तुगलकाबाद का किला या वक्त की ताकत का रौद्र रूप
तुगलकाबाद का किला बाहरी दिल्ली में होने के कारण अधिकतर लोगो की नजरो से ओझल रहा है। इसकी तरफ सरकार का ध्यान भी नहीं जा सका है जिसके कारण यह दिनोदिन खंडहर में तब्दील होता जा रहा है . इसके संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक ने दो साल के अंदर भव्य किला बनबाया था। इतना बड़ा किला इतने कम समय में बनता हुआ इससे पहले मैने नहीं सुना था। यह 6 किलोमीटर के दायरे में बसाया गया था। इसके 52 दरवाजे थे। लेकिन अब सही तरिके से बने हुए दरवाजे कुछ ही बचे है। एक भव्य किला किस तरह मलवे के ढेर में बदलता है। इसका एहसास यहाँ पहुँचकर होता है।इसकी बहुत चौड़ी दीवारे देखकर एहसास होता है। किलो को युद्ध में तोडना इतना मुश्किल क्यों होता था।
इसकी बाहरी दीवार लगभग डेढ़ मीटर चौड़ी लग रही थी। इसकी बाहरी दीवार काफी हद तक सही सलामत है। वरना बाकि दीवारों के अवशेष ही बचे है।
इसमें खाने के सामान को रखने के लिए गोल अन्नागार बनाये गए थे। अब केवल उसकी गोलाई देखकर उसके प्राचीन आकार का अहसास होता है। पानी के इंतजाम के लिए भव्य बाबली में पानी कही दिखाई नहीं देता बल्कि गंदगी ज्यादा दिखाई देती है।
इस किले में केदियो को रखने के लिए छोटी -छोटी कोठरिया बनी हुई थी। लेकिन उन कोठरियों में दरवाजे उखड़ कर गायब हो गए थे। उन कोठरियों तक पहुंचने के रास्तें में झाड़ियाँ उगने के कारण यहाँ तक पहुँचना मुश्किल हो रहा था। मेरे कपड़ो में झाड़ियाँ उलझ कर मुझे परेशान कर रही थी। अपने कपड़े सँभालने के बाबजूद बहुत सारे जंगली कांटे उसमे फंस गए थे। इतनी मुसीबत के कारण अंदर नीचे तक पहुंचने में बहुत दिक्क्त आयी।
बादशाह तुगलक ने इसमें हर तरह के उम्दा प्रबंध किये थे लेकिन रखरखाव की कमी के कारण यहाँ कुछ भी संतोषजनक दिखाई नहीं देता। इस जगह केवल टिकट घर तो बनाया गया है। लेकिन उस पैसे से इसकी बदहाली दूर करने की कोशिश नहीं की जा रही।
मेँ इतवार को इस किले में गयी थी। यहाँ पर बहुत सारे जवान बच्चे मौज मस्ती के लिए आये हुए थे। उनकी धमा चौकड़ी और शरारते मन में उल्लास पैदा कर रही थी। अधिकतर किले में ऊपर चढ़ने की सीढिया पत्थरो के ढेर में बदल गयी है जिस पर चढ़ना हिम्मत का काम है। यदि इसके ऊपर चढ़ सको तो आस -पास के दृश्य देखने पर सारी परेशानी दूर हो जाती है।
इस किले के आस -पास जंगल उग आये है। ऊंचाई से देखने पर ये बेतरतीव जंगल मन में उदासी भर देते है। क्रूर गयासुद्दीन तुग़लक़ ने जवानी में भले ही बहुत सारी लड़ाईया लड़ी थी लेकिन बाद में उसके अंदर उदार भावना पनपने लगी थी। जिसके कारण उसने जनता की भलाई के लिए बहुत सारे काम करने शुरू कर दिए थे। लेकिन उनके वंशजो को उनकी उदारता पसंद नहीं आयी। उनकी ये उदारता ही उनकी मौत का कारण बन गयी। उनके बेटे मोहम्मद बिन तुगलक ने ही ऐसा कमजोर मंच बनवाया कि गयासुद्दीन के मंच पर चढ़ते ही उसके टूटने के कारण वह उसके नीचे दब कर मर गया।
इस बाकए को जानकर मुझे लोगो की सोच पर हैरानी होती है। हम सारी उम्र जिन बच्चो के लिए मेहनत करते है। दूसरो का हक छीनने से भी गुरेज नहीं करते। वही बच्चे बड़े होने पर समय से पहले सब कुछ पा लेने की खातिर अपने बड़ो का अस्तित्व दुनियाँ से मिटा देने की तिकड़में सोचने लगते है। यदि भगवान भविष्य देखने की शक्ति इंसान में दे दे तो आधे अपराध होने से रुक जाये।
किले से कुछ दूर सड़क के पार मकबरा बना हुआ है जिसके बारे में कहा जाता है इसकी तीनो कब्रे बाप ,बेटे और माँ की है। दुनिया का आश्चर्य ही कहा जायेगा। हम दुसरो की मौत देखने के बाबजूद अपनी मौत के बारे में सोचना ही नहीं चाहते। कुछ समय की ताकत और शोहरत के लिए कितनो का खून बहा दिया जाता है।
मुह्हमद बिन तुगलक के बारे में कहा जाता है कि इसने दिल्ली की सारी जनता को दक्षिण भारत चलने के लिए विवश किया उसने अपनी राजधानी वही आक्रमणों से बचने के कारण बनाने की सोची थी। लेकिन बड़े अधिकारी और अमीर लोग सवारियों पर चढ़ कर दक्षिण भारत पहुंच गए लेकिन निरीह जनता के लिए सही प्रबंध नहीं किये जा सके। जिसके कारण निरीह जनता को बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। बादशाह ने दक्षिण भारत आने वाली परेशानियों के बारे में नहीं सोचा था। जब परेशानियों का सामना करना पड़ा तो बादशाह ने फिर से अपनी जनता को वापिस दिल्ली चलने का आदेश दे दिया। उसने जनता से कुछ भी पूछना जरूरी नहीं समझा। कहा जाता है "-इस आने -जाने की परेशानियों के कारण उसकी आधी जनता मर गयी।" इस कारण मोहम्मद बिन तुगलक को पागल बादशाह भी कहा जाता हे।
यहाँ आस -पास के इलाको में पानी की दिक्क्त है। जिसके कारण लोग दूसरी जगहों पर शरण तलाश रहे है। यदि हम मिल जुलकर प्रयास करे तो हमारी काफी सारी परेशानी दूर हो जाएगी। पुराने पानी के प्रबंध को दुबारा से पुनर्जीवित करके इस समस्या का हल किया जा सकता है।
१३२१ में बने महल के खंडहर देखकर अहसास होता है। संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। वरना जिन किलो को सेना तोड़ नहीं सकी। उन्हें 700 सालो ने खुद ही मलवे में तब्दील कर दिया।


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें