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                                     दृढ़ प्रतिज्ञ जयललिता 

   आज मुझे  मुख्यमंत्री जयललिता की  मौत का सदमा लगा  है।  उसका जुझारू व्यक्तित्ब लोगो को देवी का अवतार मानने पर मजबूर करता है। एक दो साल की बच्ची के पिता की मौत ,उनके प्रतिष्ठित परिवार के द्वारा नकार दिया जाना। उनका नानके और मौसी के हाथो पालन -पोषण होना।

       माँ के करीबी होने की इच्छा रखने पर माँ के साथ ना  रह सकना। किसी सदमे से कम नही होता। रात को माँ की साड़ी पकड़ कर सोना।,ताकि माँ के जाने का उसे पता चल जाये। लेकिन माँ का साड़ी बदल कर चले जाना। सुबह माँ के नही मिलने पर उस बच्ची का दर्द मुझे झकझोर देता है। उस माँ की तड़प सोचने पर मजबूर कर देती है। वह पैसे की खातिर, अपनी छोटी सी बच्ची को किस तरह दिल पर पत्थर रख कर जाने पर मजबूर होती होगी। जिस बच्ची ने पिता का प्यार न जाना ,केवल माँ के आँचल की छाह  मिली। वह भी स्थाई नही थी वह अनजाने चेहरो के बीज अपनापन ढूंढती रह जाती होगी। 
      उसे बड़े होने पर भी इस बात का अहसास नही था कि उनके पास पैसे की कमी है। उसे हमेशा लगता था वह अमीर घराने से ताल्लुक रखती है। अमीर घराना उसका दादा का परिवार था। उनका सम्बन्ध राज घराने से था जिसके कारण उनके नाम के आगे" जय "लगाया गया। लेकिन उसके ठाठ -बाट उसके नसीब में नही थे। 
     वह पढ़ने में बहुत अच्छी होने  कारण बहुत पढ़ना चाहती थी लेकिन 1३  साल की उम्र में उसे जबरदस्ती फिल्मो में काम करवाया गया। तब उसे माँ की मजबूरी समझ में आयी। यहाँ उसकी किस्मत चल पड़ी उसकी हर फिल्म हिट होती उसने अपने कॅरियर में १४० फिल्मे की। उसमे 28 फिल्मे" म  ग रामचंद्रन" के साथ की जो उनसे 31 साल बड़े थे। उन्होंने तमिल, तेलगु ,मलयालम ,कन्नड़ ,हिंदी और अंग्रेजी भाषाओ में काम किया। उनकी दो हिंदी फिल्मे मनमौजी और इज्जत बनी। लेकिन हिंदी फिल्मो में इतनी सफलता प्राप्त नही हुई।उन्होंने उस समय के सभी लोकप्रिय अभिनेताओ के साथ काम किया। वे अपने समय में सबसे अधिक पैसे लेने वाली अभिनेत्री थी।  
          उनके जीवन की आरंभिक अवस्था पर माँ का प्रभाव रहा। बाकि जीवन पर रामचंद्रन का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। आरम्भ में उनका जीवन रामचंद्रन के प्रभाव तले पनपा। परोक्ष रूप में उनको रामचंद्रन के साथ रहने का फायदा भी हुआ। उन्ही के सौजन्य से वह राजनीति में आयी। उनके बीच काफी मतभेद भी रहे। एक समय ऐसा आया जब रामचंद्रन उन्हें पार्टी से निकालने के लिए तैयार हो गए थे लेकिन एक दिन पहले ही उनकी मौत हो गयी। 
        रामचंद्रन की मौत के समय उनके परिवार वाले उनसे नाराज थे। जिसके कारण उन्हें उनकी मौत की सही जानकारी नही दी गयी। जिस दरवाजे से अंदर जाने की कोशिश करती उस दरवाजे को उसके सामने बंद कर दिया जाता। जब वह घर के अंदर पहुँच सकी। तब तक  रामचंद्रन के पार्थिव शरीर को अन्य दरवाजे से बाहर ले जाया जा चुका था। लेकिन उनके दृढ़ निश्चय ने उन्हें उनके पार्थिव शरीर तक पहुँचाया। जहाँ उनके विरोधी उन्हें अनेक तरह से प्रताड़ित कर रहे थे जिससे वह चली जाये। कोई उन्हें चुटकी काटता ,कोई जानबूझ कर पैर कुचल  देता लेकिन वह अपनी अदम्य जिजीविषा के कारण दो दिनों तक लगातार बैठी रही। उनकी शव यात्रा के समय वह साथ न चल सके। उस समय उन्हें धक्का तक देने में गुरेज नही किया गया। आप खुद सोच के देखिये जिस इंसान को उन्होंने अपना सब कुछ समझा ,उसकी अंतिम यात्रा के समय उसे इस तरह दुत्कारा जाना उसके हृदय को किस तरह लहूलुहान कर रहा होगा। 
