#romharshak description of kamakhya temple

                कामाख्या मंदिर का रोमहर्षक वर्णन 

 असम  का कामाख्या मंदिर प्रसिद्व  स्थान है। इस प्रदेश में मंदिर देखने के लिए पूरे  भारत से लोग आते है। इसमें सुबह से लोगो का आवागमन शुरू हो जाता है।  मुझे लोगो से पता चला आप सुबह 6  बजे चले जायेंगे तो आपको जल्दी देवी दर्शन  हो जायेंगे इसलिए हम सुबह जल्दी  तैयार होकर  साढ़े  छह बजे तक मंदिर पहुँच गए  लेकिन इस समय तक लोगो की बहुत लम्बी पंक्ति लग चुकी थी वह पंक्ति घूम -घूम कर चल रही थी। इतनी लम्बी पंक्ति देखकर हमारी हिम्मत जबाब दे गई। हमने सोचा इतनी लम्बी पंक्ति में लगकर  सात आठ घंटे लग जायेंगे। इससे तो विशेष दर्शन करने में भलाई है।
          हम विशेष दर्शन की पंक्ति में लग गए। बहुत देर तक हमारी पंक्ति आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही थी। तब आगे जाकर मालूम करने पर पता चला  दफ्तर खुलने का समय साढ़े सात बजे है।  हमें जल्दी लाइन में खड़े होने का फायदा नहीं हुआ। यहाँ भी हमें एक घंटे टिकट खिड़की पर खड़ा होना  पड़ा। मेने अपने साथी को लाइन में लगाया।
      मेने   पूरे  मंदिर में घूमकर दर्शन करना शुरू कर दिया। क्योंकि बर्षो से मेरी कामाख्या मंदिर देखने की इच्छा थी वह अब जाकर पूरी हो रही थी। इसे ढंग से देखने का लालच में छोड़ नहीं सकती थी।  यहाँ की वास्तुकला बिलकुल अलग तरह की थी। इस समय सफाई हो  रही थी। मुझे अधिकतर स्थानों पर सफाई की व्यवस्था उचित लगी। लेकिन कुछ लोग कह रहे थे। पहले यहाँ इतनी सफाई नहीं थी। तिलचट्टे जगह -जगह दिखाई देते थे।
      यहां के तालाब में नहाते हुए लोग दिखाई दिए। लेकिन तालाब मुझे साफ नहीं लगा। उसमे हरियाली (काई ) दिखाई दे रही थी। कुछ आगे बढ़ने पर सीढ़िया  बनी हुई थी। जिनपर चढ़ने के बाद भव्य मंदिर के दर्शन होते है.मंदिर की बाहरी  दीवारों पर अनेक मुर्तिया बनी  हुई है। उन्हें निहारना मुझे बहुत अच्छा लगा।
          साढ़े  सात बजे हमारा टिकट लेने का नम्बर आया।यहाँ की टिकट 500  रूपये की थी। एक इंसान के लिए इतने रूपये इससे पहले कभी अदा  नहीं किये थे दो जनो के लिए हमने एक हजार  चुकाए।  उसके बाद हमें एक हाल में बिठा दिया गया जहा से हमें अगली जगह आधे घंटे बाद जाने के लिए कहा गया। उसके बाद तीसरे हाल में जाने दिया गया। उसमे लगभग आधा घंटा और लग गया। फिर हमें लाइन में लगकर आगे चलने के लिए कहा  गया। हमारी लाइन आधे घंटे तक घूमती हुए आगे बडी ।
             इस लाइन में खड़े हुए हमने जानवरो की बली  के बाद कटे हुए सिर  आते देखे। उनके आते समय एक दम  शोर मच जाता था। जानवरो के सर दूसरे दरवाजे से आते थे। उस दरवाजे को सिर्फ बलि के समय ही खोला जा रहा था। उसके बाद एकदम बंद कर दिया जाता था।
        हमने मंदिर में घूमते हुए कई सिंदूर लगे हुए बकरे और कबूतर देखे थे। मुझे लगता है कबूतर पूजा करके वही छोड़ दिए जाते थे। क्योंकि वहां जितने कबूतर थे उन सबपर सिंदूर लगा हुआ था। हम शाकाहारी लोगो ने इससे पहले कभी कटे हुए सिर नहीं देखे थे इसलिए उन्हें देखकर सिहरन हो रही थी।
