#haphazard form of child marriage part -2

                      बालविवाह का वीभत्स रूप भाग -2 

  अरूप के  रोने की आवाज से उसकी बुआ की चेतना लौटी। नमिता ने अरूप की देखभाल करनी शुरू की। इतने छोटे अरूप की जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी थी। इतने छोटे लाचार और बेबस अरूप की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा था।उसकी चीखो से बड़ा सबका गम था।  उसकी पूरी ताकत से चिल्लाने की आवाज भी कमरे के बाहर तक नहीं जा रही थी।
     घबराये हुए रूपम को रश्मि के मायके उसकी मौत  की खबर देने की जिम्मेदारी सौंपी  गई। रूपम की हिम्मत वहाँ  जाने की नहीं हो रही थी। वह उन लोगो को रश्मि की मौत की खबर देने के बाद के परिणाम की कल्पना करके सिहर उठता था। लेकिन उसकी नानुकर काम नहीं आयी। सभी को इस हालत का सामना करने से डर लग रहा था।
     रश्मि के मायके वाले दबंग लोग थे।संयुक्त परिवार में रहते हुए उनकी बेटी को मौत के घाट उतारने  वाले का वो लोग स्वागत कभी  नहीं करेंगे।ये बात सभी जानते थे।  इस समय किसी के शब्द उनके जख्मो को भर नहीं सकते थे। यदि बड़े उसके परिवार में जाते तब उन्हें जितना अपमान सहना पड़ता शायद वे लोग भी मुखर हो उठते।ऐसे समय में  बेटी की मौत किसी और की लाश  भी उठवा सकती थी। इसलिए रूपम को खबर देने की जिम्मेदारी सौंपी गयी।
          रूपम के मुँह से मौत की खबर सुनकर उसके मायके वाले स्तब्ध रह गए। अपने नवासे की पैदायश की खबर से सभी अभिभूत थे वही बेटी की मौत की खबर से सभी को धक्का लगा। होश में आते  ही सभी को बहुत तेज गुस्सा आ रहा था। उनके लिए अपने गुस्से पर नियंत्रण करना मुश्किल था। उनके गुस्से के कारण सभी ने रूपम पर अच्छी तरह अपने हाथ आजमाये। जिसके कारण उसकी हालत खस्ता हो गयी थी। यानी  अधमरा हो गया था
      अपने किये गए कृत्य के कारण वह शांत बना रहा और माफ़ी  मांगता रहा।आदमियों का भयंकर गुस्सा देखकर रोती -बिलखती औरते बाहर आयी और  उन्हें समझाने लगी- ये वक्त रश्मि की मिट्टी  समेटने का है। हमें वहाँ  चलना चाहिए।
        ऐसे माहौल में दूसरी बेटी  रमा के कारण उन्होंने अपने पर नियंत्रण रखा वर्ना रश्मि के परिवार वाले इतने दबंग थे कि  वे रूपम को भी रश्मि के पास पहुंचाने  में देर न करते।रश्मि के मायके वाले जब तक गाँव  से दिल्ली पहुंचे   पुलिस केस बन चूका था। पुरे घर में पुलिस फैली हुई थी। हर तरफ चुप्पी छाई  हुई थी।
