अडालज की बाब उर्फ़ त्यागमय अदभूत बलिदान
अहमदाबाद में अडालज की बाब वास्तुशास्त्र के हिसाब से बेहद सूंदर बाबड़ी है। इसके निर्माण की कहानी मन को सोचने पर मजबूर कर देती है।क्या सच में कोई रानी जनता की भलाई के लिए इस सीमा तक त्याग कर सकती है। हमारा इतिहास त्याग और बलिदान की कहानियो से भरा हुआ है। महमूद बेगड़ा ने अहमदाबाद पर आक्रमण करने के बाद राजा को मौत के घाट उतार देने के बाद रानी से विवाह करने की ख्वाहिश जताई।
तब रानी ने कहा "-मेरे पति ने ये बाब बनाने का बीड़ा उठाया था। यदि तुम इस बाब को पूरा कर दोगे तब मै तुमसे विवाह कर लुंगी। "
उसकी शर्त सुनकर बेगड़ा को गुस्सा आया लेकिन उसने रानियों के जौहर करने की खबरे सुन रखी थी। इसलिए उसे ख़ुशी हुई कि ये रानी आत्मदाह करने की जगह केवल शर्त रख रही है। जो पूरा करना मुश्किल नहीं है। उसने ख़ुशी -ख़ुशी काम को पूरा करवाना शुरू कर दिया।
हर तरफ रानी के विवाह की चर्चा होने लगी। उसके ऊपर अनेक लांछन भी लगाए जा रहे थे। लेकिन बाबड़ी का निर्माण कार्य भी जोर -शोर से चल रहा था।
आखिर काम पूरा हो गया। तब बेगड़ा ने रानी से शादी करने की बात चलाई। अब रानी उसका विरोध नहीं कर सकती थी।
रानी सोलह श्रृंगार करके दुल्हन के समान तैयार हुई और किले की छत से कूद कर आत्माहुति दे दी। उससे पहले उसने महमूद बेगड़ा के नाम खत लिख कर अपना मंतव्य जाहिर कर दिया -"मै उसी दिन मर गई थी जिस दिन मेरा पति युद्ध में शहीद हुआ था। मेने आपसे शादी इसलिए स्वीकार की थी मै बाबड़ी का काम पूरा होते देखना चाहती थी। यदि मै उसी समय मर जाती तब बाबड़ी का काम भी रुक जाता। मै इस काम को अधूरा नहीं छोड़ना चाहती थी। "
रानी की ऐसी शहादत इससे पहले सुनने में नहीं आयी थी। जो औरत मरने का प्रण कर चुकी थी वह किस तरह प्रत्येक दिन तिल -तिल करके मरती होगी लेकिन जनता की भलाई के लिए सांसे लेने के लिए बाध्य थी।
इसकी कहानी दिल को बेध जाती है। लेकिन निर्माण कला मन को हर लेती है। ये बाब पांच मंजिला है। इसकी हर मंजिल बहुत सूंदर वास्तु चित्रों से उकेरी गई है। हर मंजिल ठंडक का अहसास दिलाती है। ये पहली बाब है जो वास्तु कला का अद्भुत नमूना ही नहीं बल्कि जिस मकसद से इसका निर्माण किया गया था उसे भी सार्थक करती है अर्थात इसमें पानी भी भरा हुआ है। सुखी हुई नहीं है। लोग इसमें कूद कर खुदकशी का प्रयास न करे इसलिए इसे जाल से ढक दिया गया है। एक जाल ठीक पानी के ऊपर बनाया गया है। दूसरा पांचवी मंजिल के ऊपर बनाया गया है जिससे सुंदरता तो निहारी जा सके लेकिन आपत्तिजनक काम न किया जाये।
दिल्ली की उग्रसेन की बाबड़ी इसके सामने अधूरी लगती है। अडालज की बाब के अंदर जाने के लिए तीन तरफ से रस्ते है। इसके अंदर जाने के तीनो रास्ते नक्काशीदार बने है .यह दिल्ली की बाबड़ी से लगभग तिगुनी बड़ी है। इसमें सफाई का विशेष ध्यान रखा गया है। कही भी बैठ कर काम किया जा सकता है। यह इस तरह से बनाई गयी है कि इसमें छाया रहती है। हमने दोपहर के समय इसमें प्रवेश किया था। लेकिन बहुत सारी जगह छायादार थी।
इसमें मनोरंजक कार्य की प्रस्तुति के लिए रंगमंच भी बना हुआ था। ये इतनी विशाल है की इसमें सेंकडो लोग समा जाये। इसमें कई स्थानों पर छोटे छोटे कमरे भी बने हुए है। जिसे देखकर लगता है जैसे किसी पर्दानशी के बैठने के लिए बनाये गए है।
इसे देखने के लिए दूर और पास हर जगह से लोग आते है। मेने यहाँ पर हर उम्र के लोगो का हुजूम देखा है। जिसे देख कर लोगो के मन नए उत्साह से भर उठते है। यहाँ का हर कोना सुंदरता का बेजोड़ नमूना है।



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