       मेने इससे पहले किसी मंदिर के पुजारी को लाल कपड़ो में नहीं देखा था। यहाँ अधिकतर पुजारियों  ने सुर्ख लाल रंग के कपड़े पहने हुए थे पहले बहुत अजीब लगा था। बाद में मेने एक पुजारी को पीले कुर्ते में देखा लेकिन उसके कुर्ते पर लाल धब्बे लगे हुए थे। बाद में समझ आया ये धब्बे खून के है। उस पुजारी को देखकर मुझे झुरझुरी आने लगी इतने खून से भरे धब्बे वाले कुर्ते पहन कर ये आराम से कैसे घूम रहा है। बाकि पुजारियों के सुर्ख लाल कपड़ो का होना क्यों जरूरी है इसका कारण अब समझ में आया।
         इसके बाद हमे गर्भ गृह में जाने का मौका मिला।  बाकी  सभी जगहों पर भरपूर प्रकाश था लेकिन यहाँ पर केवल दो बड़े दीपक जल रहे थे। उसके धूमिल प्रकाश में कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। पंडित जी हमें सही तरह से निर्देश दे रहे थे लेकिन हमें वहां कुछ समझ नहीं आ रहा था। यहाँ कमल  के  फूल चढ़ाओ ,व्हने वाले जल का आचमन करो। वही दूसरी तरफ कुछ और था ,उस पंडित जी ने भी हमें समझाने  की कोशिश की लेकिन हमें वहां केवल फूलो के ढेर दिखाई दिए उसके आलावा कुछ समझ नहीं आ रहा था। हमें वहां तसल्ली से रुकने का मौका मिला। लेकिन समझ नहीं आ रहा था। हम यहां देखने क्या आये है। कमसकम इतना प्रकाश करते जिससे आसपास की चीजे समझने का मौका मिलता।
        हमने दर्शन करने के बाद बाहर निकलते समय कुछ और लोगो को उस दरवाजे से अंदर आते देखा पता चला वह vvip दरवाजा है। वे लोग केवल कुछ मिनट में गर्भ गुफा तक पहुंच सकते है। हमने वहां मिल्ट्री वालो की अलग लाइन देखी। इस तरह यहाँ पर चार तरीके  से दर्शन होते देखे।
        मै  हाथ में प्रसाद की थैली ले जा रही थी। उसमे मेवे थे। एक बंदर ने मेरी थैली झपट ली। में उसे देखती रह गई। जो थोड़ा सा प्रसाद बचा  था उसी का भोग लगा दिया। वैसे प्रसाद हम अपनी संतुष्टि के लिए खरीदते है। वरना प्रसाद चढ़ाने की हमें कही जगह नहीं दिखाई दी।
        कुछ समय बाद मुझे वहां से जाने का दुबारा मौका मिला तो मुझे देखकर हैरानी हुई बंदर ने किशमिश सारी  छोड़ कर केवल दूसरे मेवे खाये है। मुझे उस बंदर पर बहुत गुस्सा आया उसने बादाम ,काजू और नारियल खाकर सारी किशमिश बर्बाद कर दी थी। अगर खा लेता तो संतुष्टि होती।
       हमें मांस  का प्रसाद  बंटता कही दिखाई नहीं दिया। बलि किसी अन्य जगह पर दी जाती है। यहां पर केवल सिर लेकर पूजा की जाती है।
       प्रसाद के अगरवत्ती और  दिए जलाने के अलग स्थान बनाये गए है। श्रद्धा भाव से लोग वहां अगरवत्ती और दिए जला रहे थे।
        कामाख्या मंदिर 51  शक्तिपीठो में से एक है। यहाँ शिव की पत्नी सती  की योनि गिरी थी। जून मास में अम्बुवाची पर्व मनाया जाता है। उस समय सती  को रजस्वला मान कर मंदिर के पट  बंद कर दिए जाते है। इस पर्व में शामिल होने के लिए दूर -दूर से लोग आते है।
       मंदिर से कुछ दूर   ब्रह्मपुत्र नदी के अंदर उमानंदा मंदिर है। जिसके बारे में कहा जाता है जब शिवजी के कंधे से विष्णुजी के द्वारा सारे  अंग काट दिए जाने पर भारहीन  होने पर शिवजी का क्रोध खत्म हुआ। तब उन्होंने उमानंदा  स्थान पर तपस्या करनी शुरू कर दी। इसी स्थान पर कामदेव ने उनकी तपस्या भंग  करने की कोशिश की। यहां पर शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया। क्रोध शांत होने पर  दुबारा  से यही पर उन्हें  जीवन दान दिया था।
       मुझे शिवजी और सती  की कहानी और यहाँ होने के कारण मुझे लग रहा था जैसे मै  पौराणिक काल में पहुंच गई हूँ। मै  स्वयं को वहां पाकर रोमांच से भर उठी हूँ। इस तरह का एहसास इससे पहले मुझे कभी नहीं हुआ था। 