           पोस्टमार्टम  के  बाद रश्मि के  मृत शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया। रूपम को पुलिस पकड़ कर ले गई। उस घर में हर तरफ मातम छाया हुआ था।
       सबका ध्यान रमा की खुशामद करने में लगा हुआ था। उसके बयान पर रूपम की जिंदगी की डोर बंधी हुई थी। वह रश्मि की जेठानी के अलावा सगी बहन होने के कारण अहम थी उसी के शब्दों पर रूपम के जेल की अवधी  तय होनी थी।
       रमा के लिए रूपम को माफ़ करना असम्भव प्रतीत हो रहा था।वह रूपम का मुँह भी देखना नहीं चाहती थी। ऐसे समय उसका मन बदलवाना आसान काम नहीं था। 
        ऐसे माहौल में रिश्तेदार भी ज्यादा दिन तक नहीं टिके। वे बहाना बना कर जल्दी चले गए। रमा का  घर में रुकने का मन नहीं था लेकिन परिवार के दबाब में उसे रुकना पड़ा।
          15  दिन बीतने के बाद रमा का मन स्थिर हुआ। लेकिन वह रूपम और अरूप के प्रति बेरुख रही। उसे अरूप से कोई मोह नहीं रह गया था।उसे रह -रह कर अपनी बहन की मौत का जिम्मेदार नन्हा अरूप  भी नजर आता  था। उसे बार -बार लगता यदि अरूप पैदा नहीं होता तो उसकी बहन जीवित होती।  जिसके कारण    अरूप की सारी  जिम्मेदारी उसकी बुआ  नमिता ने उठा ली थी।
          रमा को परिवार के प्रत्येक सदस्य से नफरत हो गई थी। ये नफरत उसे खुद से भी हो रही थी कि  मेरे घर में रहते हुए मेरी छोटी बहन को मार  दिया गया। उसे बचाने  के लिए मै कुछ नहीं कर सकी.
      उसने घर छोड़ने का फैसला कर लिया। लेकिन सबकी अनुनय -विनय के कारण घर नहीं छोड़ सकी। उसका पति विनोद बहुत अच्छा था। जिसमे उसे कोई कमी दिखाई नहीं देती थी। लेकिन परिवार के हर सदस्य से बात तक करने से मना कर दिया। वह किसी का मुँह भी नहीं देखना चाहती थी।
     अंतत उसने समझौता स्वरूप  घर के बीच  में दीवार खड़ी  करवा दी। अब इस परिवार में विनोद के अलावा किसी और  सदस्य से उसने सारे  सम्बन्ध तोड़ लिए। अब वह सीधी -साधी  बहू की जगह अपनी शर्तो पर घर चलाने  वाली दबंग औरत  बन गई थी।
         रूपम को जेल की चार -दीवारी से बाहर लाने   के लिए परिवार के सारे  सदस्य हर उपाय करने लगे। उनके उपाय सार्थक हुए रमा का गुस्सा कुछ शांत हुआ। लोगो की अनुनय-विनय  काम आयी रमा के बयान के आधार पर   रूपम एक साल बाद जेल से बाहर आया  .
      अरूप को  पैदा होते ही माँ - बाप के प्यार से महरूम होना पड़ा। इसमें अरूप का क्या दोष था।जिंदगी में माँ  का अहसास वह कभी महसूस नहीं कर पायेगा। हमेशा माँ का प्यार उसे दादी और बुआ से मिला। उन्होंने उसे भरसक प्यार दिया लेकिन एक खलिस जीवन में हमेशा रहेगी।
     बाकी  अगली बार ---------   
        