        उन्होंने जीवन में आये सारे अवरोधों को पार किया और रामचंद्रन की राजनीतिक उत्तराधिकारी बन कर अपने सारे प्रतिद्वंदियों को एक तरफ करके तमिल नाडु की मुख्यमंत्री बन कर दिखा दिया।  उन्होंने बेतन के रूप में 1 रुपया लेने की बात की। पहली महिला मुख्यमंत्री जो इस पद पर 6  बार चुनी गयी। लोग उन्हें देवी के सामान पूजते थे। उनके पैर दंडवत छूते थे। उन्होंने कभी इसका विरोध भी नही किया। वह गरीबो की मसीहा बन कर उनके दुःख -दर्द को दूर करने की कोशिश करती थी। उन्हें गरीबो के लिए बहुत सारी योजनाए बनाई जिसके कारण लोग उनके मुरीद बन गए। उन्होंने गरीबो के सारे दर्द दूर करने के लिए जी जान लगा दी। 
       उन्होंने अपने जीवन में बहुत अपमान सहा लेकिन प्रतिशोध लेने से भी कभी पीछे नही हटी। करुणानिधि और उनके सम्बन्ध राजनीतिक प्रतिशोध का ज्वलंत उदाहरण है दोनों हर तरह से अपने प्रतिद्वंदियों को सलाखों के पीछे भेजते रहे। 
         उन्होंने सारी जिंदगी भोगविलास में बिताई उनके घर जब छापा पड़ा तब 28 किलो सोना ,बहुत अधिक  चांदी  ,750 जूते ,कई हजार साड़िया मिली। उन्होंने शशिकला के बेटे की शादी में 100 करोड़ रूपये  लगाए जिसके कारण उनकी देवी की छवि टूट गयी। उसका खामियाजा उन्हें चुनाव में हार के रूप में चुकाना पडा । इसके कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। बाद में उन्होंने सुधाकरन को दत्तक पुत्र मानने से भी इंकार कर दिया। 
      बाद में उन्होंने महंगी साड़ी और जेवर रहित रहने का प्रण किया 14 साल तक उन्होंने अपने शरीर पर कोई गहना धारण नही किया। सन 2011 में अपने सहयोगी के अनुरोध पर गहने पहनने शुरू किये। 
     वह नारी कॉन्ट्रेक्टर ,मंसूर अली पटौदी और शम्मी कपूर को पसंद करती थी। 
     तमिलनाडु में जाति व्यवस्था पर बहुत सख्ती से पालन किया जाता हे. दलितो की हालत दयनीय थी। उन्होंने स्वयं उच्च कुलीन ब्राह्मण होते हुए, उनके उत्थान के लिए कई उपाय किये। वह तमिलनाडु के सभी वर्गो के उत्थान के लिए जीवन भर लगी रही। 
       उनको समझने वाला ,उनके अकेलेपन का साथी कभी उन्हें मयस्सर नही हुआ। थोड़ा बहुत उन्हें समझने वाली केवल शशिकला, उनकी सहेली थी। उनके बीच भी जहर देने  की घटना ने मनमुटाव ला दिया। इतनी उचाईयो पर पहुँचने वाले किस तरह डरे, सहमे और अकेलेपन के शिकार होते है। जयललिता का जीवन इसका  जीवन्त  उदाहरण है। उनके किये कामो के कारण उनके चाहने वालो के आँसू रोके नही रुक रहे है। उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ देखकर यकीन करना मुश्किल हो रहा था वह किस तरह लोगो के मन में समायी हुई थी। चारो और जनसैलाव दिखाई दे रहा था। 
       

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