#RAVAN KE GUN

                                  रावण के गुण 

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        कल रावण का दहन हुआ। मुझे रावण में कुछ अच्छाइया दिखाई देती है लेकिन रावण राम से हार गए थे इसलिए उन्हें बुरा इंसान मान लिया गया। आज के इंसान को यदि रावण के समान गुण मिल जाये तब उसका व्यवहार भी बदल जायेगा। आप मेरे विचारो से सहमति जाहिर नहीं कर पाएंगे लेकिन जो विश्लेषण करने जा रही हूँ उसपर विचार अवश्य करे।
       किवदंती है बचपन में रावण बहुत सूंदर होने के कारण ,उन्हें दशानन कहकर पुकारा जाता था। उनके दस सिर कभी नहीं थे। बल्कि उनकी सूंदरता  के कारण उन्हें यह उपनाम मिला।
      रावण को शास्त्र और शस्त्र का अद्भुत ज्ञान हासिल था। अपने समय में रावण लंका के आलावा पूरे भारत मे भ्रमण करते थे। उनके साम्राज्य का विस्तार भी भारत में फैला हुआ था। दक्षिण भारत में विशेष रूप से उनका वर्चस्व था इसलिए वे हवन आदि क्रियाओ का विरोध करते थे। क्योंकि उनकी रक्ष संस्कृति इसके विपरीत थी। 
      राम आर्य संस्कृति को मानने वाले थे। जबकि रावण रक्ष संस्कृति के उपासक थे। हर इंसान अपने धर्म को दूसरे धर्म से ऊँचा समझता है जिसके कारण अपने धर्म के उत्थान के भरसक प्रयत्न करता है।  दूसरे धर्म को खत्म करने में सारी ताकत झोंक देता है। वैसे ही रावण ने किया। रक्ष संस्कृति में खुलापन था। जबकि आर्य संस्कृति इस खुलेपन को बर्दाश्त नहीं कर पाती  थी।
        सुपनखा अर्थात स्वर्णनखा ने राम और लक्षमण के सामने अपनी पसंद जाहिर की जबकि आर्य संस्कृति में विवाह दूसरे निर्धारित करते थे।उन्होंने उसकी इच्छा का उपहास ही नहीं उड़ाया बल्कि उन्होंने सूपनखा को बदसूरत ही बना दिया। ये कहाँ का इंसाफ है।
      सुपर्णखा के अपमान का बदला लेने के लिए रावण ने सीता का हरण किया था। किसी की बहन को बदसूरत बना देने पर साधारण इंसान भी अपना आपा खो बैठेगा जबकि रावण लंका का ताकतवर  राजा था। उसके गुस्से के बारे में किसी ने  नहीं सोचा। 
       रावण की पत्नी मंदोदरी पांच कन्याओं (सीता ,द्रोपदी, अहिल्या ,अनुसुइया और मंदोदरी ) में गिनी जाती है।यानि उस समय की सर्वश्रेष्ठ औरत  थी.सर्वश्रेठ  औरते सर्वश्रेष्ठ लोगो को ही मिलती है।   मंदोदरी अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी। वह जोधपुर की कन्या थी।