#HAPHAZARD FORM OF CHILD MARRIAGE

                    बालविवाह का वीभत्स रूप  


 बालविवाह के कारण कुछ लोगो की जिंदगी बुरी तरह बर्बाद हो जाती है। उसका उदाहरण मेरे पड़ोस में रहने वाले रूपम की जिंदगी है। गुस्से और नासमझी के   कारण उसने छोटी उम्र में सब कुछ खो दिया। बाकी  जीवन प्रायश्चित स्वरूप बीत  गई।
         मेरे पड़ोस में  रहने वाले विनोद के   लिए बहुत सुंदर लड़की का रिश्ता आया। जब घर  के लोग लड़की देखने गए उन्हें वह  लड़की बहुत पसंद आयी।  उन्हें छोटी बहन जो उस समय केवल 15  साल की थी।  वह भी पसंद आ गयी। उन्होंने लड़की वालो से उसका रिश्ता भी छोटे भाई रूपम के लिए मांग लिया। उस समय रूपम की उम्र मुश्किल से 18  साल की थी। उन लोगो ने रूपम से पसंद -नापसंद पूछना जरूरी नहीं समझा।
        विनोद की शादी, समय आने पर धूमधाम से हुई सारे  रीति -रिवाज पूरे  किये गए। विनोद शादी की ख़ुशी से सराबोर था। लेकिन रूपम आखिरी समय तक अपनी शादी का विरोध करता रहा। लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी। वह   गुस्से में  किसी तरह के रीति -रिवाज  करवाने के लिए तैयार नहीं हुआ। सिर्फ सारे  रस्मो -रिवाज विनोद के हुए।
        मैंने  शादी के समय रूपम की हठधर्मी देखी  थी। जिसे देखकर लग रहा था कि  शादी के समय हमारे समाज में लड़के की भी कोई नहीं सुनता।
      सगा  भाई होने के कारण रूपम शादी में शामिल हुआ।  उसका बस चलता तो बाराती बनकर भी नहीं जाता। उसका बेबस और मुरझाया चेहरा मुझे द्रवित कर रहा था। उसकी बेबसी मुझे बेचैन कर रही थी।
      अगले दिन विनोद की बहू  आयी तब मैने  देखा रूपम की बहू रश्मि   भी उसके साथ है। उसकी मुँह दिखाई करने गई तब उसकी सुंदरता देखकर अवाक् रह गई। वह बड़ी से भी ज्यादा सुंदर थी।
           दोनों बहने चार दिन ससुराल में रहकर  मायके चली गई। उन्होने  एक महीने बाद बड़ी बहन रमा  को भेज दिया छोटी बहनरश्मि  को नहीं भेजा  . उन्होंने उसका गौना  कुछ साल बाद करने के लिए कहा। रूपम के परिवार वालो ने इसका विरोध नहीं किया। क्योंकि उन दोनों की उम्र छोटी थी।
        चार दिन साथ रहने के  परिणामस्वरूप  रश्मि गर्भवती हो गई।  जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी जबकि विनोद की पत्नी रमा  के गर्भवती होने के कोई आसार  नहीं थे।
      नासमझ रूपम का सभी अनेक तरह से मजाक बनाने  लगे। उस मजाक से वह खिसियाया रहता। उसका गुस्सा सातवे आसमान में चढ़ा रहता। रश्मि शादी के बाद  केवल दो बार ससुराल आयी थी। उसके बाद बच्चे होने के समय उसका ससुराल में पदार्पण हुआ।
       नौ  महीने के बाद रश्मि ने एक सुंदर और स्वस्थ बेटे  को जन्म दिया।हर तरफ खुशियाँ  मनाई जा रही थी। जिस घर में एक साल के अंदर दोहरी ख़ुशी आ गई हो उसकी खुशियों का क्या ठिकाना।
        रूपम के दोस्त उसकी खिल्ली उड़ा  रहे थे। जिसका सामना नासमझ रूपम नहीं कर पा  रहा था। वह हर समय गुस्से में भरा रहता।उसकी झल्लाहट से सब बेपरवाह थे। 19  साल के रूपम को बेटे का जन्म कोई ख़ुशी नहीं दे रहा  था । उसकी पढ़ाई  भी पूरी नहीं हो सकी थी। उस पर रोजगार मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। अब तक घर के बड़े उसका खर्चा उठा रहे थे। उसपर रूपम का अब पूरा परिवार हो गया था। उसकी खीझ और तिलमिलाहट उसके चेहरे से साफ झलकती थी। खुशियों के माहौल में रूपम की बेबसी को समझने का किसी ने प्रयास नहीं किया।
      रूपम अपना गुस्सा किसपर निकालता। कोई उसे समझ नहीं पा रहा था।जब  रात  में  रूपम अपने कमरे में गया तब उसका रश्मि से झगड़ा हो गया। वह गुस्से में भरा हुआ था। विरोधस्वरूप कमजोर और लाचार रश्मि के शब्द उसे सहन नहीं हुए।
      रूपम को अपनी मर्दाना ताकत का अंदाजा नहीं था। उसने गुस्से में उसकी गर्दन पर अपने हाथ रख दिए उसकी गिरफ्त कब बढ़ती चली गई उसे इसका अंदाजा नहीं हुआ। कुछ ही समय में रश्मि की  निर्जीव देह उसकी बाहों  में झूल गई तब उसके होश फाख्ता हो गए। उसे रश्मि के धरती से कुच  कर जाने का कोई अंदाजा नहीं था।
        रूपम हड़बड़ाता और  घबराया हुआ  अपने कमरे से बाहर आया। उसने चिल्ला कर सबको इकट्ठा कर लिया। उसके सोचने -समझने की शक्ति खत्म हो गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था ये क्या हो गया। इसकी उसने उम्मीद नहीं की थी।
      परिवार के सभी बड़े इकट्ठे हुए ऐसे माहौल का सामना कैसे किया जाये किसी को समझ नहीं आ रहा था। रश्मि के मायके वालो को मृत्यु का समाचार देने कौन  जाये। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी।
       रश्मि की बड़ी बहन रमा  उस  के शब  के पास बैठी बिलख रही थी। जिस बहन के साथ खेल -कूद कर बड़ी हुई उसकी मौत का सदमा उसकी बर्दास्त के बाहर था।रश्मि का बेटा  भूख के मारे  चिल्ला रहा था। उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। चिल्ला -चिल्ला कर एक हफ्ते का अरूप बेदम हुआ जा रहा था।
      इसका अगला भाग जल्दी आएगा।
       


