो में परेशान किया जाये तब भी भारत की नागरिकता नहीं ले सकते। उन्हें नागरिकता लेने का अधिकार तभी मिलना चाहिए जब मुस्लिमो को नागरिकता मिले। ये कहाँ का न्याय है। वे हिन्दू शरणार्थी  जिन्हे भारत में रहते हुए बरसो बीत गए। उन्हें भारतीय नागरिक नहीं समझा जाता था। जबकि सारे  संसार के मुस्लिम लाखो की संख्या में भारत में बस सकते है। लुटे उजड़े अनेक देशो से ठुकराए  हिन्दुओ के लिए भारत शरणस्थली नहीं बन सकता।  क्योकि भारतीय सरकार दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखा सकी. अब बिल पास हुआ तो कितनी रूकावट आ खड़ी  हुई है। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...