          भारत में केवल दो स्थान है जहाँ रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। उसमे एक उत्तर प्रदेश का विशरख यहां रावण के पिता विश्रवा  ऋषि रहते थे  और दूसरा जोधपुर क्योकि रावण को  यहाँ दामाद माना जाता है।
          रावण लंका में जब भी सीता से मिलने जाता था तब उसके साथ मंदोदरी होती थी। यदि उसके मन में कलुष होता तब क्या वह मंदोदरी को अपने साथ लेकर जाता।  सीता का हरण केवल सूपनखा के अपमान का बदला लेने के लिए किया गया था।
      उस समय    रावण के सामान विद्वान कोई   नहीं था। तभी तो राम ने लक्ष्मण से उसके अंतिम क्षणों  में ज्ञान प्राप्त करने के लिए कहा। दुश्मन के पास कोई चीज होती है तभी उसके सामने झुका जाता है।  वरना दुश्मनी जिससे की जाती है उससे जीभरकर पहले नफरत की जाती है। जिससे नफरत करेंगे उससे ज्ञान प्राप्त करने के बारे में कौन सोचता है।
          रावण के सामान उस समय कोई बाहुबली नहीं था। उसे कोई हराने की सामर्थ्य नहीं रखता था। ऐसे में घमंड आना बड़ी बात नहीं है।
       रावण विभीषण की विश्वासघात के कारण मारा गया था। यदि ऐसा नहीं होता रावण को हराना असम्भव था। कहा जाता है रावण की मौत के बाद विभीषण को लंका का राजा बना दिया गया और मंदोदरी की शादी भी उससे कर दी गयी।
        आपको आर्य संस्कृति को  मानने के  कारण ये उचित लगता है। मुझे नहीं लगता।  जहाँ लक्ष्मण ने कभी सीता को पैरों  से ऊपर नहीं देखा वही विभीषण ने अपनी भाभी से शादी की।
        एक बार आप अवश्य विचार कीजिये रावण एक साधारण मनुष्य था। जिसके पिता ऋषि का जीवन जीते थे। उन्हें पैतृक रूप से वह केवल ज्ञान दे पाए वाकी  सब कुछ उन्होंने अपने पुरूषार्थ  से हासिल किया। उन्हें सुंदरता भगवद्कृपा से मिली बाकि गुण उन्होंने अपनी कर्मठता से हासिल किये।
        शिव को अपनी उपासना से प्रसन्न करके उनसे सोने की लंका प्राप्त की। जबकि हम तो किसी से एक तौला सोना भी प्राप्त नहीं कर पाते। 
        अभी हमने देवी को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखे। जिंदगी भर पूजा आराधना की लेकिन भगवान ने आज तक दर्शन नहीं दिए। हमसे रावण उत्तम है तभी तो उन्हें इच्छित फल मिले। 

#GANDHI IN TODAY"S CONTEXT

                                    आज के सन्दर्भ में गाँधी 

  

  आज महात्मा गाँधी जी की 150  वी  जयंती मनाई जा रही है।  लोग बहुत उत्साह से इसे त्यौहार की तरह  मना रहे है। मै  गाँधी जी को महात्मा के रूप में न मान कर एक साधारण इंसान मानती हू। जिसने हालात  को बदलने का प्रण  ले लिया। उसके कारण उन्हें कितनी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा लेकिन वे अडिग रहे।  वे  मिलने वाली यातनाओ से घबराये नहीं।अपने निर्णय पर अडिग रहे।
          उनके जीवन में जेल और घर के माहौल में कोई अंतर नहीं था। वे  जेल में रहते हुए इस तरह अपने रोजमर्रा के कामो में इस तरह लगे रहते थे जैसे घर में रहते  काम कर रहे हो. ब्रिटिश अधिकारियो को उनके इस व्यवहार से हैरानी होती थी। गाँधी जी ने आम जनता के अंदर से भी जेल का डर  निकाल  दिया था। उनके द्वारा ही सबसे पहले जेल भरो आंदोलन की शुरुरात हुए थी। आदमी और औरत जेल जाने पर गौरान्वित महसूस करने लगे थे।
       १८५७ की आजादी  की आग लोगो के अंदर धीरे -धीरे दम तोड़ने लगी थी। भारतीय जनता के अंदर ब्रिटिश साम्राज्य का  सामना    करने की भावना खत्म हो गई थी। गाँधी जी ने उस भावना को फिर से जागृत किया। उन्होंने अकेले बढ़ने के आलावा ,सभी के अंदर स्वाभिमान से जीने की इच्छा पैदा की।  ये भावना बहुत बड़ी थी। मानो   मरते हुए इंसान को जीवित कर दिया हो।
           आज के समय में गाँधी जी के बारे में बहुत  लोग अपशब्द बोलते है। हम आजादी  के बाद पैदा होने वाली पीढ़ी है। हम उस हालात  से वाकिफ नहीं है। लेकिन बुद्धिजीवी लोग उनके सहयोग को नकार नहीं सकते।        गाँधी जी को समाज और देश में जो कमी दिखाई देती थी उसे अकेले निबटने की अपेक्षा जनांदोलन का रूप दे देते थे।
        भारतीय सफाई के लिए विशेष वर्ग तक  सीमित  थे । उनको अपने बराबर अधिकार भी देने के लिए तैयार नहीं थे ।  उनका महत्व भी नहीं समझता थे । लोग गंदगी में बैठना मंजूर करते थे लेकिन अपने हाथ से सफाई करना मंजूर नहीं था। उनकी इस आदत के कारण विदेशो में भारतीयों को गंदे लोग कहा जाता था।
      गांधीजी को ये बात खटकी। उन्होंने हर काम खुद करना शुरू किया जैसे बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना और पखाना साफ करना जिसे करने  की शक्ति आम लोगो में नहीं होती थी। सफाई खुद करके  लोगो को सफाई करने के लिए प्रेरित किया। साफ -स्वच्छ जगह पर रहने को उन्होंने जन -आंदोलन का रूप दे दिया।
        उनकी इस आदत को लोग 120  बर्षो में भूलने लगे थे। उसी भावना को मोदी जी ने फिर से जनांदोलन में बदल दिया। जन आंदोलन से समाज को बदलना आसान होता है। एक अकेला इंसान या सरकार  हालत को बदलने में असमर्थ होटी  है।
      मैने बहुत सालो से  सफाई कर्मियों की आवश्यकता केवल कागजो में देखी  थी प्रत्यक्ष में उनकी पगार का लाभ उठाते हुए, उच्च अधिकारियो को देखा था। जो सफाई कर्मी कार्यरत थे उन्हें भी कोई अधिकारी साफ -सफाई के लिए टोकता नहीं था। जिसके कारण 50  कमरों की सफाई करने के लिए एक कर्मी होता था। सभी को पता होता है  एक कर्मी इतनी सफाई नहीं कर सकता इसलिए सरकारी कार्यालयों में  गंदगी का अम्बार लगा होता था। अब उन्ही स्थानों पर सात कर्मी दोनों समय सफाई करते दिखाई देते है। उनके निरिक्षण के लिए समय -समय पर लोग आते रहते है।
       पहले हम यदि सफाई कर्मियों को काम के लिए कहते थे तब उनके पास ढेर सारे बहाने होते थे लेकिन अब सब अपनी जिम्मेदारी समझ कर काम करने लगे है।
        मैंने वह समय भी देखा है जब पुरे विद्यालय में एक कर्मी होता था। जो विद्यालय के समय में अधिक आमदनी के लिए आस पास के घरो में काम करने चला  जाता था। क्योंकि उसे बहुत कम वेतन दिया जाता था जिसमें  घर का गुजारा चलाना  कठिन होता था।
