मणिपुर मेरी नजर से
बाकी भारत से उत्तर -पूर्व का इलाका बिलकुल अलग -थलग है। वहाँ के बारे में अधिकतर भारतीयों को बिलकुल जानकारी नहीं है। उस इलाके में जाने के बारे में कोई सोचना भी नहीं चाहता वहाँ के लोगो और वातावरण के बारे में डर समाया रहता है। जैसे पहले समय में काला पानी (अंदमान -निकोबार ) के बारे में सजायाफ्ता कैदी दिमाग में आ जाते थे। वैसे ही इन राज्यों के बारे में सारे नक्सलवादी या आतंकवादी दिमाग में छाने लगते है।मेरी बेटी की नौकरी जब मणिपुर में लगी तो उस इलाके में जाने का मौका मिला। सरकारी नौकरी लगने की हमे कोई खास ख़ुशी नहीं हो रही थी बल्कि दिल में डर बैठ गया था। इम्फाल इलाके में कोई जान -पहचान वाला नहीं था। उस राज्य के बारे में किसी इंसान से जानकारी मिलना मुश्किल था। इसलिए इंटरनेट के जरिये जानकारी हासिल की।
दिल्ली से सीधी उडान इम्फाल तक नहीं है। हमारी फ्लाइट सुबह सात बजे की थी। लेकिन एयरपोर्ट पहुंचने पर उसके तीन घंटे देर से उड़ान भरने की खबर लगी। हमे दुःख हुआ इसके लिए हम सुबह 3 बजे से जग कर काम कर रहे थे। लेकिन कुछ देर हम कुर्सियों पर बैठे रहे हमसे कुछ दूर आगे कुर्सी जैसी आरामकुर्सी दिखाई दे रही थी। इस समय वे सब भरी हुई थी। कुछ समय बाद जब वो कुर्सी खाली हो गई तो मै उस पर जा कर सो गई . कब समय बीत गया पता नहीं चला।
हम लगभग उड़ान भरने से एक घंटे पहले उठ कर चाय पीने का इंतजाम देखने लगे। तब हमें दिल्ली एयरपोर्ट पर एक जगह चाय की दुकान दिखाई दी। हमने नींद भगाने के ख्याल से तीन कप चाय के आदेश के साथ पांच सौ का नोट दिया। हमें लगा दुकानवाला कुछ पैसे वापस करेगा लेकिन हमारी उम्मीदों पर तुषारापात हो गया जब उसने तीन चाय के लिए और पैसे मांगे। हमारे पैसे पूछने पर उसने बताया एक कप चाय दो सौ रूपये की है।
ऐसे ही पांच सौ मिली लीटर पानी की बोतल सौ रूपये की है।इतने पैसे सुनकर हम दंग रह गए क्योंकि हमने इससे पहले केवल दस रूपये की एक कप चाय और 25 रूपये की आधे लीटर पानी की बोतल खरीदी थी।
कोहरे के कारण उड़ान देरी की वजह हमे समझ नहीं आ रही थी क्योंकि दिल्ली में मौसम बहुत सुहावना था। कुछ समय बाद हमारा प्लेन आकाश में उड़ने लगा। जहाज गोहाटी होकर जा रहा था। गोहाटी में कुछ सवारिया उतर कर चली गयी। गोहाटी एयरपोर्ट पर फोटो खींचना मना है। वहाँ पर सुरक्षा वाले अंदर आने के बाद हर समान की चेकिंग करने लगे हमें बहुत अजीब लग रहा था। लेकिन सुरक्षात्मक पहलू से उचित था क्योंकि कोई उतरते हुए गलत चीज छोड़ जाये तो यात्रियों की जान को जोखिम का सामना करना पड़ेगा।
इम्फाल एयरपोर्ट छोटा लेकिन सुंदर है। वहाँ से इम्फाल देखना बहुत अच्छा लग रहा था। हर तरफ हरियाली थी। कांगला फोर्ट के चारो तरफ हरियाली बिखरी हुए थी। उसके चारो तरफ पानी की नहर बनी हुई थी। इसमें हमे कई मंदिर और संग्रहालय दिखाई दिए। उनका वास्तुशिल्प अद्वितीय था। वहाँ का प्रतीक चिन्ह इससे पहले कही नहीं देखा था लेकिन कांगला फोर्ट में राजमहल जैसी कोई जगह नहीं दिखाई दी इससे पहले हमने जितने किले देखे थे उनमे राजा से सम्बन्धित जगहे दिखाई देती थी लेकिन केवल संग्रहालय में ही राजशाही से सम्बन्धित चीजे थी किसी और जगह नहीं दिखाई दी।