#SHRINAGAR KA SHANKRACHARAYA MANDIR

                                  श्रीनगर का  शंकराचार्य मंदिर 

     कश्मीर में अधिकतर स्थानों से  डल झील दिखाई देती है। वह बहुत बड़ी जगह में फैली हुई है। कहा जाता है -"अब  श्  ये पहले की जगह केवल एक चौथाई   रह गई है। " जब ये अब मुझे इतनी बड़ी लग रही है तब सोच कर देखो पहले  कितनी बड़ी  जगह में   होगी। . कश्मीर का जन -जीवन इससे जुड़ा हुआ है। इस समय इसके चारो तरफ आबादी है। हर समय चहल -पहल दिखाई देती है। झील के चारो तरफ अनेक होटल है। जिनकी खिड़कियों से आप हर समय इसका नजारा देख सकते है।
       अधिकतर पहाड़ी इलाको में मुख्य घूमने की जगह माल  रोड होते है। यहाँ  का माल  रोड आप डल  लेक के चारो तरफ बनीं  हुई सड़क को कह सकते है। यहाँ  पर शाम के समय रौनक  देखने लायक होती है। इसी रोड पर सेन्टॉर  होटल बना हुआ है। जिसमे प्रधान -मंत्री  जैसे बड़े लोग आकर रुकते है। इस रोड के चारो तरफ का   दृश्य  बहुत लुभावना है। लेकिन सुरक्षित स्थान होने के कारण इसकी सुरक्षा के विशेष प्रबंध किये जाते है।
       हमारे  सामने प्रधान -मंत्री के आने के कार्यक्रम के कारण दो दिन ये सड़क आम  जनता के लिए बंद कर दी गयी थी जिसका खामियाजा हमे उठाना पड़ा। उस समय हमे बहुत गुस्सा आया  था। वहाँ  के लोगो ने बताया -यदि मोदी जी की जगह कोई और प्रधानमंत्री होता था तब इतनी अधिक सुरक्षा का प्रबंध नहीं किया जाता था। यहाँ के लोग मोदी जी को पसंद नहीं करते इसलिए इतनी अधिक सुरक्षा का इंतजाम करना पड  रहा  है।
         उस दिन शाम के समय हमने शंकराचार्य मंदिर देखा। शंकराचार्य मंदिर के रास्ते  में कई स्थानों पर विशेष रूप से सुरक्षा के इंतजाम किये गए थे। उसे देखकर लग रहा था। हमारे मंदिर कितने असुरक्षित हो गए है। जबकि दरगाह वगैरह में किसी विशेष प्रकार की सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे। जहाँ  हमारी गाड़ी ने हमें छोड़ा। वहाँ  से ढाई सौ  सीढिया  ऊपर चढ़नी थी उसके बाद हमे शिवलिंग के दर्शन होने थे। हर जगह जाने के लिए हम जैसे लोगो को गाड़ियां  मिल जाती है इसलिए इतनी अधिक सीढिया  देख कर हिम्मत पस्त  होने लगी कोई और चारा न होने के कारण सारी  हिम्मत इकठ्ठी करके ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया। लेकिन शरीर साथ नहीं दे पा  रहा था इस कारण दस सीढ़ियों के बाद रुक कर कुछ देर आराम करना पड  रहा था।
        अंतत हम मंदिर तक पहुँच  गए। वहाँ  से श्रीनगर का भव्य नजारा देखकर हम अपनी थकान  भूल गए। श्रीनगर पूरा हमे दिखाई दे रहा था। डल झील जो हमे सड़क के किनारे से बहुत विशाल दिखाई दे रही थी। वह ऊपर से सही रूप में दिख रही थी।
       शंकराचार्य मंदिर की बनावट देखकर लगता है  प्राचीन समय के लोग कितने जुझारू होते थे। जिन ऊंचाइयों तक  हम बिना समान लिए चढ़ नहीं पाते।  उन्होंने प्राचीन समय में बिना किसी सुविधा के अपनी शारीरिक क्षमता के आधार पर इतना विशाल निर्माण कर दिया। जब शुरू में हमारे सलाहकार ने इस मंदिर की चर्चा की थी तब मैने उन्हें मना  कर दिया था। इतनी ऊंचाई के कारण हिम्मत जुटानी बहुत मुश्किल थी। लेकिन इतने अधिक परिश्रम का फल हमे मीठा मिला।  
      हम दूर से परेशानियाँ  देखकर डर  जाते है। लेकिन मंजिल पर पहुँचने  का सुखद अहसास   आत्मविभोर कर देता है

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...