     मैंने वह वक्त  देखा है जब दो हजार बच्चो के विद्यालय में एक शौचालय होता था। उसे भी सफाई कर्मी सही तरीके  से साफ नहीं करता था। अधिकतर शौचालय जाम रहते थे। जिसके कारण लड़किया शौचालय में जाने से बचती थी।
           मैंने एक सफाई कर्मी ऐसा भी देखा जिसने उस इकलौते शौचालय में अपना ताला  लगा दिया था। जिसके कारण दो हजार लड़कियों को समस्या का सामना करना पड़ता था। जब उससे पूछा। उसने कहा "-इसमें मेरा सामान रखा है।इसे मैं  नहीं खोलूंगी। "उसके इस जबाब से हतप्रभ रह गई  इसके कारण लड़किया जहाँ जगह मिलती थी वही अपना काम करती थी। जिसके कारण वह सफाई कर्मी कहती थी "-इनको अक्ल नहीं है।गंद मचाती फिरती है।
      मै   मोदी जी के शौचालय अभियान और सफाई  अभियान के कारण आभारी हूँ।क्योकि गंदे शौचालय में जाने की हिम्मत नहीं होती थी। हम जैसे पढ़े -लिखे लोग खुले में जा नहीं सकते थे। हाथ में पैसे होते हुए भी बेबस थे।
     गांधीजी ने कोढ़ियो की सेवा करके लोगो के अंदर उपेक्षित और बीमार लोगो के प्रति हमदर्दी की भावना जगाई। आज भी बीमारों को उचित देखभाल और इलाज की जरूरत है। उसके लिए हमारी सरकार  ने आयुष्मान योजना और मौहल्ला क्लिनिक की शुरुरात की।
        भारत की जनसंख्या बढनेका कारण मृत्यु दर का अधिक होना है। यदि उचित समय में इलाज मिलेगा तो लोग एक या दो बच्चो से ज्यादा पैदा नहीं करेंगे। पढ़े -लिखे और अमीर  घरो में आपको एक या दो बच्चे ही मिलेंगे क्योकि उन्हें सही समय पर इलाज मिल जाता है। अभी भी भारत में गरीब राज्यों में जनसंख्या बहुत है जबकि अमीर  राज्यों में जनसंख्या का बढ़ना रुक गया है।
        अधिकतर लोग कहते है। गाँधी जी ने अछूतो को गले लगाया जो गलत था। लेकिन जब मनु ने जाति  नियमो की रचना की थी  वह  कर्म के आधार पर  निर्धारित होती थी लेकिन कालांतर में उच्च वर्ग के लोगो ने कर्म की जगह  जन्म के आधार पर  जाति निर्धारित कर दी।क्योकि उच्च वर्ग के लोग अपने बच्चो को छोटे काम करते देख नहीं सकते थे।
        निचले तबके के लोगो से सारे अधिकार छीन लिए गए। उन्हें इतना अधिक प्रताड़ित किया गया कि उन्होंने धर्म ही बदलने में भलाई समझी।क्योकि अन्य धर्मो में उन्हें समान समझा जाता था  और अनेक लाभ दिए जा रहे थे।  भारत में रहने वाले ईसाई  या मुस्लमान अधिकतर दलित वर्ग के लोग  थे।
       उच्च जाति का इंसान आसानी से धर्म नहीं बदलता। भारतीय अपनी कटटरता के कारण हिन्दू समाज को छोटा करते चले जा रहे थे जबकि ईसाई और मुसलमान बढ़ते जा रहे थे।
         सबसे पुराने धर्मो में हिन्दू धर्म की गणना की जाती है। यहाँ तक   कहा  जाता है -हिन्दू धर्म के अवशेष मालद्वीप, इंडोनेशिया , बर्मा ,मध्य एशिया ,अफगानिस्तान और अमरीका तक  मिल रहे है। तो एक भी हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं रहा।
      एक समय ऐसा आ गया था जब लोग खुद को हिन्दू नहीं कह रहे थे। भारतीय नेता खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने में शान समझ रहे थे। तब दूसरे देशो के लोगो से हिन्दू धर्म की छवि धूमिल होती जा रही थी। जब पहली बार मोदी जी ने विदेश में जाकर खुद को हिन्दू कहा. तब विदेशियों ने हैरानी से पूछा "-अन्य कोई नेता खुद को हिन्दू कहने की जगह धर्मनिरपेक्ष कहते है। आप ऐसा क्यों नहीं कहते। "
     जब हम अपने धर्म का सम्मान नहीं करेंगे तब दूसरा हमारे धर्म का सम्मान कैसे करेगा।
      आज के संदर्भ में भी गाँधी की उतनी ही जरूरत है जितनी अब से डेढ़ सौ साल पहले थी। हम गाँधी को वापिस बुला नहीं सकते लेकिन उनके पदचिन्हो पर चलने में कोई बुराई नहीं है।

              

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...