दिल्ली जैसे बड़े शहर में रहने वालो के हिसाब से इम्फाल बहुत छोटी जगह है। मणिपुर की राजधानी होने के कारण हमारा मन विधानसभा, मुख्यमंत्री का घर और मंत्रियो का घर देखने के लिए लालायित होने लगा। जब हमने इन सभी को देखना शुरू किया तो ये सब हमारे होटल के आस -पास निकले। लेकिन नया समझ कर ऑटोरिक्शा वाले ने हमसे जमकर पैसे वसूल किये। वरना हम इन जगहों पर पैदल ही जा सकते थे। मणिपुर में दस रूपये सवारी के हिसाब से ऑटो मिलते है। ये लगभग दस रूपये में इम्फाल में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देते है..लोकल लोगो से कम और ज्यादा दूरी के लिए समान रूप से दस रूपये लिए जाते है लेकिन बाहरी लोगो से जम कर कमाया जाता है।
मणिपुरी लोगो का रंगरूप बाहरी लोगो से अलग होने के कारण दूसरे भारतीयों से अलग पहचान हो जाती है। उनके हिंदी उच्चारण का तरीका भी हमसे अलग होता है जिसके कारण हमे दूर से पहचान लिया जाता है। वहाँ जाकर हमे विदेशी जैसा एहसास हो रहा था। हम जो कहते उन्हें समझ नहीं आता था उनकी बोली गयी हिंदी समझने में हमे बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी।
वहाँ के अधिकतर सभ्य लोगो को तीन भाषा आती है। वहाँ की भाषा में ल और फ शब्द की बहुतायत है। शुरू में वहाँ के नाम पढ़ने में मुश्किल होती थी क्योंकि जो लिखा होता है उसमे से बहुत सारे शब्दों के उच्चारण के बिना बोले जाते है धीरे -धीरे उन्हें बोलना आ सका।
यहाँ का खान -पान बाकि भारत से अलग है। इन जगहों पर दूध बाकि भारत से पांच गुना ज्यादा महंगा है। वहाँ के लोगो को दूध या दूध से बनी चीजे खाने की आदत नहीं होती बल्कि चाय बिना दूध की पी जाती है। जबकि यहाँ मांसाहारी भोजन सस्ता है। उन्हें समझ नहीं आता शाकाहारी लोग कैसे जीवित रहते है। उन्हें बिना सब्जी के खाना सही लगता है। उनके खाने में हर समय मांसाहार होता है।
यहाँ की सब्जी बाजार में चार सब्जी की दुकान के बाद मांस की दुकान मिलना सहज है। सुखी मछली भी खूब मिलती है यहाँ पर राजमा की फली सब्जी के रूप में मिलती है।
मणिपुर में गंदे नाले नहीं मिलते बल्कि अनेक जगहों पर साफ पानी भरा हुआ दिखाई देता है। जिसमे मछलिया तैरती देखी जा सकती है। वहां हरियाली और पानी की बहुतायत होने के बाबजूद हानिकारक मच्छर कम दिखाई देते है। उन्होंने चिकनगुनिया और डेंगू जैसी बीमारी के नाम नहीं सुने है।
बरसात अधिक होने के कारण अधिकतर सड़के टूटी हुइ हैं। वहाँ म्युटिनी मेमोरियल देखने लायक जगह हे। दूसरे विश्वयुद्ध के समय के शहीदों के स्मारक बने है। उस जगह और उनके बारे में पढ़कर बहुत दुःख होता है वहाँ बीस से लेकर तीस बरस के अनेको शहीद अंतिम निंद्रा में सोये हुए है। उनकी माओ की तकलीफ सोचने पर मजबूर करती है इन्हे कितने लाढ -प्यार से उन्होंने मरने के लिए पाला होगा। उनकी मौत का गम उन्हें जिन्दा आग में तड़पाता होगा। मरने तक उन्हें इस गम से निजाद नहीं मिली होगी। 75 साल बाद उनका दुःख मुझे विह्वल कर गया।
वहाँ की आबादी केवल 42000 होने के बाबजूद गहमागहमी दिखाई देती है क्योंकि अधिकतर बाजारों में औरतो का अधिपत्य है। हर तरफ औरते दिखाई देती है। आदमी इतने रौबदार नहीं होते जितनी औरते आत्मविश्वास से भरी दिखाई देती है। ईमा बाजार में सारी औरते दुकानों पर बैठी दिखाई देती है।
हर किलोमीटर पर सेना के जवान बंदूकों के साथ खड़े दिखाई देते है। बड़े पुलिस अधिकारी बख्तरबंद गाड़ियों में जाते दिखाई देते है। उनकी गाड़ी से आगे और पीछे गाड़ियां चलती है। ये सब हमारे लिए अजूबा था।
इन सब के बाबजूद वहाँ जाकर जिंदगी बिताना दुष्कर है। एक अलग तरह के अनुभव पाने के लिए वहाँ जाना चाहिए।

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