प्राचीनता और आधुनिकता का संगम कीर्ति मंदिर
गुजरात में घूमते हुए हमे बहुत कम आबादी मिली अधिकतर खुली जगह दिखाई दे रही थी। सोचकर हैरानी हो रही थी कि गुजरात भारत का ही हिस्सा है या हम किसी अन्य देश में घूम रहे है। मोदी जी के साढ़े 6 करोड़ देश वासियो का आह्वान सोचने पर मजबूर कर रहा था यहाँ इतनी कम आबादी क्यों है। हम घनी आबादी में रहने वाले लोगो के लिए इतनी चौड़ी और खुली जन विहिन सड़को पर चलना अचंभा सा लगता है।
हमने इससे पहले उत्तर प्रदेश जैसे इलाको में सफर किया है जहाँ की आबादी लगभग बाइस करोड़ है। आपको मेरे विचारो का कारण समझ आ गया होगा।
द्वारका से हम पोरबंदर गाँधी जी की जन्मस्थली देखने के लिए रवाना हुए। हर तरफ पवनचक्की से बिजली बनाई जाती दिखाई दे रही थी। उनके बड़े पंखे और आकार मन को बेचैन कर रहा था। यहाँ बहती हवा का सदुपयोग हो रहा था। उन्हें पास से देखने की लालसा ने मुझे उनके पास जाने पर मजबूर कर दिया।
वह केवल खड़ा हुआ ढांचा न होकर हमे बहुत कुछ बता रहा था। उसके सामने मानव बेहद अदना लग रहा था। उसमे ऊपर तक जाने के लिए सीढिया बनी हुई थी। जिनपर जिगरे वाले लोग ही चढ़ सकते थे। उसके नीचे बहुत बड़ा द्वार बना हुआ था। मेरा कहने का मतलब वह जो हमे दूर से दिखाई देता है केवल उतना नहीं बल्कि विराट मेकेनिज्म था।
हमे पोरबंदर में गाँधी जन्मस्थली पहुंचने पर भीड़भरा इलाका दिखाई दिया। क्योंकि वह गाँधी जी के जन्म से पहले बसा हुआ था। जिसके कारण वहाँ की आबादी अधिक थी। वह भारत के अन्य शहरो के सामान ही था। वह इलाका रिहायश कम और बाजार ज्यादा दिखाई दे रहा था।
गाँधी जी की जन्मस्थली को कीर्ति मंदिर नाम से पहचाना जाता है। उसका नामकरण उचित जान पड़ा क्योंकि भारत की कीर्ति उनके द्वारा ही दूर तक फैली थी। उस स्थान को काफी बदल दिया गया है। बाहरी रूप में यह बहुत सूंदर और आधुनिक बना दिया गया है। लेकिन अंदर से उसके प्राचीन रूप में परिवर्तन करने की कोशिश नहीं की गई है।
उसे देखकर पुराने घरो की वास्तुकला का आभास होता है। उस जमाने में लकड़ी की सीढिया और छत होती थी। सीढ़ियों पर रेलिंग काफी नीची थी जिसके कारण पकड़ने के लिए रस्सी भी बंधी हुई थी। उस जमाने के अमीर लोगो के घर देख कर अद्भुत अहसास हो रहा था.
गाँधी जी के उद्गार वहाँ अनेक जगहों पर लिखे दिखाई देते है। उनकी जन्म से लेकर मृत्यु तक के सामान संग्रहालय में रखे हुए है। उनकी फोटो तो बहुत समय से देख रहे है इसलिए उनको देखने में उतना मजा नहीं आया जितना उनके प्रयोग किये गए सामान को देख कर आया उनका प्राचीन रूप मन को मोह रहा था।
साबरमती आश्रम में भी गाँधी जी से संबंधित चीजों को देखना बहुत अच्छा लग रहा था। वहाँ का खुला माहौल ,साबरमती का किनारा देखकर अद्भुत अहसास हुआ । गाँधी जी के आश्रम में बिना पंखे के भी ठंडक का अहसास हो रहा था। उसके प्राचीन रूप को यथासंभव बदलने से बचने का प्रयास किया गया है। सिर्फ उतना परिवर्तन किया गया है जिससे इसके मूल रूप को ठेस नहीं पहुंचे।
भारत में केवल साबरमती नदी ऐसी नदी है जिसके साफ करने के प्रयास सार्थक हुए है। इसको पिकनिक स्थल के रूप में विकसित किया गया है। यहाँ पर फरबरी के महीने में 40 डिग्री का तापमान था जिसके कारण नदी का किनारा खुशनुमा अहसास दिला रहा था
गुजरात के लोग काफी परिस्कृत रूचि के लगे उनके अंदर सद्भावना दिखाई दी।








